गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

मुक्ति

सामने दुकान है, दुकान के पास खड़ा है नीम का पेड़, इस पेड़ के चारों ओर बाँधा गया है चबूतरा। कल तक पेड़ और चबूतरा दोनों प्रफुल्लचित्त रहते थे कल शायद फिर प्रसन्न हों किन्तु आज उदास हैं, शायद सिर्फ यही उदास हैं अगर कोई अन्य उदास है तो वह है लेखक। क्योंकि थोड़ी देर पहले इस चबूतरे से एक लाश उठाकर ले जाई गयी है अंतिम संस्कार के लिए। आज सुबह वह मर गयी थी या आसपास वालों को लगता है कि वह आज सुबह मरी थी। जहाँ तक लेखक का प्रश्न है लेखक को लगता है वह अपने जीवन में बहुत बार मरी होगी या यूँ कहें उसके अपनों ने उसे मारा होगा, आज तो उसे मुक्ति मिल गयी।
कुल तीन प्राणी वह स्वयं उसका पति और उसका आठ वर्ष का लड़का कोई पैंतीस वर्ष पूर्व इस मुहल्ले में रहने के लिए आये थे। किसी चीज की कोई कमी नहीं, हँसी ख़ुशी  से भरा पूरा परिवार। अगर कोई कमी थी तो सिर्फ इतनी कि परिवार में इकलौती सन्तान थी। किन्तु पति पत्नी को कोई मलाल नहीं, कभी इस बारे में उन दोनों की जुबान पर कोई चर्चा नहीं दिखाई दी।
पति ने अपना कपड़े का व्यवसाय शुरू किया। दुकानदारी चल निकली। किन्तु कुसंगति रुपी व्याधि जिसे हो जाए उसे कौन सा अन्य व्यसन नहीं लग जाएगा। युवावस्था का जोश कुछ आगा पीछा सोंचने तो देता नहीं। दुकान प्रायः बन्द रहने लगी और पति का ठिकाना मुहल्ले के किसी कोने में हो रहे जुए का फड़। कभी कभी पीना पिलाना भी हो जाता था। परिणाम घर में चिक चिक और कलह। बेचारी पत्नी जीते जी समझो मर गयी। कई बार दिमाग में आया पति को उसके हाल पर छोड़कर मायके चली जाये, किन्तु वहाँ भी कितने दिन निपटती। माँ-बाप तो रहे न थे और भाइयों भौजाइयों का क्या आसरा? अतः क्या करती विवशता में पति की मार-पीट सहती और रूखी सूखी खाकर किसी तरह जीवन यापन करती। हाँ, एक उम्मीद की किरण थी कि एक दिन उसका लाड़ला बड़ा हो जायेगा तब उसे शायद इस नारकीय यातना से मुक्ति मिल जाये एक सम्भावना यह भी थी कि शायद पतिदेव ही सुधर जायें।
इस संसार में किसी चीज का बिगाड़ तो बड़ा सरल है। कोई भी चीज शीघ्रता से बिगड़ जाती है फिर वह चीज मनुष्य ही क्यों न हो। किन्तु जब बनने या सुधरने का प्रश्न खड़ा होता है तो बड़ी बाधाएँ आतीं हैं। सो पतिदेव तो सुधरने की जगह बिगड़ते ही चले गये। प्रायः घर से गायब भी रहने लगे। हाँ लड़का धीरे धीरे बड़ा हो रहा था। पढ़ाई लिखाई में बहुत तेज तो न था हाँ व्यसन कोई न था उसमें। माँ से प्रेम भी करता था हाँ पिता जी के अवगुणों के कारण उसका अपने पिता जी से प्रायः विवाद हो जाता था। यह स्वाभाविक ही था कि माँ अपने पुत्र का ही पक्ष लेती। उसने स्पष्ट कहा कि वह आजतक पुत्र के लिए ही जीती आई है अन्यथा कब की मर गयी होती। पति ने माँ-पुत्र की इस एकता से आजिज आकर प्रायःकस्बे से भी गायब रहना शुरू  कर दिया। कभी कानपुर कभी आगरा कभी हरिद्वार तो कभी इलाहाबाद। कुछ पता नहीं चलता कब कहाँ आ रहे हैं और कब कहाँ जा रहे हैं। हाँ इस बीच लड़के का विवाह हो गया। चाँद सी बहू घर में आई। अब पत्नी का स्नेह पुत्र के साथ साथ बहू पर भी वितरित होने लगा। पति इस घर में पूरी तरह अनावश्यक हो गया। इसका कारण वह स्वयं था किसी का क्या दोष? काफी समय हो गया पति को इस कस्बे में किसी ने नहीं देखा, इस बीच घर में कन्या रत्न जन्मा, पति एक दिन देखने आया अपनी पोती को जब पोती दो माह की थी। घर में उसने किसी से कोई बात नहीं की। उसकी बहन आई हुई थी बस उसी ने उसे पोती का दर्शन करा दिया। घर में उससे कोई जलपान इत्यादि के लिए कोई कुछ पूछता इससे पूर्व ही वह पोती के हाथों में 50 की नोट थमाकर जैसे आया था वैसे ही चला गया। आज वह पहली बार फूट फूट कर रोई, विधाता ही जाने क्यों? अपने पति के लिए शायद या फिर उसके लिए जो बदलाव उसके बेटे में उसकी बहू के घर आ जाने के बाद हुए थे। जो भी हो कोई बारुद अवश्य उसके हृदय में था जो उसके पति के इस प्रकार आनन-फानन आने-जाने से फट पड़ी। किन्तु उसने किसी से कुछ नहीं कहा। जो कहना था लोगों ने कहा और बातें हवा में तैरीं कि अब बेटा माँ को पहले सा महत्त्व नहीं देता। इसमें गलती माँ-बेटा दोनों की रही होगी? बेटे के सामने चयन की समस्या रही होगी वह माँ और पत्नी में सामंजस्य नहीं बिठा पाया, अथवा माँ भूल गयी कि उसका अपने बेटे पर जितना भी हक हो कुछ न कुछ हक उसकी पत्नी का भी होगा। सुनने में आता था कि सास बहू अपना अपना खाना अलग बनाती हैं। कभी सुनने में आता था कि बहू आज नाराज होकर मायके चली गयी है। यह आना-जाना रूठना  मनाना लगा रहा, घर में एक पोते की किलकारियाँ भी गूंजने लगीं। अब तो इस घर में माँ कहें या सास जैसी चीज और भी अनावश्यक हो गयी। बहू का पूरा ध्यान अपने दोनों बच्चों पर और वृद्धा उपेक्षित हो गयी। तीज त्यौहार तक पर वृद्धा पर इतना ध्यान भी बहू-बेटे न दे पाये, जितना लोग घरों-दीवारों पर देते हैं। अब शायद पहली बार पत्नी को पति की याद सचमुच में आई। शायद इसीलिए वृद्धा ने खबर पाई कि उसका पति पड़ोस के गाँव में अपने किसी मित्रके यहाँ ठहरा हुआ है। वृद्धा ने अपने बहू बेटे से तमाम मिन्नतें कीं कि वे या तो उसके पति को लिवा लायें या फिर उसे ही उसके पति के पास पहुँचा दें, किन्तु उन्हें न सुनना था न उन्होंने सुना। पता नहीं किस भले आदमी ने उसकी मदद की पत्नी को पति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पत्नी को अपने पति को पहचानने में बड़ा यत्न करना पड़ा। वह बहुत ही दुर्बल व कृशकाय हो गया था बीमार भी बहुत था। अपनी पत्नी की ओर उसकी आँखें उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह जमीन में नजरें गड़ाये रहा और पत्नी उसे निःशब्द घूरती रही। कितना समय ऐसे ही बीत गया बताना अनावश्यकहै। जब दोनों की दृष्टि मिली तो बरसों के बिछड़े ऐसे आलिंगनबद्ध हुए जैसे प्रथम रात्रि में भी न हुए होंगे। दोनों की आँखों से पश्चाताप ,ग्लानि व संताप की अविरल गंगा-यमुना बह चली। दोनों ने अपने अपने दुःख दर्द व गिले शिकवे किये। पत्नी ने किसी तरह पति को अपने साथ रहने को राजी किया, पति को भी अब आश्रय की आवश्यकता थी अतः उसे राजी होना पड़ा। एक बार फिर पत्नी का समर्पण देखने को मिला। दोनों घर आ गये। किसी तरह लड़का पिता जी को घर में रखने के लिए राजी हुआ। पत्नी को कुछ सान्त्वना प्राप्त हुई, किन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन पत्नी पति को घर पर लिवाकर आई उसके छ: सात दिन बाद ही एक रात पति ने पत्नी से पानी माँगा, पत्नी ने बहू को आवाज लगाई, जब बहू नहीं आई तो विवश होकर पत्नी रसोईघर में स्वयं ही पानी लेने चली। खटरपटर सुनकर बहू की नींद क्याखुल गई बहू ने पूरा मुहल्लासिर पर उठा लिया। बेचारी पानी के बिना ही लौट आई। पति के सिरहाने खड़ी होकर सुबकने लगी, पति ने कुछ कहने का प्रयास किया किन्तु कुछ कह न सका उसका मुहँ खुला का खुला रह गया। वह अनन्त यात्रा पर निकल चुका था।
जैसे किसी को आसमान से लाकर जमीन पर पटक दिया गया हो। सारे संसार में अन्धकार का साम्राज्य छा गया।
विधवा का कठिन जीवन फिर परिवार की ओर से उपेक्षा किसी मृत्यु से कम है तो यह स्त्री वास्तव में जीवित थी। हाँ वृद्धा के लिए एक अच्छी बात यह हुई कि पोती स्कूल जाने लायक हो गई थी। बेटे बहू को एक नौकरानी की आवश्यकता थी सो वृद्धा से अच्छी नौकरानी कहाँ मिलती? ड्यूटी लगा दी गई। वृद्धा का इतना लाभ हुआ कि अब तक उसका घर से बाहर निकलना जो पहले कम होता था अब अधिक हो गया तो इससे उसका दिल बहल जाता था दूसरे उसके अन्तर्मन की पीड़ा अब पोती के प्रति ममता में परिवर्तित होती जा रही थी। अब पोती थी जिसके साथ उसका समय ही गुजर जाता हो सिर्फ ऐसा न था बल्कि वह उसके साथ अपने दुख भी भूल जाती थी। दूसरे बच्चे इतने दुनियादार नहीं होते कि बिना किसी कारण किसी से घृणा कर लें। किसी तरह वृद्धा अपना दर्द भूलने का यत्न कर ही रही थी कि उसकी ड्यूटी बढ़ गई। अब पोता भी उसके दोस्तों शामिल हो गया था। वह भी स्कूल जाने लगा था। किन्तु एक नई समस्या खड़ी हो गई। पोती जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थी धीरे धीरे अपने अपने माँ-बाप का मन्तव्य समझकर उनका अनुसरण करती जा रही थी। या यों कहें कि माँ कहीं न कहीं अपनी बेटी को यह समझाने में कामयाब हो रही थी कि बुढ़िया इस घर में फालतू की चीज है। अब बुढ़िया और पोती के बीच दूरी बढ़ रही थी। वह इतनी बढ़ी कि बुढ़िया को जब तब अपने साथियों के मध्य अपमानित कर देती। इस विस्तृत संसार में बुढ़िया बस भगवान से कहती कि उसे उठा ले।
भगवान उसकी क्यों सुनने लगे? बुढ़िया की जरूरत भगवान को भी न थी। किसी तरह दिन गुजरते रहे।
एक सप्ताह पूर्व पोती का विवाह था। बुढ़िया के हृदय में पोती के ब्याह को लेकर बड़ी उमंगें थीं। लेखक जानता था कि किस उत्साह से क्या-क्या यत्न करके उसने पोती के विवाह के लिए लिए उपहार खरीदे। किन्तु द्वार पर बारात आने के ठीक एक दिन पहले पोती व माँ ने बुढ़िया को अपशकुनी व मनहूस करार देकर उसे सख्त हिदायत दी कि विवाह कार्य सम्पन्न होने तक बुढ़िया कमरे से बाहर नहीं निकलेगी। बुढ़िया ने बुझे मन से स्वीकारा भी कि वह कमरे से बाहर न निकलेगी। लेकिन उसका कलेजा तब फट गया जब पोती ने बुढ़िया के दिए उपहारों को हाथ लगाने से भी मना कर दिया। बुढ़िया उस दिन के बाद से कमरे से बाहर न निकली, उसका पोता उसे कमरे में खाना दे आता था। कल सुबह भी वह खाना लेकर गया था द्वार नहीं खुले।  पति पत्नी ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। द्वार तोड़ा गया। चारपाई के ऊपर बुढ़िया का मृत शरीर था और चारपाई के नीचे एक हफ्ते से उसे भेजा हुआ भोजन जिसे उसने हाथ भी न लगाया था।

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शनिवार, 2 जून 2018

हमारी मत मानो

सीता जी के जन्म को लेकर बड़ा विवाद है भाई, कोई उन्हें जनकसुता कहता है तो कोई कोई उसे रावण की पुत्री तक सिद्ध करते हैं कोई उसे ऋषियों के रक्त से उत्पन्न बताते हैं अब हमारे उप मुख्यमंत्री उन्हें टेस्ट ट्यूब बेबी बता रहे हैं। अरे भाई इतना क्यों नहीं समझते जो सत्ता में पहुँच जाते हैं लोग उनकी उबासियों पर भी तर्क वितर्क करते हैं। सो आप तो चुप ही रहिये ये काम तो हमारे जैसे अज्ञानियों को सौंप दीजिए। साधो आपको पता है जब गरुड़ महाराज को अहंकार हुआ और उन्होंने ब्रह्म के बारे में जानना चाहा तो भगवान शंकर ने उन्हें कहा कि केवल कागभुशुण्डि जी आपकी शंका का समाधान करने में समर्थ हैं। अब पार्वती जी बड़ा अचंभित । क्या कागभुशुण्डि जी शंकर जी से ज्यादा जानते हैं? उन्होंने भगवान से कहा नाथ ब्रह्म का रहस्य तो आप भी बता सकते थे, तो आपने गरुड़ जी को 2000 किमी क्यों दौड़ा दिया ? शंकर जी ने बस एक वाक्य कहा खग जाने खग ही की भाषा।अब बन्धु अगर कल कोई विदेशी वैज्ञानिक हमें समझा दे कि सीता जी टेस्ट ट्यूब बेबी थीं हम मान लेंगे वरना आप क्या और आपकी औकात क्या? हम तो रामसेतु को राम निर्मित इसलिये मानते हैं क्योंकि नासा के चित्र बताते हैं कि वहाँ एक पुलवरना हम तो यह भी नहीं मानते कि कोई पुल भी है।भला हो बख्तियार खिलजी का जिसकी वेवकूफी से कुछ प्राचीन साहित्य बचा रह गया जला नहीं तो हम उन पुस्तकों के माध्यम से इतना ही मान लेते हैं कि भारत एक प्राचीन देश है। विदित हो बख्तियार ख़िलजी के नेतृत्व में नालन्दा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में लगाई गई आग से 4 माह तक पुस्तकें जलतीं रहीं थीं।हमारी तो वृत्ति हो गयी है कि हम अतीत के गौरव की चर्चा तो करते हैं किन्तु जब उस गौरव को मूर्त स्वरूप देने का अवसर आता है तो हम वामपंथी हो जाते हैं और भारतीय दर्शन व विज्ञान की खिल्ली उड़ाते हैं। सो साधो ये देश ऐसे ही रहेगाकल्पना में खोया हुआ आत्ममुग्ध इसे कोई सुझाव देना है तो विदेशी यूनिवर्सिटीज की शरण लो। तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे ये। इन्हें यह भी बताना नादानी है गुरुत्वबल की खोज न्यूटन से कई वर्ष पहले हो चुकी थी। ऋग्वेद के एक सूत्र के अनुसार सभी आकाशीय पिण्ड परस्पर बल लगाते हुए एक दूसरे को सहयोग की भावना से रोके हुए हैं। मेरी कोई माने न माने मेरी बला से। मैं न भाजपाई हूँ और न उपमुख्यमंत्री।

मंगलवार, 29 मई 2018

तुम्हें बनाया सैंया हमने



27/05/2018
सत्तर साल में जैसे झेले,
तुम भी वैसे निकले बाबा।
हम समझे थे शुरू हमारा,
अब सौतन का राज गया।
छाएगी हलवे की खुशबू,
घर से लहसुन प्याज गया।
संस्कृति संस्कृत के दिन आये,
तन से खुजली खाज गया।
घोड़े रेस जीत पायेंगे,
अब गदहों का ताज गया।
अब हम जाने फर्क नहीं कुछ,
जैसे काशी वैसे काबा।।
तुम्हें बनाया सैंया हमने,
सौंप दई कोतवाली।
जो सौतन डरनी थी हमसे,
अब ज्यादा मतवाली।
उम्मीदें थी मालपुए की,
हुई रसोंई खाली।
बाहर वाली मौज मनावे,
रोय रही घरवाली।
अब भी द्वारे लेट रहीं हम,
खाय रहीं हैं ढाबा।।
 



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शनिवार, 26 मई 2018

ओ! मतवाली


18/05/2018
आलिंगन की बेला थी तब दोनों खोये|
यौवन के घमण्ड में भरकर मुड़ मुड़ रोये|
निशा गयी प्राची में ऊषा झांक रही है|
तब क्यों मुझसे भीख प्रणय की माँग रही है|
विषय वासना के क्षण बीते ओ! मतवाली|
शैय्या तज दे सुबह हुई फैली उजियाली|
मेरे तेरे मध्य न दालें गलने वाली|

जब उपवन में भँवरों की गुंजार प्रबल थी|
कली कली आह्लादकारिणी पुष्ट सबल थी|
नवपल्ल्व निज छाया से दुलराने वाले|
कर फैला तत्पर प्रसून स्वागत मतवाले|
निकल गया अनबूझ पथिक सा दृष्टि न डाली|
अब क्या तेरे दर पर लेने आऊँ माली|
तेरी झोली मेरी झोली दोनों खाली|

तू भी भोला मैं भी भोला दोनों भोले|
तू शीतल ज्यों बर्फ शिला मैं जैसे ओले|
बहुत बार मन्दिर में हमने नैन मिलाये|
बातें छौंकीं सुख दुःख बाँटे अवसर पाये|
मन की प्यास कहाँ बुझ पाई युग युग पाली|
रीती गागर तू जाने कब भरने वाली|
बन्जर उर में भी मनमोहन कर हरियाली|







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शुक्रवार, 25 मई 2018

दो दो जेठ



4/05/2018
हम तो एक से ही परेशान थे।
अब तो दो दो जेठ आ गये।
बादल कहाँ हैं? घूँघट कर लूँ।
फिर पिया की याद के झोंके सता गये।।
उसके पास होने का अहसास,
तपती दोपहर जिया जुड़ा जाता है।
जेठ या देवर, चिन्ता नहीं होती,
सारा रंज और भय उड़ा जाता है।।
घर बड़ा फिर मैं अकेला खोज हारा,
बिन पिया के मिल न पाया है सहारा।
आ भी जा अब मेघ के सँग या पवन सँग,
तृषित आँगन, तृषित यौवन तृषित अँग-अँग।।
 


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गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

रेप समस्या व समाधान हेतु विमर्श



लिखना तो बहुत दिनों से चाहता था किन्तु लिखा नहीं| जैसे ही मोदी सरकार ने रेपिस्टों के खिलाफ कठोर कानून बनाया कि नाबालिग से रेप करने वाले को फाँसी की सजा दी जायेगी व अन्य में अधिकतम सजा उम्रकैद होगी तो मैं अपने को लिखने से रोक नहीं पाया|
रेप अत्यधिक निन्दनीय कृत्य है, किसी भी समाज के लिए कलंक है, किसी भी रूप में स्त्री अस्मिता से खिलवाड़ एक सभ्य समाज में त्याज्य होना चाहिए| रेप से रेप पीड़िता को व उसके परिवार को गहरा मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक व आर्थिक आघात पहुँचता है| अपूरणीय क्षति होती है जिसकी भरपाई कई पीढ़ियों बाद भी सम्भव नहीं होती| कभी कभी पीड़िता व उसके परिवार का समापन हो जाता है जोकि एक सामाजिक क्षति है| अतः ऐसे प्रबन्ध होने चाहिये कि ऐसी घटनाएं न हों| आसाराम काण्ड, निर्भया काण्ड, कठुआ काण्ड, उन्नाव की घटना व अन्यान्य रेप की घटनायें उस प्रथम श्रेणी के अपराध हैं जहाँ अपराधी को कठोरतम दण्ड दिया जाना आवश्यक है| ऐसे कानून का हृदय से स्वागत है|
रेप को रोकने के लिए कठोरतम सजा का यह कानून इतना कामयाब होगा यह समय बतायेगा, मैं यहाँ कानून के औचित्य या अनौचित्य पर विचार नहीं कर रहा क्योंकि किसी भी विषय पर सबके अपने-अपने तर्क कुतर्क होते हैं| मेरा प्रश्न यह है कि क्या कभी हमने इस सन्दर्भ में मनुष्य की प्रकृति व उसकी आवश्यकताओं को समझने का प्रयास किया है? क्या रेपिस्ट की मनोवृत्ति का मानवीय या चिकित्सकीय दृष्टिकोण से भी विचार करने का प्रयास किया है? क्या रेप जैसे अपराध की अन्य अपराध से कोई तुलना है? इन प्रश्नों के उत्तर दिया बिना कोई भी कानून अल्पमात्रा में ही प्रभावी होगा|
आप सबने ट्रेनों के, अस्पतालों के व सार्वजनिक शौचालयों के दीवारों पर लिखे हुए स्लोगन व विचार पढ़े होंगे| मैं सिर्फ स्लोगनों की चर्चा करूँगा| वैसे आपने कंडोम और बैंगन जैसी चीजें भी शौचालयों में पायी होंगी| ये वहाँ क्या कर रहीं थीं कहने की आवश्यकता नहीं| आप स्वयं बहुत समझदार हैं|
स्लोगन जिन्हें पढ़ने में लज्जा आती है लिखने वाले को नहीं आई| क्यों? क्योंकि वे बीमार या  विक्षिप्त लोगों के द्वारा लिखे गये थे| ये स्लोगन उनके हृदय की अतृप्त वासनाओं की अभिव्यक्ति थे, जिन्हें कदाचित वे इसी सर्वोत्तम प्रकार से तृप्त कर सके| क्या आपको पता है जिस समय आप स्लोगन पढ़ रहे थे आपका मानसिक बलात्कार हो चुका था? उन्हें वह सॉफ्ट टारगेट नहीं मिला या फिर उन्हें किसी भय ने रोक दिया जहाँ वे अपनी वासना की पूर्ति करते| कठोर सजा प्रायः इन्हीं पर प्रभावी है जो बेचारे पहले से ही डरे हैं, किसी सार्वजनिक स्थल पर लड़कियों की ओर देखने से भी डरते हैं|
उनका क्या जो मानसिक रूप से इस बात के लिए सक्षम होते हैं कि आत्महत्या कर लें या किसी की हत्या कर दें कठोर सजा उन्हें कैसे रोकेगी| ध्यान दें रेपिस्ट किसी बच्ची, युवती या वृद्धा का बलात्कार नहीं करता वह बालिग या नाबालिग का भी विचार नहीं करता उसके सामने तो जो भी सॉफ्ट टारगेट आ जाता है, जिसमें वह स्वयं को सक्षम पाता है उसका शिकार कर लेता है| ये द्वितीय प्रकार के बलात्कारी हैं| यह भी देखा जाता है कि बालिग हों या नाबालिग इश्क पर जोर नहीं, सामाजिक खुलेपन के दौर में दोस्ती प्यार में और प्यार कब विवाह पूर्व सम्बन्धों में बदल जाता है पता ही नहीं चलता| विचार मिले या स्वार्थ सिद्ध हुए और विवाह हो गया तो ठीक वरना झेलो| ऐसे में प्रायः हानि में पुरूष ही रहता है चाहे वह बालिग हो नाबालिग| ये तीसरे प्रकार के बलात्कारी हैं| चौथे प्रकार के बलात्कारी वे हैं यद्यपि नगण्य हैं, जहाँ स्त्रियों ने ही शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए दबाव डाला हो (लेखक ऐसे ही एक बलात्कारी से कई वर्ष पूर्व मिल चुका है और उससे सहानुभूति रखता है) और जब भेद खुल गया तो सारा दोष पुरुष पर मढ़ दिया|
लेखक की चिन्ता अंतिम तिन प्रकार के बलात्कारियों के सन्दर्भ में है| यह तीनों ऐसे हैं जिनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है तथा यह भी ध्यान रखना है कि प्रथम प्रकार के बलात्कारी बचने न पायें|
मैंने आयुर्वेद के वेग-विधारण से सम्बन्धित चैप्टर में विभिन्न प्रकार के वेग पढ़े हैं-श्वास, कास, हिक्का, जृम्भा, छींक, मल, मूत्र, प्यास, भूख व अन्य के साथ एक पढ़ा है मैथुनेच्छा| यह भी कि शरीर में उपस्थित ये वेग बलात रोके जाने पर रोग उत्पन्न करते हैं और कुछ कभी कभी मृत्यु का भी कारण होते हैं| मैथुन के लिए तो व्यक्ति बहुत बार अप्राकृतिक व कृत्रिम साधनों का भी सहारा ले लेता है| हमारे तमाम पाठक स्त्री हों या पुरुष सभी ने कभी न कभी किसी न किसी साधन को अपनाया होगा| अतः साधनों के बारे में लिखने की आवश्यकता नहीं| आवश्यकता इस प्रश्न की है मनुष्य की इस नैसर्गिक इच्छा की पूर्ति के कितने प्राकृतिक साधन उपलब्ध हैं हमारे देश में विशेषकर यदि पुरुष अविवाहित हो तो| अब ऋषियों व ब्रम्ह्चारियों का देश तो रहा नहीं| यहाँ तो साधू भी जेल में हैं ऋषि पराशर बनने के चक्कर में| हमारे यहाँ तो वेश्यावृत्ति भी अवैधानिक है|
एक तरफ प्रचार होता है कि कंडोम का प्रयोग करें और सुरक्षित सम्बन्ध बनाएं दूसरी तरफ कहो महात्मा हो जायें यह कैसे चलेगा| फिर आज वासनाओं को भड़काने के लिए मोबाइल पर तमाम वीडियोज, फोटोज, शेरो-शायरी-कहानियाँ व पोर्न साइटें हैं| यहाँ तक कि पारिवारिक चैनलों में भी आज वह सामग्री दिखाई जा रही है जो कुछ समय पूर्व तक सिर्फ एडल्ट फिल्मों में दिखाई जाती थी| मेरी समझ से इन सब पर भी रोक लगाने की आवश्यकता है| जहाँ तक बलात्कार से जुड़ी हत्याओं का प्रश्न है तो वह वास्तव में एक अपराध को छिपाने के लिए किया गया गौण अपराध है|
मेरे हिसाब से तो पहले विश्व के उन समाजों का अध्ययन करना चाहिए जहां न्यूनतम बलात्कार होते हों और तदनुरूप भारतीय समाज को शिक्षित करने का कार्य होना चाहिए|
टीवी चैनलों व फिल्मों में वह नहीं दिखाना चाहिए जो लोग देखना चाहते हैं वह दिखाना चाहिए जो समाज के लिए हितकर हो विल्कुल रोगी के लिए कटु औषधि की तरह| सेंसर के मानक कड़े होने चाहिए अन्यथा सभी प्रयास निष्फल हो जायेंगे| हमें इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण समाज की मानसिकता को शुद्ध करने पर ध्यान देना होगा| वास्तविकता यह है कि कहीं न कहीं हम सब बलात्कारी हैं कोई तन से तो कोई मन से| यदि हम विद्यालयों में यौन शिक्षा की वकालत करेंगे, बालक बालिकाओं की स्वच्छन्दता को आधुनिकता समझ लेंगे, पर स्त्री-पुरुषों का सामीप्य आज की जरूरत समझकर चलने देंगे तो बलात्कार होंगे| भले ही शारीरिक नहीं तो मानसिक| ऐसे वातावरण के निर्माण की आवश्यकता है जहाँ मानसिक रूप से भी लोग सच्चरित्र बनें, भृष्टाचार मुक्त बनें, शीलवान बनें| ये सभी चीजें साथ साथ हैं|
 



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