फेविकोल का वादा था फिर हाथ हथौड़ा थामा क्यों?
जातिवाद का पहन पजामा बन बैठे हो मामा क्यों?
जिनका दामन पकड़ युगों से सिंहासन के सिंह दहाड़े,
उनके बच्चों की खातिर तुम भूल गये निज जामा क्यों?
तुमने चल दी चाल चाल का प्रतिउत्तर एक चक्रव्यूह है,
तुमको तो दक्षिण चलना था चल बैठे हो वामा क्यों?
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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
जातिवाद
बुधवार, 7 जनवरी 2026
रजाई में
तन मन कॉंपा, ठंड बढ़ गयी, सूरज छिपा रजाई में।
कुहरा, बादल, शीत मिल गये,बिक गये अक्षर ढाई में।
गर्म श्वास की, चाह चढ़ गयी, बढ़ गयी प्रीति लोनाई में।
खुल खुल खॉंसें, बुढ़ऊ घर में, मर गयी मौज दवाई में।।
शुक्रवार, 2 जनवरी 2026
शीत के शासन
शीत की रीति है प्रीति जमे वहीं आग जले गरमाई मिले यदि।
शून्य भई मति कम्पन अंग में संग फले मनभाई मिले यदि।
स्वर्ग की चाह न मोक्ष का मोह न नेह उढ़ायी रजाई मिले यदि।
शुक्ल कहें सुख शीत के शासन अंक समायी लुगाई मिले यदि।
बुधवार, 24 दिसंबर 2025
सृष्टि का विचार
विचार से है सृष्टि या कि सृष्टि का विचार है।
विचार ब्रह्म ने किया कि ब्रह्म ही विचार है।।
अपार प्रश्न हैं व प्रश्न भी कठिन कुठार हैं।
जुड़े हजार लोग तो जवाब दस हजार हैं।
फटा जो अणु असंख्य पिंड चल पड़े जहाॅं तहॉं।।
मुझे समझ न आ रहा कि पिंड थे वहॉं कहॉं।।
विशाल पिण्ड कोटि-कोटि मूर्त हो रहे सतत।
अमूर्त कण मनज लगे प्रमाणहीन बिन्दुवत।।
वहॉं पे कौन था कि जिसके कर चले प्रहार को।
प्रकट हुए अरूप से सरूप हो विहार को।।
युगों युगों चलें न पर पा सकेंगे छोर का।
न साॅंझ का पता चले न ज्ञान मिले भोर का।।
दबाव था वो कौन सा हटा कि पिण्ड उड़ चले।
उन्हें जहां जगह मिली इस दिशा में मुड़ चले।।
उड़े अगर विचित्र क्या? विचित्र है रुके नहीं।
हवा करे बिना थके वो खेल से छके नहीं।।
कहाॅं है स्रोत शक्ति का वो कौन है महाबली।
प्रयास कौन कर रहा प्रकृति फिरे चली चली।।
लगा हुआ उसी अचिन्त्य खोज में सदा रहूॅं।
मिले ना हल न खेद कुछ अज्ञात से जुड़ा रहूॅं।।
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