शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

ग्रामीण क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षा

मैं बड़ा प्रयास कर रहा हूँ लेकिन जहाँ मैं हूँ वहाँ ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था दूर की कौड़ी है। अव्वल तो मेरे पास ही संसाधन कम हैं। मैं संसाधन जुटा लूँ और व्हाट्सएप्प वीडियो इत्यादि से काम चला लूँ तो अधिकाँश बच्चों के पास एंड्राइड फोन नहीं हैं। फोन है तो डेटा नहीं है बड़ी मुश्किल से तो 49 रूपये में 28 दिन की इनकमिंग कराई है वीडियो कैसे डाउनलोड करें और सबसे बड़ी बात जो छात्र क्लास में आंखों के सामने नहीं पढ़ते वह ऑनलाइन क्यों पढ़ें? मेरे पास 40 में 3 छात्र व्हाट्सएप्प चलाने वाले किसी कक्षा में थे उनको जोड़ा ग्रुप बनाया उनमें से 1 ग्रुप बनाने के बाद ग्रुप छोड़ गया। बचे 2 उनमें एक गेहूँ की कटाई में लगा है। एक का मोबाइल पिता जी के पास रहता है उनका कहना है मोबाइल बच्चे को बिगाड़ देता है।
सबसे बड़ी बात 14 मार्च 2020 के बाद आज 23 अप्रैल 2021 के मध्य केवल 10 प्रतिशत छात्र-छात्राओं ने ही विद्यालय में पलटकर देखा है वरना 90 % विद्यालय को भूल गए और उन 90 % को मैं। जो स्थिति है उसमें मुझे नहीं लगता कि अगले 2-3 सत्रों में भी विद्यालय सुचारू रूप से खुल पायेंगे। ऐसे में मुझे लगता है भविष्य में प्रौढ़ शिक्षा की बड़ी सम्भावनायें होंगी क्योंकि हमारी मजबूरी है कि पहले जीवन.बचायें या शिक्षा। तो सरकार से लेकर समाजशास्त्रियों तक सभी ने तय कर लिया है कि जीवन पहले बचना चाहिए। शिक्षा का क्या है जब निरक्षर थे तब भी तो राजकाज चलते थे। वैसे अभी ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने में ही समय लगेगा। यूँ भी डिग्री हासिल करने में गाँव शहरों को भी मात दे रहे हैं उच्च कक्षाओं के तमाम छात्र कॉलेज में नाम लिखाने के बाद देहरादून, हरियाणा, दिल्ली कमाने चले जाते हैं परीक्षा के समय प्रकट हो जाते हैं। पास भी होते हैं मुझे यही समझ नहीं आया कैसे? खैर आजकल सब यहीं हैं लेकिन कटाई जोर की चल रही है अभी इनसे तो बात करो मत। जब खाली होंगें तब अगर शादी ब्याह वाले दरवाजे से लौट गए तो बात करेंगे या फिर किसी फैक्ट्री में हाईस्कूल का सर्टिफिकेट माँग दिया तो या फिर लड़की घर से भाग गई तो उसकी जन्मतिथि के प्रमाणपत्र के लिए। 

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

सपना मुंगेरीलाल का

तिश्नगी है उम्र की चिन्ता न कोई रिस्क की।
पाठशाला खोल दी ट्रेनिंग मिलेगी इश्क की।।
प्रिंसिपल का पद सुरक्षित है उसी के वास्ते,
डर कोरोना का नहीं या फिर जरूरत विक्स की।।
ऑनलाइन क्लास तो सपना मुँगेरीलाल का,
अपने बच्चों की जगह हमने तबेला फिक्स की।।
छोड़ दूँ घरबार मैं इतना निकम्मा हूँ नहीं,
इतना कर्मठ भी नहीं एक्टिंग करूँ फकीर की।।
चाँद-मंगल की समस्या हमने सुलझाईं बहुत,
खाज जाती ही नहीं है मित्र कोहनी तीर की।।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

कोरोना की वापसी का कारण

परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा, "महामुने! एक बात समझ में नहीं आयी? वैक्सीन आ रही थी कोरोना जा रहा था। लोग धीरे धीरे मौज मस्ती की तरफ जा रहे थे फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वैक्सीन के आते ही कोरोना भी अपने तेवर दिखाने लगा।"
शुकदेव जी ने एक रहस्यमयी मुस्कान परीक्षित की ओर फेंकते हुआ कहा, "राजन! आपने आम जनता की जानकारी वर्धनाय बड़ा अच्छा व रूचिकर प्रश्न पूछा है हृदय गदगद हो गया। यही गोपनीय प्रश्न कलयुग में ऊधव ने विमल कुमार शुक्ल नाम के एक नामालूम से प्राणी से पूछा था तो उसने जो बताया था उसे आप भी सुनो।
विमल कुमार शुक्ल ने ऊधव जी को बताया था, "सरकार को जब पता नहीं था कि कोरोना क्या बला है? तो मीडिया को अपनी ओर करके बड़ी भयंकर खबरें दिखाकर इतना डराया और इतने अधिक प्रतिबंध लगाए कि लगा तृतीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। प्रवासियों की इतनी भीड़ सड़कों पर दिखी जितनी भारत पाकिस्तान विभाजन के समय भी न दिखी थी। मृत्यु की बात करें जितनी मौतें कोरोना से न हुईं उससे कहीं अधिक इसलिए मर गए कि यात्रा अवरोधों की वजह से डॉक्टरों तक नहीं पहुँचे, पहुँचे तो डॉक्टरों ने इलाज नहीं किया। भूख और अवसाद से मरने वालों को जोड़ दें तो यह ग्राफ और ऊपर चला जाएगा।
सरकार को अपनी भूल पता चली और उसने धीरे धीरे प्रतिबन्धों को हटाना शुरू किया साथ ही घटना शुरू हुआ कोरोना का। वैक्सीन कब आयेगी पता नहीं था इसलिए जिंदगी पटरी पर आ रही थी। जब न्यूनतम केस थे तभी वैक्सीन आ गई। अब नई समस्या यह थी कि कोरोना खत्म हो गया तो वैक्सीन का क्या होगा? जिन कम्पनियों ने वैक्सीन बनाने में भारीभरकम खर्चा किया आखिर उसकी भरपाई कैसे हो। इसलिए कोरोना को सरकार से सहानुभूति दिखाते हुए उसे वापस आना पड़ा। ऊधव जी यही असली कारण है कोरोना की वापसी का।
फिर विमल जी ने ऊधव के कान में मुँह सटाकर जो मंत्र जपा वह यह है। पहले चक्र में रजिस्ट्रेशन कराये सिर्फ 30% लोगों ने ही टीका लगवाया तो जिम्मेदारों के कान खड़े हो गए। तो एक रजिस्टर्ड से जिम्मेदार ने पूछा क्यों रे वैक्सीन क्यों नहीं लगवाया। रजिस्टर्ड बोला कि जब कोरोना जा रहा है तो वैक्सीन लगवाने का क्या फायदा। बात ऊपर पहुँची ऊपरवाला बोला अच्छा....। बस अगले दिन से कोरोना को दौड़ने के आदेश जारी हो गए। " 
शुकदेव जी अपनी बात समाप्त करें इससे पहले ही परीक्षित बोल पड़ा, "महामुने! विमल कुमार शुक्ल ने आखिर यह निष्कर्ष कैसे निकाला।"
"परीक्षित! तुम अभी भी कलियुग के प्रभाव में हो। इतनी तमीज तो रखो कि बात पूरी हो जाए। अब और जो ज्ञान की बात उसने मुझे बताई वह तुम्हारी जल्दबाजी की वजह से विस्मृत हो गई। खैर निष्कर्ष का आधार सुनो।
परीक्षित! कोरोना सरकार द्वारा आयोजित भीड़ों से दूर था। बाजारों, बसों, ट्रेनों और सरकार के लाभ वाली हर जगह से दूर था। वह वहींं अटैक कर रहा था जहाँ कोरोना गाइडलाइन का पालन अब भी जारी था। वह उन प्रदेशों में शान्त था जहाँ चुनाव थे। स्कूलों में तो गजब का परफॉर्मेंस था कोरोना का। सरकार की पूरी कोशिश थी प्राइवेट टीचरों का कुनबा भूख से मरे तो ठीक पर कोरोना से नहीं। सरकार की सख्ती भी गुलगुलों की मार वाली थी। सबसे बड़ी बात लोग कोरोना की सही जानकारी के लिए अपुष्ट स्रोतों पर कलयुग में भी आश्रित थे और द्वापर में भी हैं।"
परीक्षित को समझ में तो कुछ नहीं आया लेकिन उसने कोई प्रश्न नहीं किया क्योंकि प्रथम तो मोदी के मन की बात टीवी पर आ रही थी दूसरे मोबाइल का नेटवर्क ऑनलाइन कथा संचालन में बाधक बन गया था।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

भेड़ और भेड़िया

लहू तो लाल ही है भेड़ का भी भेड़ियों का भी।
पत्ते हरे होते हैं नीम के और हरा होता है अंगूर भी।
कलर नहीं फितरत की बात करो।
खयाल छोड़ो हकीकत की बात करो।
मुझे यह मत बताओ कि पानी तो पानी है,
मुझे यह बताओ कि पानी की क्या कहानी है।
जमीन से निकलता है पेट्रोल किन्तु पी नहीं सकते।
इसी तरह सदभाव की कविता अच्छी है, 
मगर इस कविता को जी नहीं सकते।
ये सनातनी जिस कुएँ से पीते हैं वहाँ,
गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और नर्मदा का,
जल नहीं अमृत बहता है।
तुम तुलना करते हो उन दिलों से जिनमें,
सहारा का रेगिस्तान रहता है।
तुम पढ़लिख ज्यादा गए हो देखते हो फैट 
किन्तु हम देखते हैं कि डालडा है या देशी है।
दकियानूसी है कि नवोन्मेषी है।
दूध से बनी है रबड़ी और दही भी दूध से बनता है,
सबके अपने टेस्ट हैं कोई किसी की कहाँ सुनता है।
खट्टा होता है दही और नींबू भी खट्टा होता है,
मगर रायते में दही का ही जलवा है।
तो ज्यादा रायता मत फैलाओ, 
असलियत पर आओ।
असलियत ये है भेड़ भेड़ है,
और भेड़िया भेड़िया।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गिल्ली-डंडा

स्कूल अब 11 अप्रैल को खुलेंगे सरकार ने घोषित कर दिया जाहिर है ये अब जुलाई से पहले नहीं खुलेंगे। तो बच्चों आओ कल से मैदान में गिल्ली-डंडा खेलने की प्रैक्टिस करते हैं। क्योंकि इसे सिखाने के लिए न तो बिल्डिंग की जरूरत है और न इन्फ्रास्ट्रक्चर की न अध्यापक की और गिल्ली-डंडा खेलने से न कोरोना ही फैलता है और न ही सरकार की नजर में ये सेक्टर आया है। वैसे भी सालभर से गलियों में तो गिल्ली-डंडा ही खेल रहे थे। जब से कोरोना लगा है तुम ज्यादातर घर पर ही रहे हो। तुम बोर नहीं हुए क्योंकि सरकार ने कहा बेटा मोबाइल है न। माँ बाप के सामने पढ़ाई करो और जब मन ऊबे तो कान में लीड लगाकर ईलू-ईलू गाओ। हाँ जब उससे भी बात न बने तो वो जो तुम्हारी नई क्लास-टीचर हैं न जिनको तुमने उस सो-हॉट सो-सेक्सी कुछ ऐसे ही बोला था न उनसे उनकी निजी जिंदगी के बारे में जानकारी और दोस्तों में चटकारे लेकर बताओ यार! क्या मेम हैं तुम पर अभी से डोरे डाल रही हैं। यदि निगेटिव सोचते हो तो अपने साथियों को बताओ कि कैसे हिन्दी वाले पुराने टीचर रंग को लंद बोलते थे। हाँ तुमने मम्मी पापा को उल्लू बहुत बनाया वे जरूर ऊब गए हैं, एक कमरे के फ्लैट में तुम माँ -बाप के बीच प्राइवेसी के बाधक बन गए हो। शायद इसीलिए वे  तुम्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं और तुमने उनका सम्मान करना छोड़ दिया है। 
स्कूल बन्द होने से पहले ही तुम पढ़ाई से जी चुराते थे। अब तो किसी बहाने की भी जरूरत नहीं। स्कूल बन्द है और माँ बाप ने भी कह दिया कि प्राइवेट स्कूलों की फीस मुफ्त में नहीं देंगे जब स्कूल ठीक से खुलेंगे तब नाम लिखायेंगे और तभी कापी किताबें खरीदेंगे। कुछ बच्चे सरकारी स्कूलों का रुख कर गए हैं लेकिन तुम वहाँ भी नहीं गए क्योंकि तुम्हें लगता सरकारी स्कूल में जाने से तुम्हें बेइज्जती महसूस होगी। तो सबसे बड़ी मुसीबत तुम्हारी है क्योंकि तुम धोबी के कुत्ते हो गए न घर के न घाट के। तो तब तक गिल्ली-डंडा ही खेलने का प्रोग्राम बनाते हैं क्योंकि बेटा कोरोना भी जिद पकड़ गया है कि छोटे प्राइवेट स्कूलों की कब्र खोदे बगैर मानेगा नहीं। तो घर से बाहर निकलो और मैदान में मिलो। वैसे टेंशन मत लो गिल्ली-डंडा तुम्हें मुझसे ज्यादा आता है तो तुम्हें डरना नहीं पड़ेगा मुझसे जैसे स्कूल में डरते हो, दरअसल सिखाओगे तुम ही मैं तो सिर्फ सीखूँगा। सीखूँगा इसलिए ताकि कोरोना ने जो भयावह चीजें सिखाईं हैं उसे भूल सकूँ शायद भूल सकूँ कि मेरे पास एक अदद पेट भी है जो सिर्फ रोटी से भरता है और रोटी हाथ पैर हिलाने से ही मिलती है। तो हाथपैर हिलाने हैं। मुझे पता है अब इस उम्र में हाथ पैर हिलाने से कुछ होने वाला नहीं। लेकिन हाथपैर तो हिलाने ही हैं। नहीं हिलाने से लगेगा मर गया हूँ। तो जिन्दा हूँ इस अहसास के लिए गिल्ली-डंडा जरूरी है।
गिल्ली डंडा इसलिए भी जरूरी है ताकि यह सरकार के मस्तिष्क को टकोर सके और उसे अहसास करा सके कि डाल हिलाकर पराक्रम दिखाना बंदरों का काम है रिजल्ट भी आना चाहिए। फिलहाल कोरोना का रिजल्ट यह है कि हम जहाँ से चले थे एक साल बाद भी वहीं हैं।

मंगलवार, 30 मार्च 2021

चमकती चीजें

बहुत दिनों से मन में द्वंद्व था कि लिखूँ न लिखूँ। आखिर लिखने की भावना ने विजय प्राप्त की और लिखने बैठ गया। हम भारतीयों की प्राचीन काल से रोटी, कपड़ा और मकान के अतिरिक्त एक अन्य आवश्यकता रही है "आभूषण"। यद्यपि तमाम पुरुषों का आकर्षण भी आभूषणों के प्रति होता है किन्तु महिलाओं का कहना ही क्या? शायद ही कोई स्त्री होगी जो जेवर कपड़ों से तृप्त हो जाए। यह अलग बात है पति उनकी आकांक्षा की पूर्ति करता है कि नहीं।
समाज में सुन्दर, श्रेष्ठ व धनी दिखने की चाहत, धन को बहुमूल्य धातुओं के रूप में संचित करने की चाहत, अपनी बचत को गाढ़े समय के लिए बचाकर रखने की इच्छा और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर लेन-देन व पहनने-पहनाने के लिए जेवरों को खरीद बेचा जाता रहा है। भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग सदियों से इन्हीं आभूषणों की सहायता से गिरवीं-गाँठ रखकर अपनी अर्थ-व्यवस्था को सँभालता रहा है।
दूसरी ओर इन्हीं के व्यापार से एक बड़ा वर्ग अपनी आजीविका पहले भी चलाता रहा है और अब भी चला रहा है।
भारत में सोने चाँदी की एक बहुत बड़ी बाजार है जो कि संसार के आभूषण बाजार में शायद सबसे बड़ी है। लेकिन क्या आपको पता है कि जितना बड़ा बाजार असली जेवरों का है उससे कहीं बड़ा बाजार नकली जेवरों का भी। इन नकली जेवरों में मिलावटी धातुओं से लेकर सस्ती धातुओं के फैंसी आभूषण तक शामिल हैं। इसके अलावा क्या आपने सोचा है कि जिस आभूषण को आप असली समझते  हैं हो सकता है कि पीढ़ियों तक आपको पता ही न चले वह असली है कि नकली। ऐसे आभूषणों का भी बड़ा बाजार है कि स्वर्णकार उन्हें सौगन्ध खा खाकर उत्तम किस्म का बता बताकर बेचता है और उन्हें बेचने जायेंगे तो दूसरा स्वर्णकार उसका उचित मूल्य नहीं लगाएगा और उन्हें खोटयुक्त बतायेगा। जब आप पहले वाले आभूषण विक्रेता के पास जायेंगे तो वह पुनः अपने माल की गुणवत्ता को लेकर सौगन्ध उठायेगा और वापस खरीदी करेगा किन्तु नकद मुद्रा शायद ही देगा क्योंकि उसकी नीयत में वाकई खोट है।
इसके अतिरिक्त सोने का जो रेट आपको बताया जाता है असली सोने का होता है और जेवर टाँका युक्त अर्थात अशुद्ध धातुयुक्त। फिर भी आपको आभूषण की बनवाई के नाम पर अतिरिक्त ठग लिया जाता है। यही हाल चाँदी के जेवरों का भी । आजकल तो तनिष्क आदि के आभूषण आ रहे हैं जिन्हें उत्तम क्वालिटी का बताया जाता है फिर हॉलमार्क युक्त आभूषण आ रहे हैं जिनकी असलियत असन्दिग्ध मानी जाती है वरना मैं आपको अपना एक अनुभव बताऊँ हरदोई बड़ा चौराहा स्थित लाला प्यारेलाल सर्राफ की दूकान है जहाँ 1996 में मेरी माँ ने हथफूल खरीदे चाँदी के और फिर उन्हीं की दूकान पर उन्हीं की दूकान के कारीगर से उनपर सोने की कलई करवाई। मैं उस समय उनके साथ में ही था। उन हथफूलों को चढ़ावे पर भेजकर हम चार भाइयों के विवाह हो गए। 2019 में 23 साल बाद मेरी माँ को उन हथफूलों को बेचने का इरादा हुआ तो जब उसे अन्य स्वर्णकार के यहाँ बेचने का यत्न किया तो पता चला कि वे बेहद सस्ती धातु गिलट के बने हैं। दुकानदार के यहाँ शिकायत आदि करने के लिए इतने समय तक रसीद कौन सँभालता है। मैंने या मेरी माँ ने भी नहीं सँभाली। किन्तु एक चीज समझ में आई कि चमकती चीजें प्रायः छल करती हैं और परखेंगे तो उनकी चमक चली जाती है। कल्पना करें यदि उन हथफूलों को हम चार भाइयों में से किसी एक ने भी अपने पास रखने का फैसला किया होता तो आज भी हम उन्हें चाँदी का ही समझ रहे होते।
तो भइया आभूषण खरीदें शौक से किन्तु जानबूझकर। अन्यथा धनी होने का भ्रम पालने से कोई लाभ नहीं, जब समय आएगा और असलियत पता चलेगी तब तक बहुत देर हो जाएगी। बेहतर हो तो धन का सदुपयोग करें और शरीर पर पत्थर लादने का मोह छोड़ ही दें।
हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कंठस्य भूषणं।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किंप्रयोजनम्।।

हमारीवाणी

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