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रविवार, 23 अगस्त 2020
रविवार, 7 जून 2020
वन्देमातरम्
15/03/2020
शस्त्र पवित्रं वन्दे मातरम्|
अस्त्र पवित्रं वन्दे मातरम्|
दुष्ट हृदय विस्फारक यन्त्रं,
शब्द विचित्रं वन्दे मातरम्|
म्लेच्छ मनं भयदायक घोषम्|
दिव्यमतिं सुखदायक घोषम्|
संस्कार उन्नायक घोषम्|
मनुजभाव परिचायक घोषम्|
घोष प्रचण्डं वन्दे मातरम्|
शान्तमना भव मूढमते त्वं|
राष्ट्रमना भव द्रोहमते त्वं|
मोदमना भव क्षीणमते त्वं|
भक्तिमना भव पापमते त्वं|
भाव अतुल्यं वन्दे मातरम्|
भारतीय भू एकक शक्तिं|
राष्ट्र-भाल अभिषेकक शक्तिं|
विश्व-बन्धुता प्रेरक शक्तिं|
ज्ञान-बुद्धि उन्मेषक शक्तिं|
शक्ति अनिन्द्यं वन्दे मातरम्|
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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017
केन
केन हतः
श्याममृगः, केन हता सुनन्दा?
केन टू
जी धनं हृता, केन आरुषी हता|
अद्यावधि
अनिर्णीता पदमार्गे मनुजतां,
केन
छिन्नभिन्ना कृता कश्कदाच वदिष्यति?
धन्याः
अभियोजकाः, धन्याः विवेचकाः,
धन्या
न्याय व्यवस्था, धन्या वयं जनाः|
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सोमवार, 27 अप्रैल 2015
यौवनभारगर्विता बाले!
संस्कृत हिंदी सहित अनेक भारोपीय भाषाओँ की जननी है। अपने इसी लगाव के तहत कभी कभार इस भाषा में काव्य रचना का प्रयास कर लेता हूँ। सुधी विद्वतजनों से प्रोत्साहन की आकांक्षा रहेगी।
26/04/2015
ऐ! बाले! त्वंकथमट्टाले केशप्रशाधयितुं तल्लीना।
गृहम् विशालं तव हे सुमुखे! किं त्वं कुलं कुटुम्बम् हीना।
कस्मै अलक संजालं क्षेपस्यसिवीथी हिंस्र जन्तु आकीर्णा।
रूपाजीवा इव संलग्ना त्वं प्रतिभासि सुरुचि अकुलीना।।1।।
केन प्रशंसा वाञ्छसि भामिनि चंचल नयन प्रसारिणी दीना।
यौवन भार गर्विता बाले! पीनस्तनी गौरा कटि क्षीणा।
ऐ!मृगनयनी मृगयारता काम शर क्षेपण कला प्रवीना।
सुभग़े सुग्रीवेलोल लोचने पीन पयोधरे वसन विहीना।।2।।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'
मेरे कुछमित्र कह रहे थे कि उन्हें संस्कृत नहीं आती इसलिए वे इस कविता को समझ नहीं पाते अतः इसका अनुवाद कर दूँ| उनकी अभिलाषा व प्रेम को देखते हुए अनुवाद प्रस्तुत है|
ऐ! बालिके! चढ़ अट्टालिका किसलिए केश निज के संवारने में लीन है|
बड़ा घर तुम्हारा व सुन्दर मुखी है नहीं लगता कुल या कुटुम्ब से हीन है|
किसलिए केश-जालक गली में बिखेरा गली हिंस्र जीवों से आकीर्ण है|
जैसे कोई वेश्या प्रतीक्षारता है उसी भांति तेरी सुरूचि अकुलीन है|
चाहती है किसकी प्रशंसा को भामिनी चलाती है चंचल नयन हो दीन है|
यौवन के भार पे इतराती बालिके सुन्दर उरोज गौर कटि तेरी क्षीण है|
ऐ मृगनयनी! शिकार की ताक में काम वाण फेंकने की कला में प्रवीण है|
सुन्दर सुकंठी अमूल्य नैन वाली तू उभरे उरोज किन्तु वसन विहीन है|
26/04/2015
ऐ! बाले! त्वंकथमट्टाले केशप्रशाधयितुं तल्लीना।
गृहम् विशालं तव हे सुमुखे! किं त्वं कुलं कुटुम्बम् हीना।
कस्मै अलक संजालं क्षेपस्यसिवीथी हिंस्र जन्तु आकीर्णा।
रूपाजीवा इव संलग्ना त्वं प्रतिभासि सुरुचि अकुलीना।।1।।
केन प्रशंसा वाञ्छसि भामिनि चंचल नयन प्रसारिणी दीना।
यौवन भार गर्विता बाले! पीनस्तनी गौरा कटि क्षीणा।
ऐ!मृगनयनी मृगयारता काम शर क्षेपण कला प्रवीना।
सुभग़े सुग्रीवेलोल लोचने पीन पयोधरे वसन विहीना।।2।।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'
मेरे कुछमित्र कह रहे थे कि उन्हें संस्कृत नहीं आती इसलिए वे इस कविता को समझ नहीं पाते अतः इसका अनुवाद कर दूँ| उनकी अभिलाषा व प्रेम को देखते हुए अनुवाद प्रस्तुत है|
ऐ! बालिके! चढ़ अट्टालिका किसलिए केश निज के संवारने में लीन है|
बड़ा घर तुम्हारा व सुन्दर मुखी है नहीं लगता कुल या कुटुम्ब से हीन है|
किसलिए केश-जालक गली में बिखेरा गली हिंस्र जीवों से आकीर्ण है|
जैसे कोई वेश्या प्रतीक्षारता है उसी भांति तेरी सुरूचि अकुलीन है|
चाहती है किसकी प्रशंसा को भामिनी चलाती है चंचल नयन हो दीन है|
यौवन के भार पे इतराती बालिके सुन्दर उरोज गौर कटि तेरी क्षीण है|
ऐ मृगनयनी! शिकार की ताक में काम वाण फेंकने की कला में प्रवीण है|
सुन्दर सुकंठी अमूल्य नैन वाली तू उभरे उरोज किन्तु वसन विहीन है|
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