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शनिवार, 2 मार्च 2024

मन की कर ले

कदरदान तो आयेंगे ही बाकी को फुर्सत न मिलेगी।
जहॉं जमेंगे पीने वाले साकी को फुर्सत न मिलेगी।।
तेरे हित में ये अच्छा है मन की कर ले इस महफिल में,
ओ रक्कासा! यहॉं से जाकर अन्य कहीं इज्जत न मिलेगी।।
नीचे गिरना जल छोंड़े तो प्यासे सब मर जायेंगे,
आग अगर नीचे गिर जाये धरती पर जन्नत न मिलेगी।
मेरी पुस्तक के ग्राहक हैं चूहे, दीमक, चूरन वाले,
मुझे पता है छपवा भी दूॅं कविता की कीमत न मिलेगी।
जिससे जो भी मिली नसीहत सबकी सब मेमोरी में,
जो भी चाहे सब ले जाये बार बार मोहलत न मिलेगी।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

शक्ति कहाॅं विज्ञान में?

भॅंवरे ने क्या फूॅंक दिया है? मन्त्र कली के कान में।
खिल खिल करके खुशबू अर्पित, कर दी जग को दान में।
अधर खोल कुसुमावलि हॅंस दी, जीवन जगा विहान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?
चमक दमक जयघोष कर रहे, पवनों के सम्मान में।
धरती को श्रृंगारित करते, प्राण डालते धान में।
आलिंगन कर गिरिश्रृंगों को, मेघ जुटे जल-दान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?
गोले ने जादू दिखलाया, चढ़कर अरुण विमान में।
कण-कण में जीवन लहराया, हलचल गगन वितान में।
खगकुल ने जयगान सुनाया, सूर्य देव की शान में।
नैसर्गिक सम्बन्ध समझ लें, शक्ति कहाॅं विज्ञान में?

बुधवार, 25 अक्टूबर 2023

हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन

जो मूडे मा आवा तौ मजमा लगायेन।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
मदन्नू, महतिया, महेन्दर, मुरारी,
सबै गाॅंठै बातें हवा की सवारी।
न गन्ना न गेंहूॅं न मोहरा दुआरी,
न गैया न गोरू बनाई बिगारी।
मगर इनके मुॅंह ज्ञान अद्भुत पिटारा,
बिखेरै की खातिर इनका बुलायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
रहै मद्दा ठगउरि न जाने थी पब्लिक,
रहै खाइ का कम खुशी पै चतुर्दिक।
मदन्नू बताइनि कमर मा गई चिक,
जो उल्टा था जन्मा लगाएसि जरा किक।
रहै बात अद्भुत समुझि माॅं न आवै,
बिना डाॅक्टर औ' दवा दौड़ि पायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
महतिया बनाएनि महत्तम जतन ते,
जिला राजधानी सबै नापि तन ते।
न लेना न देना बड़े अफसर न ते।
बड़े बरगदन का उखारिनि जरन ते।
जो पूछेन सचाई बताइनि महतिया,
कि थोड़ा जलेन हम औ ज्यादा जलायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
महेन्दर न समझैं पढ़ाई-लिखाई,
कहैं लरिकिनी सीखि जातीं ढिठाई।
जै कॉलेज के लरिका जुगाड़ैं भिड़ाई,
तकैं नौकरी कामु अपनो बिहाई।
निजी सभ्यता संस्कृति को भुलाये,
जुआ, दारू-सिगरेट में सबकुछ उड़ायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।
मुरारी बड़ी चिन्त करते सबन की,
दिशा मोड़ सकते गगन के पवन की।
रखें जानकारी खगन के परन की,
इन्हैं युक्ति आवै समस्या हरन की।
मगर सिलि न पावैं अपनी फटी का,
पड़ोसी के कुत्ता से खुद का कटायेन।।
हमहु खाली खपड़ी की खुजली मिटायेन।।

शनिवार, 23 सितंबर 2023

ओ! सबकी सुधि रखने वाले!

५.

२३/६/९६ जन-फर ९७ रश्मिरथी में प्रकाशित
निज नामावलि में मेरा भी एक नाम तू लिख ले।
ओ! सबकी सुधि रखने वाले एक काम तू लिख ले।
एक बार मम गाँव द्वार पर निज नयनों में नेह धार धर।
हल्के हल्के उर सहला जा थका हुआ हूँ कुछ बहला जा।
करुणा की बरखा का मुझ पर तामझाम तू लिख ले।
निज नामावलि में मेरा भी एक नाम तू लिख ले।
ओ! सबकी सुधि रखने वाले एक काम तू लिख ले।
जाने कितनी बार निकट से सूक्ष्म रूप से या कि प्रकट से।
मुझे लगा यह अभी गये तुम टेरा तुमको किन्तु हुए गुम।
एक बार एक पल मेरे उर का विराम तू लिख ले।
निज नामावलि में मेरा भी एक नाम तू लिख ले।
ओ! सबकी सुधि रखने वाले एक काम तू लिख ले।
दे न सका कुछ दे न सकूँगा जो अर्पित निज कह न सकूँगा।
किन्तु मुझे इतना अशीष दो तव चरणों नत रहे शीश दो।
तुझ पर श्रद्धा रहे अटल मम सुबह शाम तू लिख ले।
निज नामावलि में मेरा भी एक नाम तू लिख ले।
ओ! सबकी सुधि रखने वाले एक काम तू लिख ले।


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बुधवार, 13 सितंबर 2023

यशोधरे! तुम जान पाईं

युवरानी जब सो जायेगी तब युवराज चलेगा वन को।
लुभा नहीं श्रृंगार सका यदि तो वैराग्य जमेगा मन को।।
इतना भी पहचान न पाईं।
यशोधरे! तुम जान न पाईं।
संतों का अपना स्वभाव है सम्राटों की अपनी लीला।
सुत का प्रेम पिता की आज्ञा कर न सकी नयनों को गीला।।
बाॅंध सको वह बान न पाईं।
यशोधरे! तुम जान न पाईं।
कितना कठिन फैसला होगा उर पर प्रस्तर लेकर जाना।
पद, पैसा, प्रिय पुत्र, प्रिया सबको तजकर सम्बन्ध भुलाना।।
तुम थोड़ा दे दान न पाईं।
यशोधरे! तुम जान न पाईं।
चले गए फिर वापस आये संन्यासी का वेश संवारे।
तब भी तुमसे बना नहीं यह स्वागत करतीं आतीं द्वारे।।
स्वामी का कर मान पाईं।
यशोधरे! तुम जान पाईं।।

बुधवार, 5 जुलाई 2023

बारिश हो तो

मेरी टीन तुम्हारा छप्पर,
बारिश हो...तो...किसी एक पर?
छत भीगे या आँगन भीगे,
भीगे खेत महावन भीगे,
बचपन भीग बुढ़ापा भीगे,
या मस्ताना यौवन भीगे,
मेरी कार तुम्हारा ट्रैक्टर,
बारिश हो...तो...किसी एक पर?
धरती भीगे अम्बर भीगे,
सच भीगे आडम्बर भीगे,
जीवन मृत्यु मुक्ति भव भीगे,
भीगे जून दिसम्बर भीगे।
मेरा घाव तुम्हारा नश्तर।
बारिश हो...तो... किसी एक पर?
बिस्तर खटिया चद्दर भीगे,
रेशम भीगे खद्दर भीगे,
सुख-दुख शान्ति शोरगुल भीगे,
भीगे करम मुकद्दर भीगे।
मेरी गागर तेरा सागर।
बारिश हो...तो... किसी एक पर?
तृषित मरुस्थल कण-कण भीगे,
तपित विरहिणी क्षण-क्षण भीगे,
रोम-रोम रसमय हो भीगे,
अंकुर -अंकुर तृण-तृण भीगे।
मेरा फूल तुम्हारा पत्थर।
बारिश हो...तो... किसी एक पर?

गुरुवार, 18 मई 2023

क्या याचना करूँ मैं

11/3/1995

1

अब आप ही बता दें,

क्या याचना करूँ मैं?

जो दे चुके हो अब तक,

उसको कहाँ धरूं मैं?

दो वक्त लोन रोटी,

तन को ढकूँ लँगोटी,

सो जाऊँ यार जिसमें,

वह झोपड़ी न छोटी|

अतिरिक्त चाहिए क्या,

क्या याचना करूँ मैं?

गैरों से माँग होती,

अपनों से पूर्ति होती,

तुझसे जुदा न मेरी,

कभी आत्मा है होती,

तुम यदि कहो की मांगो,

क्या भावना करूँ मैं?

तेरा धूर्त यार जाने,

सब कुछ तेरे खजाने,

तेरा हाथ सिर पे जब तक,

सभी मैंने अपने माने,

सच्ची रहे ये यारी,

दृढ़ कामना करूँ मैं|


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गुरुवार, 3 नवंबर 2022

ओ कुड़ी तू मुझसे पट

आपने हाँक लगाकर सामान बेचने वालों को देखा ही होगा। क्या कलात्मक ढंग से आवाज लगाकर अपने ग्राहक को केन्द्र में रखते हैं कि बस ग्राहक मना नहीं कर पाता। दूसरी ओर प्रेमी जन होते हैं बड़ा भावविभोर होकर प्रणय निवेदन करते हैं बेचारे पिटते पिटते बच जाते हैं, कभी पिट जाते हैं और कभी उनके वो पट जाते हैं। मेरा क्या होगा राम जाने? मैंने तो पहले वाली युक्ति ही उचित समझी। आनन्द के लिए मैंने लिखा आनन्द के लिए आप पढ़ें। मस्तिष्क को थोड़ी देर के लिए छुट्टी दें। 

आजूबाजू वाले छड, 
ओ! कुड़ी तू मुझसे पट!
नहीं सोच मैं पका हुआ हूँ,
नर्म डाल पर टँगा हुआ हूँ,
अब तक टपका नहीं अगर मैं, 
तेरी खातिर रुका हुआ हूँ।
एक बार तो मुझको चख,
मैं झट से जाऊँगा कट।।
ओ! कुड़ी तू मुझसे पट!
कुछ न करे तो यहीं खड़ी रह,
फोटो जैसे फ्रेम जड़ी रह,
आँखों की राहों से घुस जा,
दिल के बेड पर सदा पड़ी रह।
मैं भी बिल्कुल नहीं हिलूँगा,
रसिक प्रिये! मैं भी उद्भट।।
ओ ! कुड़ी तू मुझसे पट!
शरद-ग्रीष्म की चिंत नहीं कर,
केवल अपना चित्त सही कर,
चलो प्रेम का वित्त बढ़ायें,
ना ना कर मति नहीं दही कर।
खा लेना तू चाउमीन भी,
अभी न भूखी जा मरघट।
ओ ! कुड़ी तू मुझसे पट!

रविवार, 18 सितंबर 2022

तू कहे तो चलूँ

मेरा चलना ठहरना तुम्हारी खुशी।।
तू कहे तो रुकूँ तू कहे तू चलूँ।
प्रेम के पन्थ में स्वत्व होता नहीं,
जिस तरह से उदधि में उतरती नदी।
शैल पर जो खड़े शैल से जो जड़े,
भाग्य में नेह की लिपि छपी ही नहीं।
मोम जैसा बनूँ ताप तो मिल सके।
तू कहे तो तरल बूँद बन बन गलूँ।।1।।
तू कहे तो रुकूँ तू कहे तू चलूँ।
मेघ की यह नियति है पवन सँग बहे,
चन्द्र कब नभ सजे चन्द्रिका के बिना,
ज्योति होगी तभी तो प्रभा राजती,
तट बिना सरि कहाँ ध्यान में आयेगी।
नेह की डोर पर तू नटी सी चले,
मैं भी नट की तरह झूम लूँ नाच लूँ।।2।।
तू कहे तो रुकूँ तू कहे तू चलूँ।
अब न पतझड़ के दिन हैं न ऋतु ग्रीष्म की,
शीत की रात बीते समय हो गया,
याद में ही बची बूँद बरसात की,
है बसंती सुबह की पवन मोदमय।
तुझमें हो यदि हुनर अंक में आ उतर,
तू भ्रमर हो सके पुष्प हो मैं खिलूँ।।3।।
तू कहे तो रुकूँ तू कहे तू चलूँ।

सोमवार, 15 अगस्त 2022

आजादी का अमृत महोत्सव

आजादी का अमृत महोत्सव, घर घर अलख जगायेगा।
बच्चा बच्चा थाम तिरंगा, अम्बर तक लहरायेगा।।
इंसानों ने इंसानों को जब इंसान समझना छोड़ा।
दुश्मन कोई भी हो तोपों का मुँह उसने हम पर मोड़ा।
कोई भी भारत में अब से, नहीं भूल दुहरायेगा।।1।।
जातिधर्म की लाठी लेकर, युगों युगों सिर फोड़ चुके हैं।
फाँस तरक्की के पहिए को, रूढ़िवाद में रहे रुके हैं।
नवयुग में नव संकल्पों संग, जनगण कदम बढ़ायेगा।।2।।
अन्दर-बाहर जहाँ कहीं भी, षड्यंत्रों के चक्र चल रहे।
एक-एक कुचले जायेंगे, आस्तीनों में सर्प पल रहे।
सहनशीलता-संयम सरगम, कौन कहाँ तक गायेगा।।3।।
गर्द छा गई है संस्कृति पर, धूमिल सदाचार के मोती।
कुत्तों जैसे झगड़ रहे हम, भारत माता अब तक रोती।
भेद भूलकर मनुज आज से, भारतीय बन पायेगा।।4।।

गुरुवार, 9 जून 2022

बेटा बहू


जिनके हित में बंजर कर दी अपनी हरी बहार में,
बेटे बहू नहीं आते हैं अब घर पर त्यौहार में।।
अपनी अपनी ध्वजा उठाए सब विकास की चाह रहे,
रोजीरोटी का रण लड़ते देख विजय की राह रहे।
कुछ तो खोए हुए तरक्की की सतरंग मल्हार में।।
बाहर बेटा गया अकेला दो होकर अब रहता है,
लेकर बहू आ रहा घर पर हर महिने ही कहता है,
आँखें उलझी हुई प्रतीक्षारूपी काँस-सिवार में।।
बेटे के सिर सेहरा देखें मन की चाह मरी मन में,
कभी नहीं जानी है मस्ती पोती-पोतों के धन में,
सिसक सिसक कर कटे जिंदगी जीवन की पतझार में।।

रविवार, 5 जून 2022

नया व्यवसाय

आजकल पकड़ा हुआ मैंने नया व्यवसाय है।
शव पुराने खोदता या संग रहती गाय है।।
पात्र अपने मन मुताबिक चुन लिए इतिहास से,
कींच में डाला किसी को रंग दिया उजियास से।।
चोंच लड़तीं जा रहीं हैं गीत सबके ही मधुर।
रँग बिरंगी हर किसी की टोपियाँ हैं उच्चतर।।
शीश नंगा ले फिरूँ अपनी प्रकृति में है नहीं।
गूँथ कर उद्दण्डता सिर पर उठाये हूँ मही।।
हाकिमों ने भय बनाया है सभी के हृदय में।
आग का मैं भी खिलाड़ी नित्य रहता प्रलय में।।
ध्वंस से सम्बन्ध तोड़े मैं सृजक हूँ सृष्टि का।
यत्न करता हूँ कि कृति में भाव हो उत्कृष्टि का।।

शनिवार, 5 मार्च 2022

बेटे बहू


जिनके हित में बंजर कर दी अपनी हरी बहार में,
बेटे बहू नहीं आते हैं अब घर पर त्यौहार में।।
अपनी अपनी ध्वजा उठाए सब विकास की चाह रहे,
रोजीरोटी का रण लड़ते देख विजय की राह रहे।
कुछ तो खोए हुए तरक्की की सतरंग मल्हार में।।
बाहर बेटा गया अकेला दो होकर अब रहता है,
लेकर बहू आ रहा घर पर हर महिने ही कहता है,
आँखें उलझी हुई प्रतीक्षारूपी काँस-सिवार में।।
बेटे के सिर सेहरा देखें मन की चाह मरी मन में,
कभी नहीं जानी है मस्ती पोती-पोतों के धन में,
सिसक सिसक कर कटे जिंदगी जीवन की पतझार में।।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कौन तुमको दूर अपने से करे

अंजुली में हैं सजाये सुमन अधरों से झरे।
नैन झिलमिल दीप हो मन को उजाले से भरे।
छवि तुम्हारी ओ प्रिये हरती सदा मन की थकन,
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
पूर्णिमा का चाँद सम्मुख हो रही साकार हो
स्वर्ग से उतरी परी का स्वर्णमय आकार हो
तुम हमारे सदन-उपवन-वन-विजन में बस गयी,
प्रात की पावन सुरभियुत पवन का व्यवहार हो।
तंत्रिकाएं हो गयीं झंकृत अजब अनुभूति से,
दश दिशाएं अमृत भरकर कलश निज कर में धरे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
काम है या मोह है या प्रेम है या वासना।
नेह का आनन्द है या बिछुड़ने की त्रासना।
कौन विश्लेषण करे या संश्लेषण मेंं जुटे,
कर रहा अव्यक्त की जैसे सतत आराधना।
जिस घड़ी से आ गया सानिध्य में तेरे प्रिये!
हो गया मैं पतन या उत्थान के भय से परे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।

विमल 9198907871

रविवार, 30 मई 2021

डिजिटल प्रेम

प्रेम डिजिटल हुआ हम डिजिट हो गए।
ऑनलाइन मजे के विजिट हो गए।।
बॉक्स मेंं कुछ लिखा फिर सफा कर दिया,
कौन जाने कि कितनी दफा कर दिया,
उर प्रफुल्लन कुशल प्रेय सम्वाद को,
हर डिजिट ने सँभाला शिफा कर दिया।।
हम जियेंगे यही सोच मन में रखी,
देख डी पी तुरत जां-ब-हक हो गए।
प्रेम डिजिटल हुआ हम डिजिट हो गए।
ऑनलाइन मजे के विजिट हो गए।।1।।
भय मिटा और चिन्ता हरी फोन ने,
मौन रह कर कहा हाल रिंगटोन ने,
एक नोटीफिकेशन खुशी दे गया,
ऐसी घुट्टी पिलाई लवर-जोन ने।
छोड़ घर संत होवें जरूरत नहीं,
प्रेम सागर की गहरी लहर हो गए।
प्रेम डिजिटल हुआ हम डिजिट हो गए।
ऑनलाइन मजे के विजिट हो गए।।2।।
अंक का क्षीर सागर न अधरों छुआ,
माँगते रह गए विष-घटों से दुआ,
मायानगरी ने नेट की ठगा इस तरह,
प्यास से मर गई वृद्ध मेरी बुआ*। 
टिप्पणी लाइकों के शिखर पर चढे़,
गृह-सदस्यों के मन की चुभन हो गए।
प्रेम डिजिटल हुआ हम डिजिट हो गए।
ऑनलाइन मजे के विजिट हो गए।।3।।

*(मैं जब प्रेम की बात करता हूँ तो समझता हूँ माँ के बाद दो ही रिश्ते प्रगाढ़ होते हैं एक बुआ और दूसरी मौसी)


सोमवार, 10 अगस्त 2020

कोरोना रे अब तो जा रे


कोरोना रे, अब तो जा रे|
जाड़े गये, फिर गर्मी आई,
तूने पाँव पसारे|
लोग-बाग़ घर भीतर घुसि गए,
तूने डेरे डारे|
बारिश जाई रही अपने घर,
अब तो तू भी जा रे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
मन्दिर बनि रहो मोदी कृपा से,
तुमसे रामउ हारे|
बिना दवा जन ठीक हुई रहे,
काहे छ्प्परू फारे|
लूट पाट औ' घटा नफा सब,
देखि लई हइ प्यारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
घेरो चीनु संभारी फौजें,
अब राफेल रखवारे|
पर-निर्भरता छोड़के भारत,
राग स्वदेशी गा रे|
मजदूरों ने करी वापसी तुमहि,
टिकासनु डारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|


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सोमवार, 1 जून 2020

मील के पत्थर


१५/१२/१९९७
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पत्थर नहीं तुम हो गतागत ज्ञान दाता।
है प्रीत जिसको लक्ष्य से वह जान पाता।
किस दिशा में और कितना है गमन।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पथ की महत्ता मूक होकर भी बताते।
भटके हुओं को मार्ग पर भी तुम लगाते।
और करवाते वियुक्तों का मिलन।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
पथ पर चला जो करके अनदेखी तुम्हारी।
उसने कदाचित ही स्वयँ की गति संवारी।
प्राप्त कर पाया सफलता की शरण।
ओ! मील के पत्थर तुम्हें मेरा नमन।
 




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