गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

बैशाखियाँ

हो लिया है बन्द भी और हो लिया उपवास भी|
हानि में है देश क्या कुछ शेष है उपहास भी|
खिंच गये पाले हमारे दो करों के मध्य में,
हम हो गये हैं एक सँग प्रसन्न भी उदास भी|

दी गयीं बैशाखियाँ थीं दस बरस के ही लिए,
जो थे लंगड़े उनकी संख्या में कमी आई नहीं,
स्थिर व्यवस्था हो गयी है नफरतों के साथ में,
क्या कहूँ मैं दिख रहा है लुंजपुंज विकास भी|



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अंकित, अनीस, अनिकेत



गंगाघाट की सीढियों पर बैठे हुए संजय मानो गंगा माँ में तैरते व हिचकोले खाते हुए दीपों की गिनती कर रहा था| अभी सूरज ठीक से अस्त नहीं हुआ था, किन्तु हर की पैड़ी पर होने वाली गंगा आरती में भाग लेने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का जमघट लगना शुरू हो गया था| संजय भी आरती में भाग लेने के लिए सुविधानुसार सीढ़ियों पर एक स्थान पर आसन जमा चुका था| तभी अचानक एक हाथ उसके सामने फैला| बाबू जी इस भूखे साधु को भी एक चाय पिला दो| संजय जैसे नींद से जागा उसे यह स्वर जाना पहचाना सा लगा| उसने सिर ऊपर उठाया तो ऐसा लगा जैसे इसे कहीं देखा हो| दुबारा फिर वही स्वर गूँजा| बाबू जी इस भूखे को एक चाय पिला दो| सामने एक गेरुआ भेषधारी साधू दिखाई पड़ा| यद्यपि उसने जटायें व दाढ़ी-मूँछे इत्यादि बढ़ा रखीं थीं किन्तु संजय अपने मित्र को तुरन्त ही पहचान गया, “अंकित! तुम यहाँ|” “कौन अंकित, मैं अंकित नहीं हूँ| मैं स्वामी अनिकेत हूँ|” और इसी के साथ बड़ी तत्परता से वह साधुवेशधारी वहाँ से खिसक लिया|
अंकित! अंकित! की आवाज देता हुआ संजय भी अपने स्थान से उठकर उसके पीछे चला| किन्तु संजय अधिक दूर तक उस साधुवेशधारी का अधिक दूरी तक पीछा न कर सका और वह साधु भी उसी भीड़ में न जाने कहाँ गुम हो गया|
संजय जब रूका तो ठठाकर हँसा, “हा! हा! हा! अंकित, अनीस, अनिकेत! अब जब मिलेगा तो कोई और नया नाम चस्पा होगा|” संजय जब लौटकर अपने स्थान पर आया तो सीढ़ियों पर जगह न थी| गंगा आरती प्रारम्भ हो चुकी थी, किन्तु उसका मन अब आरती में नहीं लग रहा था| अतः उसने सीधे होटल के कमरे में हो जाना उचित समझा|
कमरे में पहुँचकर उसने बेयरे को कमरे में खाना पहुँचाने का आर्डर दिया और अपनी जेब से पर्स निकालकर अपने जिगरी दोस्त अंकित के साथ खिंचाई हुई फोटो देखने लगा| उसे वह दिन याद आ रहा था जब संजय व अंकित सहपाठी हुआ करते थे| ग्रेजुएशन की उस क्लास में अंकित बड़ा ही होनहार छात्र था| कक्षा 10 व 12 की परीक्षायें उसने प्रथम श्रेणी में ससम्मान उत्तीर्ण कीं थीं और डिग्री कॉलेज में भी वह प्रशंसा का अधिकारी था| किन्तु जब किसी पर इश्क का भूत सवार होता है तो उसे पूरी तरह से मटियामेट कर देता है|
शकीला, हाँ यही नाम था उसका जिससे उसे प्यार हो गया| शकीला भी उसे चाहती थी| छुपते छुपाते होने वाले मेलजोल के चर्चे कॉलेज के लडके लडकियों के मुँह-कान से होते हुए उनके घर परिवारों तक भी पहुँच गये| जिस दिन उन दोनों को यह पता चला कि उनका कथानक जग जाहिर हो गया है दोनों ने फैसला कर लिया कि वे आपस में शादी कर लेंगे, किन्तु क्या यह इतना सरल था? सबसे बड़ी बाधा धर्म-मजहब तो बीच में पहाड़ की तरह खड़े ही थे वह भी बहुत दुर्गम व जानलेवा|
दोनों के घर परिवार वाले समझा रहे थे कि यह बेमेल विवाह है धर्म व मजहब से बाहर जाकर किया गया यह सम्बन्ध किसी को स्वीकार्य नहीं होगा| किन्तु कौन मानता है? अंततः अंकित के घर-परिवारवालों ने कलेजे पर पत्थर रखा और जीते जी अंकित को मरा मानकर उसे अपने परिवार से बहिष्कृत कर दिया| उस दिन से कॉलेज का हॉस्टल ही अंकित का घर संसार हो गया|
उधर जब शकीला किसी भी तरह से अंकित को छोड़कर विवाह के लिए राजी न हुई तो मुल्ला और मौलवियों ने फरमाया अगर अंकित इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले तो उसका निकाह शकीला से पढ़वाया जा सकता है| शकीला के अब्बू ने मुशीर को अंकित के पास भेजा और सारी बात कहलवायी| अंकित ने कुछ भी आगा पीछा विचारा नहीं और इस्लाम कुबूल करने को अपनी रजामंदी दे दी| अगले ही दिन अंकित को मस्जिद ले जाया जाया गया, उसका इस्लामिक संस्कार कराया गया और उसका नाम अंकित से बदलकर अनीस हो गया| कुछ ही दिन बाद बड़ी धूमधाम से अंकित उर्फ़ अनीस का निकाह शकीला के साथ पढ़ दिया गया| ख़ास बात यह थी की विजय प्रेम की नहीं हुई अपितु अहंकार की हुई| इस विवाह को कुछ मुस्लिम युवाओं ने नगर भर में हिन्दुओं पर मुस्लिमों की विजय के रूप में प्रचारित किया|
बहरहाल निकाह के बाद जब वे दोनों कॉलेज पहुँचे तो कॉलेज के छात्र-छात्राओं व सहपाठियों की नजरें उन दोनों को ऐसे घूर रहीं थीं जैसे कोई जानवर कॉलेज में घुस आया हो| कॉलेज के लड़के-लड़कियों का व्यवहार अब उनके साथ पहले सा नहीं था| वे दूरियाँ बनाने लगे थे| पहले के पुराने दोस्तों के साथ उनका मेलजोल कम हो गया था| अनीस और शकीला शायद ही कभी समझ पाए होंगे कि जो लोग उनके प्रेम को सहन कर लेते थे वे अब उन दोनों का विवाह क्यों नहीं स्वीकार पा रहे थे?
धीरे- धीरे कॉलेज उन दोनों को अरुचिकर प्रतीत होने लगा था और एक दिन उन दोनों ने अपना ग्रेजुएशन पूरा किये बिना ही कॉलेज छोड़ दिया| उन्होंने महसूस कर लिया था कि कॉलेज के लड़के लड़कियाँ उन दोनों से यद्यपि कुछ न कहते फिर भी नजरों के व्यंग्य वाण उन पर सदैव चलाया करते, घृणा से देखते और उन दोनों को असहज कर देने वाली कानाफूसियाँ करते|
जब दोनों घर पर रहे तो अनीस ने पाया कि उसके हिन्दू मित्रों व रिश्तेदारों ने तो उससे दूरियाँ बना ही लीं थीं मुस्लिम जन भी उसे अपने मध्य सम्माननीय स्थान देने को तैयार प्रतीत न होते थे| उधर शकीला व उसके परिवार के लोगों को मुस्लिम समाज का एक वर्ग उपेक्षा से देखता था और एक हिन्दू से अपनी लड़की का निकाह पढ़वा देने पर जब तब आलोचनायें कर देता था| मुहल्ले व रिश्तेदारी की हमउम्र लड़कियों को उनके माँ बाप प्रायः उन्हें शकीला से दूरी बनाये रखने की हिदायत देते रहते थे| ऐसे में दोनों दीन-दुनिया से जैसे अलग-थलग पड़ गये थे| तमाम लानतों-मलानतों के बीच अंकित उर्फ़ अनीस ने चार साल किसी तरह गुजारे| शकीला को उससे दो संतानें हुईं दोनों लड़कियाँ| जिस रात को छोटी लड़की का जन्म हुआ उस सुबह के बाद फिर अंकित उर्फ़ अनीस को किसी ने उस शहर में नहीं देखा न ही किसी को उसके बारे में कोई खबर ही मिली|
शकीला के अब्बू व मुशीर भाई दोनों ने उसके बारे में पता करने का बहुत यत्न किया किन्तु कोई खोज खबर न मिली| अंकित के परिवार वालों ने चूंकि उसे छोड़ ही रखा था अतः उसके बारे में कुछ भी पता करने की कोशिश न की| शकीला के अब्बू व मुशीर भाई ने बहुत प्रयास किया कि शकीला व उसके बच्चों को अंकित के परिवारवाले अपना लें किन्तु अंकित के पिताजी ने साफ साफ कह दिया कि विधर्मियों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता| यद्यपि शकीला के परिवारवालों ने इस्लामिक रीति के अनुसार शकीला के दूसरे विवाह का प्रयास किया किन्तु शकीला इसके लिए राजी न हुई|
तबसे अब तक अंकित उर्फ़ अनीस उर्फ़ अनिकेत की खोज जारी है|
रूम की घंटी बजी बेयरा खाना लाया था| संजय खाना खाने में व्यस्त हो गया|


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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

ऊँचा नीचा

उसको थोड़ा ऊँचा कर दो इसको थोड़ा नीचा।
हम समान करके मानेंगे गद्दा और गलीचा।।
कोई सिर न झुकायेगा अब चाहेगा आशीष नहीं।
एक कुड़ी से नैन लड़ायें चाचा और भतीजा।।

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

मुझे जाँच लीजिये



भागने की कला में प्रवीण पैदाइशी हूँ,
जब चाहे मुझे आजमाके देख लीजिये|
छोड़ पाठशाला कई बार भाग आया घर,
टीचरों से मेरे स्वर्ग जाके पूछ लीजिये|
छिपता था ऐसी जगह ढूँढ़ हारते थे मित्र,
कहते थे इसे कभी खेल में न लीजिये|
अरे! बैंक वाले मित्र हो जाएगा विश्वास,
एक बार कर्ज देके मुझे जाँच लीजिये|
 




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गुरुवार, 22 मार्च 2018

डाटा

1- जब मैंने पहली बार अपनी कनपटी पर,
सफेद बाल देखा। 
तो भूल गया सुषमा, सुशीला, सुरेखा।
वक्त का मैसेज ज्यों गाल पर चाँटा,
यू हैव यूज्ड फिफ्टी परसेंट ऑफ योर डाटा।

2-  चलो थोड़ा सा ही सही भ्रष्ट हो लें,
बनाकर पार्टी सन्तुष्ट होलें|
न्यायालय कहाँ रोकता है तुम्हें,
राजनीति में उत्कृष्ट हो लें|

शनिवार, 17 मार्च 2018

हमारीवाणी

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