गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

वर्तमान शिक्षा के सरोकार

1. क्लासरूम एजुकेशन

अभी एक यूट्यूब वीडियो देखा मेरे ही कॉलेज का कोई फ्रेशर लड़का कॉलेज खोलने की माँग कर रहा था। बीएचयू में भी फ्रेशर्स और सेकंड ईयर के छात्र विश्वविद्यालय खोलने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। अव्वल तो मैं क्लासरूम शिक्षा व्यवस्था में ही विश्वास नहीं रखता। दो-तीन महीनों में मैं 22 साल का होने वाला हूँ और पिछले 18 सालों से अनवरत चल रही क्लासरूम शिक्षा को भी पूरा कर लूँगा। पोस्ट-ग्रेजुएट हो जाऊँगा। पर सच कहूँ तो आठवीं के बाद के अगले 10 सालों में मैंने क्लासरूम में कुछ भी सीखा हो पर अकादमिक शिक्षा तो नहीं ग्रहण की। अकादमिक ज्ञान केवल सेल्फ-स्टडी से आया, न स्कूल-न कॉलेज; ये सब बस इसलिए कि सर्टिफिकेट्स मिल जाएँ। कॉलेज की बात की जाये तो ये प्रोफ़ेसर चाहे ऑनलाइन पढ़ाएँ या ऑफ़लाइन, उतना ही गोबर पढ़ाते हैं। चाहे केमिस्ट्री पढ़ाएँ या एस्ट्रोफिजिक्स, जॉब सबको सॉफ्टवेयर फ़ील्ड में लेनी है। और स्कूल में नौवीं से बारहवीं बस सिलेबस कंप्लीट हुआ, सिलेबस पीछे छूटा तो स्लाइड्स दिखाकर ख़त्म कर दिया गया। जिसको अच्छे से पढ़ना था उसने स्कूल टीचर्स के पास कोचिंग जॉइन की। मैंने वो भी नहीं किया। एक साल के ड्रॉप में जब आईआईटी एंट्रेंस की कोचिंग कर रहा था तो थोड़ा बहुत ज़रूर क्लासरूम में ढँग से पढ़ा। फिर कुछ महीनों बाद वहाँ भी सोता रहता था क्लास में। और मुझे नहीं लगता कि मैं इन सब में अकेला हूँ। सबके साथ कमोबेश यही हुआ। मैं शिकायत नहीं कर रहा। इन सबके कोर में क्या कारण हैं यह मैं अच्छे से समझता हूँ। विरोध नहीं करूँगा क्योंकि मैं अभी विकल्प नहीं सुझा सकता लेकिन क्लासरूम शिक्षा व्यवस्था भारत में वैदिक काल से है और हम राष्ट्रीयस्तर पर इतनी पुरानी व्यवस्था क्यों चला रहे हैं इसका उत्तर शिक्षाविदों को देना होगा। सारे अविष्कारों का उत्तरदायित्व इंजीनियरों और वैज्ञानिकों पर नहीं डाल सकते ना?

2. ऑफलाइन/ऑनलाइन एजुकेशन और एक पैराडॉक्स

छात्र पढ़ना नहीं चाहते थे इसलिए टीचर्स ने ख़राब पढ़ाना शुरू कर दिया या टीचर्स ख़राब पढ़ा रहे थे इसलिए छात्र अच्छे से नहीं पढ़े। यह एक पैराडॉक्स है। वैसे पैराडॉक्स से ज़्यादा यह एक साईकल है जिसको ख़त्म करने की जिम्मेदारी टीचर्स पर अधिक है। मरीज़ हाथ-पैर चलाए, दर्द में गालियाँ दे तो डॉक्टर इलाज करना बंद नहीं कर देते। मेरे कॉलेज में प्रोफ़ेसरों के पास 20-40 साल पुराने नोट्स हैं। या शायद तबके जब वो पीएचडी कर रहे थे। तब से इंडस्ट्रीज-तकनीक सब बदल गयी पर न सिलेबस बदला और न नोट्स। चीन में पेपर के आदिकाल में आविष्कृत, पीले पड़ चुके, अधफटे पन्नों पर ब्राह्मी लिपि में लिखा कुछ-कुछ। उफ़्फ़! प्रोफेसर/टीचर बन गए पर पढ़ाना नहीं आया। ज्ञान होना और ज्ञान देने की कला होना दोनों अलग-अलग बाते हैं। NET के पेपर 1 का छोटा सा सिलेबस भावी प्रोफ़ेसरों को यह नहीं सिखा पा रहा है कि अपनी बात कैसे रखें। मेरे ही कॉलेज में कई प्रोफ़ेसर ईमेल का कॉन्टेंट ढँग से नहीं लिख पाते हैं। जब हम लिख कर अपनी बात नहीं कह पा रहे तो ऑन द स्पॉट बोलने में तो बड़ी समस्या है। ख़ैर! टीचर्स की ट्रेनिंग इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। ऑनलाइन एजुकेशन में यह बात घर-घर पहुँच गयी। अब चिंटू की मम्मी को भी पता है कि चिंटू की मैडम को घोड़ा-गधा कुछ नहीं पता। ऑनलाइन पढ़ाने के लिए तो और भी ट्रेनिंग की आवश्यकता है। न केवल फ़ोन और इंटरनेट जैसे संसाधनों के स्तर पर वरन पढ़ाने के तरीक़ों के स्तर पर भी 95% भारतीय ऑनलाइन एजुकेशन असफल हो चुकी है। फिर वह चाहे स्कूल्स हों या आईआईटी जैसे संस्थान। यूट्यूब जैसे स्थानों पर स्वतंत्र वीडियो बनाने वाले यूट्यूबर्स भी पेशेवर अध्यापकों और प्रोफ़ेसरों से लाख गुना अच्छा पढ़ा रहे हैं। किसी को अपनी बात रोचक तरह से समझा पाना अपने आप में एक विषय है। जिसकी टीचरों/प्रोफ़ेसरों में बहुत कमी है। मैं पूरी शिक्षा व्यवस्था में ही विश्वास खो चुका हूँ। एकमात्र अच्छी बात यह है कि मुझ जैसे छात्र अपने-अपने तरीक़ों से पढ़कर, प्रयोग करके, और तमाम संसाधनों से ज्ञान एकत्रित कर जैसे-तैसे एजुकेशन कंप्लीट कर रहे हैं। इस शिक्षा व्यवस्था की एकमात्र अच्छी बात यही है कि यह ठोस नहीं है और कुछ न करने से लेकर कुछ भी करने की गुंजाइश है। 

3. कोरोना और ऑफ्टरमैथ में एजुकेशन

मैं अब घटनाओं से ज़्यादा उनके ऑफ्टरमैथ पर लिखना पसन्द करता हूँ। वैसे तो ऑफ्टरमैथ शब्द आपदाओं के बाद के समय के लिए प्रयोग होता है पर मैं इसे किसी भी घटना के होने के बाद की गणित के लिए उपयोग कर लेता हूँ। वैसे ज़्यादातर घटनाएँ आपदाएँ ही होती हैं। ऑफ्टरमैथ की अच्छी बात यह है कि आप तथ्यों पर बात करते हैं न कि व्यक्तिगत मान्यताओं पर। इससे डिबेट की गुंजाइश कम हो जाती है। मुझे डिबेट निहायती फ़ालतू काम भी लगता है। 2014 में आप कहते फ़लाने की यह कमी है तो आपकी मान्यता होती, 2021 में वही बात तथ्य है। अब फ़लाने आपके बाप हों या जानी दुश्मन जो हो गया उसे झुठलाया नहीं जा सकता। जो है सो है। यही है ऑफ्टरमैथ की सुंदरता। कोरोना आया, डर आया, वैक्सीन आयी, कोरोना गया। देश में सब होने लगा बस शिक्षण संस्थान नहीं खुले। राजा तो है ही जैसे-तैसे डिग्री जुगाड़ने वाला, प्रजा उससे चार-हाथ आगे कि उनके नौनिहाल बाबू को कोरोना न हो जाए। दारू बिकी, चुनाव रैलियाँ हुईं, मार्किट खुली, चाट-पकौड़े खाए गए, मिठाई बिकी, दीवाली हुई, मैच हुए, सिनेमा हॉल खुले, सब हुआ बस पढ़ाई-लिखाई न हुई। और अभी तक हाथ-पाँव फूले हैं इन लोगों के। दूसरे पैराग्राफ में मैं बता ही चुका हूँ ऑनलाइन एजुकेशन की स्थिति। पहले पैराग्राफ को ध्यान में रखकर आप पूछ सकते हैं कि जब क्लासरूम एजुकेशन में ऐसा है तो शिक्षण संस्थान क्यों खोलने। तो मैं कहूँगा कि पहले और दूसरे पैराग्राफ में जो लिखा है ऐसा मेरा अनुभव है और दूसरी बात यह कि सवाल नतीजों का नहीं नीयत का है। और बहुसंख्यक एवरेज छात्र तभी पढ़ते हैं जब उनपर कोई दवाब डाला जाता है। तो शिक्षण संस्थान तो खुलने चाहिए। इस कोरोना की ऑफ्टरमैथ यही है कि इस देश में ज़्यादातर लोगों को एजुकेशन की क़द्र नहीं है। भारतीय जनमानस के शिक्षा प्रति इसी रवैये ने समाज में बहुत सी विसंगतियों को जन्म दिया है। गुरू! चाट-पकौड़े-दारू से कोई विश्वगुरु नहीं बनता। मिडिल-ईस्ट और इस्लामिक आक्रमणकारियों के समय तक में जिन्होंने तक्षशिला-नालन्दा का साथ नहीं छोड़ा उनके उत्तराधिकारी खाँसी-ज़ुकाम के डर से स्कूल नहीं जाते। उफ़्फ़! क्या यही इतिहास लिखा जाएगा? सरकारों ने एनसीईआरटी सिलेबस बदला नहीं तो यही लिखा जाना चाहिए। उम्म?
सिद्धार्थ शुक्ल पुत्र श्री विमल कुमार शुक्ल
अयारी, हरदोई

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

बस अड्डा

बस अड्डा (BUS STATION)

इस चित्र में जो खेतों में बस खड़ी दिख रही है, अपनी राह भूलकर इधर नहीं आयी है। बन्धु यह बस अड्डा है। कौन सा? मत पूछो। यह बस अड्डा हमारे देश के असन्तुलित विकास की संतान है। वैसे तो यह बस कैमी और अंतोरा गाँव की सीमा पर खड़ी है लेकिन इस तरह के बस अड्डे उत्तर प्रदेश में बहुत जगह मिल जायेंगे।
मैंने बस अड्डा कहा लेकिन यह क्या, यहाँ कोई चहलपहल तो दिख नहीं रही? बन्धु ऐसा इसलिए है अभी इसके जाने का समय नहीं है। जब किसी के जाने का समय होता है तो उसके घर पर भीड़ इकट्ठी करने की हमारी संस्कृति है चलो जाने से पहले एक बार देख लें वरना किसी का हालचाल जानने की फुर्सत भी कहाँ मिलती है। उसी तरह इस बस की भी रवानगी के समय ही यहाँ यात्री व उन्हें छोडऩे आने वाले दिखाई देते हैं। वरना यह बस दिन भर अपने एकाकीपन का शोक मनाती होगी। सवारी-सकारी छोड़िए कोई दूसरी बस भी यहाँ नहीं खड़ी होती जिससे बोल-बतलाकर अपना जी हल्का कर ले।
इस प्रकार के बस अड्डों का जो एक ही गन्तव्य मुझे अब तक पता चल पाया है, वह है दिल्ली। आज मुझे समझ में आ रहा है क्यों नेता जी ने "दिल्ली चलो" का नारा दिया था। उन्होंने "मुम्बई चलो" या "कलकत्ता चलो" का नारा नहीं दिया। वरना वर्मा से कलकत्ता बहुत पास था। ये बसें रात की मुसाफिर हैं। शाम को भर जाती हैं सुबह दिल्ली में खाली हो जाती हैं और शाम को पुनः उधर से भर जाती हैं और सुबह फिर गाँव में आकर खाली।
मैं गाँव के एक परिवार से मिला। घर में बस बुड्ढा और बुड्ढी। एक अदद लड़के के चक्कर में पाँच लड़कियाँ पैदा कर लीं और फिर कहीं एक लड़का साथ न दे तो दूसरा देगा इस चक्कर में चार लड़के पैदा कर लिए। आज बुड्ढा बुड्ढी अपनी किस्मत को कोसते हुए अकेले। बेटे दामाद सब रोजगार के लिए बाहर हैं दिल्ली या हरियाणा में। अच्छा कह सकते हैं कमाते हैं माँ-बाप को रुपया भेज देते हैं। रुपये से तन की साध तो सध जाती है पर मन की? वही जाने जिस पर बीते। आप कह सकते हैं कि ईश्वर की लीला न्यारी है। किन्तु यह क्या सिर्फ ईश्वर की लीला है। इसमें सरकार और योजनाकारों का कुछ भी दायित्व नहीं क्या? रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर दौड़ कब खत्म होगी? कब इन बुड्ढे-बुड्ढियों को अपनों के मध्य रहना नसीब होगा? या ये यूँ ही इस संसार से यह सोचते विदा हो जायेंगे कि अरे अभी फलाँ बेटा-बेटी नहीं आयी। काश उसे भी देख लेते।

दया कर प्रभू

क्या गजब ढा रहीं बाल रंगीन कर!
है बुढ़ापा जवानी चलींं छीनकर।।1।।
हमने केशों को सनई ही रहने दिया,
एक रुपया अठन्नी रखीं तीन कर।।2।।
थे धनी हम बहुत ये जगत जानता,
इस गली से गईंं तो हमें दीन कर।।3।।
जब से जालिम अधर मिर्च सूखी हुए,
तब से जेबों में यादें भरींं बीनकर।।4।।
रात तब से हिमालय हुई मित्रवर!
जबसे यौवन गया मेरी तौहीन कर।।5।। 
कोई चक्कर चला कुछ दया कर प्रभू!
एक दिन जो रहा फिर वही सीन कर।।6।।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

का जानइं जइ चेले


गुरू बनन की खातिर हमने कितने पापड़ बेले 
हमरे कन्धे चढ़ि के आये झेले नाइंं झमेले।
जहु सबु का जानइंं जइ चेले।
धक्का मुक्की कितनी झेली कितने महल गिराये।
कितने चरण पखारे हमने, कितने शीश हराये।
आजु करोड़न हैं झोली मा, कबहुँ नाहिं थे धेले।
जहु सबु का जानइंं जइ चेले।
जिन चेलन आकाशु तको हइ देखीं नाहिं जमीनेंं।
कामुधामु कछु जानैं नाहीं, बनते बड़े कमीनेंं।
बातन केर बताशे फोड़इंं दिखते फिरइंं करेले।
जहु सबु का जानइंं जइ चेले।

डालूँ कहाँ

जो भी मुसीबत है लोगों की दी है,
मुसीबत ये बिल्कुल कुदरती नहीं है।
जब से पड़ोसन की ऊंची उठी छत,
वो छत से हमारी गुजरती नहींं है।
गाहे बगाहे इधर से उधर से,
जो आये यहाँ तो ठहरती नहींं है।
डालूँ कहाँ चारपाई बताओ,
कहीं धूप आँगन मेंं झरती नहीं है।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

वसंती होलें

मुक्तक

आओ बन्धु वसंती होलें।
उमगें हृदय वचन यों बोलें।
सरसों जैसी सूक्ष्म काय हों,
फिर भी जगत नेह से धोलें।।1।।

शीत गई अब जड़ता छोड़ो।
तन के, मन के बन्धन तोड़ो।
बहुत किया विध्वंस सृजन में,
शक्ति नदी की धारा मोड़ो।।2।।

पग पग प्रकृति प्रफुल्लित पावन।
गाती राग विराग नसावन।
आओ हम भी आलस छोड़ें,
आता पास दिख रहा फागुन।।3।।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

दृष्टिदोष

दृष्टि की बात है कौन, कहाँ और क्या देख बैठे कुछ कह नहीं सकते? मैं 100 % विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि जब-जिसने भी यह लोगो बनाया होगा उसके हृदय में रंचमात्र भी नहीं आया होगा कि इस लोगो का एक अक्षर महिलाओं के लिए अपमानजनक है। किन्तु एक महिला नाज पटेल को यह नजर आया।  कमाल इस बात का है कि मुम्बई साइबर क्राइम सेल को भी यह आपत्तिजनक लगा। कम्पनी ने अपना लोगो बदल दिया। कम्पनी क्या करे। उसके लिए व्यवसाय महत्त्वपूर्ण है, यह लोगो न सही कोई दूसरा सही। किन्तु मेरे मन में प्रश्न मचल उठा कि क्या इस तरह भी बुराइयाँ देखी जायेंगी। अगर ऐसा हुआ तो बहुत कुछ बदलना पड़ेगा। मेरे विचार से ईश्वर को भी अपना प्रोडक्ट बदलना पड़ेगा। कटहल के कोये(बीज) वो तो गले के नीचे बिल्कुल भी नहीं उतरेंगे न ही चबाये जा सकेंगे। क्यों? शायद नाज पटेल बेहतर जानती होंगी। 
कश्मीर शासक मिहिरकुल ने सिंहल देश पर इसलिए आक्रमण कर दिया क्योंकि उसकी पत्नी ने जो चोल ओढ़ रखा था उस पर गौतम बुद्ध का पैर का चिन्ह बना हुआ था और वह पैर का चिन्ह उसके कुचों अर्थात स्तनों के पास हृदयस्थल में आकर ठहरता था। बताता चलूँ उसके समय में सिंहल में बौद्ध धर्म का प्रभाव था और यह चोल दर्शाता था कि इसे धारण कर उसने भगवान बुद्ध के चरणों को हृदय में स्थान दिया है, किन्तु दृष्टि तो दृष्टि वह भी आततायी शासक की। काल हो गई मिहिरकुल की दृष्टि कि वह श्रद्धा को भी अश्लील समझ बैठा। मिहिरकुल कश्मीर का शासक था उन दिनों। कश्मीर से गुजरात से होकर समुद्री मार्ग से उन दिनों व्यापार हुआ करता था। कोई सिंहल व्यापारी ही उसे रानी को भेंट कर गया था। संभलकर आजकल पग पग मिहिरकुलों से पटा पड़ा है। 
इनका वश चले तो ये गायत्री मंत्र से धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् को बदलवा दें। आम के संस्कृत पर्याय चूतम् का भी निषेध करा दें। वाल्मीकि रामायण का तो पढ़ना ही बन्द हो जायेगा जिसमें बोलने अथवा कहने के अर्थ में सैकड़ों बार चोदयति शब्द का प्रयोग किया गया है। बन्धु नजर में ही दोष आ गया है आजकल। जो है सो अच्छा ही है।
अरे! जहाँ विचार प्रदूषित हो जाते हैं वहाँ कुछ भी हो सकता है।
इन्टरनेट से साभार 
इन्टरनेट से साभार

दोहा-वार्ता

बड़े बड़ेन के संग मा, कबहु न घूमन जाय।
वह तौ खइहैं कोरमा, तुमका सूखी चाय।। (नीतीश नयन , हरदोई)
मिलिहै तुमका कोरमा, रहउ ढंग से संग।
टाँग बड़ेन की खींचि के, सदा राखिये तंग।। (विमल शुक्ल, हरदोई)
टांग बड़े कर खीचिहौ तो अपुनौ होइहौ तंग, 
बहुत दिनन ई ना बचे होइ जाये एक दिन जंग। (श्रद्धानन्द द्विवेदी, अमेठी)
तबलमंजनी ना करैं,ना हम मांगैं भीख ।
दादा हमसे दूर तुम,राखौ अपनी सीख।। (नीतीश नयन, हरदोई)
तबलमंजनी ना करउ, ना तुम मांगउ भीख।
इनका काटउ यहि तरह, जैसे सिर की लीख।। (विमल शुक्ल, हरदोई)
बड़े जो राखैं दाबि के, करैं न लघु की चिन्त।
हुईहै जंग जरूर तब, फल हुइहैं अनमन्त।। (विमल शुक्ल, हरदोई)

हमारीवाणी

www.hamarivani.com