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मंगलवार, 13 जुलाई 2021

जीवन के अंग

यह दुबली पतली काया श्री जय जय राम निवासी ग्राम उरली वि0ख0 टोडरपुर हरदोई की है। मेरे जीवन से यदि इस व्यक्ति को हटा दें तो शायद मैं ही न रहूँ न रहेगा माँ भारती विद्या मन्दिर पूर्व माध्यमिक विद्यालय अयारी, हरदोई। 1998 में मुझसे और मेरे विद्यालय से जुड़कर हम दोनों का जो पथ प्रदर्शन किया है वह अनवरत जारी है। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों से विद्यालय में उपस्थित नहीं हो रहे हैं फिर भी हम दोनों की आत्मा के बन्धन बड़े मजबूत हैं।
लगभग 17 वर्ष विद्यालय में सेवा के मध्य ऐसे भी क्षण उपस्थित हुए जिनमें मनमुटाव भी हुआ लेकिन बिल्कुल वैसे ही जैसे पिता पुत्र के मध्य होता है। यद्यपि वह मेरे पिता नहीं हैं जाति के सन्दर्भ में भी मैं ब्राह्मण और यह चमार लेकिन मैंने सदैव इनकी उपस्थिति में एक अभिभावकीय संरक्षण अनुभूत किया है। कभी यह अनुभव नहीं हुआ यह अध्यापक हैं और मैं प्रबंधक सदैव यही लगा मेरे परिवार के हैं।  मुझे अच्छी तरह से याद है जुलाई 1998 में 118 छात्रों से विद्यालय शुरू हुआ और अगस्त 1999 में विद्यालय की छात्र संख्या केवल 85 रही। मैंने इनसे कहा कि बच्चों से कह दो कि कल दूसरे विद्यालय में प्रवेश ले लें मैं विद्यालय बंद कर रहा हूँ। तो इन्होंने जवाब दिया कि जब तक 5 बच्चे आते रहेंगे यह विद्यालय रहेगा और मैं इसका अध्यापक। मैंने कहा 5 बच्चों में आप और अन्य अध्यापकों का वेतन कैसे निकलेगा। तो जवाब मिला अन्य का मुझे पता नहीं मैं यहाँ पैसे के लिए नहीं आता। यह एक जवाब इतना महत्वपूर्ण है मेरे लिए कोरोना के समय जब विद्यालय बंद हुआ तो विद्यालय की छात्र संख्या 650 है और छप्पर की जगह पक्की बिल्डिंग है। 
हम दोनों एक दूसरे को समझते भी बहुत हैं एक दिन साहब किसी बात पर नाराज हुए रजिस्टर पर कलम पटका और कहा विमल भइया कल से मेरा इस्तीफा। मजे की बात उस समय मेरे विद्यालय में एकमात्र यही अध्यापक थे। गुरु जी चले गए तो एक बच्चे ने पूछा कि कल गुरु जी आएंगे नहीं पढ़ाई कैसे होगी। मेरा स्पष्ट जवाब था कि कल पढ़ाई होगी और यही गुरू जी आकर पढ़ायेंगे। बच्चों को मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन अगले दिन जैसे ही बच्चों ने गुरू जी की साइकिल विद्यालय की ओर आते देखी तो मारे खुशी के सब चिल्लाने लगे। मेरी आँखों में आँसू थे कि ईश्वर ने मेरे विश्वास की लाज रखी। 
एक बार और गुरू जी नाराज हुए तो जो इन्हें नहीं कहना था वह सब मेरे बारे में कह डाला और क्रोध आने पर मैंने भी इन्हें बहुत कुछ अनुचित कहा। लगभग एक वर्ष विद्यालय नहीं आये। कई महीने बाद एक दिन आमना सामना हुआ तो मैंने हालचाल पूछ लिया तो बताया बीमार रहते हैं। मैंने दवा के बारे में पूछा तो कहने लगे विमल भाई मैं बीमार इसलिए रहता हूँ कि मैं घर पर पड़ा रहता हूँ अगर पढ़ाने लगूँ तो ठीक हो जाऊँगा। मैंने कहा इतने विद्यालय हैं कहीं भी पढ़ाने लगो। तो जवाब मिला अगर पढ़ाएंगे तो मेरे ही विद्यालय में नहीं तो बीमार ही ठीक। मैंने भी कह दिया विद्यालय मेरा नहीं है आपका है और उसके बाद फिर विद्यालय में छह वर्ष पढ़ाया।
आज मुलाकात हुई तो हृदय प्रसन्न हो गया। ईश्वर इन्हें दीर्घायु करें और मेरे पर छत्रछाया बनाए रखें। अभी बहुत कुछ सीखना है।

सोमवार, 6 जून 2016

तुक्का



बात उन दिनों की है जब मैं अपने पिता जी की डॉक्टरी में उनका हाथ बँटाया करता था| उनके साथ मुझे भी कभी कभी मरीजों को देखने व उनका इलाज करने का मौका मिल जाया करता था| इन दिनों मैं इलाज करना सीख ही रहा था और बमुश्किल अभी रोगों व दवाओं का क ख ग आता था| मेरे पिता जी ने गाँव के कुछ घर-परिवारों को इंगित कर रखा था ककि इनमें दवा सोंच समझ कर देना है क्योंकि वे लोग दवा तो बढ़िया मांगेंगे किन्तु पैसों के नाम पर इनकी नानी मर जाएगी ज्यादा कहने पर दबंगई दिखायेंगे|
खैर एक दिन मुझे ऐसे ही एक घर में इलाज के लिए जाने का मौका मिला| यूं तो मेरे पिता जी ही जाते किन्तु वह उस दिन घर पर नहीं थे| अब किसके यहाँ गया? तो उसका नाम कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी रख लीजिये कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा| मैं अपनी सुविधा के लिए उसका नाम अमित रख लेता हूँ| तो हाँ अमित जी के यहाँ मुझे जाना पड़ा| अर्जेंट बुलाया गया था, अमित जी की तबियत बहुत ज्यादा खराब थी| न करने का सवाल नहीं था| जब मैं अमित जी के घर पर गया तो मैंने देखा अमित जी अपना पेट पकड़ कर दुहरे हुए जा रहे थे और बैलों की तरह हाय हाय चिल्ला रहे थे| अब उनकी हालत देख के मेरी अपनी तबियत खराब हुई जा रही थी| क्या रोग है? क्या दवा दूँ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था| अगर मैं कह दूँ कि मरीज मेरे बस का नहीं है?  यह बात कहना भी मैं उन दिनों सीख नहीं पाया था| मैंने मरीज की नब्ज देखी, जीभ देखी, पेट को छूकर और दबाकर देखा और जिस किसी भी रह से वहाँ मौजूद लोगों यह विश्वास हो कि मैं एक कुशल डॉक्टर हूँ वह सब किया| अंत में चार-पांच तरह की रंग-बिरंगी खड़िया वाली गोलियां निकालीं|(जी हाँ मेडिकल व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं जितनी दवाएं बाजार में काम की बिकतीं हैं उससे ज्यादा बे काम की बिकतीं हैं| नकली दवाओं का कारोबार तब भी टॉप पर था और अब भी है) और उनकी तीन पुड़ियाँ बनाईं और कहा मेरी जानकारी में इन्हें जो भी समस्या है उसके लिए मेरे पास इससे बेहतर कुछ नहीं है| पुड़ियाँ अमित जी की माँ को देते हुए मैंने कहा 10-10 मिनट के अन्तर से गुनगुने पानी से यह दवा लगातार खिला दीजिये अगर ठीक हो जाएँ तो ठीक वरना किसी दुसरे डॉक्टर को बुला लीजिये| खैर मेरे सामने ही मरीज के लिए पानी गर्म होने लगा था| पैसों के बारे में मुझे पता था कोई पूंछेगा नहीं कितने पैसे हुए और मैं मांगूंगा तब भी मिलेंगे नहीं टरका दिया जायेगा| अतः मैंने भी अपनी जुबान खराब करना ठीक नहीं समझा| वैसे भी मैंने दवा के नाम पर कौन सी संजीवनी बूटी दी थी या तो मैं जानता था या भगवान| पैसे मिलते न मिलते कोई फर्क नहीं पड़ता था| अतः मैं वहाँ से चला आया पैसों की कोई बात नहीं हुई|
अगली सुबह मैं अपने दुकान के बाहर खड़ा था| मैंने देखा अमित जी के हाथ में एक मोटा डंडा है जिससे लिए हुए वे मेरी दुकान की तरफ ही चले आ रहे हैं| मेरी तो जान ही सूख गयी| मैं समझ चुका था मुझे मेरी दवा का मूल्य पीठ पर डंडों के रूप में मिलेगा| लेकिन उस समय पिता जी मेरे साथ ही थे अतः ज्यादा भय नहीं था अन्यथा की स्थिति में मैं वहाँ से निकल लेता| खैर अमित जी आये और उन्होंने मेरे पिता जी के पैर छुए और कहा, “पंडित जी आप तो उस्ताद थे ही आपका लड़का उससे भी बड़ा ही उस्ताद है| इसकी दवा से मुझे तुरंत ही आराम हो गया|”
अमित जी ने मेरी ओर 100 रूपये का नोट बढ़ाया और कहा कि कल वाली 3 खुराकें मैं और दे दूँ तथा कल के और आज के ऐसे काट लूं|
अब अमित जी जब भी बीमार होते इलाज कराने के लिए मुझे ढूंढते और एक लम्बे समय तक (जब तक कि मैं अपने को ट्रेंड नहीं समझने लगा) मैं उनका इलाज करने से बचने की कोशिश करता रहा| क्योंकि तुक्का हर बार नहीं चलता|

हमारीवाणी

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