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शुक्रवार, 19 जून 2026

नेहरू जी की गलती

मन्दिर नहीं बना था प्यारे कांग्रेस की चलती थी।
क्योंकि कृपा गांधी नेहरू की म्लेच्छ वर्ग को मिलती थी।
जय बीजेपी जय जय मोदी मन्दिर तो बनवा डाला,
किन्तु कोष में चोर घुस गये नेहरू जी की गलती थी।
भ्रष्टाचार मिटाओगे तुम इस वादे पर आये थे,
चाल तुम्हारी भी खलती है जैसे उनकी खलती थी।
तुमने खुद को गंगा समझा सब अपराधी स्वच्छ किये,
कहां गयी वैसी बीजेपी जैसी पहले मिलती थी।
मुद्दों पर मौनी बाबा है आत्मप्रशंसा लीन लबारी,
बना दिया परधान उसे यह सन चौदह की गलती थी।
विमल

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

जातिवाद

फेविकोल का वादा था फिर हाथ हथौड़ा थामा क्यों?
जातिवाद का पहन पजामा बन बैठे हो मामा क्यों?
जिनका दामन पकड़ युगों से सिंहासन के सिंह दहाड़े,
उनके बच्चों की खातिर तुम भूल गये निज जामा क्यों?
तुमने चल दी चाल चाल का प्रतिउत्तर एक चक्रव्यूह है,
तुमको तो दक्षिण चलना था चल बैठे हो वामा क्यों?

बुधवार, 7 जनवरी 2026

रजाई में

तन मन कॉंपा, ठंड बढ़ गयी, सूरज छिपा रजाई में।
कुहरा, बादल, शीत मिल गये,बिक गये अक्षर ढाई में।
गर्म श्वास की, चाह चढ़ गयी, बढ़ गयी प्रीति लोनाई में।
खुल खुल खॉंसें, बुढ़ऊ घर में, मर गयी मौज दवाई में।।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

शीत के शासन

शीत की रीति है प्रीति जमे वहीं आग जले गरमाई मिले यदि।
शून्य भई मति कम्पन अंग में  संग फले मनभाई मिले यदि।
स्वर्ग की चाह न मोक्ष का मोह न नेह उढ़ायी रजाई मिले यदि।
शुक्ल कहें सुख शीत के शासन अंक समायी लुगाई मिले यदि।

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

सृष्टि का विचार

विचार से है सृष्टि या कि सृष्टि का विचार है।
विचार ब्रह्म ने किया कि ब्रह्म ही विचार है।।
अपार प्रश्न हैं व प्रश्न भी कठिन कुठार हैं‌।
जुड़े हजार लोग तो जवाब दस हजार हैं।
फटा जो अणु असंख्य पिंड चल पड़े जहाॅं तहॉं।।
मुझे समझ न आ रहा कि पिंड थे वहॉं कहॉं।।
विशाल पिण्ड कोटि-कोटि मूर्त हो रहे सतत।
अमूर्त कण मनज लगे प्रमाणहीन बिन्दुवत।।
वहॉं पे कौन था कि जिसके कर चले प्रहार को।
प्रकट हुए अरूप से सरूप हो विहार को।।
युगों युगों चलें न सत्य पा सकेंगे छोर का।
न साॅंझ का पता चले न ज्ञान मिले भोर का।।
दबाव था वो कौन सा हटा कि पिण्ड उड़ चले।
उन्हें जहां जगह मिली इस दिशा में मुड़ चले।। 
उड़े अगर विचित्र क्या? विचित्र है रुके नहीं।
हवा करे बिना थके वो खेल से छके नहीं।।
कहाॅं है स्रोत शक्ति का वो कौन है महाबली।
प्रयास कौन कर रहा प्रकृति फिरे चली चली।।
लगा हुआ उसी अचिन्त्य खोज में सदा रहूॅं।
मिले ना हल न खेद कुछ अज्ञात से जुड़ा रहूॅं।।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

करतार

यों ही नहीं कहते उसे करतार हम।
हर ओर उसकी देखते सरकार हम।।
हमने लगाये पुष्प पादप श्रम किया,
हैं देखते उनपर खिली तलवार हम।।
जब भी लगा हर रास्ता अब बन्द है,
खुद हो गये हैं आप ही से पार हम।।
क्या कर्म था क्या फल मिला किसको पता,
हर हानि का उस पर रखेंगे भार हम।।
ज्यादा कभी तो कम कभी अनुमान से,
मजबूत भी तो फिर कभी लाचार हम।।

सोमवार, 22 सितंबर 2025

मीटर और फीते


हमारे मित्र कवि ने लिखा कि मीटर पर ध्यान न दें आजकल फीते से लिख रहे हैं तो उनको मेरी प्रतिक्रिया

हम तो हथेली से नाप लेते हैं,
बित्त दो बित्त।
अधिक हुआ तो हाथ आजमा लेते हैं।
नापना हो कोई बहुत छोटी चीज,
तो बाल, नाखून और उंगलियॉं भी,
नापने का काम करती हैं।
मीटर और फीते बहुत बाद में आये,
हमने ऑंखें बन्द कईं,
घुसे ध्यान में और नाप लीं,
ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों की दूरियॉं।
कविता तो भावनाओं से नाप लेते हैं,
आपको पूरे सौ नम्बर देते हैं।
विमल

मंगलवार, 3 जून 2025

एक बड़ा घर

एक बड़ा सा गॉंव का घर,
उन्नत मस्तक चूमे अम्बर,
जिसमें लग जाते सौ बिस्तर,
पूरे जवार में प्रबल प्रखर।
परिवार बढ़ा फैला लश्कर,
अब घर में हैं दर ही दर,
ऊॅंचाई घटी घट गया असर,
सिसक सिसककर करता बसर।

सोमवार, 26 मई 2025

वे ही दोषी नहीं

किसने व्यभिचारी को चुनकर
प्रतिनिधि अपना बना लिया।
और सुअर ने सत्ता पाकर,
मुॅंह कीचड़ में सना लिया।
वे ही दोषी नहीं द्यूत में,
जो नारी को हार गये हैं।
कन्धे पर गांडीव टॅंगा था,
किन्तु मौन को धार गये हैं।
अरे! हस्तिनापुर के वासी,
तुमने दुर्योधन को झेला।
तुम भी उतने ही दोषी हो,
कुरुक्षेत्र में लगा झमेला।
सत्ता का आस्वाद लगा है,
तुम लोगों की दाढ़ों में भी।
इसीलिए हर ओर जहर है,
कैपसूल में काढ़ों में भी।
तुमको रण में घुसकर ही,
मरना होगा इतना तय है।
माथे पर कलंक गाथा ले,
तिरना होगा इतना तय है।

शुक्रवार, 14 मार्च 2025

रवीश जी

यूॅं तो फेसबुक पर बहुत से रवीश होंगे और कविता भी करते होंगे किन्तु मैं बस एक को जानता हूॅं बड़ा अच्छा लिखते हैं। ईश्वर उनके काव्य को यशस्वी करें।
बहुत से विषयों पर बेबाक लिखते हैं उनके साहस को बधाई।
आजकल कई रचनाएं मोनालिसा पर लिखी हैं। मुझे तो उसमें कुछ लिखने वाला नजर नहीं आया लेकिन हमारे छोटे भाई जिस तरह लिख रहे हैं तो मुझे उन पर कुछ लिखने का मन हुआ तो लिख दिया। आप लोग भी रस लें।

नयनों के बाण से हुये घायल रवीश जी।
मोनालिसा के पॉंव की पायल रवीश जी।
यूॅं तो नजारे लाख थे सुन्दर प्रयाग में,
मोनालिसा के हो गये कायल रवीश जी।।
जिस राह चल पड़े पग मोनालिसा के शुभ,
उस राह के अब हो गये टायल रवीश जी।।
रम्भा की उर्वशी की या भगिनी मेनका की,
नम्बर तो कर गये हैं डायल रवीश जी।।
कहते हैं महाकाव्य रच के तुलसी बनेंगे,
कर देंगे अमर उसकी स्मायल रवीश जी।।
विमल 9198907871

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सोमवार, 27 जनवरी 2025

एक दिन तय है

पत्ता पत्ता बूटा बूटा झड़ जायेगा एक दिन तय है।
नीरस डाल छोड़ कर पक्षी उड़ जायेगा एक दिन तय है।।
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जप जप, काया माया बसी रही मन।
धर्म-कर्म का मधुर फलाफल सड़ जायेगा एक दिन तय है।।
अपने और पराए गिन गिन, मन को मथते रहते हैं हम।
छल प्रपंच का हर मंदराचल, अड़ जायेगा एक दिन तय है।।
सबको विन्डो सीट चाहिये, सबके अपने-अपने कारण,
लड़ते लड़ते चैन हृदय में, पड़ जायेगा एक दिन तय है।।
चिन्तन मेरा बिल्कुल पिछड़ा, जैसे दादा जी का बक्सा।
अगड़ी सोचों की नजरों में, गड़ जायेगा एक दिन तय है।।

गुरुवार, 9 जनवरी 2025

कई दिनों के बाद

आज सुबह रवि जल्दी जागा, कई दिनों के बाद।
और देह का आलस भागा, कई दिनों के बाद।
आज अलगनी पर कपड़े हैं, कई दिनों के बाद।
छत पर चढ़ी गुलब्बो मेरी, कई दिनों के बाद।
दादा जी ने कम्बल त्यागा, कई दिनों के बाद।
दादी जी का सम्बल जागा, कई दिनों के बाद।
चुन्नू मुन्नू द्वार खड़े हैं, कई दिनों के बाद।
मेरे मन में कविता आयी, कई दिनों के बाद।।

शनिवार, 28 सितंबर 2024

बैंगन गीला नहीं हुआ

कितना सारा जल बिखराया,
बैंगन गीला नहीं हुआ।
बहुत अधिक हल्दी निपटाई,
चूना पीला नहीं हुआ।
कुतिया की दुम सीधी होगी,
बीड़ा मैंने उठा लिया।
रोयाॅं रोयाॅं नोच लिया है,
बन्धन ढीला नहीं हुआ।
अर्द्धशतक तो बिता दिया है,
धरती सिर पर उठा सकूॅं।
रक्त रक्त ही बना रहा है,
नभ सा नीला नहीं हुआ।
चाहे जितनी राय मुझे दो,
जड़वत् जीता रहा सदा,
घोल-घाल कर तला तवे पर,
पत्थर चीला* नहीं हुआ।
(चीला - उत्तर प्रदेश में बेसन का बना कागज सा पतला व्यंजन)

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

विरह वेदना

ना पिय पाये न पायी पाती।
सावन माह जल रही छाती।
खेत खेत बिखरी हरियाली,
हृदय  मरुस्थल बिछुड़न व्याली।।1।।
तन तृण विरस ज्वलन हित तत्पर।
प्राण प्रयाण चाहते सत्वर।
दोनों अपनी गति पा जाते,
प्रिय दर्शन को ठहरे हठकर।।2।।
दुरभिसंधि है अनिल अनल की।
दिखे न पीड़ा उर में छलकी।
नयन नीर का कोष शून्य है,
पलकें चाह करें एक पल की।।3।।

रविवार, 10 मार्च 2024

दिग्विजेता


उर दिया है नेह घृत है,
और जीवन वर्तिका।
दीप क्षण क्षण जल रहा है,
विश्व में सत को समर्पित।
पथ सुचिंतित पग सुचिंतित,
प्रेय भी है श्रेय भी।
मनुज भी मैं मनज भी मैं,
प्यास मैं ही मैं पयस्।
पथ पथी गन्तव्य गति सब,
हो गये हैं एक रॅंग।
और मैं संग में तुम्हारे,
दिग्विजेता समर-ध्वज।

शनिवार, 24 फ़रवरी 2024

हाथों पर अम्बर

पहले पहले डर लगता है।
फिर जंगल भी घर लगता है।
पूरे मन से पर्वत ठेलो,
तो पक्षी का पर लगता है।।
उर में संशय घर कर जाये,
कटहल लटका सिर लगता है।
कोई अपना ही ठग जाये,
असली झटका फिर लगता है।।
श्रमसीकर-सरि बहा चुके यदि,
हाथों पर अम्बर लगता है।
धैर्य अंगीठी पर जो तपते,
उनका ही नम्बर लगता है।।
प्रेम परोसी थाल न पायी,
अमृत भी हो गर लगता है।
पाप कमाकर पुण्य कर रहे,
काशी भी मगहर लगता है।।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

शक्ति कहाॅं विज्ञान में?

भॅंवरे ने क्या फूॅंक दिया है? मन्त्र कली के कान में।
खिल खिल करके खुशबू अर्पित, कर दी जग को दान में।
अधर खोल कुसुमावलि हॅंस दी, जीवन जगा विहान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?
चमक दमक जयघोष कर रहे, पवनों के सम्मान में।
धरती को श्रृंगारित करते, प्राण डालते धान में।
आलिंगन कर गिरिश्रृंगों को, मेघ जुटे जल-दान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?
गोले ने जादू दिखलाया, चढ़कर अरुण विमान में।
कण-कण में जीवन लहराया, हलचल गगन वितान में।
खगकुल ने जयगान सुनाया, सूर्य देव की शान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?

बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन

जो मूडे मा आवा तौ मजमा लगायेन।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
मदन्नू, महतिया, महेन्दर, मुरारी,
सबै गाॅंठै बातें हवा की सवारी।
न गन्ना न गेंहूॅं न मोहरा दुआरी,
न गैया न गोरू बनाई बिगारी।
मगर इनके मुॅंह ज्ञान अद्भुत पिटारा,
बिखेरै की खातिर इनका बुलायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
रहै मद्दा ठगउरि न जाने थी पब्लिक,
रहै खाइ का कम खुशी पै चतुर्दिक।
मदन्नू बताइनि कमर मा गई चिक,
जो उल्टा था जन्मा लगाएसि जरा किक।
रहै बात अद्भुत समुझि माॅं न आवै,
बिना डाॅक्टर औ' दवा दौड़ि पायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
महतिया बनाएनि महत्तम जतन ते,
जिला राजधानी सबै नापि तन ते।
न लेना न देना बड़े अफसर न ते।
बड़े बरगदन का उखारिनि जरन ते।
जो पूछेन सचाई बताइनि महतिया,
कि थोड़ा जलेन हम औ ज्यादा जलायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
महेन्दर न समझैं पढ़ाई-लिखाई,
कहैं लरिकिनी सीखि जातीं ढिठाई।
जै कॉलेज के लरिका जुगाड़ैं भिड़ाई,
तकैं नौकरी कामु अपनो बिहाई।
निजी सभ्यता संस्कृति को भुलाये,
जुआ, दारू-सिगरेट में सबकुछ उड़ायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
मुरारी बड़ी चिन्त करते सबन की,
दिशा मोड़ सकते गगन के पवन की।
रखें जानकारी खगन के परन की,
इन्हैं युक्ति आवै समस्या हरन की।
मगर सिलि न पावैं अपनी फटी का,
पड़ोसी के कुत्ता से खुद का कटायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।

सोमवार, 23 अक्टूबर 2023

बेचारी जनता

19/05/2018

जब जब चीजें हल्के में ले ली जायेंगी।

सड़ी चादरें जोड़ तोड़ से सीं जायेंगी।

रिश्वत वाले पेट नगाड़ा हो जायेंगे।

जिम्मेदार तानकर चादर सो जायेंगे।

तब तब बिल्डिंग या फिर पुल को गिरना होगा।

बेचारी जनता को पिसना मरना होगा।।


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रविवार, 27 अगस्त 2023

चन्दा मामा

जब से चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर रोवर उतरा है हम भारतीय बड़े प्रसन्न हैं हमने एक मील का पत्थर स्थापित किया है। समस्त देशवासियों व वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई। किन्तु हम कवि हैं साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि भी रखते हैं अतः हृदय में कुछ अलग प्रकार के भाव उठते हैं जिन्हें एक कविता में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। आशा है मैं अपने कवि धर्म में सफल रहा होऊंगा।
विज्ञान का यथारथ कवि उर की कल्पना है।
तुम हो खुशी मनाते पर चाॅंद अनमना है।
जो भी कहे ये दुनिया मैं मानता नहीं हूॅं, 
मेरा चाॅंद खुरदुरा है यह बात ही मना है।।
सौन्दर्य का नहीं प्रिय कोई बाॅंट दूसरा है।
सब यान जा के उतरे वह ठाॅंव दूसरा है।
हमने हमेशा पूजा पूजा किया करेंगे,
वह चाॅंद दूसरा है यह चाॅंद दूसरा है।।
स्नेहिल सुधा सुसज्जित सोलह कला सॅंवारे।
हे! दक्ष के जमाता शिव शीश डेरा डारे।
अनसूया-अत्रि के सुत दुर्वासा तेरे भाई,
कोई ऑंख जो दिखा दे फौरन उन्हें पुकारे।।
हे कृष्ण के खिलौने जन जन के जगत मामा।
विज्ञान है निठल्ली इसको न कोई कामा।
शायर गजल कहेंगे पण्डित पढ़ेंगे मन्तर,
निश्चिन्त हो गगन में जपो राम राम रामा।।

हमारीवाणी

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