शनिवार, 4 दिसंबर 2021

सनम

अभी तो बहुत कुरकुरा हूँ सनम।
हसीनों पे चलता छुरा हूँ सनम।
न डाई रँगे बाल सिर पर रहे,
जमाना घुटे उस्तुरा हूँ सनम।।

रविवार, 28 नवंबर 2021

प्रयागराज या इलाहाबाद

क्यों भैया किसी ने खोजकर बताया नहीं कि इलाहाबाद का नाम इलाहाबाद इसलिए नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह आबाद है। कहानी यह है कि इला नाम है सरस्वती जी का। अब गंगा और यमुना तो वहाँ प्रत्यक्ष हो गईं किन्तु सरस्वती जी थीं अदृश्य तो हमारे जैसे घोंघों ने सॉरी घाघों ने इला+इह+आ+आबाद नाम से उन्हें इलाहाबाद में प्रत्यक्ष कर दिया। सच तो यह है कि अकबर के समय में इसका नाम इलाहावास था। इला+इह+आवास। मतलब देवी सरस्वती इस लोक में निवास करती हैं। आज भी इलाहाबाद के आसपास के लोग इसे इलाहावास ही बोलते हैं। अकबर के सिक्कों पर इलाहावास और इलाहाबाद दोनों खुदे मिलते हैं। मुझे लगता है अकबर ने पहले स्थानीय नाम को खुदवाया किन्तु फिर अरबी फारसी उच्चारण से साम्यता होने के कारण इसे इलाहावास से इलाहाबाद कर दिया। साथ ही अर्थ का अनर्थ भी। कहा तो यह भी जाता है कि इसका नाम इलाहाबाद जहाँगीर के समय से शुरू हुआ।
लोग कहते हैं कि यहाँ तट पर जो किला है उसे अकबर ने बनवाया। मुझे नहीं लगता। क्योंकि अकबर एक भी दिन इस किले में रुका होता तो इस किले में मस्जिद जरूर होती आगरा, दिल्ली और फतेहपुर सीकरी की तरह। अगर हो तो पाठक अवश्य अवगत करायें। उल्टे इस किले में है पातालपुर मंदिर, अक्षय वट व सरस्वती कूप जो हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। अकबर से इस दरियादिली की उम्मीद मुझे तो नहीं है। सत्य के अनुसंधान की आवश्यकता है। 
जो भी हो अगर आप वैराग्य चाहते हैं तो हरिद्वार या उसके उत्तर जाइये, भक्ति की कामना है तो अयोध्या या मथुरा जाइये, ज्ञान की खोज में हैं तो काशी है। किन्तु निस्वार्थ भाव से चाहे प्रयागराज कहें, इलाहावास कहें या इलाहाबाद कहें। यहाँ संगम में डुबकी लगाएं और ज्ञान, भक्ति तथा वैराग्य तीनों को एक साथ पाएं।

बुधवार, 10 नवंबर 2021

मुक्तक


सत्ता के तलवों में चुभती कीलें हैं,
चोरों के सिर पर मँड़राती चीलें हैं,
ये कवि जो हरक्षण में जागा करते हैं,
चलती फिरती कोर्ट और तहसीलें हैं।।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

बतकही

उइ कहिनि चलौ गंगा नहाइ, हम कहेन पापु नहिं कबहुँ कीन।
बस इतनी बात भई एक दिन, हम दुऔ परानी युद्ध कीन।।
वै पाहन कौ भगवान किये, जब कबहुँ भजन मा मस्त भये।
हम आँखि बन्द करि हिरदै मा, जगदीश्वर से बतकही कीन।।
परसादु चढ़ावै का विचारि, उइ मन्दिर अन्दर बैठि गईंं।
हम चारि बूँद पानी छिरकेन, औ ठौरइ पै परिकमा कीन।।
इन बातन ते गुस्सा हुइके, जो हाथें परा चलाई दिहिनि।
हम देवी का परसादु समझि, हँसि हँसि के तन पे सहा कीन।।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कौन तुमको दूर अपने से करे

अंजुली में हैं सजाये सुमन अधरों से झरे।
नैन झिलमिल दीप हो मन को उजाले से भरे।
छवि तुम्हारी ओ प्रिये हरती सदा मन की थकन,
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
पूर्णिमा का चाँद सम्मुख हो रही साकार हो
स्वर्ग से उतरी परी का स्वर्णमय आकार हो
तुम हमारे सदन-उपवन-वन-विजन में बस गयी,
प्रात की पावन सुरभियुत पवन का व्यवहार हो।
तंत्रिकाएं हो गयीं झंकृत अजब अनुभूति से,
दश दिशाएं अमृत भरकर कलश निज कर में धरे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।
काम है या मोह है या प्रेम है या वासना।
नेह का आनन्द है या बिछुड़ने की त्रासना।
कौन विश्लेषण करे या संश्लेषण मेंं जुटे,
कर रहा अव्यक्त की जैसे सतत आराधना।
जिस घड़ी से आ गया सानिध्य में तेरे प्रिये!
हो गया मैं पतन या उत्थान के भय से परे।
इस दशा में कौन तुमको दूर अपने से करे।

विमल 9198907871

शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

जाति के बन्धन

जोड़ने का वायदा था तोड़ने में लग गया हूँ।
पागलों की भाँति गति है सोचते हैं जग गया हूँ।
जन्म लेकर ऋषिगणों के उच्च कुल में दीन -सा मैं,
हर जगह बनकर भिखारी श्रेष्ठता पर हग गया हूँ।।1।।
जाति के बंधन हटाये जायेंगे कुछ सब्र कर लो।
किन्तु निज पहचान का फिर क्या करोगे युक्ति कर लो।
पूर्वजों से स्वयं का रिश्ता बहुत पहले तजा है,
लाभ शासन से मिले जो छोड़ने की हृदय धर लो।।2।।




गुरुवार, 12 अगस्त 2021

आरक्षण

हर जन की गणना करवा आरक्षित कर दो चारा।
अस्पताल श्मशान रेलवे खेल सिनेमा कारा।
कौन जाति के कितने भैया कौन सड़क से जायें।
अखबारों में एक सूचना रोज सुबह छपवायें।
कौन जाति वालों को कितनी पानी हवा मिलेगी।
अमुक जाति का पिसना आये चक्की तभी चलेगी।
जब तक कोटे भर मरीज हों नहीं किसी क्लीनिक में।
तब तक डॉक्टर रहे लापता दिखे नहीं क्लीनिक में।
एफबी पर कमेंट की खातिर असली आरक्षण हो।
पहले अपनी जाति बताये तभी पोस्ट लाइक हो।

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

जीवन के अंग

यह दुबली पतली काया श्री जय जय राम निवासी ग्राम उरली वि0ख0 टोडरपुर हरदोई की है। मेरे जीवन से यदि इस व्यक्ति को हटा दें तो शायद मैं ही न रहूँ न रहेगा माँ भारती विद्या मन्दिर पूर्व माध्यमिक विद्यालय अयारी, हरदोई। 1998 में मुझसे और मेरे विद्यालय से जुड़कर हम दोनों का जो पथ प्रदर्शन किया है वह अनवरत जारी है। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों से विद्यालय में उपस्थित नहीं हो रहे हैं फिर भी हम दोनों की आत्मा के बन्धन बड़े मजबूत हैं।
लगभग 17 वर्ष विद्यालय में सेवा के मध्य ऐसे भी क्षण उपस्थित हुए जिनमें मनमुटाव भी हुआ लेकिन बिल्कुल वैसे ही जैसे पिता पुत्र के मध्य होता है। यद्यपि वह मेरे पिता नहीं हैं जाति के सन्दर्भ में भी मैं ब्राह्मण और यह चमार लेकिन मैंने सदैव इनकी उपस्थिति में एक अभिभावकीय संरक्षण अनुभूत किया है। कभी यह अनुभव नहीं हुआ यह अध्यापक हैं और मैं प्रबंधक सदैव यही लगा मेरे परिवार के हैं।  मुझे अच्छी तरह से याद है जुलाई 1998 में 118 छात्रों से विद्यालय शुरू हुआ और अगस्त 1999 में विद्यालय की छात्र संख्या केवल 85 रही। मैंने इनसे कहा कि बच्चों से कह दो कि कल दूसरे विद्यालय में प्रवेश ले लें मैं विद्यालय बंद कर रहा हूँ। तो इन्होंने जवाब दिया कि जब तक 5 बच्चे आते रहेंगे यह विद्यालय रहेगा और मैं इसका अध्यापक। मैंने कहा 5 बच्चों में आप और अन्य अध्यापकों का वेतन कैसे निकलेगा। तो जवाब मिला अन्य का मुझे पता नहीं मैं यहाँ पैसे के लिए नहीं आता। यह एक जवाब इतना महत्वपूर्ण है मेरे लिए कोरोना के समय जब विद्यालय बंद हुआ तो विद्यालय की छात्र संख्या 650 है और छप्पर की जगह पक्की बिल्डिंग है। 
हम दोनों एक दूसरे को समझते भी बहुत हैं एक दिन साहब किसी बात पर नाराज हुए रजिस्टर पर कलम पटका और कहा विमल भइया कल से मेरा इस्तीफा। मजे की बात उस समय मेरे विद्यालय में एकमात्र यही अध्यापक थे। गुरु जी चले गए तो एक बच्चे ने पूछा कि कल गुरु जी आएंगे नहीं पढ़ाई कैसे होगी। मेरा स्पष्ट जवाब था कि कल पढ़ाई होगी और यही गुरू जी आकर पढ़ायेंगे। बच्चों को मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन अगले दिन जैसे ही बच्चों ने गुरू जी की साइकिल विद्यालय की ओर आते देखी तो मारे खुशी के सब चिल्लाने लगे। मेरी आँखों में आँसू थे कि ईश्वर ने मेरे विश्वास की लाज रखी। 
एक बार और गुरू जी नाराज हुए तो जो इन्हें नहीं कहना था वह सब मेरे बारे में कह डाला और क्रोध आने पर मैंने भी इन्हें बहुत कुछ अनुचित कहा। लगभग एक वर्ष विद्यालय नहीं आये। कई महीने बाद एक दिन आमना सामना हुआ तो मैंने हालचाल पूछ लिया तो बताया बीमार रहते हैं। मैंने दवा के बारे में पूछा तो कहने लगे विमल भाई मैं बीमार इसलिए रहता हूँ कि मैं घर पर पड़ा रहता हूँ अगर पढ़ाने लगूँ तो ठीक हो जाऊँगा। मैंने कहा इतने विद्यालय हैं कहीं भी पढ़ाने लगो। तो जवाब मिला अगर पढ़ाएंगे तो मेरे ही विद्यालय में नहीं तो बीमार ही ठीक। मैंने भी कह दिया विद्यालय मेरा नहीं है आपका है और उसके बाद फिर विद्यालय में छह वर्ष पढ़ाया।
आज मुलाकात हुई तो हृदय प्रसन्न हो गया। ईश्वर इन्हें दीर्घायु करें और मेरे पर छत्रछाया बनाए रखें। अभी बहुत कुछ सीखना है।

हमारीवाणी

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