मंगलवार, 29 मई 2018

तुम्हें बनाया सैंया हमने



27/05/2018
सत्तर साल में जैसे झेले,
तुम भी वैसे निकले बाबा।
हम समझे थे शुरू हमारा,
अब सौतन का राज गया।
छाएगी हलवे की खुशबू,
घर से लहसुन प्याज गया।
संस्कृति संस्कृत के दिन आये,
तन से खुजली खाज गया।
घोड़े रेस जीत पायेंगे,
अब गदहों का ताज गया।
अब हम जाने फर्क नहीं कुछ,
जैसे काशी वैसे काबा।।
तुम्हें बनाया सैंया हमने,
सौंप दई कोतवाली।
जो सौतन डरनी थी हमसे,
अब ज्यादा मतवाली।
उम्मीदें थी मालपुए की,
हुई रसोंई खाली।
बाहर वाली मौज मनावे,
रोय रही घरवाली।
अब भी द्वारे लेट रहीं हम,
खाय रहीं हैं ढाबा।।
 



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शनिवार, 26 मई 2018

ओ! मतवाली


18/05/2018
आलिंगन की बेला थी तब दोनों खोये|
यौवन के घमण्ड में भरकर मुड़ मुड़ रोये|
निशा गयी प्राची में ऊषा झांक रही है|
तब क्यों मुझसे भीख प्रणय की माँग रही है|
विषय वासना के क्षण बीते ओ! मतवाली|
शैय्या तज दे सुबह हुई फैली उजियाली|
मेरे तेरे मध्य न दालें गलने वाली|

जब उपवन में भँवरों की गुंजार प्रबल थी|
कली कली आह्लादकारिणी पुष्ट सबल थी|
नवपल्ल्व निज छाया से दुलराने वाले|
कर फैला तत्पर प्रसून स्वागत मतवाले|
निकल गया अनबूझ पथिक सा दृष्टि न डाली|
अब क्या तेरे दर पर लेने आऊँ माली|
तेरी झोली मेरी झोली दोनों खाली|

तू भी भोला मैं भी भोला दोनों भोले|
तू शीतल ज्यों बर्फ शिला मैं जैसे ओले|
बहुत बार मन्दिर में हमने नैन मिलाये|
बातें छौंकीं सुख दुःख बाँटे अवसर पाये|
मन की प्यास कहाँ बुझ पाई युग युग पाली|
रीती गागर तू जाने कब भरने वाली|
बन्जर उर में भी मनमोहन कर हरियाली|







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शुक्रवार, 25 मई 2018

दो दो जेठ



4/05/2018
हम तो एक से ही परेशान थे।
अब तो दो दो जेठ आ गये।
बादल कहाँ हैं? घूँघट कर लूँ।
फिर पिया की याद के झोंके सता गये।।
उसके पास होने का अहसास,
तपती दोपहर जिया जुड़ा जाता है।
जेठ या देवर, चिन्ता नहीं होती,
सारा रंज और भय उड़ा जाता है।।
घर बड़ा फिर मैं अकेला खोज हारा,
बिन पिया के मिल न पाया है सहारा।
आ भी जा अब मेघ के सँग या पवन सँग,
तृषित आँगन, तृषित यौवन तृषित अँग-अँग।।
 


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