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सोमवार, 9 जून 2025

घरवाली

जो घरवाली का कहा, मान न सकता मित्र।
उसे मिलें ससुराल से, चोटें बड़ी विचित्र।
चोटें बड़ी विचित्र, मिलें जो पूरी माने।
जोरू का है दास, सभी देते हैं ताने।
इसीलिए तू मान, कहे जो कुछ भी साली।
साली वश में होय, रहे वश जो घरवाली।।

शनिवार, 22 मार्च 2025

कोठे

मेरे एक मित्र ने फेसबुक पर अपनी कविता में कोठा शब्द का प्रयोग किया तो मैं भी लिख गया। कुण्डलिया का आनन्द लें।

घर घर कोठे खुल गये, आजादी के बाद।
फैशन फिल्मों से लिया, अपने सिर पर लाद।
अपने सिर पर लाद, लीद बेशर्मी की ली।
जिसको भी दो टोक, ऑंखें हों नीली पीली।
कोठे की कर बात, करो मत चोट हृदय पर।
बेशर्मी का नृत्य, दिख रहा मित्रों घर घर।।
विमल ९१९८९०७८७१

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

फागुन


विषय ---फागुन
विधा ----छंद - कुण्डलिया

1. फागुन आया देखकर आम उठा बौराय।
    पिया बसे परदेश में, कोयल रही बुलाय।
    कोयल रही बुलाय, धरा है धानी धानी।
    मादकता सिर चढ़ी कर रही पानी पानी।
    समझ न आवें मित्र! ससुर बहुओं के लच्छन।
    मन को दे भरमाय मदन का भाई फागुन।।
 
    2- फागुन चढ़ा मुंडेर पर, घोट रहा है भाँग।
        देवर जी का लग रहा, नम्बर हो गया राँग।
        नम्बर हो गया राँग, मनाते घूमें भाभी।
        हर ताले की पास रखें जो अपने चाभी।
        चाहत गोरा होंय माँगते क्रीमें साबुन।
        भाभीजी की बहन भा गई अबकी फागुन।।
               

रविवार, 30 अक्टूबर 2022

संगिनि अपनी

अपनी प्रियतम प्रेम से, फेरे सिर पर हाथ।
बन्धु अभी तक है बना, सिर-बालों का साथ।
सिर-बालों का साथ, कलर है बिल्कुल पक्का।
लड़कों को आश्चर्य, चकाचक अब भी कक्का।
करिए साँचा प्रेम, और क्या माला जपनी?
सिर साजे सम्मान, साध लो संगिनि अपनी।।

शनिवार, 17 सितंबर 2022

नुस्खा यही अभेद्य

पत्नी से परेशान लोगों के लिए
कुण्डलिया
पत्नी की पूजा करो, अर्प धूप नैवेद्य।
पद छू दिन प्रारम्भ हो, नुस्खा यही अभेद्य।
नुस्खा यही अभेद्य, पूजिये पत्नी मैया।
जो दिखती है भैंस, दिखेगी तुमको गैया।
नजर कीजिये बन्द, तिजोरी खोलो अपनी।
देगी सब वरदान, माँग भर तेरी पत्नी।।
विमल 9198907871

रविवार, 11 सितंबर 2022

शुभे

कुण्डल कानों पर छजे, छजे नाक नकबिन्दु।
बिंदिया मस्तक-मध्य में, रचे इन्दु पर इन्दु।
रचे इन्दु पर इन्दु, मेघ बन लहरें कुन्तल।
दो अधरों के मध्य, दंत एल ई डी चंचल।
शुभे! तुम्हारी श्वास, सुवासित दश दिशि मण्डल।
चुम्बन लेता नित्य, अगर मैं होता कुण्डल।।

सोमवार, 22 मार्च 2021

जाती हैं बाजार

जबसे आयीं मायके, कर नित नव श्रृंगार।
छोट-भैया ले साथ में, जाती हैं बाजार।
जाती हैं बाजार, जहाँ पर राम-पियारे।
लिए रेंट पर रूम, रहें निज गेह बिगारे।
तोड़ रहें सम्बन्ध, एक की खातिर सबसे।
दिखें प्रफुल्लित बन्धु, मायके आयीं जबसे।

शनिवार, 28 नवंबर 2020

नीरो

नीरो जिन्दा है अभी, जनता रही कराह।
आँखे पथराने लगीं, कोर हो गईं स्याह।
कोर हो गईं स्याह, हेर पथ अच्छे दिन का।
टूट गया विश्वास, हरे सावन से मन का।
वणिक, खेतिहर, छात्र, दुःखी दिखते हैं सभी।
राष्ट्रवाद ले ओट, नीरो जिन्दा है अभी।।
9198907871
विमल 

सोमवार, 16 नवंबर 2020

भूधर

हमारे पड़ोस में भूधर नाम के एक बुजुर्ग कुछ दिन पूर्व गुजर गए। उनके जीवन को देखते हुए मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये। जो एक कुण्डलिया के रूप में प्रस्तुत है। मैं उनके परिवार से क्षमा प्रार्थी हूँ कि अगर उनके परिवार में किसी की भावनाएं आहत होती हों। मेरा यह उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। मेरी समझ से हममें से अधिकतर लोगों का जीवन ऐसा ही है और हममें से बहुत से लोग भूधर हैं। तो कुण्डलिया का आनन्द लें।

भूधर भू धरकर यहीं, चले गये भुव लोक।
भू धर कर परिवार में, बढ़ा गर्व गत शोक।
बढ़ा गर्व गत शोक, हृदय की कली खिल गयी।
क्षण-क्षण की बकवास, सोंच उर मुक्ति मिल गयी।
जिस कुटुम्ब के हेत, बहुत तकलीफें सहीं।
सहते गये दुत्कार, भूधर भू धर कर यहीं।।

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

हिन्दी हित

लो बीता हिन्दी दिवस, खत्म हो गया स्वांग।
किचन और ऑफिस चढ़ी, अंग्रेजी की भाँग।
अंग्रेजी   की   भाँग,  गटककर  मुर्गा  सोता।
अंग्रेजी  रँग  बाल,  रँगे   बाबा   का   पोता।
चढ़ छज्जे पर  मेम, बन  गयी  देशी  सीता।
हिन्दी हित हर हाथ, दिख रहा एक पलीता।।
9198907871

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

फकीर

बहुत बड़ी झोली लिए, गद्दी डटा फकीर।
क्षण में गंगा तीर है, क्षण में यमुना तीर।
क्षण में यमुना तीर, कर्म हैं घूम-घुमारे।
मन-बातों के वीर, विरोधी सभी पछारे।
बदल रहे हैं नित्य, दवाएं, काढ़ा, जड़ी।
अच्छे दिन हैं दूर, मुसीबत बहुत बड़ी।।

शुक्रवार, 8 मार्च 2019

सत्ता का प्रभाव

कंटकों से भरे हुए, पथ में जो जाना पड़े,
पैर में पड़े जूतों से, प्यार हो ही जाता है।
जहाँ मारपीट की हों थोड़ी भी सम्भावनाएं,
हाथ में लगे तो हथियार हो ही जाता है।
पत्थरों में नाम जब खोदा नहीं जाता बन्धु,
नेताजी का खून खौल, क्षार हो ही जाता है।
सत्ता के जूते पर हो पॉलिश अहंकार की,
चोरों व उचक्कों में, रार हो ही जाता है।।

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