शनिवार, 18 जून 2022

उल्लूपने का काम

उपद्रवियों से विनम्र निवेदन है कि राष्ट्रहित में राष्ट्रीय सम्पत्ति को हानि पहुँचाना बंद करें। आपकी पीड़ा शायद मेरी भी हो। किन्तु लोकतंत्र में विरोध का यह तरीका बिल्कुल भी जायज नहीं है। सरकार की नीतियों से असहमति अपनी जगह और उसके लिए तोड़फोड़ अपनी जगह। 
सरकार ने तो बिना विचारे काम करने की हठ पकड़ ली है। पहले नोटबंदी, फिर सी ए ए, फिर किसानों के लिए कानून और अब अग्निवीर योजना। किस-किस बात के लिए तोड़ फोड़ करोगे। आप किसी योजना से असहमत हैं तो आपके पास शान्तिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है या चुनाव में आपके पास मौका होता है कि आप सरकार को उसकी औकात बता सकें। 
समस्या यह भी है कि शान्तिपूर्ण प्रदर्शन की भाषा वो सरकार कैसे समझे जिसकी आईटी सेल लगातार प्रचारित कर रही है कि गाँधी की शान्ति और अहिंसा छलावा थी। अंग्रेज देश छोड़ कर इसलिए गए क्योंकि हिंसक आन्दोलन उस काल में हुए। अंग्रेजों की दृष्टि में जो उग्रवादी थे वे इस सरकार के समर्थकों की दृष्टि में सबसे बड़े देशभक्त थे और गाँधी दोगले। तो भैया जैसा बोओगे वैसा काटोगे यह जग की रीति है। एक ओर सरकार व उसके समर्थक उग्रवाद को महिमामंडित करें और दूसरी ओर तोड़ फोड़ करने वालों की निन्दा ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं।
तो भैया चुनाव तक इन्तजार करो और तोड़ फोड़ बन्द करो।
सरकार के लिए भी यह आत्मावलोकन का अवसर है कि लम्बे समय तक आप जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते। जनता में लोकप्रियता हासिल कर लेना और जनहित के फैसले लेना दो अलग अलग बातें हैं। जनता प्रायः छल को समझ नहीं पाती और जब तक समझती है तब तक देर हो चुकी होती है। इस सरकार और वर्तमान जन के मध्य भी यही है। 
सरकार कुछ भी कहे कि वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करेगी किन्तु करते समय वह पक्षपात अवश्य करेगी। हर जगह वह बुलडोजर का प्रयोग नहीं कर सकती। हर जगह बुलडोजर सफल भी नहीं हो सकता यह बात मेरे जैसे दो चार गाँधी समर्थक ही जानते हैं। 
लोकतंत्र में बहुमत की चलती है और यही लोकतंत्र का गुण भी है और अवगुण भी। गुण और अवगुण के मध्य बहुत बारीक विभाजक रेखा है। उसे देखने के लिए बहुत बारीक बुद्धि भी चाहिए। बुद्धि के सन्दर्भ में जार्ज बर्नाड शॉ के पात्र ब्लंटशली ने रैना से कहा, "नाइन सोल्जर्स आउट ऑफ टेन आर बॉर्न फूल्स।"
दुर्भाग्य से इस समय विवाद भी सोल्जर्स के सन्दर्भ में ही है। लेकिन मैं इस कथन को सम्पूर्ण समाज पर लागू कर जब लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ तो यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा अवगुण है। बहुत बार नौ लोगों ने उल्लूपने का काम किया है और आगे भी करते रहेंगे।

सोमवार, 13 जून 2022

लाजवाबी

गुलब्बो कहाँ तक गुलाबी रहेगी,
नजर से कहाँ तक शराबी रहेगी,
मगर नेह की अग्नि उर से उठी है,
जहाँ तक रहे लाजवाबी रहेगी।।1।।
गला ढल गया गुम हुआ है तरन्नुम,
अभी इल्तिजा गर मिले वो तबस्सुम, 
गुलब्बो समाँँ बाँध देगी जहाँ में, 
बना देगी जन्नत मिले जो जहन्नुम।।2।।
नोट-गुलब्बो प्रायः मेरी कविताओं का ऐसा काल्पनिक पात्र है जिसे मैं प्रेम करता हूँ।

शुक्रवार, 10 जून 2022

चित्रमाला

ये जो हँसते-मुस्कुराते हुए एकदूसरे के कँधे पर हाथ रखकर, गोद में उठाकर या आलिंगनबद्ध होकर बीसियों तरह की मुद्राओं से युक्त चित्रमाला सोशल मीडिया पर लगाई है सच बताना इस प्रेम में कितनी सच्चाई है। प्रश्न ये भी है कि विवशताओं के मध्य यह फिल्मी अदाकारी कहाँ से आई है। तुम्हारे अधरों की भंगिमा लिखे गए शब्दों का साथ नहीं देती, नयन तो किसी स्वर्णमृग या स्वर्णमृगी के पीछे गए हुए लगते हैं। कभी कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि चिपका दिए गए हो काटकर पास-पास। 
ये जो पग पग पर साथ देनेवाली बात लिख देते हो इसमें कितनी सच्चाई है। सच बताना किसके दबाव में ये बयान चिपका देते हो। मिसेज के साथ फोटो मजबूरी है। प्रेस्टीज का सवाल है बाबा। न कहीं काशी न कहीं काबा। मगर विशेषण बाबू, बेबी, सोना और बाबा। कभी किच किच नहीं होती? कितने नीरस हो? या सच कह नहीं सकते बेबस हो। 

गुरुवार, 9 जून 2022

बेटा बहू


जिनके हित में बंजर कर दी अपनी हरी बहार में,
बेटे बहू नहीं आते हैं अब घर पर त्यौहार में।।
अपनी अपनी ध्वजा उठाए सब विकास की चाह रहे,
रोजीरोटी का रण लड़ते देख विजय की राह रहे।
कुछ तो खोए हुए तरक्की की सतरंग मल्हार में।।
बाहर बेटा गया अकेला दो होकर अब रहता है,
लेकर बहू आ रहा घर पर हर महिने ही कहता है,
आँखें उलझी हुई प्रतीक्षारूपी काँस-सिवार में।।
बेटे के सिर सेहरा देखें मन की चाह मरी मन में,
कभी नहीं जानी है मस्ती पोती-पोतों के धन में,
सिसक सिसक कर कटे जिंदगी जीवन की पतझार में।।

सोमवार, 6 जून 2022

छप्पन इंची गुब्बारा

2014 में गुब्बारे का साइज 56 इंच था। जनभावनाओं के सहारे उड़ा तो उड़ता गया। भूल गया कि हर उड़ान की सीमा है। जमीन और आसमान के तापमान और दशाओं में फर्क होता है। उड़ने की स्वतंत्रता में संविधान का बंधन है। अब संविधान के अनुच्छेदों में छेद ढूँढ़ कर बढ़ना सरल रहा तो बढ़ लिये। लेकिन धर्म व जाति ऐसा भावनात्मक बिन्दु है जिस पर भारत जैसे बहुलतावादी देश में खड़े होकर कला करना बहुत मुश्किल है। 
किसानों का विरोध करते करते इस गुब्बारे में हवा भरनेवालों ने सोये हुए खालिस्तानियों को भी तमाशा देखने के लिए बुला लिया। मैं इसे आन्तरिक कूटनीतिक असफलता मानता हूँ। 
पुनश्च मुस्लिमों व कश्मीर का मसला ऐसा है जो एक दूसरे से अलग होते हुए भी एक दूसरे में गुंथे हैं। इस मसले से ऐसा समूह जुड़ा है जिसकी आँखों पर आसमानी किताब का वो नूर है जिसमें तर्क की रोशनाई नहीं होती। जिसके लिए छठवीं शताब्दी और बाइसवीं शताब्दी के समाज में कोई अन्तर नहीं है। इसने इतनी सामान्य बात नहीं समझी संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। इसने यह नहीं सीखा कि जो परिवर्तित न होंगे तो नष्ट हो जाएंगे। 
इस वर्ग के अन्दर ही कुछ लोग जिन्होंने परिवर्तनों को स्वीकारा भी उनका भी व्यवहार दोगला है। बस एक उदाहरण पर्याप्त है कि संगीत इस्लाम विरोधी है लेकिन किसी की शादी में जाकर बाजा बजाना बिल्कुल भी इस्लाम विरोधी नहीं है।
जो भी हो मेरा इस्लाम और इस्लामिकों से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें अपना आचार विचार मुबारक। 
मैं तो गुब्बारे की चर्चा कर रहा था। गुब्बारे में हवा भरनेवालों ने  अयोध्या की हरित भूमि से अपने गुब्बारे को पार कराया तो गुब्बारे में पंख लग गए। एक तो छप्पन इंच दूसरे पंख चढ़ा। मथुरा व काशी की सैर पर भी निकल पड़ा। कुछ तमाशाई जोश में आकर गुब्बारे को पूरे देश की सैर कराने पर आवाज लगाने लगे। बड़ी विवशता में या सदाशयता भी हो सकती है कि आर एस एस के मुखिया को कहना पड़ा कि काशी की तरह का अभियान प्रत्येक बिल्डिंग के लिए नहीं चलाया जाएगा। अच्छा है। 
कश्मीर में या विश्व में अन्यत्र जब कोई आतंकी घटना होती है तो जैसे यह वर्ग देश में या विश्व में रहता नहीं या अन्धा बहरा है लेकिन जैसे ही किसी आतंकी की गर्दन पर लात रखी जाती है तो पेट वाले भी पत्थर टटोलने लगते हैं। जब तक यह वर्ग अपनी भेदभाव वाली मानसिकता से बाहर नहीं आएगा यह संघर्ष अनवरत जारी रहेगा। 
अब फिर गुब्बारे पर आते हैं। गुब्बारा जब बहुत ऊँचाई पर पर पहुँचा तो जोशीले दर्शकों से उसकी दूरी बढ़ गई। शायद एक दूसरे का तालमेल भी टूटा। दर्शकों तक गुब्बारे की प्रतिक्रिया शायद नहीं पहुँच रही या दर्शक गुब्बारे की गति से कोई सबक नहीं लेना चाहते। दर्शक यह भी नहीं समझ पा रहे कि समय के साथ गुब्बारे की दीवारों से वायु विसरित हो जाती है और गुब्बारा नम्र हो जाता है। गुब्बारे का साइज भी कम हो जाता है। 
दर्शकों की समस्या यह है कि उनकी बुद्धि तेज हो गई है कि वे पीछे रह गए और बुद्धि आगे निकल गई। वे भूल जाते हैं कि वे उस शत्रु को कभी समाप्त नहीं कर सकते जिसकी मनोवृत्ति नहीं परिवर्तित कर सकते। शत्रु को समाप्त करना है तो मनोवृत्ति को परिवर्तित करें। लेकिन हवाभरने वाले स्वयं स्वीकारते हैं कि जल को रंगीन बना सकते हैं कीचड़ को नहीं।तो भैया कीचड़ में लोट लगाना बंद करें। गुब्बारे को सही दिशा में उड़ने के लिए प्रेरित करें। गुब्बारे को भी सोचना पड़ेगा जहाँ दस इंच की जगह हो वहाँ से छप्पन इंच नहीं गुजर सकता। हवा भरनेवाले गुब्बारे का साइज कम होते नहीं देखना चाहते यद्यपि साइज कम होना नियति है। 

रविवार, 5 जून 2022

नया व्यवसाय

आजकल पकड़ा हुआ मैंने नया व्यवसाय है।
शव पुराने खोदता या संग रहती गाय है।।
पात्र अपने मन मुताबिक चुन लिए इतिहास से,
कींच में डाला किसी को रंग दिया उजियास से।।
चोंच लड़तीं जा रहीं हैं गीत सबके ही मधुर।
रँग बिरंगी हर किसी की टोपियाँ हैं उच्चतर।।
शीश नंगा ले फिरूँ अपनी प्रकृति में है नहीं।
गूँथ कर उद्दण्डता सिर पर उठाये हूँ मही।।
हाकिमों ने भय बनाया है सभी के हृदय में।
आग का मैं भी खिलाड़ी नित्य रहता प्रलय में।।
ध्वंस से सम्बन्ध तोड़े मैं सृजक हूँ सृष्टि का।
यत्न करता हूँ कि कृति में भाव हो उत्कृष्टि का।।

शनिवार, 4 जून 2022

रखवाला

अपना तो हर काम निराला होता है।
जब आँखें हों बन्द उजाला होता है।।
घर खाली है इतने भ्रम में मत रहना,
प्रायः मेन गेट पर ताला होता है।।
जो भी जाति नहीं लड़ पाती अपना रण।
उसका लिखा पढ़ा सब काला होता है।।
अपने तन मन में लड़ने का जोश न हो।
साथ न कोई देनेवाला होता है।।
यदि वैरी का शीष काटना ठन जाए।
हाथ खड्ग उर मध्य शिवाला होता है।।
घर को छोड़ भागते फिरने वालों का,
कहीं नहीं कोई रखवाला होता है।।

शुक्रवार, 3 जून 2022

खुद से शादी

स्वयं से प्रेम तो बहुत से मनुष्य करते हैं, मैं भी करता हूँ। किन्तु विवाह तो किसी अन्य से ही किया है। विवाह का उद्देश्य प्रेम होता है पहली बार पता चला। हमारी सनातन परंपरा में तो दो अनजाने लोग विवाह करते रहे हैं बच्चे पैदा करते रहे हैं परिवार का विस्तार करते रहे हैं। उनमें कभी प्रेम हुआ तो ठीक नहीं हुआ तो ठीक। मेरे अपने विवाह को 26 वर्ष हो गए। मैं अपनी पत्नी से प्रेम करता हूँ निश्चय करके नहीं कह सकता। पत्नी को छोड़िये मेरे जानने वालों को कोई यह बता दे कि विमल कुमार शुक्ल को किसी से प्रेम भी है तो विश्वास नहीं करेंगे। 
विवाह का कारण प्रेम है तो यह भी आवश्यक नहीं। हमारे समाज में तमाम लोग हैं परस्पर प्रेम करके जीवन बिता देंगे पर विवाह नहीं करेंगे। विवाह किसी और से प्रेम किसी और से यह भी चलता है। 
फिल्म वालों ने लैला मजनूँ और शीरी फरहाद से टपोरियों को दिमाग में इस तरह भर दिया है कि अब प्रेम पहले फिर शादी और कभी कभी शादी से पहले ही ब्रेकअप। 
मैं कुछ लोगों को जानता हूँ जो विवाह करके अपना घर तो बसा  नहीं पाये हाँ प्रेम के चक्कर में दूसरे का तोड़ जरूर दिया। ऐसे लोग भी समाज में हैं विवाह नहीं करेंगे लेकिन हर फूल का आस्वाद ग्रहण करने के चक्कर में रहेंगे। एक उम्र पर जब स्थायित्व चाहेंगे तो फूलों के द्वारा स्वतः फेंक दिए जायेंगे। 
खैर आप विवाह करें न करें। आपकी इच्छा। संविधान अनुमति देता है। किन्तु बायोलॉजी का क्या? बायोलॉजी सभी सजीवों में (पेड़ पौधों सहित) अपनी सृष्टि विस्तार के लिए लैंगिक व अलैंगिक दो प्रकार के साधनों को इंगित करती है। लैंगिक व अलैंगिक जनन करनेवाले प्राणियों की पृथक पृथक विशेषताएं होती हैं। स्पष्टतः मनुष्य लैंगिक प्राणी है। जैसे ही बालक बालिकाएं किशोरावस्था में पहुँचते हैं विपरीत लिंगियों में आकर्षण बढ़ जाता है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। हाँ हमारी सामाजिक परम्पराओं व मान्यताओं के कारण हम लड़के लड़कियों के स्वतंत्र मेलजोल को अनैतिक मानते रहे हैं। 
इस अनैतिकता को नैतिकता का स्वरूप प्रदान करने के लिए ही विवाह को स्वीकारा गया है। दूसरे आयुर्वेद के जानने वाले जानते है कि शरीर के चौदह वेग भूख, प्यास, खाँसी, श्वास, जम्भाई आदि में एक वेग यौनेच्छा का भी है। इन सारे वेगों को रोकने से शरीर विकारग्रस्त हो जाता है। विवाह मनुष्य की यौन इच्छाओं की तृप्ति का साधन भी है। भौतिकी में भी न तो धनावेश-धनावेश आकर्षित होते हैं और न ऋणावेश-ऋणावेश। ये सदैव प्रतिकर्षित ही करते हैं। कार्यफलन के लिए धनावेश व ऋणावेश का संगम आवश्यक है। इसी प्रकार चुम्बक में ध्रुवों का व्यवहार भी होता है। उत्तर-उत्तर व दक्षिण-दक्षिण ध्रुव कभी नहीं मिलते। एकल ध्रुवीय चुम्बक का तो अस्तित्व ही नहीं होता। 
ठीक इसी प्रकार आप सनकी या महामानव हो सकते हैं किन्तु परिवार नहीं हो सकते। परिवार के लिए धनावेश-ऋणावेश, उत्तर ध्रुव-दक्षिण ध्रुव जैसे ही स्त्री-पुरूष तथा प्रेम और घृणा दोनों की ही आवश्यकता होती है। 
यह सम्भव है कि आपको अपने मनोनुकूल साथी मिलने में समय लगे इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें किन्तु मिलेगा अवश्य। न मिले फिर दूसरे को अपने मनोनुकूल बना लें। सबसे सरल है स्वयं दूसरे के मनोनुकूल बन जाएं। प्रेमी का यह भी एक स्वरूप होता है और सर्वोत्तम स्वरूप है कि हम वह बनें जो हमारा प्रेमी/प्रेमिका चाहता है/चाहती है। मार्ग अनन्त हैं हठ छोड़ कर देखें।
संक्षेपतः विवाह एक आवश्यक व नैतिक शर्त है, आप करें न करें आपकी मर्जी, किन्तु उपयुक्त अवस्था प्राप्त कर, पूर्ण स्वस्थ होकर भी विवाह नहीं करते तो आप मनोविकारी हैं हाँ सन्यासी हो जाएं अलग बात है। तो मेरा सुझाव है यदि आपकी उम्र हो गई है नैसर्गिकता का आनन्द लें विवाह करें और वैवाहिक धर्म का पालन करें। जिस प्रकार मार्ग सदैव समतल नहीं होता उसी प्रकार जीवन भी समतल नहीं होता। पर्वतारोहण से घबरायें नहीं।

मंगलवार, 31 मई 2022

हिन्दी मात्रा प्रयोग

बिन मात्रा के अजगर, अदरक, कटहल, शलजम, कलम।
हलचल, बरतन, खटपट, सरपट, टमटम, कलकल, जलम।।1।।
आ से आम, आग में भूना, खट्टा मीठा स्वाद।
खाना-दाना पेड़ दे रहा, खुद खाता है खाद।।2।।
किरन किशन से झगड़ा करती, बिना बात की बात।
इमली तो इठलाती फिरती, इतराती इफरात।।3।।
ईश्वर का ईनाम सभी कुछ, मीठा, तीखा, फीक।
खीर, खरी, खीरा, ककड़ी की, बात बड़ी बारीक।।4।।
उड़द, उड़ीसा, उबटन, उपला, उधम अउर उत्पात।
सुघड़, माधुरी, सुन्दर, युवती, फुलवारी, पुलकात।।5।।
सूटर पहने फुल्लू  फूले, ऊटपटाँगा ऊन।
ऊँट पूँछ कूबड़ को भूला, धाँसू देहरादून।।6।।
ऋषि के गृह मृग-मृगी टहलते, मृगतृष्णा से दूर।
कृषक, कृष्ण, कृषि, कृपा, गृहस्थी, घृत अमृत भरपूर।।7।।
एक अनेक नेक क्यों चरचे, बाँचे लेख अनन्त।
साँचे राँचे प्रेम नेम में, राधे रटते संत।।8।।
ऐरावत ने ऐनक पहनी, भैया है हैरान।
गैया-भैंस न शैय्या छोड़े, हो गये हैं शैतान।।9।।
ओंकार को रोज भजो जो, बोलो हरिहरिओम।
रोग, शोक, मद, मोह, छोड़कर, घूमो धरती-व्योम।।10।।
औरत, औषधि, मौसी, भौजी, लौकी, नौका, चौक।
गौरव, रौनक, रौशन, यौवन, दौलत, लौटा, शौक।।11।।
नग को नंग बना देती है, जग में करती जंग।
अं की बिन्दी का कमाल है, रग में भरती रंग।।12।।
अः की बात निराली कितनी, मजेदार निशि-अहः।
छः दिन कर्म रविः विश्रामः, सुखपूर्णः मम मनः।।13।।

मंगलवार, 24 मई 2022

जुआ वैध या अवैध

मैं अपने सुधी पाठकों से यह जानना चाहता हूँ कि क्या देश में जुआ खेलना वैध है अथवा अवैध। या फिर वैध और अवैध जुए के मध्य कोई विभाजक रेखा है? 
हमारे समाज में जुए का इतिहास बड़ा पुराना है।  महाभारत काल से भी पुराना। राजा नल अपना सबकुछ जुए में हार गए थे यह युधिष्ठिर से बहुत पहले की कहानी है। मेरा जिस जुए से प्रथम बार परिचय हुआ वह शायद गाँव में गोली-कंचों का अथवा पैसों का रहा। लोगों को खेलते देखा बस कभी कभार खुद भी खेला होगा कुछ याद नहीं। इस संदर्भ में मेरे पिता जी अति कठोर थे। फिर लोगों को ताश खेलते देखा किन्तु खेला कभी नहीं इतना स्पष्ट है। उन दिनों कभी कभी पुलिस जुआरियों के विरुद्ध कार्यवाही कर देती थी। फिर दौर आया लॉटरी का। सबसे अधिक परिष्कृत और सरकार के द्वारा संचालित। लाखों परिवार विनष्ट हो गए लॉटरी के चक्कर में।अन्ततः सरकार ने बन्द करा दिया। यद्यपि लॉटरी दो चार बार लेखक ने भी खरीदी।
लॉटरी बन्द हुई तो सट्टा शुरू हो गया। अभी चल रहा है। जब तब कार्यवाही भी होती है किन्तु परिणाम शून्य। अब तो सट्टा अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।
कुछ समय से जुए का नया स्वरूप आया है। इन्टरनेट पर ऐप डाउनलोड करो। खेलो जीतो और खाते में ट्रांसफर करो। विज्ञापन भी इसका जबरदस्त। "हैलो दोस्तों यह कार मैंने लूडो खेलकर जीती है। तुम भी जीत सकते हो। ऐप डाउनलोड करो। साइट का पता है कखग.com।"
फिर एक्सप्रेस की स्पीड से चेतावनी, "कृपया 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए। वित्तीय जोखिम की संभावना शामिल। अपनी जिम्मेदारी और जोखिम पर खेलें। इसकी लत लग सकती है।" बहुत बार क्या कहा जा रहा है समझ नहीं आता।
मेरा प्रश्न यही है कि इस प्रकार का जुआ यदि ऑनलाइन सही है तो ऑफलाइन गलत किस प्रकार से है। यदि दोनों सही हैं तो एक पीछे पुलिस दौड़ती है और दूसरे कमरों में बैठ कर जुआ खेलते रहे हैं यह बिल्कुल उचित नहीं। यदि दोनों गलत हैं तो सरकार को चाहिए कि अविलम्ब ऐसे जुए और साइटों को बंद करें जो युवा शक्ति को अनुत्पादक व हानिकारक व्यवसायों के लिए प्रेरित कर रही हैं।
मैं समझता हूँ कि वकील लोग जो अनाप शनाप मामले ले जाकर कोर्ट में बदनामी झेलते हैं वे इस मुद्दे पर कुछ सार्थक करके सम्मान अर्जित कर सकते हैं। सरकार में बैठे लोगों का भी यह दायित्व है कि युवा पीढ़ी को अंधकार के गर्त में जाने से रोके।











गुरुवार, 19 मई 2022

मुबारक

1
तुम्हें हुक्मरानी तुम्हारी मुबारक,
हमें दिन भरे की दिहाड़ी मुबारक,
कहाँ काशी काबा में सिर को घुसेड़ूँ,
नचाए सभी को मदारी मुबारक।
2
सब हवा के साथ बहते जा रहे हैं,
जागरण का ध्वज सभी लहरा रहे हैं,
मैं विवश हूँ देखने को पूर्व दिशि मेंं,
मेघ कुछ उत्पात हित गहरा रहे हैं।
3
चोंचों में जो कीट पकड़ना चाह रहे,
वक्ष धरा का तोड़ा जाए चाह रहे,
वहीं घास की पत्ती में जो जन्तु छिपे,
हर हलचल पर घबराकर भर आह रहे।

मदारी-भगवान, 

सोमवार, 16 मई 2022

बुद्ध ने क्या दिया

फेसबुक पर एक भाई ने पूछा कि गौतम बुद्ध ने देश को दिया क्या है? तो मैं अल्पबुद्धि व्यक्ति कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ। कुछ अनुचित लिखा हो तो क्षमा करें।
बन्धु वर्तमान में ऐसे विवादों की आवश्यकता नहीं है। गौतम बुद्ध भारतीय वाङमय में ऐसे विचारक हैं जिन्होंने समाज को एक नवीन मानवतावादी दर्शन प्रदान किया जो सत्य, प्रेम और अहिंसा पर आधारित था। वह महात्मा अगस्त्य(शैव मत के प्रचारक) के पश्चात ऐसे दूसरे विद्वान थे जिन्होंने भारतीय मनीषा को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर पाने में और बड़े बड़े राजा महाराजाओं को अपने सिद्धांतों से अभिभूत करने में सफलता पाई थी।  गौतम बुद्ध ने जिस मध्यम मार्ग को अपनाने की बात कही है वह ऐसा मार्ग है जिसकी उपेक्षा करने के कारण हम असंख्य सुविधाओं से युक्त होने पर भी विषादग्रस्त हैं।
रही बात सनातन धर्म व बौद्धों के बीच मतभिन्नता और तोड़फोड़ की तो विगत की बात है जिस की चर्चा न हो तो बेहतर।
गौतम बुद्ध ने अपने किसी शिष्य को सनातन धर्म पर आक्रमण के लिए नहीं उकसाया, न ही उन्होंने अन्य धर्मों के विनाश की बात कही। यदि कालांतर में लोग उनके पदचिन्हों पर नहीं चले तो दोष हमारा है। 
आज आवश्यकता उनका विरोध करने की है जो यह कहते हैं कि उनका मत ही सर्वश्रेष्ठ है और अन्य मतों के अनुयायियों को जीवन का अधिकार नहीं है।
हम अत्यधिक सौभाग्यशाली राष्ट्र हैं कि भारतीय मूल का कोई भी मत शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख आदि अन्य धर्म व मतों के उच्छेद की चर्चा नहीं करता। अपितु सभी लोगों को शान्ति से अपने अपने आचार विचार को मानने की स्वतंत्रता देता है। हम तो हम तो चार्वाक जैसे नास्तिक का दर्शन भी स्वीकार कर भारतीय वाङ्मय में स्थान प्रदान करते हैं।
बौद्धों और सनातनियों के मध्य जो झगड़े के आरोप लगते हैं मुझे निजी स्तर पर समझ नहीं आते। जो समाज मुक्त हृदय से महाभारत काल में यवनों, शकों, हूणों से सम्बन्ध स्थापित करता है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानियों से व्यापारिक व बौद्धिक सम्बन्ध स्थापित करता है। प्रथम शताब्दी में ईसा मसीह को भारत आकर ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देता है। दूसरी तीसरी शताब्दी में अरबों से व्यापार करता है वह बौद्ध धर्म के लोगों को लेकर इतना असहिष्णु रहा हो समझ नहीं आता। हाँ यह हो सकता है कि राजे महाराजों ने धर्म का नाम लेकर अपना उल्लू सीधा किया हो और निरीह जनता को बौद्ध व सनातन धर्म के नाम पर लड़ाया हो।
तो हाथ जोड़कर समस्त पाठकों से निवेदन है कि बुद्ध को बुद्ध ही रहने दें और बुद्ध बनें। गौतम बुद्ध न सही बुद्धिमान सही।

स्पीड और सुरक्षा

कितना अच्छा था कि अयारी से गुजरने वाला शाहाबाद पिहानी मार्ग ऊबड़ खाबड़ था। आप हिचकोले खाते हुए चलते थे और कहीं देर से पहुँचने पर हाथ मलते थे। धन्यवाद विधायिका जी का जिनके प्रयासों से फर्राटा भरने वाली सड़क बनी। साथ ही समस्या खड़ी हो गई स्पीड की और सुरक्षा की।
पिछले दो दिनों में सड़क पर लगातार अलग अलग स्थानों पर तीन एक्सीडेंट दो मौतें और कम से कम चार घायल। 
हमारी बहुत बड़ी त्रुटि है कि विकसित होती तकनीक के साथ हम विकसित नहीं हुए। हमें यह तो पता है कि हमारी गाड़ी का एवरेज और अधिकतम स्पीड क्या है लेकिन हमें यह पता नहीं कि कितनी स्पीड पर हमारे लिए खतरा कितना ज्यादा है और वाहन रुकने में कितना समय और शक्ति लेता है। बन्धु सामान्य भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि 40 किमी प्रति घंटा की चाल का तात्पर्य 11 मीटर प्रति सेकंड होता है और 60 किमी प्रति घंटे की चाल का तात्पर्य लगभग 17 मीटर प्रति सेकंड होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ऑब्जेक्ट आपको सड़क पर दिखे और आप एक सेकेंड के अन्दर त्वरित क्रिया करें तब भी आप ऑब्जेक्ट को हिट कर ही जाएंगे यदि ऑब्जेक्ट आपसे लगभग 15 से 20 मीटर दूर है। स्पष्ट रूप से आप खतरे में हैं। इस स्पीड पर भी।
दूसरा गति दुगुना बढ़ने से खतरा दुगुना नहीं होता बल्कि चौगुना होता है। E=mv^2 आइंस्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण के अनुसार ऊर्जा द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती और वेग के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है। उस हिसाब सवारी डबल तो खतरा डबल लेकिन स्पीड डबल तो खतरा चार गुना ज्यादा। 
इस खतरे को कम कर सकते हैं हेलमेट लगा के सरकार लगातार कह रही है हेलमेट लगाओ किन्तु आप आजाद हैं। तो नहीं लगाते। आप लगा भी लें तो पैदल वाला क्या करे। वह तो निकल लिया आपकी ठोकर से।
तो भैया स्पीड कम करें साथ में सवारियों को संख्या भी सीमित करें बीमित तो करा ही लिया होगा।
सिर्फ इसी सडक़ का प्रश्न नहीं है एक्सप्रेस हाइवे प्रतिदिन दुर्घटनाएं होती हैं किसी भी लेन में चलें वाहन और.रेलिंग के मध्य दूरी लगभग शून्य होती है। झपकी का समय आधा सेकंड और कई लोगों का गन्तव्य वहीं स्थिर। 
अरे भाई समय पर पहुँचने का मतलब गन्तव्य तक पहुँचना रखिए न कि भगवान के घर। मृतकों को श्रद्धांजलि और जो लोग इस लेख को पढ़कर सचेत न हों उन्हें श्रद्धांजलि की डीबीडी।(डबल बेनिफिट डिपाजिट) 

गुरुवार, 12 मई 2022

वृद्धों की उचित देखभाल व उनके दायित्व

प्रायः फेसबुक पर चर्चा होती है कि फेसबुक पर तो माँ बाप की फोटो चेंप देते हैं और फादर्स डे-मदर्स डे मनाते हैं। माँ बाप वृद्धाश्रम में पड़े होते हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि सभी वृद्ध जिनकी संतानें वृद्धों की उचित देखभाल नहीं करतीं वे वृद्धाश्रम में हैं। सच यह है कि बहुत कम ही वृद्ध सौभाग्यशाली हैं जो वृद्धाश्रम में रहते हैं। अधिकांश तो बेटे बहुओं की गाली गलौज सुनते हैं या फिर तंग आकर घरबार  छोड़े हुए सड़कों पर टहलते हैं। 
ये वे माँ बाप हैं जिनमें से कुछ ने अपने बच्चों की बहुत बेहतर ढंग से परवरिश की है। थोड़े बहुत ऐसे भी हैं जो शायद इसी योग्य हैं कि वे बहू बेटों की गालियाँ सुनें। लेखक बहुत दुखी है यह देखकर कि लोग संतानों का तो रोना रोते हैं लेकिन संतान के प्रति उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं। लेखक बड़ा प्रसन्न होता है किसी वृद्ध को तंग देखकर क्योंकि लेखक का अपना अनुभव है। बहुत से मामलों में लेखक ने तंग वृद्धों को देखकर उनका इतिहास खंगाला तो अधिकांश मामलों में यही पता चला कि वृद्धों ने जो बोया वही काट रहे हैं। उन अभिभावकों का क्या जो जुए और पार्टियों में अपना समय गुजार देते हैं। न तो स्कूल की फीस समय पर जमा होती है, न कापी किताबों की उचित व्यवस्था, बालक बालिकाओं के भविष्य को लेकर अध्यापकों से परामर्श, न शुभचिंतकों के द्वारा बालक बालिकाओं की शिकायत किये जाने पर उचित कार्यवाही, बीमार होने पर सही इलाज की उपेक्षा। उन माँओं का क्या? बच्चों को दूध नहीं पिलातीं, पास नहीं सुलातीं, देखभाल आया करती है, कुछ बड़े होने पर बच्चे हास्टल में, भावनात्मक लगाव शून्य। हाँ, बच्चे इतना समझते हैं कि माँ बाप एटीएम हैं जहाँ से पैसा निकलता है। जॉब लग गई तो उसकी भी जरूरत खत्म। पहले तो हम अच्छे माँ बाप बनें तब बनेगी बात। हम न तो अपनी पीढ़ी को मिल बाँटकर खाना सिखा पा रहे हैं, न परिवार में सहयोग सिखा पा रहे हैं, न उनके बन पा रहे हैं और उन्हें अपना बना पा रहे हैं। कुछ लोगों को यह अभिमान कि वे पैसा खर्च कर रहे हैं और कुछ लोग सारी जिम्मेदारी बच्चों पर ही डाल देते हैं।
मुझे यह तो नहीं पता कि बड़े होने पर किसके बच्चे अपने माँ बाप के साथ कैसा बर्ताव करेंगे लेकिन अपने आसपास इतना दिखाई देता है कि बहुत से माँ बाप अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वहन नहीं कर रहे हैं। वे भी कल कहेंगे बच्चों को हमने पालपोस कर बड़ा कर दिया और आज बच्चे हमारी उपेक्षा कर रहे हैं। अरे भाई अभी धरती में एक बीज डालो। हरि इच्छा।खाद पानी मिल गया तो वह पौधा पेड़ बन ही जाएगा। लेकिन एक पौधा जिसकी उचित देखभाल हो तो क्या कहने। पौधा जड़ होता है लेकिन हमारे बच्चे जड़ नहीं हैं। वह हर उस क्रियाकलाप को अपने अवचेतन में बैठा लेते हैं जो हमारे द्वारा नित्यप्रति किया जाता है।
बच्चे अपने प्रति हुए व्यवहार को ही अवचेतन में नहीं रखते अपितु आपके अपने परिवार में अन्य लोगों से कैसे व्यवहार हैं इसे भी अपने अवचेतन में रखते हैं। जो माँ बाप रोज घर में किचकिच करते हों उनके बच्चे बड़े होकर अपने माँ बाप का सम्मान करेंगे इसकी सम्भावना कम ही है। आप अपने भाई बहनों से कटु सम्बन्ध रखें और निज सन्तानों से परस्पर प्रेम व सहयोग चाहें तो कठिन कार्य है।
प्रायः लोग कहानी सुना देते हैं कि एक लड़का था और किसी शहर में डीएम हो गया। उसका बाप उसके ऑफिस पहुँच गया। लोगों ने पूछा तो उसने कह दिया कि नौकर है। तो बाप का पारा गर्म। लोग प्रायः बाप के पक्ष में खड़े होते हैं लेकिन मैं लड़के के पक्ष में हूँ कि लड़के की भी कुछ समस्या रही होगी। मुझे याद है कि मैंने अपने पिता जी को एक दिन चाय बनाकर दी। वह चाय लेकर जमीन पर बिना किसी आसनी के पालथी लगाकर बैठ गए ऐसी उनकी आदत थी और उनके लिए बिल्कुल सामान्य। मैंने उनसे कई बार कहा कि कुर्सी पर बैठेंं या तख्त पर बैठ जाएं। लेकिन मेरा कहना बेअसर। अब मैं जमीन पर उस तरह बैठने का अभ्यस्त नहीं। बहुत क्रोध आया और अंततः मैंने चाय खड़े खड़े टहल कर पी क्योंकि अगर मैं कुर्सी पर बैठ जाता और आप वहाँ पहुँच जाते तो या तो मुझे मूर्ख समझते या अशिष्ट।
मुझे एक अन्य व्यक्ति का किस्सा याद है एक दिन मेरे पास आये और बोले भैया मुझे बहू रोटी सेंककर नहीं देती। यद्यपि मुझे पता था कि बहू ऐसी है नहीं लेकिन फिर भी मैंने अपनी पत्नी से उनकी बहू का पक्ष मालूम करवाया तो पता चला कि घर से लेकर खेत न तो उसका पति कोई सहयोग करता है और न बुड्ढे महाशय। मैंने बुड्ढे को बुलाकर पूछा तो बोले लड़के की नालायकी का हम क्या करें? हमारी अवस्था तो कुछ काम धंधे की रही नहीं कि जानवर चरा लाएं या खेत की रखवाली करें। मुझे कुछ समझ नहीं आया बात आयी गयी हो गई। 
एक दिन बुड्ढे मेरे पास एक समस्या लेकर आए। एक बाग वाले ने उनसे बाग की रखवाली कराई और अब उनकी मजदूरी नहीं दे रहा था। अब मुझे बहुत क्रोध आया लेकिन मैंने उनसे कुछ नहीं कहा सिर्फ इतना पूछा कि मुझे यह बताओ अपना चार बीघे खेत की रखवाली के लिए आपके शरीर में ताकत नहीं है और दूसरे का बारह बीघे का बाग बचाने की ताकत कहाँ से आ गई? बुड्ढे ने न तो मेरी बात का कोई जवाब दिया और न ही वे कोई जवाब देने की स्थिति में थे। 
ऐसा नहीं है कि सारी गलती बड़ों की ही हो बच्चे भी बहुत बार गलत लोगों की संगत में परिस्थितियों वश गलत निकल जाते हैं। हम हर जगह न उनका पीछा कर सकते हैं और न उन्हें बन्धन में रख सकते हैं। 
अन्त में, परिवार सबके सहयोग से चलता है चाहें वे बड़े हों या छोटे। सबको अपने अपने हिस्से के कार्य करते समय दूरगामी परिणाम पर भी सोचना चाहिए।

बुधवार, 11 मई 2022

मुहब्बत का जुनून

नाम कुछ भी रख लें। पाठकों की इच्छा। शीलू, नीलू, सावित्री, सुकन्या कोई फर्क नहीं पड़ता। आज किसी ने बताया कि वह चली गई। चली गई? मतलब। अपने पति और चार बच्चों को छोड़कर चली गई। आश्चर्य है? अभी कुछ दिन पहले रात में जब कुछ लोगों ने उसके घर के बाहर पड़ोस के एक लड़के को देखा था तो मुहल्लेवालों का अंदाजा था कि शायद उसकी बेटी के लिए आया था। शायद उसका उसके साथ कुछ चक्कर था। लेकिन लेखक को लगता है ऐसा कुछ था नहीं?  ऐसा कुछ होता तो अब तक स्पष्ट हो जाता है। गाहे बगाहे लोग उसके बारे में जब तब कहते रहते थे कि अगली चालू है लेकिन लेखक को कभी समझ नहीं आया। लेखक को जब भी मिली भद्रता से मिली। नैन नीचे किये प्रायः पूछती हुई कि गुरू जी बच्चों की फीस बता दो या जमा कर लो। इसके अलावा भी कुछ बातचीत लेकिन ऐसी नहीं कि लेखक चरित्र का आकलन कर सके। 
उसके चार बच्चों में सबसे बड़ी लड़की की उम्र 17 वर्ष, दूसरी लड़की की उम्र 15 वर्ष, तीसरा लड़का उम्र 12 वर्ष और चौथे लड़के की उम्र 10 वर्ष। जिस उम्र में उसके बच्चे प्रेम का पाठ पढ़ना शुरू करने वाले थे उसने पढ़ लिया। अनायास ही अपने बच्चों को जिम्मेदार बना दिया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। पुरुष ने कितनी भी वैज्ञानिक प्रगति क्यों न की हो  लेकिन नारी से सामंजस्य बनाकर रखने का स्थायी फार्मूला वह अब तक नहीं खोज पाया।
अपने पति से इतनी ही असन्तुष्ट थी तो शादी के बाद के बीस वर्ष कैसे निपट गये? यदि सन्तुष्ट थी तो जाने की क्या आवश्यकता? लेकिन वह निकल गई ऋषि विश्वामित्र के आश्रम की मेनका की तरह। मेनका तो आयी थी एक लक्ष्य लेकर इसका तो बस जाने का कुछ लक्ष्य रहा होगा। 
जिस पति से चार बच्चे मिले हों और हमउम्र हो तो यौन सम्बन्ध तो कारण प्रतीत नहीं होते। आर्थिक समस्या तो प्रत्येक परिवार में होती है। संयुक्त परिवार में थी नहीं जो कलह के कारण वह जाती? फिर...
कोई समस्या रही भी हो तो परिवार के प्रति दायित्व का क्या पति के प्रति न सही बच्चों के प्रति तो सोचना चाहिए था। फिर वे बच्चे जिनकी उम्र धीरे धीरे विवाह की हो रही थी और जिन्हें पथ प्रदर्शक की आवश्यकता थी। अच्छा ही हुआ ऐसी माँ यदि बच्चों की पथ प्रदर्शक होगी तो उनका उद्धार ही कर देगी। प्रेम के जाल में फँस जानेवाले भी न जाने किस तरह पत्थर दिल हो जाते हैं कि बस पूछो मत। कुछ भी छोड़ सकते हैं एक मुहब्बत के जुनून के सिवा। माँ, बाप, भाई, बहन, बेटा, बेटी, रिश्तेदार और मित्र की क्या कहें ये अपने व अपने प्रेमी के जीवन की भी परवाह नहीं करते। कहाँ से आती है यह हिम्मत या ढीठता?
लेखक ने अदालत कक्ष के बाहर एक माँ को अपनी बेटी के पैर छूकर मानमनौवल करते हुए और बेटी को निर्लज्जता से प्रेमी के साथ ही जाने की जिद करते हुए देखा है। लेकिन यहाँ तो माँ ही निकल ली। बेटी के बारे में कह सकते हैं कि बीस पचीस की उम्र आगा पीछा कम ही सोचती है लेकिन चालीस पैंतालीस की उम्र तो परिपक्वता की कसौटी है। ऐसे में उसका चले जाना ईश्वर ही समझे या वह स्वयं।
हम सबसे मिलते रहे, जोड़ जोड़ कर हाथ।
किन्तु एक ऐसा मिला, साथ ले गया हाथ।।

शनिवार, 7 मई 2022

सिनेमा दिखउतीं

बियाहिन से गहिरी कुंवारी लगउतीं।
लिपिस्टिक ते होंठन की यारी दिखउतीं।।
न सिर पर दुपट्टा न सीना ढके हैं,
निलज तारिका सी सिनेमा दिखउतीं।।
न अम्मा न बप्पा न बहिनी न भैया,
सिरिफ दोस्तन संग रिश्ता निभउतीं।।
मुहब्बत का फीवर चढ़ा तन व मन पर,
अगर कुछ कहौ आधुनिकता बतउतीं।।
गजब वक्त के रंग अजबइ गजब हैं,
फिसलने को अपने तरक्की जतउतीं।।
तुम्हैं लगि रहो हम गलत कहि रहे हइं।
कहति हम तुम्हैं सबसे जादा सतउतीं।।

अखबार पढ़ूँ

क्यों प्रतिदिन अखबार पढ़ूँ मैं।
वही खबर हर बार पढ़ूँ मैं।।1।।
रोज कहानी वही पुरानी।
बदल रहे किरदार पढ़ूँ मैं।।2।।
चंदो भागी चंदा लटका।
धर्मों की तकरार पढ़ूँ मैं।।3।।
भारी वाहन टूटी सड़कें,
ट्रैफिक है बेजार पढ़ूँ मैं।।4।।
अस्पताल कानून पुलिस या,
शासन है बीमार पढ़ूँ मैं।।5।।
बैंक घोटाले रिश्वतखोरी,
नर नारी व्यभिचार पढ़ूँ मैं।।6।।
मँहगाई के अट्टहास पर,
अभिजन-अत्याचार पढ़ूँ मैं।।7।।
बिजली, पानी, खाद, गैस पर, 
जब तब हाहाकार पढ़ूँ मैं।।8।।










बुधवार, 27 अप्रैल 2022

रोटी और अचार से

हमने सोना शुरू कर दिया, छत पर इस इतवार से।
चार पड़ोसी भड़क गए हैं, अपने इस व्यवहार से।।1।।
अभी दूर की नजर हमारी इतनी ज्यादा तेज है।
मीलों भर से जान सकें हम काँपे कौन बुखार से।।2।।
बाजारों से बच कर रहना, महाजनों के जाल ये।
बड़े बड़ों की हस्ती मिट गई, उबरे नहीं उधार से।।3।।
जो गुलाब से दमक रहे हैं, क्या बकरे सब स्वस्थ हैं?
इनमें से बहुतेरे रोगी, हैं डॉक्टर की मार से।।4।।
लाउडस्पीकर जब से उतरा, मन्दिर की प्राचीर से,
अपना झगड़ा सब सुनते हैं, टिकट लिए तैयार से।।5।।
इतना मीठा नहीं खिलाओ, मित्र पड़ूँ बीमार मैं।
मन की तृप्ति 'विमल' को मिलती, रोटी और अचार से।।6।।

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

बड़े

एक दिन हम अपने घर में हो गए सबसे बड़े।
मेज पर थीं कुर्सियां और कुर्सियों पर हम खड़े।
सच यही है हम बड़े हों यह कभी सोचा नहीं,
नाक मुँह डूबा रहे और हम दही में हों पड़े।
जो बड़े थे गोल-सीधे और लम्बाई लिये,
सब गये चीरे हसीनाओं के बेड में थे जड़े।
इसलिए भी हम बड़े होना नहीं हैं चाहते,
उम्र में लगते ससुर भौजाई कहने को अड़े।
गाँव भर की औरतें सब फाड़ देतीं चित्त को,
जेठ कहतीं बुड्ढियाँ भी बाल जिनके सब झड़े।
हम बड़े थे हर तरह से हमको ही डाँटा गया,
शेष दुलराये गए थे माँ की गोदी में गड़े।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

कविता का मरहम

जो मुकद्दर में लिखाकर लाए हैं।
वो छुहारे हमने अब तक खाए हैं।
यूँ तो मुसम्मी रसभरी थी हाथ में,
किन्तु सिर पर पत्थरों के साए हैं।
जो मिला हम उसपे लट्टू हो गए,
नच-नचाकर ही यहाँ तक आए हैं।
हम झमेलों से बहुत ही दूर हैं,
राह सीधी पर हमेशा छाए हैं।
झूठ है सब हमने अब तक जो कहा,
हम तुम्हारी ही तरह भरमाए हैं।
थे तुम्हारी दिलजली को जानते,
इसलिए कविता का मरहम लाए हैं।

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

बहुत बड़े पाजी

हम तो बहुत बड़े पाजी हैं तुम भी बहुत बड़े पाजी।
झोला बंद बंद रहने दो बाजा अभी नहीं बाजी।।1।।
कौए हों या कोयल सबके अपने मौसम होते हैं।
पपिहा है बस इन्तजार में स्वाति किस दिवस हो राजी।।2।।
राजनीति पर चर्चा के हैं खतरे बहुत बड़े भारी।
हिटलर भले मिट गया लेकिन जन्मे नए नए नाजी।।3।।
हम फकीर हैं कहते कहते, सबको भीख मंगा डाली,
क्लास एक से विद्यालय में बंटती है रोटी भाजी।।4।।
राम और रहमान सभी हैं, मुफ्त मिले पर चंगे से।
दल कोई हो जन को लेकर, दलदल में है पहुँचा जी।।5।।
गूँज गई मंदिर में घंटी, प्रभु की याद दिला बैठी,
वरना 'विमल' विमल हो लिखता, इसके आगे कड़वा जी।।6।।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

कर्जे अदा

आप सबसे इश्क मेरा अलहदा।
आप जिस पर मर गए मैं हूँ फिदा।।1।।
अब जुए का खेलना ही तज दिया,
एक उसकी झलक पर रुपया बदा।।2।।
द्वार पर पापा रहे माँ छत खड़ी,
हमने खिड़की से किये कर्जे अदा।।3।।
शातिरों ने रातरानी छेंड़ दी,
मैं तो बेला के लिए दहशतजदा।।4।।
मैं खुशी से जान देता, माँगते!
हो हलक पर जब छुरी तो क्या सदा?।।5।।

रविवार, 3 अप्रैल 2022

नया शगल

पावर में आकर गरियाना नया शगल।
जबकि पता है जो भी आया लिया निकल।।1।।
लोकतंत्र में हाथापाई जायज है।
कुर्सी पर बैठे हैं फिर क्यों उखल-बिखल।।2।।
अब सच्चा इतिहास लिख रहे, उजले ठग।
गंजों के सिर पर हैं कीलें रहीं मचल।।3।।
सच कहने की कीमत मैं दे डालूँगा,
संभव नहीं कींच-कच्चड़ में पड़ूँ फिसल।।4।।
'मुँह में राम बगल में छूरी' सत्य कहा है,
राम संग माया का रहना तथ्य सरल।।5।।
देशद्रोहियों में लिख जाना अच्छा है।
खुद की नजरों में गिर जाना नहीं 'विमल'।।6।।
विमल 9198907871

रविवार, 20 मार्च 2022

चौराहे

चौराहों से डर लगता है। कई प्रश्न प्रताड़ित करते हैं। किधर जाएं? कौन सा मार्ग अपनाएं? किस साधन से जाएं? किसको साथ ले जाएं? 
यह सब पुराने प्रश्न हैं और तब खड़े होते हैं जब हम सकुशल चौराहे तक पहुँचें। आजकल तो समस्या यह है कि चौराहे तक पहुँचने से पहले ही कदम जाम हो जाते हैं। हम ऐसी भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं कि गिंजाइयों (एक गेरुए रंग का आधा से एक इंच लम्बाई का कीड़ा) का खानदान भी शरमा जाए। यदि अनन्तता का अनुभव करना हो तो उत्तर भारत के किसी भी महानगर की सड़कों पर अनुभव कर सकते हो। चलो चौराहा पार हो लें फिर पता चले गलत मार्ग पर आ गए हैं तो बहुत बार सही मार्ग पर आने में इतना समय लगता है और इतनी दूरी तय करनी पड़ती है कि गन्तव्य तक पहुँचने का कोई लाभ नहीं रहता।
हमारा जीवन तो सतत चौराहों की श्रृंखला है। सावधानी बरतें। मैंने एक बार अपने छोटे बेटे के साथ पिहानी से सीतापुर, सीतापुर से लखीमपुर खीरी और लखीमपुर खीरी से शाहजहांपुर तथा शाहजहांपुर से फिर पिहानी की यात्रा की तो एक आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आया कि हर रास्ता लखनऊ की ओर जाता है और वही रास्ता दिल्ली भी जाता है। यकीन मानो इस यात्रा में यह तथ्य जीवन की फिलासफी बन गया। सारे मार्ग भगवान की तरफ और सारे मार्ग शैतान की तरफ। बस हमें यह तय करना है कि हमारा मुँह किधर है और पीठ किधर।
साधन कोई भी हो हर साधन अपने आप में विशिष्ट। बैलगाड़ी और रेलगाड़ी दोनों में कोई तुलना नहीं। दोनों की अपनी उपयोगिता और अपना आनंद। हमें तो बस अपनी रुचि और आवश्यकता पर ध्यान देना है साधन अपने आप में समझ आ जाएगा। जहाँ काम आवे सुई काह करै तरवारि।
जाना अकेले ही है साथ केवल वहीं तक जहाँ से लक्ष्य बिछुड़ जाते हैं सोच बदल जाती है। 

शनिवार, 5 मार्च 2022

बेटे बहू


जिनके हित में बंजर कर दी अपनी हरी बहार में,
बेटे बहू नहीं आते हैं अब घर पर त्यौहार में।।
अपनी अपनी ध्वजा उठाए सब विकास की चाह रहे,
रोजीरोटी का रण लड़ते देख विजय की राह रहे।
कुछ तो खोए हुए तरक्की की सतरंग मल्हार में।।
बाहर बेटा गया अकेला दो होकर अब रहता है,
लेकर बहू आ रहा घर पर हर महिने ही कहता है,
आँखें उलझी हुई प्रतीक्षारूपी काँस-सिवार में।।
बेटे के सिर सेहरा देखें मन की चाह मरी मन में,
कभी नहीं जानी है मस्ती पोती-पोतों के धन में,
सिसक सिसक कर कटे जिंदगी जीवन की पतझार में।।

सोमवार, 3 जनवरी 2022

इतिहास तो अंततः सभी का एक ही है


1. "ये मेरा नववर्ष नहीं है, मेरा नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। मैं इसकी बधाई न लूँगा न दूँगा।" 
2. "मैं क्रिसमस की बधाई क्यों दूँ। यह मेरा त्यौहार नहीं है।"
3. "मोमबत्ती जलाकर नहीं, केक काटकर नहीं बल्कि दूध पीकर मंत्रोच्चार के साथ जन्मदिन मनाऊँगा।"
4. "मैं फादर डे , मदर डे, टीचर डे, वैलेंटाइन डे कुछ नहीं मनाता, यह हमारी संस्कृति नहीं है।"
ये सब मैं नहीं कहता। वे कहते हैं जो शर्ट, पैंट और टाई पहनते हैं। बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते हैं। बच्चों को चरणस्पर्श और प्रणाम की जगह गुड मॉर्निंग सिखाते हैं और कुत्ते को डॉगी कहलवाते हैं। सिर पर चोटी गायब है लेकिन तिलक लगाते हैं। परिवार में कोई स्वर्गवासी हो तो सिर घुटाने में शर्माते हैं और सिर्फ कटिंग करा के परिवारी होने का कर्तव्य निभाते हैं। पूजापाठ के अवसर पर पंडित से कहते हैं कि जल्दी निपटाओ। यज्ञोपवीत बस विवाह के आसपास चार दिन पहनते हैं। गौसंरक्षण का नारा और रिक्शेवाले की बेइज्जती दोनों साथ साथ चलते हैं। ऑफिस में लंबा सा तिलक लगाकर बैठते हैं पूर्ण धार्मिक होने का लेक्चर देते हैं और रिश्वत खाते हैं तो डकार भी नहीं लेते। कहो तो खींसेंं निकाल देते हैं।
नीम हकीम खतरेजान। स्वयं को सनातनी कहते हैं किन्तु 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का तिरस्कार कर अन्य समाजों को अपमानित करने का भाव भी हृदय में पाले हुए हैं। हम तो सहिष्णु रहे हैं, हम असफल हो गए संसार को सहिष्णुता सिखाने मेंं। हाँ म्लेच्छों से अमानवीयता सीखकर असहिष्णु होने का अभ्यास करने लग गए हैं। यह अत्यधिक विचित्र है कि हम धीरे धीरे असहिष्णु होते जा रहे हैं और सहिष्णु होने का ठप्पा भी छोड़ने में शर्मा रहे हैं। 
मेरी बात करो तो मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं वैष्णव हूँ? शैव हूँ?शाक्त हूँ?  साईं भक्त हूँ? वेदाचारी हूँ? शिश्नपूजक हूँ? कापालिक हूँ? वैरागी हूँ? आनन्दमार्गी हूँ? या फिर नाग, गन्धर्व, यक्ष, रक्ष, किन्नर, सुर, असुर, देव, दानव, आर्य, द्रविड़ आदि से कोई हूँ। अथवा हूण, शक, यवन आदि में से हूँ। या फिर इस सबका घालमेल हूँ। यह प्रश्न आजकल के सभी तथाकथित धर्म व समुदायों से अपेक्षित है चाहे वे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि भारतीय पृष्ठभूमि के हों अथवा मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि विदेशी पृष्ठभूमि के हों। इतिहास तो अंततः सभी का एक है और मूल भी। इस सबमें मनुष्यता को कहाँ खो दिया?



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