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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

अजाब

लब पर है तेरा नाम और तस्वीर ख्वाब में।
बस इतना लिख सका हूॅं खत के जवाब में।।
हर ओर रोशनी की चाहत का शोर है,
हमने शमा छुपा ली दिल के हिजाब में।।
सोना खरीदते हैं बहुत जॉंच-परख कर।
कुछ बात देख ली है हमने जनाब में।।
दूभर उधर निकलना दूभर इधर भी रहना,
ठहरूॅं कहाॅं पे कैसे उलझा हिसाब में।।
हर ओर आईने हैं और आईने में तुम,
मैं खुद को खो चुका हूॅं कैसे अजाब में।।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

अगर तुम पास आ जाओ

लगी है हाट जब सुन्दर तो कुछ तो क्रीत हो जाये।
उठो दौड़ो करो जल्दी न इच्छा शीत हो जाये।।
जहॉं निर्मल हृदय होगा अहम् से दूरियॉं होंगी।
सुकोमल मन मिले कोई न चाहे प्रीत हो जाये।।
हृदय का मूल्य वे देंगे स्वयं समृद्ध जो उर से,
सॅंभल कर कीजिये सौदा नहीं अनरीत हो जाये।।
न समझूॅं स्वर न जानूॅं लय विकल मैं रागिनी खोजूॅं।
अगर तुम पास आ जाओ तो फिर से गीत हो जाये।।
करूॅं साधन कहाॅं कितना यही आकर बता जाओ।
कठिन हो कर्म कितना भी सरलतम जीत हो जाये।।

गुरुवार, 17 अगस्त 2023

तेरी बला से

ये गज़ल मेरी नहीं है आपकी है।
जो कलम है आपकी ही नाप की है।।1।।
हमको क्या है तर्जुमा ही जानते हैं।
आप जानो पुण्य की है पाप की है।।2।।
ये जो ऑंखें बन्द कर मक्कर किये हो,
जैसी भी है पर अदा ये टॉप की है।।3।।
खुश हूॅं या गुस्सा हूॅं मैं तेरी बला से।
कैफियत तेरी धनुष के चाप की है।।4।।
इस शहर को छोड़कर जाना पड़ा तो।
हर सवारी इस 'विमल' के बाप की है।।5।।

बुधवार, 16 अगस्त 2023

हार बैठे जिन्दगी

सोच में बन्दूक या खंजर छुरी तलवार थी।
किन्तु मक्तूलों के दिल पे दो नयन की धार थी।।1।।
थी नहीं पहचान कैसी है मुहब्बत की नजर।
इसलिए मैं बच गया वह मौत की ललकार थी।।2।।
खुद से दुनिया छोड़कर जाने का मुझको हक न था,
जिन्दगी ईश्वर ने दी थी उसका ही अधिकार थी।।3।।
बैठकरके सामने क्यों दो घड़ी बातें न कीं?
हार बैठे जिन्दगी ऐसी भी जिद बेकार थी।।4।।
त्यागना था त्यागता संसार में आसक्ति को।
तन छुटा पर कर्म संग था मृत्यु केवल भार थी।।5।।

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

कोई पागल तुम्हारे लिए है

खास काजल तुम्हारे लिए है।

नेह संदल तुम्हारे लिए है।

उनसे जाकर के इतना बता दो,

कोई पागल तुम्हारे लिए है।

बूँद दो बूँद हित रो रहे हो,

सारा बादल तुम्हारे लिए है।

यूँ तो बहुतों ने हमको है पीटा,

बंदा घायल तुम्हारे लिए है।

होगा फाटक भले बंद सच है,

खोली साँकल तुम्हारे लिए है।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

भूला हुआ गुलाब


भूला हुआ गुलाब है अपने रुआब को।
गुड़हल चुरा चुके हैं रंग-ए-गुलाब को।।
जल्दी निकल गये सब साकी के मुँहलगे,
हम तो सुबह गये ले सारे हिसाब को।।
मन में बसी हुई है सूरत बहिश्त की,
मैं क्या करूँ उठाकर तेरे हिजाब को।।
हमने तो अपनी घिस घिस खुशबू बिखेर दी,
रख ले बचाके तू ही अपने शबाब को।।
या तो बढ़ा न मुझसे कोई भी राब्ता,
या फिर किनारे रख दे अपने नकाब को।।
यूँ तो कई जवाब हैं हर एक सवाल के,
देता 'विमल' हमेशा उत्तम जवाब को।।

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

बहुत बड़े पाजी

हम तो बहुत बड़े पाजी हैं तुम भी बहुत बड़े पाजी।
झोला बंद बंद रहने दो बाजा अभी नहीं बाजी।।1।।
कौए हों या कोयल सबके अपने मौसम होते हैं।
पपिहा है बस इन्तजार में स्वाति किस दिवस हो राजी।।2।।
राजनीति पर चर्चा के हैं खतरे बहुत बड़े भारी।
हिटलर भले मिट गया लेकिन जन्मे नए नए नाजी।।3।।
हम फकीर हैं कहते कहते, सबको भीख मंगा डाली,
क्लास एक से विद्यालय में बंटती है रोटी भाजी।।4।।
राम और रहमान सभी हैं, मुफ्त मिले पर चंगे से।
दल कोई हो जन को लेकर, दलदल में है पहुँचा जी।।5।।
गूँज गई मंदिर में घंटी, प्रभु की याद दिला बैठी,
वरना 'विमल' विमल हो लिखता, इसके आगे कड़वा जी।।6।।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

कर्जे अदा

आप सबसे इश्क मेरा अलहदा।
आप जिस पर मर गए मैं हूँ फिदा।।1।।
अब जुए का खेलना ही तज दिया,
एक उसकी झलक पर रुपया बदा।।2।।
द्वार पर पापा रहे माँ छत खड़ी,
हमने खिड़की से किये कर्जे अदा।।3।।
शातिरों ने रातरानी छेंड़ दी,
मैं तो बेला के लिए दहशतजदा।।4।।
मैं खुशी से जान देता, माँगते!
हो हलक पर जब छुरी तो क्या सदा?।।5।।

रविवार, 3 अप्रैल 2022

नया शगल

पावर में आकर गरियाना नया शगल।
जबकि पता है जो भी आया लिया निकल।।1।।
लोकतंत्र में हाथापाई जायज है।
कुर्सी पर बैठे हैं फिर क्यों उखल-बिखल।।2।।
अब सच्चा इतिहास लिख रहे, उजले ठग।
गंजों के सिर पर हैं कीलें रहीं मचल।।3।।
सच कहने की कीमत मैं दे डालूँगा,
संभव नहीं कींच-कच्चड़ में पड़ूँ फिसल।।4।।
'मुँह में राम बगल में छूरी' सत्य कहा है,
राम संग माया का रहना तथ्य सरल।।5।।
देशद्रोहियों में लिख जाना अच्छा है।
खुद की नजरों में गिर जाना नहीं 'विमल'।।6।।
विमल 9198907871

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

दया कर प्रभू

क्या गजब ढा रहीं बाल रंगीन कर!
है बुढ़ापा जवानी चलींं छीनकर।।1।।
हमने केशों को सनई ही रहने दिया,
एक रुपया अठन्नी रखीं तीन कर।।2।।
थे धनी हम बहुत ये जगत जानता,
इस गली से गईंं तो हमें दीन कर।।3।।
जब से जालिम अधर मिर्च सूखी हुए,
तब से जेबों में यादें भरींं बीनकर।।4।।
रात तब से हिमालय हुई मित्रवर!
जबसे यौवन गया मेरी तौहीन कर।।5।। 
कोई चक्कर चला कुछ दया कर प्रभू!
एक दिन जो रहा फिर वही सीन कर।।6।।

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

उर में उठती पीर

मिट्टी खाई गिट्टी खाई , खा डाली सीमेंट याद है।
गए पोतने दीवारों को , चेहरे पर की पेंट याद है।।1।।
डाली पर दो बन्दर बैठे, मुझको ढँग से ताक रहे थे,
गड्ढा खोद गिटैली रख के, ढक दी थी वो गेंद याद है।।2।।
बहुत बार शैतानी करके, बच जाते थे कभी कभी हम,
लेकिन फँसे सजा पाई जब, खूब दुखी थी पीठ याद है।।3।।
भरी दोपहर छुक छुक करती, जिसके नीचे रेल चली थी,
बच्चों के मन भाने वाला, वो पीपल का पेड़ याद है।।4।।
विदा हुई जब काली कोयल, पीछे पीछे दौड़ रहा था,
ठोकर खाकर गिरा जहाँ पर, वहाँ पड़ी थी ईंट याद है।।5।।
था जिस दिन स्कूल आखिरी, छूट गया कुछ बहुत कीमती,
अंकपत्र दे ठगा गया था, उर में उठती पीर याद है।।6।।

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

लोटा नहीं न डोर

मेरी खुली किताब के पन्ने पलट के देख।
चाँदी के भाव बिक गये सिक्के गिलट के देख।।1।।
केवल दरोदिवार से पूछो नहीं हालात,
सुननी जो तुझको खनक तो बिस्तर उलट के देख।।2।।
यूँ तो हमारे चित्त का कुछ भी नहीं प्रसार,
ब्रह्माण्ड बस गया यहाँ थोड़ा सिमट के देख।।3।।
रूखा बहुत स्वभाव है सब जानते हैं बन्धु,
स्नेहिल हृदय समूर सा इससे लिपट के देख।।4।।
बारिश नहीं हुई तो क्या फिसलन है हर जगह,
चिकना हूँ मार्बल सा इसपर रपट के देख।।5।।
भइया 'विमल' के पास थी लोटा नहीं न डोर,
कैसे मिटी ये प्यास फिर, बादल झपट के देख।।6।।

रविवार, 26 अप्रैल 2020

कोरोना

आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से कोरोना चला रौनक घटी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन राहें बन्द थीं हर ठाँव की।
ये पुलिस तो आज फिर से हो गयी आतंकमय,
लोग मुर्गा बन गए ज्यों पाठशाला काँव की।
लॉकडाउन को लगाकर काम तो अच्छा किया।
लोग शहरों से छुटे चौखट खड़े हैं गाँव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
माँगने आया दवा वो मुझसे खूनी आँव की।
तुम भले समझो गजल प्यारे इसे बेकार में,
मैंने बस यात्रा शुरू की है हृदय की नाँव की।

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

सारी उमर जाती

शमा जलने  से डर जाती,
पतिंगे की सँवर जाती।
पता है इश्क का खतरा,
मगर वो इश्क कर जाती।।1/11/2019 FB

बहुत बेचैन थी साकी,
न कोई मयकदे आया,
न मेरे पास आती तो,
सुराही ले किधर जाती।|1/11/2019 FB

सजे थे शूल करतल में,
बचाने थे सुमन कोमल।
जो करता पीर की चिंता,
तो फिर माला बिखर जाती।।2/11/2019 FB

खुली खिड़की नहीं होती,
तो होती बात क्या उससे,
जो रुकता द्वार खुलने तक,
चली सारी उमर जाती।।2/11/2019 FB

बसे जिस आँगने जाकर,
लगायी आग नफरत की।
करें दावा मुहब्बत का,
बुरी आदत अखर जाती।।3/11/2019 FB

जहर बो कर हवाओं में,
पवन चाहूँ बसन्ती सी,
ये सपना देखता हूँ जब,
तो हर सूरत है मर जाती।।4/11/2019 FB

फँसी थी मन में जो मछली,
कँटीली और जहरीली,
उगलता या निगल जाता,
'विमल' को हो जहर जाती।|4/11/2019 FB

बुधवार, 29 मई 2019

दिल से दिल

दिल से दिल की बात करी, और  चल दिये।
मन में न कोई प्रश्न था, पर उसने हल दिये।।1।।
चढ़कर चिराग हुस्न का रक्खा मुंडेर पर,
जालिम को खबर ना हुई, कैसे कतल किये।।2।।
तुम भी तो एक रोज गए थे उसी डगर,
पत्थर तुम्हें कहा क्या, तुम तो पिघल लिये।।3।।
सब कुछ बजार में मुझे मन का मिला नहीं,
जिन्दा रहा हूँ इसलिये अबतक गरल पिये।।4।।
माना कि दूर लगती है सूरज की रोशनी,
पर ज्येष्ठ का महीना, तन मन विकल किये।।5।।
यह प्रेम की कमाई कोई नौकरी नहीं है,
अब तक वसन सिये जो उज्ज्वल 'विमल' सिये।।6।।


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सोमवार, 11 मार्च 2019

धार धर लो

11/03/2019
वोट है तलवार इस पर धार धर लो।
और अपने आप पर उपकार कर लो।।
देश उन्नायक चयन का समय है ये।
जोकरों खलनायकों का मान हर लो।।
तुम मदारी हो जमूरे सामने हैं।
एक निर्णय पंचसाला खेल कर लो।।
लोकतंत्री नाव की पतवार कर में।
ले चलो तट या कि फिर मझधार मर लो।।
जब बटन पर उँगलियाँ हों तो ठहरकर।
दस शतक की दासता को याद कर लो।।
देश का आँचल जो श्यामल हो गया है।
अब समय घर, वसन, तन, मन 'विमल’ कर लो।।


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रविवार, 21 अक्टूबर 2018

नजर से गई

बहुत दिनों के बाद जिसे मैं कविता कहता हूँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शराफत शरीफों के घर से गई,
हवेली हमारी नजर से गई।।
कहाँ कौन शातिर बताये भला,
चमन छोड़ चिड़िया किधर से गई।।
करूँ वायदा फिर से मुमकिन नहीं,
अभी पीर पिछली जिगर से गई।।
परेशान रातों की चुभती घुटन,
बहुत वक्त बीता उमर से गई।।
गजल क्या कहूँ शून्य में रम गया,
कलर की कसौटी कमर से गई।।
विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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सोमवार, 11 दिसंबर 2017

कुतुबमीनार हो ऊँची



04/12/2017
चाहता तो था कि एक दीवार हो ऊँची।
और अपने बीच में तकरार हो ऊँची।।
ये जमाना देखता है साथ में हमको,
भर अचम्भे यों कुतुबमीनार हो ऊँची।।
आ गये हम तुम यहाँ रस्में निभाते बस,
तुम भी नाटक की बड़ी किरदार हो ऊँची।।
कट गयी आधी झगड़ते रह गये हम तुम,
अब तो रिश्ते में प्रिये झनकार हो ऊँची।।
तुम झगड़कर प्रेमकी बरसात में माहिर,
तोड़ में भी जोड़ की फनकार हो ऊँची।।


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मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

बर्फ के फाहे


                                                             ( चित्र dabangdunia.in/news/aisha-kyun/story/29625.html से साभार )



30/11/2017
बर्फ के फाहे भले हैं इनको पानी मत करो।
अब चमन में बुलबुलों से छेड़खानी मत करो।
आपने कविता कही है गद्य भी साबुत नहीं।
नाम पर साहित्य के ये बदजुबानी मत करो।।
हर नफे पर दोस्त मैं देता नहीं अपना दिमाग,
फालतू में हर शमा की कदरदानी मत करो।।
जौहरी ही जानता है दाम नग पर काम का,
हाट में हाँकें लगाकर बदगुमानी मत करो।।
मैं अकेला ही बहुत हूँ थामने को आंधियाँ,
इस कमर को साधने की मेहरबानी मत करो।।
बन्जरों में हम बहारों की हँसी लौटायेंगे,
इस अहद पर बन्धु मुझसे पहलवानी मत करो।।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

मत रक्खो



अपनी तशरीफ इधर मत रक्खो।
मेरी है चीज नजर मत रक्खो।।
तेरी बातों  में बड़ी फिसलन है,
मेरी राहों में बटर मत रक्खो।।
तेरी नजरों की धार काफी है,
मेरी गर्दन पे कटर मत रक्खो।।
तेरे खत से मेरा घर काँपता है,
उसके अंदर वे जिकर मत रक्खो।।
वक्त हर वक्त पलट सकता है,
काँप जाये वो जिगर मत रक्खो।।
सौंप तो दी तुम्हें गुल्लक अपनी,
मेरा क्या होगा फिकर मत रक्खो।।

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