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रविवार, 8 अक्टूबर 2023

आयुष्मान कार्ड की प्रासंगिकता

हमें पाॅंच लाख वाली बीमारी हो जाये तो साहब हम मरना पसंद करते हैं इलाज कराना नहीं। हमारे लिए तो खाॅंसी जुकाम बुखार दस्त पेचिश का इलाज ही सस्ता मिल जाए बस इतना करिये। लेकिन आप तो सब्जबाग दिखाने में माहिर हैं, आपको पता है कि हल्की-फुल्की बीमारी में हम आयुष्मान योजना का लाभ लेने से रहे और पाॅंच लाख वाली बीमारी हो इससे पहले मर जायेंगे। आपके लिए सॉंप भी मरा और लाठी भी नहीं टूटी। एक तरफ पीठ भी थपथपा ली अपनी कि हम गरीबों का इलाज मुफ्त में करेंगे दूसरी तरफ इलाज भी न करना पड़ेगा।
शर्त यह भी आयुष्मान कार्ड उसका बनेगा जिसके राशनकार्ड पर ६ यूनिट हों। अब 6 यूनिट बनाने की न तो क्षमता रही और न मानसिकता।
मुझे याद है कि 1990-2000 के दशक में कोई भी सरकारी अस्पताल चला जाता और डॉक्टर उसे ठीक से देखभाल कर दवा दे देता था बस एक रूपए के पर्चे पर। आज क्या हो गया? कि आयुष्मान कार्ड की जरूरत पड़ गई। इस ढोंग की क्या आवश्यकता है? जितना स्टाफ और कर्मचारी व अन्य खर्च आयुष्मान कार्ड के निर्माण पर है उतने के खर्च में तो गरीब आदमी के छोटे मोटे इलाज करा दीजिए साहब। लेकिन इससे आपको प्रचार नहीं मिलेगा न। आप तो ठहरे प्रचार प्रिय प्राणी।
कुछ न करें इतना करें। 2018 से पूर्व की व्यवस्था ही दवा व्यापार में लागू कर दें। 2018 से पूर्व जब आप दवा लेने मेडिकल स्टोर पर जाते थे तो आपको पता था कि यह ओरिजनल कम्पनी की दवा है और इसकी कीमत में बहुत ज्यादा ऊॅंचनीच नहीं होगी। 200 रुपए की दवा का मतलब 200 रुपए। लोकल या नकली दवा उसका कोई रेट नहीं है उसे पता था। आज ओरिजनल कम्पनी की दवा भी 200 रुपए रेट प्रिंट है कहो एक मेडिकल स्टोर पर 150 रुपए की मिले तो दूसरे मेडिकल स्टोर पर केवल 50 रुपए की। कोई नियंत्रण आपका है कि नहीं? या लूट की खुली छूट है? मुझे लगता है 2019 के इलेक्शन का खर्च दवा मार्केट से ही वसूला जा रहा है। रही सही कसर आयुष्मान कार्ड के बहाने पूरी करने प्रयास किया जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सभी अमीर गरीब को समान रूप से उचित खर्च पर उपलब्ध हों ऐसे प्रयास होने चाहिए किन्तु वर्तमान में दोनों की हालत बद से बद्तर हो रही है और आप शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर रहे हैं।

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

इण्डिया बनाम भारत

हमारे गाॅंव-देहात में एक कहावत है कि "गुह मा ईंटइ डरिहौ तो छिट्टइ पैहौ"। जब से विपक्षी दलों ने इकट्ठे होकर अपने गठबंधन का नाम "इण्डिया" रख लिया तब से भाजपा को देश का नाम बदलकर भारत रखने की खुजली शुरू हो गई। यह वही भाजपा है जिसने अपने कार्यकाल में अपने अनेक कार्यक्रम इण्डिया के नाम पर शुरू किये हैं। उदाहरण के लिए, "मेक इन इंडिया, खेलों इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, फिट इण्डिया आदि।" यह वही भाजपा है जिसने मुलायम सिंह यादव के द्वारा सन 2004 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में लाये गये इण्डिया के स्थान पर देश का नाम भारत करने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए सदन से बहिर्गमन किया था। यह इस देश की राजनीति की बड़ी सुन्दर विशेषता है कि पक्ष से विपक्षी और विपक्ष से पक्ष में जाने पर नेताओं के चश्मे का नम्बर बदल जाता है।
विपक्ष भी यह भूल गया कि एक समय कहा गया था, "इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा"। कहना अलग बात थी और होना अलग। इन्दिरा चुनाव हार गईं और चापलूसों का दिया नारा फ्लॉप हो गया।" कुछ ऐसा ही पुनः होने जा रहा है। अन्तर मात्र इतना है कि आज एक समूह अपने को इण्डिया घोषित कर रहा है। 
कोई भी व्यक्ति या समूह अपना नाम इण्डिया रख ले तो उसका उद्धार तो होने से रहा। हॉं अपने कर्म बदल लें तो बात दूसरी है। जिसकी हाल साल में कोई सम्भावना नजर नहीं आती।
मैंने एक सोसायटी का रजिस्ट्रेशन 1998 में कराया था। आज भी कार्यरत है। नाम है, "भारतीय चेतना समिति" आजकल भारतीय, राष्ट्रीय आदि नामों से संस्थाओं के पंजीकरण नहीं होते। मैं सोचता हूॅं अगर मैंने समिति का नाम कुछ और रखा होता तो क्या अन्तर आता। शायद कुछ भी नहीं। 
अब चाहे विपक्ष अपना नाम इण्डिया रख ले या पक्ष इण्डिया के स्थान पर भारत शब्द का प्रयोग करे। आम आदमी पर इसका क्या प्रभाव होगा? संविधान में भले ही लिखा है, "इण्डिया दैट इज भारत" और राजनीतिक लिखा पढ़ी में देश विदेश में भले ही इण्डिया शब्द का प्रयोग किया जाता है, आम भारतीय जनमानस इस देश को भारत के नाम से ही जानता है। जब जब कोई सनातनधर्मी संकल्प के मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह यही करता है,
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2080, तमेऽब्दे नल नाम संवत्सरे दक्षिणायने ……. ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे ……. मासे …… पक्षे …….. तिथौ ……. वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री ……….. (जिस देवी.देवता की पूजा कर रहे हैं उनका नाम ले)पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये।
इस मन्त्र में कहीं इण्डिया शब्द का प्रयोग नहीं है। इस मन्त्र में स्पष्टतः भारतवर्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।
पक्ष और विपक्ष जनहित के मुद्दों की उपेक्षा कर कृपया इस पर राजनीति न करें। इण्डिया को इण्डिया और भारत को भारत रहने दें। विपक्ष को चाहिए कि जनभावनाओं को समझकर ही किसी मुद्दे को हवा दे। आखिर विपक्ष को इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए कि इण्डिया के स्थान पर शब्द का प्रयोग किया जाये। जब हम राष्ट्रगान का वाचन करते हैं तब भारत भाग्यविधाता शब्द का प्रयोग करते हैं न कि  इण्डिया भाग्यविधाता। विपक्ष को समझना चाहिए कि इण्डिया भारत  -भारत इण्डिया करके वह भाजपा को ही लाभ पहुंचायेगा। हाॅं यदि वह शान्त रहे तो शायद इण्डिया भारत -भारत इण्डिया के मुद्दे पर आम आदमी ध्यान ही न दे।
भाजपा को भी चाहिए यदि वह वाकई गम्भीर है तो संविधान में संशोधन कर "इण्डिया दैट इज भारत" शब्द समूह को हटाये और व्यर्थ का वितण्डा बन्द करे।

शुक्रवार, 3 जून 2022

खुद से शादी

स्वयं से प्रेम तो बहुत से मनुष्य करते हैं, मैं भी करता हूँ। किन्तु विवाह तो किसी अन्य से ही किया है। विवाह का उद्देश्य प्रेम होता है पहली बार पता चला। हमारी सनातन परंपरा में तो दो अनजाने लोग विवाह करते रहे हैं बच्चे पैदा करते रहे हैं परिवार का विस्तार करते रहे हैं। उनमें कभी प्रेम हुआ तो ठीक नहीं हुआ तो ठीक। मेरे अपने विवाह को 26 वर्ष हो गए। मैं अपनी पत्नी से प्रेम करता हूँ निश्चय करके नहीं कह सकता। पत्नी को छोड़िये मेरे जानने वालों को कोई यह बता दे कि विमल कुमार शुक्ल को किसी से प्रेम भी है तो विश्वास नहीं करेंगे। 
विवाह का कारण प्रेम है तो यह भी आवश्यक नहीं। हमारे समाज में तमाम लोग हैं परस्पर प्रेम करके जीवन बिता देंगे पर विवाह नहीं करेंगे। विवाह किसी और से प्रेम किसी और से यह भी चलता है। 
फिल्म वालों ने लैला मजनूँ और शीरी फरहाद से टपोरियों को दिमाग में इस तरह भर दिया है कि अब प्रेम पहले फिर शादी और कभी कभी शादी से पहले ही ब्रेकअप। 
मैं कुछ लोगों को जानता हूँ जो विवाह करके अपना घर तो बसा  नहीं पाये हाँ प्रेम के चक्कर में दूसरे का तोड़ जरूर दिया। ऐसे लोग भी समाज में हैं विवाह नहीं करेंगे लेकिन हर फूल का आस्वाद ग्रहण करने के चक्कर में रहेंगे। एक उम्र पर जब स्थायित्व चाहेंगे तो फूलों के द्वारा स्वतः फेंक दिए जायेंगे। 
खैर आप विवाह करें न करें। आपकी इच्छा। संविधान अनुमति देता है। किन्तु बायोलॉजी का क्या? बायोलॉजी सभी सजीवों में (पेड़ पौधों सहित) अपनी सृष्टि विस्तार के लिए लैंगिक व अलैंगिक दो प्रकार के साधनों को इंगित करती है। लैंगिक व अलैंगिक जनन करनेवाले प्राणियों की पृथक पृथक विशेषताएं होती हैं। स्पष्टतः मनुष्य लैंगिक प्राणी है। जैसे ही बालक बालिकाएं किशोरावस्था में पहुँचते हैं विपरीत लिंगियों में आकर्षण बढ़ जाता है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। हाँ हमारी सामाजिक परम्पराओं व मान्यताओं के कारण हम लड़के लड़कियों के स्वतंत्र मेलजोल को अनैतिक मानते रहे हैं। 
इस अनैतिकता को नैतिकता का स्वरूप प्रदान करने के लिए ही विवाह को स्वीकारा गया है। दूसरे आयुर्वेद के जानने वाले जानते है कि शरीर के चौदह वेग भूख, प्यास, खाँसी, श्वास, जम्भाई आदि में एक वेग यौनेच्छा का भी है। इन सारे वेगों को रोकने से शरीर विकारग्रस्त हो जाता है। विवाह मनुष्य की यौन इच्छाओं की तृप्ति का साधन भी है। भौतिकी में भी न तो धनावेश-धनावेश आकर्षित होते हैं और न ऋणावेश-ऋणावेश। ये सदैव प्रतिकर्षित ही करते हैं। कार्यफलन के लिए धनावेश व ऋणावेश का संगम आवश्यक है। इसी प्रकार चुम्बक में ध्रुवों का व्यवहार भी होता है। उत्तर-उत्तर व दक्षिण-दक्षिण ध्रुव कभी नहीं मिलते। एकल ध्रुवीय चुम्बक का तो अस्तित्व ही नहीं होता। 
ठीक इसी प्रकार आप सनकी या महामानव हो सकते हैं किन्तु परिवार नहीं हो सकते। परिवार के लिए धनावेश-ऋणावेश, उत्तर ध्रुव-दक्षिण ध्रुव जैसे ही स्त्री-पुरूष तथा प्रेम और घृणा दोनों की ही आवश्यकता होती है। 
यह सम्भव है कि आपको अपने मनोनुकूल साथी मिलने में समय लगे इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें किन्तु मिलेगा अवश्य। न मिले फिर दूसरे को अपने मनोनुकूल बना लें। सबसे सरल है स्वयं दूसरे के मनोनुकूल बन जाएं। प्रेमी का यह भी एक स्वरूप होता है और सर्वोत्तम स्वरूप है कि हम वह बनें जो हमारा प्रेमी/प्रेमिका चाहता है/चाहती है। मार्ग अनन्त हैं हठ छोड़ कर देखें।
संक्षेपतः विवाह एक आवश्यक व नैतिक शर्त है, आप करें न करें आपकी मर्जी, किन्तु उपयुक्त अवस्था प्राप्त कर, पूर्ण स्वस्थ होकर भी विवाह नहीं करते तो आप मनोविकारी हैं हाँ सन्यासी हो जाएं अलग बात है। तो मेरा सुझाव है यदि आपकी उम्र हो गई है नैसर्गिकता का आनन्द लें विवाह करें और वैवाहिक धर्म का पालन करें। जिस प्रकार मार्ग सदैव समतल नहीं होता उसी प्रकार जीवन भी समतल नहीं होता। पर्वतारोहण से घबरायें नहीं।

शनिवार, 6 जनवरी 2018

भय और बच्चे



आज जिन बच्चों को शिक्षित करने का प्रयास कर रहा हूँ कभी उनके माता-पिता को शिक्षा प्रदान की है। यूँ तो एक दीर्घ समयावधि व्यतीत हो गयी किन्तु लगता है, जैसे कल की ही बात है। मुझे स्मरण है कि जब मैं कक्षा 12 उत्तीर्ण कर चुका था और बी0 ए0 की कक्षा में प्रवेश ले चुका था तब प्रायः मेरे मित्र, पड़ोसी व परिजन मुझसे यह अपेक्षा करते थे कि मैं दो चार बच्चों को घेर घार करके कम से कम ट्यूशन ही पढ़ाया करूँ।  मैं उन्हें टका सा जवाब दिया करता था कि बच्चों की नाक पोंछना अपनी फितरत में नहीं है। ऐसा नहीं है कि मुझे बच्चों से द्रोह था। मुझे बच्चे सदैव प्रिय रहे हैं उनकी सादगी, भोलापन, निष्कपटता और निर्दोषिता का मैं कायल रहा हूँ। मेरे हृदय में अपने भाई बहनों व दूसरे बच्चों में कभी ज्यादा विभेद नहीं प्रतीत हुआ। फिर भी जब जब बच्चों को पढ़ाने की बात चलती थी तब तब मेरे मन में बच्चों को लेकर कम पढ़ाने को लेकर ज्यादा अरुचि होती थी। एक बात और थी कि ट्यूशन पढ़ाने मुझे लोगों के घर पर जाना पड़ता यह भी मुझे अस्वीकार्य था। भला जब अभिभावक खोपड़ी पर खड़ा रहे तो बच्चे को कैसे पढ़ाया जा सकता है। सिर्फ ड्यूटी निभानी हो तो बात अलग है। अंग्रेजी कहावत 'लीव द रॉड स्पॉइल द चाइल्ड' का मैं समर्थक रहा हूँ। अपनी युवावस्था में भी और प्रौढ़ावस्था में भी। इस सन्दर्भ में प्रायः मुझे बाबा तुलसीदास जी भी याद आ जाते हैं और पुकारकर कहते हैं,
"विनय न मानति जलधि जड़ गये तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होई न प्रीति।।"
आज का जैसा समाज है उसमें मेरी यह धारणा अब असंगत मानी जाती है। सैद्धान्तिक रूप  से मैं भी इसे असंगत ही मानता हूँ किन्तु जब व्यवहारिकताकी बात आती है तब बहुत बार बच्चों पर प्रेम का अस्त्र नाकाम होते पाया और भय का असर कारगर।
केवल बच्चों की बात छोडिये बड़े बड़े भय अथवा प्रेमके वशीभूत आचरण करते हैं। जिस प्रकार हम कहते हैं कि संसार में भगवान है तो शैतान भी, उसी प्रकार सज्जन हैं तो दुर्जन भी। जो सज्जन होते हैं वे प्रेम व भय दोनों से वश में हो जाते हैं, किन्तु जो दुर्जन हैं उन्हें तो चाबुक से ही वश में कर सकते हैं अगर कलाई में ताकत और दिल में हौसला हो।





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रविवार, 22 नवंबर 2015

दिल की धड़कन और हौसला




बच्चा बोलता है कि हमारे सर जी हमसे स्पीच इसलिये दिलवाते हैं कि हम लोगों का हौसला बढ़े। मेरी समझ में नहीं आता कि हौसला कैसे बढ़ता है। मैं जब स्पीच देने खड़ा होता हूँ तो मेरे सीने में यहाँ पर (उसने उंगली रखकर बताया) दर्द होता है और मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती है। ताऊ जी क्या हौसला बढ़ना इसी को कहते हैं। एक हँसी सी छूटी बच्चे की इस बात पर। एकबारगी तो लगा कि बड़ा बेतुका प्रश्न है? दिल की धड़कन का बढ़ जाना सच में हौसले का बढ़ना नहीं है। बच्चे ने फ़िर पूँछा कि क्या ताऊ जी इसी को हौसले का बढ़ना कहते हैं। लेखक बच्चे को क्या समझाता? बोला बड़ा अच्छा जोक सुनाया तुमने "तुम्हारे सर जी सोचते हैं तुम्हारा हौसला बढ़ा और तुम्हें लगा तुम्हारे दिल की धड़कन।
ऐसा प्रायः होता है रोजमर्रा की जिन्दगी में कुछ प्रश्न उछलते हैं। आखिर दिल की धड़कन बढ़ने का हौसले के बढ़ने से क्या सम्बन्ध है? लेखक को लगता है कि दिल की धड़कन का बढ़ जाना सीढ़ी का पहला डंडा है और हौसले का बढ़ना आखिरी। किसी भी कार्य को प्रथम बार करते समय ऐसा प्रतीत होता है कि कोई हमें ऑब्जर्व कर रहा है और प्रतिक्रिया कर सकता है तो वाकई हमारे दिल की धड़कन तेज हो जाती है। बहुत बार प्रतिक्रियायें ऐसी होती हैं जो केवल अपने दिल की धड़कन को ही नहीं बढ़ातीं बल्कि समाज की धड़कनों को भी बढ़ा देती हैं और हम कार्य करना बन्द कर देते हैं। किन्तु बहुत बार हमें ऐसी उत्साहवर्धक प्रतिक्रियायें प्राप्त होती हैं कि हमें लगता है कि अरे हम भी कुछ कर सकते हैं तो दिल फूलकर गुब्बारा हो जाता है और धड़कना भूल जाता है। यदि प्रतिक्रियायें बिल्कुल सामान्य हों तो भी दिल की धड़कन लगातार कब तक बढ़ सकती है। दिल भी समझ लेता है बेटा ये स्पीच तो रोज का काम है और प्रतिक्रियायें भी। तब दिल की धड़कनों को अपनी औकात पता चल जाती है और हौसला जन्म ले लेता है। स्पीच देने का हौसला कुछ काम करने का हौसला कि हमारे पास भी कुछ करने या कहने का मशाला है।
दिल संभाले संभलता नहीं



व्यवहार गणित सम्बन्धी किसी भी जिज्ञासा के समाधान के लिये लेखक को ईमेल करें। यथा सम्भव समाधान किया जायेगा।
vimalshukla14@yahoo.in





गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

क्या विद्यालयों में बच्चों की पिटाई होनी चाहिये?


प्रायः यह बिन्दु विवाद का विषय रहता है। इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिये जाते हैं। एक अध्यापक होने के नाते इस संदर्भ में अपने अनुभव के आधार पर कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ। आशा है मेरे विचार उपयोगी होंगे। बालक जो प्रथम अवसर पर विद्यालय में प्रवेश करता है एकदम से नवीन वातावरण में पहुँचता है। अपने जन्म के बाद बालक  प्रथम बार  अपने आसपास ऐसे लोगों को पाता है जो उसके लिये पूर्णतः अपरिचित होते हैं। ऐसी परिस्थिति में इस वातावरण के प्रति एकदम से तादात्म्य बिठा पाना उसके लिये न तो संभव होता है और न वाँछनीय।
मेरा अनुमान है पहले दिन अधिकाँश बालक यही सोंचते होंगे कि कहाँ आकर फँस गये इस कैदखाने में? यहाँ से बाहर निकल पायेंगे कि नहीं? हर अगले पल पर क्या घटना दुर्घटना होने वाली है? अध्यापक व बच्चे उससे कैसा व्यवहार करेंगे? आदि प्रश्न उसके मस्तिष्क में होते हैं। फिर छुट्टी होती है, बालक अत्यधिक प्रसन्न होता और अपने घर भागता है। वह सोंचता है "जान  बची तो लाखों पाये लौट के बुद्धू घर को आये।"
अगले दिन बालक अपने आपको पुनः उसी वातावरण में पाता है तो उसे लगता है कि अरे! कल तो किसी तरह तो बच गये आज नहीं बचेंगे? बच्चा फिर छुट्टी के बाद घर पहुँचता है और अनुभव करता है कि विद्यालय उतना भयकारी नहीं है जितना वह समझता है। फिर धीरे-धीरे बालक को यह समझ आ जाता है कि विद्यालय भी उसके जीवन का अनिवार्य अंग है। यहाँ का कोई क्षण उबाऊ और भयकारी है तो कोई क्षण मनोरंजक, ज्ञानवर्धक, रुचिकर और हितकर भी है।
बालक को विद्यालय में कापी-किताबें पकड़ाकर पढ़ने-लिखने का कार्य बता दिया जाता है वह भी बालक को पर्वतारोहण सा प्रतीत होता है। वह शिकायत करता है कि उसे लिखना नहीं आता। पढ़ना नहीं आता। प्रत्येक अध्यापक को बालकों की उपरोक्त कठिनाइयों को समझते हुए उन्हें प्रेम से बिना किसी शारीरिक व मानसिक दण्ड के समझा-बुझाकर खेल खेल में शिक्षण, प्रायोगिक शिक्षण और मनोरंजक किस्से कहानी कविताओं व आधुनिकतम उपलब्ध सह-शिक्षण सामग्री व अधिगम का प्रयोग करते हुए छात्र छात्राओं की इन कठिनाइयों का निराकरण करना चाहिये।
बालक कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं जिन्हें जैसे आकार प्रकार में चाहो ढाल दो वे वैसे ही ढल जाते हैं। विद्यालय में कदाचित शारीरिक दण्ड का कोई आवश्यकता व स्थान नहीं होना चाहिये किन्तु बालक जब प्रथम बार विद्यालय पहुँचता है तो वह कोरी स्लेट की तरह होता है ऐसा माना जाता है, किन्तु मैं मानता हूँ वह कोरी स्लेट नहीं होता। अधिकाँशतः उस स्लेट पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है, जिसे मिटाना आवश्यक होता है और बालक इस प्रक्रिया का पुरजोर विरोध करता है। इसके अतिरिक्त जो बालक विद्यालय पहुँचते हैं वे सदैव कोमल मिट्टी की तरह नहीं होते, उनमें कुछ कड़ापन होता है व उनमें कंकड़ पत्थर खर पतवार मिले होते हैं। अस्तु मनवाँछित सुन्दर व सुरुचिपूर्ण आकार देने के लिये उस मिट्टी का निस्तारण व संस्कार करना पड़ता है।
कबीरदास ने यूँ ही नहीं कहा "गुरु कुम्हार घट शिष्य है, गढ़ गढ़ काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै बाहर दै दै चोट॥" अंग्रेजी में भी एक कहावत है "लीव द रॉड, स्पॉइल द चाइल्ड।" हो सकता है कबीरदास गलत हों। हो सकता है बदलते समय व शिक्षण विधियों के अनुरूप उपरोक्त अंग्रेजी कहावत गलत हो। किन्तु उस बालक के बारे में क्या कहा जाये जिसे मैंने नर्सरी कक्षा में प्रवेश दिया। तीन महीनों तक मैंने उस कक्षा में उपस्थिति देखी। उस बालक ने कभी ‘जयहिन्द’, ‘यस सर’, ‘जी सर’ कुछ भी नहीं बोला। मैंने उसे प्रतिदिन समझाया व लालच दिया कि वह अपना नाम पुकारे जाने पर आवाज दिया करे। सब बेकार गया। मैंने सोचा कि शायद बालक बोल पाने में असमर्थ है अतः उपस्थिति के समय आवाज नहीं दे रहा या फिर मुझसे डरता है। मैंने दूसरे अध्यापक को उपस्थिति लेने के लिये भेजा किन्तु परिणाम शून्य रहा। तब मैंने प्रयास करना बन्द कर दिया यह सोचकर कि एक दिन तो आवाज लगायेगा। 
एक दिन मैंने ध्यान दिया कि वह  बालक अपने साथियों से तो फटाफट बातें कर रहा है। अगले दिन कक्षा में उपस्थिति पंजिका लेकर गया। उपस्थिति के लिये नाम पुकारने शुरू किये। उस बालक का नाम बोला। उस बालक ने उत्तर नहीं दिया। मैंने उसको कक्षा में खड़ा किया और एक जोरदार थप्पड़ लगाया और उसे भयभीत करने के लिये कहा ‘यस सर’ बोलो नहीं तो और पिटाई होगी। मेरे दो तीन बार अधिक पिटाई का भय दिखाने पर उसने ‘यस सर’ बोलना शुरू कर दिया। तब से विद्यालय में वह बालक जब तक रहा। मुझे उस बालक से कोई समस्या नहीं रही। लगभग १४ वर्षों के मेरे शिक्षणकाल में कम से कम ५ बार ऐसा अवसर आया है जब मुझे न चाहते हुए भी अंततः इसी हथियार से काम लेना पड़ा।
पिटाई का उपाय सदैव सफल हो यह भी कोई जरूरी नहीं है कभी कभी बहुत ही दुष्ट बालक बालिकाओं से भी सामना होता है। १००० में २ बालक ऐसे होते हैं जहाँ तक मैं समझता हूँ आपराधिक होने कि हदतक वे हर हथियार को भोथरा सिद्ध कर देते हैं। दूसरे उदाहरण में एक बालक (सुनील) (काल्पनिक नाम) ने मुझसे शिकायत की कि उसकी घड़ी खो गई है। मैंने प्रार्थना के समय दूसरे बालकों से जानकारी की। एक बालक रमेश ने मुझे बताया कि मकबूल (काल्पनिक नाम) ने एक घड़ी सड़क पर पड़ी हुई पाई है। मैंने मकबूल को बुलाया और जो घड़ी उसने पाई थी उसे साथ लाने के लिये कहा। मकबूल एक घड़ी लाया और कहा गुरू जी मैंने यह घड़ी सड़क पर पाई थी।  मैंने वह घड़ी सुनील को दिखाई तो सुनील ने कहा वह घड़ी उसकी नहीं है। मैंने सुनील को सांत्वना दी कि खोना पाना तो चला करता है वह अब दूसरी घड़ी खरीद ले और डाँटा भी कि अपनी चीज की सुरक्षा करना सीखे।
मैं पढ़ाने में लग गया किन्तु मेरा ध्यान घड़ी पर ही लगा रहा। पता नहीं किस विचार से प्रेरित होकर मैंने मकबूल को पुनः बुलाकर वह घड़ी उससे माँगी तथा रमेश को दिखाई जिसने मुझे घड़ी मिलने कि जानकारी दी थी तो रमेश ने बताया कि मकबूल यह दूसरी घड़ी उठा लाया है जो घड़ी उसने पाई थी वह दूसरी है। अब मुझे बहुत क्रोध आया मैंने मकबूल से सही घड़ी लेकर आने के लिये कहा। मकबूल इस बात पर अड़ गया कि उसके पास कोई दूसरी घड़ी नहीं है उसने तो यही घड़ी पाई है।
मैंने उस बालक की बहुत पिटाई की किन्तु उसके मुँह से सच बात नहीं निकलवा पाया। मैंने उसे कितना पीटा शब्दों में नहीं बता सकता तब मैं अनुभवहीन और नया अध्यापक था फिर भी उसे इतना पीटा कि उसे पीटते हुए डर रहा था और उस दिन के बाद किसी दूसरे छात्र को इतना नहीं पीटा। वह लड़का यही कहता रहा कि चाहे उसे ४ फिट गहरे जमीन में गाड़ दो तब भी वह घड़ी नहीं दे पायेगा क्योंकि उसके पास कोई और घड़ी है ही नहीं। उसने तमाम तरह की कसमें खाईं। तब मुझे कुछ कुछ लगने लगा कि शायद यह लड़का सही कह रहा है और उसके पास घड़ी नहीं है। किन्तु तभी मेरे छोटा भाई जो उस समय वहीं उपस्थित था उसने मुझसे कान में कुछ कहा और तब मैंने उस लड़के से यह कहा कि अब पुलिस बुलाई जायेगी वह उसे थाने ले जायेगी। उसे उल्टा लटकायेगी उसके नीचे आग सुलगायेगी। उस पर पानी डाला जायेगा, उसकी पिटाई होगी। लगभग १० मिनट तक मैंने उसे इसी प्रकार जो भी थर्ड डिग्री का भय हो सकता था दिखाया। साथ में दूसरों बच्चों ने भी मेरा साथ निभाया तब कहीं जाकर उस बच्चे ने मुझे सही घड़ी सौंपी। मैं वह घड़ी सही लड़के को सौंप सका। मुझे आज भी लगता है कि मैंने जो किया वह शायद गलत था मैं अध्यापक हूँ पुलिस या अदालत नहीं।
जो भी हो इस घटना से मैंने एक सबक सीखा कि भले ही तुलसीदास ने सही कहा है ‘भय बिनु होय न प्रीत’ किन्तु भय दिखाना सदैव सही तरीका नहीं है। दूसरे उपाय भी हो सकते हैं। एक दिन मेरी अनुपस्थिति में मेरे एक सहायक अध्यापक ने दूसरा ही तरीका अपनाया। उन्होंने चोरी की घटना को खोलने के लिये एक माली को बुलवाया जिसने कक्षा में जाकर कहा कि उसके पास जो चावल हैं वह प्रत्येक बालक को खिलाये जायेंगे जिस बच्चे ने चोरी की होगी उसे खून की टट्टियाँ लग जायेंगी और वह मर जायेगा। बच्चे भयभीत हो गये और एक बच्चे ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। मैंने सहायक अध्यापक को भविष्य में पुनः ऐसा न करने की राय दी, क्योंकि अध्यापक का यह कार्य बच्चों में अन्धविश्वास को बढ़ाने वाला है और विद्यालय का कार्य बालक को अन्धविश्वास से दूर करना होता है।
अध्यापक क्या करे? यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। विद्यालय में अध्ययन अध्यापन के प्रश्न पर मारपीट की नौबत शायद ही आती है। अध्यापक चाहता है कि बालक सदगुणी बने सामान्यतः अभिभावक भी यही चाहता है। किन्तु कभी कभी प्रतीत होता है कि कुछ माँ बाप अपने बालक के सुधार में बाधक होते हैं। यदि समाज ही सदगुणी न हो तो विद्यालय क्या करे।
एक दिन मध्याह्न काल में एक छात्रा ने रो-रोकर बताया कि उसका १०० रूपये का एक नोट किसी ने उसके बस्ते से चुरा लिया। मध्याह्न काल की समाप्ति पर मैंने पता किया। एक बालक ने बताया कि अनु (काल्पनिक नाम) रूपये निकाल सकता है उसे बस्ते के पास देखा गया है। अनु तब तक विद्यालय नहीं पहुँचा था उसकी प्रतीक्षा की। जब वह आया उसके हाथ में एक नयी कापी, बिस्कुट का पैक, जेब में कुछ टॉफियाँ और ४ रुपये निकले। उसने बताया वह अपनी माँ से १० रुपये लेकर आया था। वह यहीं पर धोखा खा गया। जो सामान खरीदा गया उसकी कीमत १० रुपये से ज्यादा थी। उसने बताया कि शेष पैसे दुकानदार के उधार रहे। मैंने दुकानदार से जानकारी की। दुकानदार ने बताया कि वह २० रुपये लेकर दुकान पर गया था और कोई उधार उसने नहीं दिया। बस गड़बड़ शुरू हो गयी। जब बालक कसमें खाने लगा और कहने लगा कि उसकी माँ से पुछवा लो कि वस सही कह रहा है। तो मेरा एक अध्यापक पूछने गया। उसकी माँ ने कुछ नहीं बताया पहले मामला बताने पर जोर दिया। जब अध्यापक ने यह कहा कि किसी बच्चे के १०० रुपये गायब हो गये हैं। तो माँ का कहना था कि १००-२०० रुपये तो उसकी जेब में सदैव बने ही रहते हैं। मुझे क्रोध आ गया  बाप फीस के ८० रुपये चार महीने से नही जमा करवा पाया था और बेटा लखपति हो गया था कि १००-२०० रुपए उसकी जेब में हर समय बने रहते हैं। दर असल उसकी माँ अपने बच्चे का बचाव करके अपने बच्चे को चोर बना रही थी। उसने सोचा होगा कि शायद रुपये उसके बच्चे के पास मिल गये हैं गुरू जी रुपये बच्चे से छीन लेना चाहते हैं जबकि मेरी समस्या यह थी कि रुपये मुझे मिले नहीं थे जबकि यह पक्का हो गया था कि रुपये उसी ने चुराये थे।
अन्ततः मैंने मकबूल की पिटाई वाली घटना को ध्यान में रखते हुए उसका मानसिक रूप से प्रताड़न करना शुरू किया। उसको कमरे में बन्द किया रस्सी और कंडे मँगवाये। भय दिखाया कि उसे कमरे कि छत से लटकाकर नीचे से आग सुलगाऊँगा और उसकी तब तक पिटाई करूँगा जब तक वह बता नहीं देता कि रुपये कहाँ हैं। इस बीच वह लड़का लगातर यही कहता रहा कि उसे उसकी माँ के पास ले चलो वह पुँछवा देगा कि रुपये घर से ही लाया था। मैं समझ गया चोर चोर मौसेरे भाई ही नहीं माँ बेटे भी होते हैं। लगभग आधा घंटे तक मैंने उस बच्चे की कोई पिटाई तो नहीं की किन्तु भयभीत पर्याप्त किया तब कहीं जाकर उसने मुझे जुते हुए एक खेत में ले जाकर खड़ा किया और कहा कि रुपये वह इसी खेत में रखकर भूल गया है। मैं समझ रहा था कि वह भागने की कोशिश में है। फिर मैंने सोचा कि पैसे छिपाते हुए उसने कोई पहचान तो बनाई होगी। इस आधार पर मैने अपने आप रुपये जहाँ उसने रखे थे निकाल लिये।
२५ ₨ उसने खर्च कर लिये थे मुझे केवल ७५ ₨ प्राप्त हुए। जितने रुपये नहीं थे उससे ज्यादा का श्रम मैंने किया सिर्फ़ इस लिये नहीं कि रुपये मिल जायें बल्कि इसलिये कि विद्यालय के बच्चों में कोई गलत आदत न पड़ जाये। किन्तु मेरे चाहने से क्या होता है जब अभिभावक ही बच्चों को बिगाड़ने पर तुले हुए हों। उस दिन मैंने यह सीखा कि बच्चे की पिटाई से बचा भी जा सकता है अगर धैर्य हो तो। मैं दावा तो नहीं करता कि मैंने जो किया वह ठीक किया किन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि विद्यालय में प्रवेश करने वाले  बालक भिन्न भिन्न परिवेश, प्रकृति, आचरण व मानसिकता के होते हैं। बालक से किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिये इस विषय में अध्यापक को  छूट अवश्य मिलनी चाहिये। कहीं कहीं बालक के लिये शारीरिक दण्ड अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। दण्ड के भय के बिना कभी कभी बालकों को अनुशासित रखना असंभव सा हो जाता है।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में जो महत्व  विनम्रता का है कठोरता का महत्व उससे  कहीं कम नहीं है।  विद्यालय में अध्यापक को अभिभावक, मित्र, समन्वयक, सलाहकार, शिक्षक, प्रशासक, निर्णायक और संरक्षक आदि अनेक प्रकार के दायित्वों का निर्वहन करता है। इन सभी का निर्वहन शिक्षक को केवल उसके कर्तव्यों की याद दिलाकर नहीं कराया जा सकता। हमारे अधिकाँश वर्तमान विद्वान शिक्षाविद बालकों के अधिकारों की ओर अधिक ध्यान दे रहे हैं किन्तु अध्यापक के अधिकारों पर चर्चा तक नहीं होती। यह शिक्षकों के कद को घटाने का प्रयास है जिसके दूरगामी परिणाम ठीक नहीं होंगे।
बालक को मार्ग पर लाने के लिये दण्ड का यथोचित प्रयोग अपरिहार्य है।

हमारीवाणी

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