गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

सपना मुंगेरीलाल का

तिश्नगी है उम्र की चिन्ता न कोई रिस्क की।
पाठशाला खोल दी ट्रेनिंग मिलेगी इश्क की।।
प्रिंसिपल का पद सुरक्षित है उसी के वास्ते,
डर कोरोना का नहीं या फिर जरूरत विक्स की।।
ऑनलाइन क्लास तो सपना मुँगेरीलाल का,
अपने बच्चों की जगह हमने तबेला फिक्स की।।
छोड़ दूँ घरबार मैं इतना निकम्मा हूँ नहीं,
इतना कर्मठ भी नहीं एक्टिंग करूँ फकीर की।।
चाँद-मंगल की समस्या हमने सुलझाईं बहुत,
खाज जाती ही नहीं है मित्र कोहनी तीर की।।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

कोरोना की वापसी का कारण

परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा, "महामुने! एक बात समझ में नहीं आयी? वैक्सीन आ रही थी कोरोना जा रहा था। लोग धीरे धीरे मौज मस्ती की तरफ जा रहे थे फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वैक्सीन के आते ही कोरोना भी अपने तेवर दिखाने लगा।"
शुकदेव जी ने एक रहस्यमयी मुस्कान परीक्षित की ओर फेंकते हुआ कहा, "राजन! आपने आम जनता की जानकारी वर्धनाय बड़ा अच्छा व रूचिकर प्रश्न पूछा है हृदय गदगद हो गया। यही गोपनीय प्रश्न कलयुग में ऊधव ने विमल कुमार शुक्ल नाम के एक नामालूम से प्राणी से पूछा था तो उसने जो बताया था उसे आप भी सुनो।
विमल कुमार शुक्ल ने ऊधव जी को बताया था, "सरकार को जब पता नहीं था कि कोरोना क्या बला है? तो मीडिया को अपनी ओर करके बड़ी भयंकर खबरें दिखाकर इतना डराया और इतने अधिक प्रतिबंध लगाए कि लगा तृतीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। प्रवासियों की इतनी भीड़ सड़कों पर दिखी जितनी भारत पाकिस्तान विभाजन के समय भी न दिखी थी। मृत्यु की बात करें जितनी मौतें कोरोना से न हुईं उससे कहीं अधिक इसलिए मर गए कि यात्रा अवरोधों की वजह से डॉक्टरों तक नहीं पहुँचे, पहुँचे तो डॉक्टरों ने इलाज नहीं किया। भूख और अवसाद से मरने वालों को जोड़ दें तो यह ग्राफ और ऊपर चला जाएगा।
सरकार को अपनी भूल पता चली और उसने धीरे धीरे प्रतिबन्धों को हटाना शुरू किया साथ ही घटना शुरू हुआ कोरोना का। वैक्सीन कब आयेगी पता नहीं था इसलिए जिंदगी पटरी पर आ रही थी। जब न्यूनतम केस थे तभी वैक्सीन आ गई। अब नई समस्या यह थी कि कोरोना खत्म हो गया तो वैक्सीन का क्या होगा? जिन कम्पनियों ने वैक्सीन बनाने में भारीभरकम खर्चा किया आखिर उसकी भरपाई कैसे हो। इसलिए कोरोना को सरकार से सहानुभूति दिखाते हुए उसे वापस आना पड़ा। ऊधव जी यही असली कारण है कोरोना की वापसी का।
फिर विमल जी ने ऊधव के कान में मुँह सटाकर जो मंत्र जपा वह यह है। पहले चक्र में रजिस्ट्रेशन कराये सिर्फ 30% लोगों ने ही टीका लगवाया तो जिम्मेदारों के कान खड़े हो गए। तो एक रजिस्टर्ड से जिम्मेदार ने पूछा क्यों रे वैक्सीन क्यों नहीं लगवाया। रजिस्टर्ड बोला कि जब कोरोना जा रहा है तो वैक्सीन लगवाने का क्या फायदा। बात ऊपर पहुँची ऊपरवाला बोला अच्छा....। बस अगले दिन से कोरोना को दौड़ने के आदेश जारी हो गए। " 
शुकदेव जी अपनी बात समाप्त करें इससे पहले ही परीक्षित बोल पड़ा, "महामुने! विमल कुमार शुक्ल ने आखिर यह निष्कर्ष कैसे निकाला।"
"परीक्षित! तुम अभी भी कलियुग के प्रभाव में हो। इतनी तमीज तो रखो कि बात पूरी हो जाए। अब और जो ज्ञान की बात उसने मुझे बताई वह तुम्हारी जल्दबाजी की वजह से विस्मृत हो गई। खैर निष्कर्ष का आधार सुनो।
परीक्षित! कोरोना सरकार द्वारा आयोजित भीड़ों से दूर था। बाजारों, बसों, ट्रेनों और सरकार के लाभ वाली हर जगह से दूर था। वह वहींं अटैक कर रहा था जहाँ कोरोना गाइडलाइन का पालन अब भी जारी था। वह उन प्रदेशों में शान्त था जहाँ चुनाव थे। स्कूलों में तो गजब का परफॉर्मेंस था कोरोना का। सरकार की पूरी कोशिश थी प्राइवेट टीचरों का कुनबा भूख से मरे तो ठीक पर कोरोना से नहीं। सरकार की सख्ती भी गुलगुलों की मार वाली थी। सबसे बड़ी बात लोग कोरोना की सही जानकारी के लिए अपुष्ट स्रोतों पर कलयुग में भी आश्रित थे और द्वापर में भी हैं।"
परीक्षित को समझ में तो कुछ नहीं आया लेकिन उसने कोई प्रश्न नहीं किया क्योंकि प्रथम तो मोदी के मन की बात टीवी पर आ रही थी दूसरे मोबाइल का नेटवर्क ऑनलाइन कथा संचालन में बाधक बन गया था।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

भेड़ और भेड़िया

लहू तो लाल ही है भेड़ का भी भेड़ियों का भी।
पत्ते हरे होते हैं नीम के और हरा होता है अंगूर भी।
कलर नहीं फितरत की बात करो।
खयाल छोड़ो हकीकत की बात करो।
मुझे यह मत बताओ कि पानी तो पानी है,
मुझे यह बताओ कि पानी की क्या कहानी है।
जमीन से निकलता है पेट्रोल किन्तु पी नहीं सकते।
इसी तरह सदभाव की कविता अच्छी है, 
मगर इस कविता को जी नहीं सकते।
ये सनातनी जिस कुएँ से पीते हैं वहाँ,
गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और नर्मदा का,
जल नहीं अमृत बहता है।
तुम तुलना करते हो उन दिलों से जिनमें,
सहारा का रेगिस्तान रहता है।
तुम पढ़लिख ज्यादा गए हो देखते हो फैट 
किन्तु हम देखते हैं कि डालडा है या देशी है।
दकियानूसी है कि नवोन्मेषी है।
दूध से बनी है रबड़ी और दही भी दूध से बनता है,
सबके अपने टेस्ट हैं कोई किसी की कहाँ सुनता है।
खट्टा होता है दही और नींबू भी खट्टा होता है,
मगर रायते में दही का ही जलवा है।
तो ज्यादा रायता मत फैलाओ, 
असलियत पर आओ।
असलियत ये है भेड़ भेड़ है,
और भेड़िया भेड़िया।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गिल्ली-डंडा

स्कूल अब 11 अप्रैल को खुलेंगे सरकार ने घोषित कर दिया जाहिर है ये अब जुलाई से पहले नहीं खुलेंगे। तो बच्चों आओ कल से मैदान में गिल्ली-डंडा खेलने की प्रैक्टिस करते हैं। क्योंकि इसे सिखाने के लिए न तो बिल्डिंग की जरूरत है और न इन्फ्रास्ट्रक्चर की न अध्यापक की और गिल्ली-डंडा खेलने से न कोरोना ही फैलता है और न ही सरकार की नजर में ये सेक्टर आया है। वैसे भी सालभर से गलियों में तो गिल्ली-डंडा ही खेल रहे थे। जब से कोरोना लगा है तुम ज्यादातर घर पर ही रहे हो। तुम बोर नहीं हुए क्योंकि सरकार ने कहा बेटा मोबाइल है न। माँ बाप के सामने पढ़ाई करो और जब मन ऊबे तो कान में लीड लगाकर ईलू-ईलू गाओ। हाँ जब उससे भी बात न बने तो वो जो तुम्हारी नई क्लास-टीचर हैं न जिनको तुमने उस सो-हॉट सो-सेक्सी कुछ ऐसे ही बोला था न उनसे उनकी निजी जिंदगी के बारे में जानकारी और दोस्तों में चटकारे लेकर बताओ यार! क्या मेम हैं तुम पर अभी से डोरे डाल रही हैं। यदि निगेटिव सोचते हो तो अपने साथियों को बताओ कि कैसे हिन्दी वाले पुराने टीचर रंग को लंद बोलते थे। हाँ तुमने मम्मी पापा को उल्लू बहुत बनाया वे जरूर ऊब गए हैं, एक कमरे के फ्लैट में तुम माँ -बाप के बीच प्राइवेसी के बाधक बन गए हो। शायद इसीलिए वे  तुम्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं और तुमने उनका सम्मान करना छोड़ दिया है। 
स्कूल बन्द होने से पहले ही तुम पढ़ाई से जी चुराते थे। अब तो किसी बहाने की भी जरूरत नहीं। स्कूल बन्द है और माँ बाप ने भी कह दिया कि प्राइवेट स्कूलों की फीस मुफ्त में नहीं देंगे जब स्कूल ठीक से खुलेंगे तब नाम लिखायेंगे और तभी कापी किताबें खरीदेंगे। कुछ बच्चे सरकारी स्कूलों का रुख कर गए हैं लेकिन तुम वहाँ भी नहीं गए क्योंकि तुम्हें लगता सरकारी स्कूल में जाने से तुम्हें बेइज्जती महसूस होगी। तो सबसे बड़ी मुसीबत तुम्हारी है क्योंकि तुम धोबी के कुत्ते हो गए न घर के न घाट के। तो तब तक गिल्ली-डंडा ही खेलने का प्रोग्राम बनाते हैं क्योंकि बेटा कोरोना भी जिद पकड़ गया है कि छोटे प्राइवेट स्कूलों की कब्र खोदे बगैर मानेगा नहीं। तो घर से बाहर निकलो और मैदान में मिलो। वैसे टेंशन मत लो गिल्ली-डंडा तुम्हें मुझसे ज्यादा आता है तो तुम्हें डरना नहीं पड़ेगा मुझसे जैसे स्कूल में डरते हो, दरअसल सिखाओगे तुम ही मैं तो सिर्फ सीखूँगा। सीखूँगा इसलिए ताकि कोरोना ने जो भयावह चीजें सिखाईं हैं उसे भूल सकूँ शायद भूल सकूँ कि मेरे पास एक अदद पेट भी है जो सिर्फ रोटी से भरता है और रोटी हाथ पैर हिलाने से ही मिलती है। तो हाथपैर हिलाने हैं। मुझे पता है अब इस उम्र में हाथ पैर हिलाने से कुछ होने वाला नहीं। लेकिन हाथपैर तो हिलाने ही हैं। नहीं हिलाने से लगेगा मर गया हूँ। तो जिन्दा हूँ इस अहसास के लिए गिल्ली-डंडा जरूरी है।
गिल्ली डंडा इसलिए भी जरूरी है ताकि यह सरकार के मस्तिष्क को टकोर सके और उसे अहसास करा सके कि डाल हिलाकर पराक्रम दिखाना बंदरों का काम है रिजल्ट भी आना चाहिए। फिलहाल कोरोना का रिजल्ट यह है कि हम जहाँ से चले थे एक साल बाद भी वहीं हैं।

हमारीवाणी

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