रविवार, 17 जनवरी 2021

रंगे सियार

समय परिवर्तनशील होता है किन्तु इतिहास-कथायें शाश्वत। यद्यपि यह हो सकता है कि समय-समय पर व्याख्याकार निजी प्रयोजनों के वशीभूत कुछ तथ्य छिपा लें, कुछ क्षेपक जोड़ दें या फिर घटनाओं की मनमानी व्याख्या कर दें। 
आप सबने संस्कृत-कथा "नील श्रृगालः" अवश्य पढ़ी होगी। एक सियार था। एक दिन एक गाँव के भ्रमण पर निकल पड़ा। यद्यपि वह बहुत होशियारी से छिपते छिपाते गाँव में पहुँचा फिर भी कुत्ते तो कुत्ते ही ठहरे। सूँघ लिया अँधेरे में और दौड़ पड़े सियार के पीछे। अब किसका कहूँ आजकल साहित्य कथाओं में भी जाति का उल्लेख करने के अपने खतरे हैं। संस्कृत साहित्यकार दूरदर्शी थे अतः उन्होंने लिखा "रजकः" अर्थात कोई रंगबाज क्षमा करें रंगरेज यानी रंगाई करने वाला। आजकल रंगबाज तो हर कोई है अलबत्ता रंगरेजी का काम प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक सब पब्लिक को अपने अपने ढंग से रंगकर कर रहे हैं। 
हाँ, सियार और कुत्ते तो पीछे ही रह गए। सियार आगे कुत्ते पीछे। रंग से भरी हौज दिखी ही नहीं सियार को। भय बड़ी चीज है भूत को भी होता है तभी दिन में नहीं रात को मिलता है। सियार सीधे रंग के हौज में "छपाक"। हौज से ठीक दो फुट पहले कुत्तों की रेंज खत्म। पूरा गैंग जहाँ का तहाँ। कोई आगे नहीं बढ़ा। सियार ने यह दृश्य देखा तो आराम से निकल भागा गाँव के बाहर और पहुँच गया तालाब के किनारे। अरे भाई दौड़ते-दौड़ते दम फूल गई और प्यास लग आयी। सो "जलं बिना जीवनं न अस्ति" का विचार तो स्वतः-स्फूर्त था, इसके लिए गुरु की आवश्यकता थोड़े ही है। 
अरे यह क्या तालाब में पहले से कोई जानवर उसका मुँह नोचने को तत्पर। दिखता तो उसकी अपनी बिरादरी का ही था लेकिन काया का रंग अजब सा नीला-नीला। अब मेरी कहानी यहीं से पलटा मारती है और संस्कृत से बाहर आकर सियार का रंग हरा बताती है। पाठक सोचते होंगे, क्या फर्क पड़ता है नीला या हरा एक ही बात है। जी नहीं कहानी को ध्यान से पढ़ें और फर्क समझें।
सियार ने जब हरे रंग का दूसरा सियार जल की छाया में देखा तो पहले तो डरा किन्तु अकस्मात उसके दिमाग की बत्ती जली। उसे जंगल में जो भी सियार मिलता उसको बताता कि उसका हरा रंग सर्वोच्च की देन है। यह सर्वोच्च क्या है उसने भी नहीं देखा। उसे सिर्फ मैसेज मिला कि तेरे पर एक विशेष ज्योति प्रकटी है उसके प्रभाव से जो तू कह देगा वही अंतिम सत्य माना जायेगा। कोई तर्क-वितर्क नहीं। तर्क-वितर्क करना उस सर्वोच्च की इच्छा का अनादर समझा जाएगा और उसे नर्क की आग में पकाया जाएगा और उसे पुण्यवानों के द्वारा स्वाद ले-ले कर डकारा जाएगा।
स्वाभाविक रूप से जंगल के जो सियार कुछ कत्थई, भूरे या भगवा रंग के थे। उनमें से कुछ लालची सियारों के मुँह में पानी आया। अहा! अभी तक तो दूसरे जानवरों का मांस उड़ाते थे अब उन सियारों का मांस उड़ायेंगे जिन्हें नर्क की आग में पकाया जाएगा। सारे लालची, नीच, भयभीत और भ्रात-कुल-हन्ता हरे रंग में रंग लिए।
लेकिन ओरिजनल सियार संख्या में ज्यादा थे अतः रंगे सियार भागकर जंगल के एक कोने में पहुँचे। थोड़ा दम लिया। काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुँचे जब तक संख्या में कम रहोगे, बेदम रहोगे। संख्या ज्यादा होगी तो दूसरों की नाक(स्वर्ग) में दम करोगे। इसके लिए रक्तसम्बन्ध भी उपेक्षित कर दो। संख्या बढ़ने के साथ खून का रिश्ता मजबूत हो जायेगा। उस दिन से आजतक फार्मूला चालू है। स्वयं की संख्या बढ़ाओ, जंगल के कोने -कोने में फैल जाओ और सर्वोच्च का यह आदेश जैसे भी हो नीचा दिखाकर, फूट डालकर, समझा-बुझाकर या मारकाट मचाकर समझाओ कि उसको किसी ने नहीं देखा जिसने सब सियारों को बनाया लेकिन सर्वोच्च वही है जिसने हरे सियारों को बनाया। सत्य वही है जो पहले सियार ने समझाया। कोई तर्क करे तो उसे कत्ल कर दो। आजतक चल रहा है। 
लोभ, लालच, भय, मोह, मद और मत्सर किसे नहीं सता सकते। मनुष्य पराजित हो जाता है सियार तो सियार ठहरे क्या ओरिजनल क्या रंगे हुए। जंगल का रंग एक समय तक तेजी से बदला। लेकिन बड़ी संख्या में फिर भी ऐसे सियार बचे जो ओरिजनल थे। वे इस बात को समझ चुके थे कि नाखूनों के आक्रमण का जवाब नाखूनों से देना है और उन्होंने दिया भी और अपने अस्तित्व को बचाया भी। कुछ उत्तम किस्म के हरे सियार भी ओरिजनल सियारों से सहानुभूति तो रखते हैं और मानते हैं कि सियार तो सियार क्या हरे क्या लाल। वे यह भी जानते हैं कि हरे सियार भी कभी न कभी लाल थे। लेकिन हिम्मत नहीं है सच का सामना करने की। वैसे अब हरे सियार भय खाने लगे हैं क्योंकि ओरिजनल सियार भी वही हथियार अपनाने लगे हैं। 
उस कहानी का अंत सब जानते हैं इसलिए लिखूँगा नहीं। इस कहानी का कुछ अलग होगा इसकी उम्मीद न करें। क्योंकि जंगल में सियार ही रहेंगे रंगे सियार नहीं।

शनिवार, 16 जनवरी 2021

मेरे पिता जी

आज 16 जनवरी है। मेरे लिए सबसे मनहूस दिन है। आज ही 2020 में मेरे पिता जी मुझे इस जगत की जिम्मेदारी सौंप कर अनन्त यात्रा के नवीन गन्तव्य की ओर प्रस्थान कर गए थे। यूँ तो आना-जाना संसार का शाश्वत सत्य है, अतः सुखी अथवा दुःखी होने का कोई कारण नहीं है फिर भी अपने को समझा पाना अति कठिन कार्य है। आशा है कि वे जहाँ कहीं भी होंगे ईश्वर की कृपा से सुखी होंगे और मेरे सहित समस्त परिवार व इष्ट वान्धवों को अपना आशीर्वाद ही प्रदान कर रहे होंगे। 
माँ के पिता इस संसार में द्वितीय गुरु होता है। उनके मार्गदर्शन का बहुत बड़ा अंश अस्वीकार करने के बाद भी आज जो कुछ हूँ मुझे लगता है कि उनकी प्रतिकृति हूँ अथवा कभी-कभी मुझे लगता है वे अपना भौतिक शरीर छोड़कर आत्मिक रूप से मेरे अन्दर बस गए हैं। उनके रहते मैं निश्चिन्त व निर्द्वन्द्व रहता था। उनके बाद मुझे हमेशा यह भय रहता है कि कहीं मैं अपने दायित्वों के निर्वहन में असफल तो नहीं हो रहा। कहीं ऐसा तो नहीं किसी को यह अहसास हो कि उनके बाद इस परिवार में उसकी उपेक्षा हो रही हो। उनकी अनुपस्थिति ने अचानक ही मुझे अपने परिवार में वरिष्ठ बना दिया और मैं इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। सच पूछो तो मैं सदैव कामचोर टाइप का व्यक्ति रहा हूँ। जब तक सामने न आये तब तक मैं काम को हाथ में लेने से बचता रहता हूँ तथापि जब मेरी उम्र केवल 10 वर्ष की ही रही होगी तब से कभी एक महीना लगातार उनके साथ नहीं रहा। वे गाँव में अकेले रहे और मैं पढ़ाई लिखाई के सिलसिले में कस्बे में अपने सभी भाई बहनों व माँ के साथ। वे चौथे पाँचवे दिन घर आते मुँह-अँधेरे और सुबह तड़के ही निकल लेते थे। 10, 20, 50 रुपये मेरी माँ के हाथ पर रखते और उनमें अगले 4 से 5 दिन का खर्च चलता या कहें चलाना पड़ता। ज्यादा के लिए कहने पर कहते मुझे बेच लो, कहीं डकैती नहीं डालूँगा। अधिक कहने पर पूरे परिवार की कुटाई तय थी।
मेरी माँ भी जितना दे जाते थे उसी में सन्तोष करती और मजे की बात उसमें भी वह कुछ न बचा लेती। मैं समझता हूँ मेरे पिता जी घर के जितने अच्छे नियन्त्रक थे मेरी माँ उतनी ही अच्छी प्रबन्धक हैं। बिना डिग्री की प्रबन्धक हैं।
मेरा पिता जी यद्यपि साख़र्चों में नहीं गिने जाते थे तथापि परिवार की कोई अनिवार्य आवश्यकता कभी अपूर्ण नहीं रही।
अपने पिता जी से मैंने जीवन का सबसे बड़ा मन्त्र सीखा, "भूखे रहो तो ठीक कभी उधार मत लो" अगर इतना कर लिया तो सिर कभी नीचा नहीं होगा। 
और भी अनन्त कथा है। पता नहीं क्यों आज उनकी बड़ी याद रही थी सोचा शेयर कर लूँ।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

अजब समझ

शेयर मार्केट चढ़ रही, लेकिन मैं बेहाल।
खुले नहीं स्कूल हैं, कोरोना की चाल।।1।।
ले न सके हैं कोर्स या, मोबाइल कुछ बन्धु।
बच्चे उनके भी हुए, बिना पढ़े गुण-सिन्धु।।2।।
अजब समझ सरकार की, करती खूब कमाल।
बसें भरी हैं ठसाठस, ट्रेनें करें सवाल।।3।।
रोगी जब घटने लगे, बिना दवा-वैक्सीन।
क्यों खतरों की लोग हैं, बजा रहे फिर बीन।।4।।
कोरोना ने कम किया, मित्र! देश को तंग।
इसके भय से हो गये, बच्चे-बूढ़े दंग।।5।।
छोड़ तुम्हारे शहर को, बढ़ा न मेरे गाँव।
कोरोना को मारते, पटक-पटककर पाँव।।6।।

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

ज़हरीली

पानी में दूध मिला, खोये में रवा।
चीनी में रेत मिली, गेहूँ में जवा।
असली की बात गई, नकली का शोर।
औषधि में जहर मिला, जहरीली हवा।।

लोटा नहीं न डोर

मेरी खुली किताब के पन्ने पलट के देख।
चाँदी के भाव बिक गये सिक्के गिलट के देख।।1।।
केवल दरोदिवार से पूछो नहीं हालात,
सुननी जो तुझको खनक तो बिस्तर उलट के देख।।2।।
यूँ तो हमारे चित्त का कुछ भी नहीं प्रसार,
ब्रह्माण्ड बस गया यहाँ थोड़ा सिमट के देख।।3।।
रूखा बहुत स्वभाव है सब जानते हैं बन्धु,
स्नेहिल हृदय समूर सा इससे लिपट के देख।।4।।
बारिश नहीं हुई तो क्या फिसलन है हर जगह,
चिकना हूँ मार्बल सा इसपर रपट के देख।।5।।
भइया 'विमल' के पास थी लोटा नहीं न डोर,
कैसे मिटी ये प्यास फिर, बादल झपट के देख।।6।।

रविवार, 20 दिसंबर 2020

कविता क्यों

लोग पूछते हैं यार तू कविता क्यों लिखता है? तो उत्तर देना लाजिमी है। बन्धु कविता लिखना सरल है इसलिए कविता लिखता हूँ। एक दो चार छः पंक्तियाँ या जितनी मर्जी हो लिख दो। तुक-बेतुक, हेतु-अहेतुक, गद्य-पद्य-गदापद्य सब कविता में समाहित हो जाता है। कविता के नाम पर लोकलाज छोड़ लोकभाषा के शब्दों को भी जगह-बेजगह प्रयोग कर सकते हैं। शब्द विकलांग, भाषा विकलांग और शैली भी विकलांग फिर भी वाह वाह अति सुन्दर लोग पढ़े वा बिना पढ़े कमेंट बॉक्स में ठोक ही देते हैं। विषय ढूँढ़ने का झंझट नहीं। उर्दू के अल्फाज हैं न गजल झोंक दो, शेर दौड़ा दो। तमाम पर्वत नदी आकाश है न आधी -अधूरी पंक्तियों में झोंक दो। पाठक अर्थ निकालने के लिए स्वतंत्र है और हम अपने नाम के आगे पीछे कवि, महाकवि  और व्यंग्यकार आदि न जाने क्या चेंपने के लिए स्वतंत्र।
अब गद्य कठिन है, शब्दों को तोड़मरोड़कर लिखने की सम्भावना शून्य, विषय-चयन और उसकी पूर्ण समझ का झमेला अलग। पता नहीं कौन ज्ञान का पिटारा खोल बैठे। लोकभाषा के प्रयोग की स्वतंत्रता भी बाधित। स्वयं के नाम के आगे पीछे जोड़ें क्या, लेखक न कथाकार न शिल्पी। कुछ भी तो खुद को समझ नहीं पा रहा। इसलिए हे बन्धु स्वान्तः सुखाय रघुनाथगाथा, मुझे कुछ ज्यादा नहीं आता। 

शनिवार, 28 नवंबर 2020

नीरो

नीरो जिन्दा है अभी, जनता रही कराह।
आँखे पथराने लगीं, कोर हो गईं स्याह।
कोर हो गईं स्याह, हेर पथ अच्छे दिन का।
टूट गया विश्वास, हरे सावन से मन का।
वणिक, खेतिहर, छात्र, दुःखी दिखते हैं सभी।
राष्ट्रवाद ले ओट, नीरो जिन्दा है अभी।।
9198907871
विमल 

सोमवार, 16 नवंबर 2020

भूधर

हमारे पड़ोस में भूधर नाम के एक बुजुर्ग कुछ दिन पूर्व गुजर गए। उनके जीवन को देखते हुए मेरे मस्तिष्क में कुछ विचार आये। जो एक कुण्डलिया के रूप में प्रस्तुत है। मैं उनके परिवार से क्षमा प्रार्थी हूँ कि अगर उनके परिवार में किसी की भावनाएं आहत होती हों। मेरा यह उद्देश्य बिल्कुल नहीं है। मेरी समझ से हममें से अधिकतर लोगों का जीवन ऐसा ही है और हममें से बहुत से लोग भूधर हैं। तो कुण्डलिया का आनन्द लें।

भूधर भू धरकर यहीं, चले गये भुव लोक।
भू धर कर परिवार में, बढ़ा गर्व गत शोक।
बढ़ा गर्व गत शोक, हृदय की कली खिल गयी।
क्षण-क्षण की बकवास, सोंच उर मुक्ति मिल गयी।
जिस कुटुम्ब के हेत, बहुत तकलीफें सहीं।
सहते गये दुत्कार, भूधर भू धर कर यहीं।।

हमारीवाणी

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