शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

मैं-आदर-करता-हूँ



मैं प्रेम प्रिये तेरा ही तुझे न्यौछावर करता हूँ|
मैं शांत अनल दहकाओ नहीं |
निज आहुति दे भड़काओ नहीं|
तुम दूर रहो वीणा से मेरी,
छू तार इसे झनकाओ नहीं|
मेरा पथ बहुत सरल सुन री,
तुम आके इसे उलझाओ नहीं|
मैं खुश हूँ सदा अपने में प्रिये
मेरी मौज में टांग अडाओ नहीं|
तेरा मंगल हो अरदास यही निसि वासर करता हूँ|
मैं प्रेम प्रिये तेरा ही तुझे न्यौछावर करता हूँ|
धनवान नहीं गुणवान नहीं
मैं रूप की अनुपम खान नहीं|
मेरा मान नहीं अपमान नहीं
जग में सुन री मेरी शान नहीं|
ऐश्वर्य नहीं सुखसाज नहीं
निज आगत का अनुमान नहीं |
मैं कैसे कहूँ ऐ प्रिय तुमसे
मुझे प्रेम के पथ का ज्ञान नहीं|
सुन री तुझको अर्पित तुझसे जो कांवर भरता हूँ|
मैं प्रेम प्रिये तेरा ही तुझे न्यौछावर करता हूँ|
तेरे अरूणिम अधरों पर मुस्की
यहे राज भरे नयना गहरे
तेरे गालों का स्पर्श मधुर
तेरे तन पे उरोजों के पहरे
लट कुण्डलिनी हैं शीश चढ़ी
कानों में कनक कुण्डल फहरें|
पर लोभ मुझे निज साधना का
अभी प्रेम के मेरे न दिन बहुरे|
मेरी राह तको यह एक विनय मैं गाकर करता हूँ|
मैं प्रेम प्रिये तेरा ही तुझे न्यौछावर करता हूँ|

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

ऐ! सुन्दरि

विश्वसनीय वेदनाहर, मूँगिया अधर पर मंद हास,
तिरछी चितवन ज्यों शल्य चिकित्सा को तत्पर,
न्यू शार्प ब्लेड ले शल्य चिकित्सक डटा हुआ है ड्युटी पर।
पस पड़ चुकी निराशा की कर देता बाहर।
ऐ! सुन्दरि, तू बोल, घोल नर्वाइन टॉनिक नस नस में।
जो सटकर बैठे तो हर ले ज्वर तन मन का।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

शनिवार, 5 जुलाई 2014

फेरीवाले

2/4/1993

6

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

नंगे पांवों दौड़े आते,

सरदी गरमी या बरसातें,

नये शहर में, नये गाँव में,

बीच धूप में, याकि छाँव में,

बिखराकर अपनी दुकान को,

किये उपेक्षित निज थकान को,

द्वारे द्वारे टेर लगाते,

स्वयं उठा जन कष्ट बचाते|

चिकनी चुपड़ी बातें करते फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

फल सब्जी या चूरन चटनी,

सज्जा साधन ले लो सजनी,

कपड़े बर्तन मिर्च मशाला,

बेच्र रहे हैं गड़बड़झाला,

बच्चे खायें चाट पकौड़ी,

बहना आयें दौड़ी दौड़ी,

टूटे फूटे बदलो आकर,

नये नये सामान सजाकर,

चिल्लाते हैं द्वारे द्वारे फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

जहाँ खड़े हैं वहीं हाट है

पहचाना हर एक बाट है|

लाल हुआ मुँह चुए पसीना,

धकधक धकधक चलता सीना,

किन्तु नहीं है निकट विकलता,

पूँजी है व्यवहार कुशलता,

थके कदम पर तेज चाल है|

श्रम की रोटी का कमाल है|

जीवन का अहसास कराते फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

फेरीवाले, फेरीवाले, फेरीवाले|

बुधवार, 2 जुलाई 2014

ऐसा भी होता है?

यह कोई कहानी नहीं है। एक भुक्तभोगी द्वारा लेखक को सुनाई गयी वास्तविक घटना है। इसमें सिर्फ भुक्तभोगी का नाम काल्पनिक है  शेष की सत्यता का लेखक भुक्तभोगी के कथनानुसार विश्वास करता है। क्या ऐसा भी हो सकता है? जब रेप और दुष्कर्म के मामलों में इतना हो हल्ला हो रहा हो तब समाज के किसी कोने में कुछ ऐसा भी हो सकता है जो विधि निर्माताओं के लिए विचारणीय हो सकता है।

बात तब की है जब मैं युवराज दत्त महाविद्यालय खीरी में B.Ed का प्रशिक्षणप्राप्त कर रहा था। अक्टूबर 2000 से फरवरी 2001 के मध्य, हम कई लड़के एक बड़े कमरे में अपना ठिकाना बनाये हुए थे। उन लडकों में एक लड़का था जिसका नाम हम विजय मान लेते हैं। खीरी जिले के तराई क्षेत्र से सम्बन्धित किसी जनजाति से सम्बद्ध यह लड़का शारदा नगर  के आसपास कहीं से आता था वह भी हम लोगों के साथ रहा।

एक दिन मुझे किसी लड़के ने कहा विजय से पूछना क्या वह लखनऊ चलेगा? मैं समझ गया अवश्य विजय इस प्रश्न से चिढ़ता होगा। मैंने उससे कभी यह प्रश्न नहीं किया होता यदि मुझे उसके साथ रहने और इस प्रश्न को पूछने का अवसर न मिला होता।

हुआ यूँ कि कॉलेज में 4 दिन की छुट्टी हुई। शनिवार का दिन था, सभी लड़के अपने अपने घर चले गये। मैं भी बस स्टैंड पर आया पिहानी के लिए आखिरी बस छूट चुकी थी। अतः मैं कमरे पर वापस आया और रविवार को वापसी का फैसला किया। मैंने देखा विजय भी कमरे पर मौजूद है वह भी घर नहीं गया। अस्तु उस रात कमरे पर हम दो ही थे।

हम दोनों ने अपने अपने बिस्तर लगाये जिनके बीच 5 चारपाइयां खाली पड़ीं थीं। मेरे उसके बीच अब तक कुछ जान पहचान बढ़ गयी थी तथा प्रेमभाव विकसित हो चुका था। अतः मैंने उससे कहा कि यार उतनी दूर बिस्तर कहाँ लगाया। पास की किसी चारपाई पर बिछा लो। बिना किसी अधिक बातचीत के वह अपना बिस्तर पास की चारपाई पर ले आया। थोड़ी देर इधर उधर की बातें होती रहीं। फिर मुझे अचानक ख्याल आया कि लगे हाथों उसके लखनऊ चलने वाले प्रश्न की भी चर्चा कर ली जाये। विश्वास करिये इस सन्दर्भ में मुझे उससे प्रश्न करने के लिए बड़ी हिम्मत जुटानी पड़ी।

मैंने उससे कहा कि विजय भाई नाराज न हो तो एक बात पूंछूं। उसने हँसते हुए कहा,"दद्दा नाराज होने की क्या बात है। एक के बजाय चार पूंछो।" न उसने यह कल्पना की होगी कि मैं क्या पूंछने वाला हूँ न मैंने कल्पना की थी कि मुझे क्या जबाव मिलेगा। मैंने कहा नही सिर्फ एक ही पूंछ्नी है। उसने कहा पूँछो दद्दा। मैंने कहा, "यहाँ कुछ दिन पहले कुछ लड़के कह रहे थे कि विजय से पूँछना कि क्या लखनऊ चलोगे।" अरे! मेरी बात भी पूरी नहीं हो पाई थी। मुस्कुराते हुए से अचानक उसका चेहरा आक्रोश और दुःख से भर गया। उसकी आँखों में आंसू और क्रोध देखकर मुझे अति आश्चर्य हुआ और ग्लानि भी। किन्तु तीर कमान से निकल कर वापस आने वाला तो था नहीं।

थोड़ी देर बाद जब विजय ने अपने आपको संयत किया तो उसने मुझसे कहा, "दद्दायह बात तुमने पूँछी थी अगर किसी और ने पूँछी होती तो पिट जाता।

मैंने कहा' "अगर ऐसा है तो भइया मुझे माफ़ करना। मेरे दिमाग में था कि कोई अटपटी बात जरूर  है तभी मैंने कभी पहले नहीं पूँछा। यदि मुझे मालूम होता कि लखनऊ के नाम पर तुम इतना परेशान होओगे तो बिलकुल नहीं पूँछता। फिर भी ऐसा क्या है जो तुम रोने लगे।"

उसने कहा, "दद्दा कुछ पूछो मत।"

फिर धीरे धीरे उसने मुझे बताना शुरू किया। जो उसने बताया था काफी कुछ दिमाग से फिसल गया फिर भी जो मुझे याद रहा वह इस प्रकार है।

1995-96 की बात है उस लड़के ने शारदानगर से इन्टर मीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात लखनऊ में कहीं B.Sc. में एडमिशन लिया और गोमती नगर में किराये पर कमरा लेकर रहने लगा। प्रतिदिन साइकिल से कालेज से कमरा और कमरे से कालेज जाना आना अपनी पढाई लिखाई करना बस यही उसकी दिनचर्या में शामिल था इससे ज्यादा मतलब नहीं। गरीब घर का जन-जातीय सदस्य होने वह  कुछ संकोची भी था तथा उसकी वेशभूषा व शारीरिक बन गठाव भी आम शहरी से अलग था।

एक दिन 3 बजे के आसपास कालेज से कमरे पर जाते हुए एक लड़की जिसकी उम्र कोई 19-20 की रही होगी उसकी साइकिल के सामने आयी और इससे पहले वह लड़का कुछ समझता लड़की साइकिल से टकराई या ऐसा लगा कि वह टकराई, ठीक से उस लड़के को अनुभव नहीं हो पाया सड़क पर बैठ कर अपना पाँव पकड़कर जोर जोर से चिल्लाने लगी। "हाय! मेरा पैर। नालायक देखकर नहीं चलते। कितनी जोर से टक्कर मार दी।" और न जाने क्या क्या? वहाँ तमाम तमाशबीन इकट्ठे हो गये और इससे पहले कि उस पर लोगों के दो चार हाथ पड़ें वह लड़की लंगड़ाते हुए से खड़ी हुयी और लोगों से उस लड़के के साथ मारपीट न करने के लिए कहा। फिर कराहते हुए उसने लड़के से कहा पैर में चोट लग गयी है चलो पहले मेरा इलाज कराओ। अब लड़की आगे आगे और लड़का पीछे पीछे। कुछ दूर तो लड़की लंगड़ाते हुए ही चली किन्तु फिर उसने साइकिल अपने हाथ में ली और लड़के से केरियल पर बैठने के लिए कहा। उस लड़के ने कहा,"बहन जी साइकिल मैं स्वयं चलाता चलूँगा आप पीछे बैठ जाइये।" लेकिन उस लड़की ने झिड़क दिया और उसे चुपचाप पीछे बैठने के लिए कहा। मरता क्या न करता उसे लड़की की जिद और बेहूदगी के सामने झुकना पड़ा। रास्ते में कई क्लिनिक पड़े लड़के ने वहाँ इलाज कराने के लिए कहा। किन्तु लड़की ने चुपचाप पीछे बैठने के लिए कहा और बताया कि उसके घर के पास ही उसका फैमिली डॉक्टर रहता है वही इलाज करेगा। वह हर जगह इलाज नहीं करवाती। वह इतना डर गया था कि कुछ और कह सुन नहीं सका।

कोई 6-7  मिनट चलने के बाद उस लड़की ने साइकिल एक पतली सी गली में एक घर के सामने रोकी। गली जितनी पतली थी घर कहीं उससे बड़ा था। लड़की ने गेट खोला साइकिल गैलरी में खड़ी कर ली। बैठक खोलकर लड़के से सोफे पर बैठने के लिए कहा। लड़के ने फिर कहा बहन जी डॉक्टर को बुलवा लीजिये मुझे देर हो रही है। लड़की ने कहा वह चिंता न करे डॉक्टर आ रहा है। वह चुपचाप आराम करे। लड़की घर के अंदर चली गयी। लड़के की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह साइकिल लेकर भाग ले। लड़की थोड़ी देर बाद कमरे में आई कुछ मीठा और ठंढा पानी लेकर। लड़के ने फिर कहा,"बहन जी वो डाक्टर..." बात पूरी नहीं हो पाई लड़की ने कहा,"वह आने ही वाला है। तुम पानी पीकर तब तक आराम करो।"

लड़के को समझ नहीं आ रहा था वह क्या करे? कुछ समय बाद एक बुलेट गाड़ी उस घर के सामने रुकी और उस पर से एक दरोगा जी उतरे।अब तो लड़के की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। क्या यही डॉक्टर है जिससे इलाज करवाना है। तब तो निश्चित रूप  से इलाज लड़की का नहीं लड़के का होगा और यह सोचकर उसका कलेजा मुंह को आ गया। दरोगा जी ने एक फाड़ खाने वाली नजर लड़के की ओर डाली फिर सीधे घर के अंदर चले गये। लडका किंकर्तव्यविमूढ़ अपने आपको उल्टा लटकाए जाने की राह देख रहा था।

बैठक में लगी घड़ी में साढ़े छह बज चुके थे। स्ट्रीट लाइटें जल चुकीं थीं। साथ ही बढ़ रहा था अँधेरा और लड़के हृदय में किसी अनहोनी का भय। कोई एक घंटे बाद वो दरोगा जी घर के बाहर आये लड़के पर फिर एक नजर डाली और अपने रास्ते हो लिए। लड़के के जी में जी आया चलो यह बला टली। अब उसे कमरे पर जाने की व अपनी साइकिल और किताबों की चिंता सताने लगी। पौने आठ आसपास लड़की खाने की थाली लेकर आई। उसने लड़के से कहा वह बैठकर खाना खाए तब तक वह पडोस से डॉक्टर को बुलाने जा रही है। लड़का देख व समझ चुका था लड़की को कहीं कोई चोट वोट नहीं लगी थी सिर्फ एक नौटंकी थी मगर क्या होने जा रहा था उसे कुछ पता नहीं था। थोड़ी देर बाद वह लड़की अपनी हमउम्र एक और लड़की को लेकर वापस आई। उन दोनों में से एक ने गेट बंद कर लिया और टीवी ऑन कर उसे फुल वॉल्यूम पर कर दिया।

"बहन जी यह क्या कर रहीं हैं मुझे घर जाना है।"

अब लडकी का रूप  बदल चुका था और बात करने का अंदाज भी,"अबे बहन जी बहन जी मत कर। मैं कोई तेरी बहन वहन नहीं। मेरा भाई वो था जो अभी थोड़ी देर पहले दरोगा आया था। मेरी माँ अंधी है जो अंदर कमरे में खाना खाकर आराम कर रही है। और इस घर में कोई नहीं है। आज तुम्हे यहीं रूकना है और मेरा तथा मेरी सहेली का मनोरंजन करना है। समझे मुझे कोई चोट वोट नहीं लगी है और न ही यहाँ कोई डॉक्टर आने वाला है। यहाँ आज की रात के डॉक्टर तुम और हम दोनों मरीज।

"बहन जी मुझे घर जाने दीजिये। प्लीज।"

अबे चुप हम तुझे क्या यहाँ खाए जा रहे हैं। घर जाकर भी सोयेगा आज यहीं सो" दूसरी लड़की ने कहा।

लड़के के दुबारा कुछ कहने पर धमकी मिली,"अबे ज्यादा चूं चपड़ करेगा तो अभी चिल्लाकर मुहल्ले वालों को बुला लेंगे। और फिर पुलिस तुम्हारी जो गत बनाएगी उसे समझ ही सकते हो। लड़का ज्यादा विरोध नहीं कर सका। आज उझे समझ में आ गया था कि आखिर यह उक्ति क्यों कही जाती है,"त्रिया चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्य:।" अगले क्षणों की मात्र कल्पना ही की जा सकती थी।

सारी रात दोनों लडकियों ने लड़के के विरोध करने पर भी पूरी रात जैसे चाहा वैसे लड़के के शरीर से खेला। दुसरे दिन भी लड़का उन दोनों लडकियों से मिन्नतें करता रहा। किन्तु लडकियों ने विभिन्न प्रकार की धमकी पटकी देकर उसे जाने नहीं दिया। अगली रात फिर वही खेल हुआ। तीसरे दिन लड़के के शरीर ने जब पूरी तरह जबाव दे दिया तब उन दोनों ने उस लडके को यह कहकर जाने दिया कि वह जब बुलाएगी लड़के को उनके मनोरंजन के लिए आना पड़ेगा नहीं तो उसने उसका नाम और पता नोट कर लिया है अपने दरोगा भाई से उल्टा सीधा बताकर अंदर करा देगी।

लड़के के अनुसार वह दिन जिस दिन लड़की से उसका पिंड छूटा और वह दिन जब मैंने उससे इस बाबत पूछा लड़का घर आने के बाद दुबारा लखनऊ नहीं गया। जब भी उससे लखनऊ जाने का नाम लिया जाता है तो वही होता है जो नहीं होना चाहिए।

रविवार, 29 जून 2014

बारिश हो... तो...

मेरी टीन तुम्हारा छप्पर,
बारिश हो...तो...किसी एक पर?
छत भीगे या आँगन भीगे,
भीगे खेत महावन भीगे,
बचपन भीग बुढ़ापा भीगे,
या मस्ताना यौवन भीगे,
मेरी कार तुम्हारा ट्रैक्टर,
बारिश हो...तो...किसी एक पर?

शनिवार, 7 जून 2014

प्रेम की नदी

चाहता हूँ प्रेम की नदी होना,

अल्प जीवन में समूची सदी होना,

रेत में मधुगंध की भावना जागी,

यदि मिले पारस बनूं सोना|

शुक्रवार, 6 जून 2014

हो न कुठाराघात

जनता जागी तुम भी जागो, नेतागण की जात।

पूरा बहुमत दे बनवाई हाथी की सरकार।

दलित की बेटी पत्थर जोड़ा भरा निजी भण्डार।

जनता ने जब मौका पाया बतला दी औकात।

जनता जागी ...

धरती-पुत्र को साईकिल देकर जब लखनऊ को भेजा।

आतंकी जन निर्भय साधे बेटा भाई भतीजा।

केवल पांच सांसद घर के मुट्ठी भर का भात।

जनता जागी...

मोदी तुमको जनता ने अपना सर्वस्व दिया है।

अंगद का तुम पांव बनो ऐसा विश्वास किया है।

जनता की उम्मीदें जागीं हो न कुठाराघात।

जनता जागी...

शनिवार, 31 मई 2014

रसमय मित्र

29/5/1993

किसी अंग्रेजी कविता की स्मृति आधारित भावाभिव्यक्ति--
रसमय मित्र

कितनी रसमय? मित्र ! मनोहर छवि है तेरी|

बस तू आशा किरण अन्य सब छाँव घनेरी|

शाम घिरे ही लौट गेह में तुम आते हो|

बड़े प्रेम से निज बच्चों संग कुछ गाते हो|

निश्चय ही यह प्रेम गीत है गाओ प्यारे|

कानों को अच्छा लगता है मित्र हमारे|

इतनी मिठास यह दर्द कहाँ से लाते हो|

मुझको भी दो जिस मीटर में तुम गाते हो|

मुझको भी अपने भावों का सहभागी कर लो|

इसी नीड़ में फिर चाहे इहलीला कर लो|

सिर्फ आखिरी साँस तुम्हारी मृदु लय टूटे|

सुनता रहूँ निरंतर मैं जब तक तन छूटे|

काश तुम्हारा गीत सभी जग वाले सुनते|

भौतिकता से दूर तुम्हारे रंग में रंगते|

@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

हे अवनि आत्मज

www.hindisahitya.org/poet-vimal-kumar-sukl/
हे-अवनि-आत्मज/
हे अवनि आत्मज!
आज आसुरी राज जगत पर विविध वेश में विविध रूप धर।
घोर प्रलय का घोष कर रहा चोर मोदमय संत मर रहा।
शरण माँगता दिवस प्रात से साँझ आज है उच्च प्रात से।
न्याय धरणि को आज चाहिये ज्योतिपुंज का राज चाहिये।
साथ साथ हों पथिक आओ चलें अन्धकार का मन आओ दलें।
एक बार जय बोल भरतसुत और हस्तकर सद्य शस्त्रयुत।
या भवानिरिपु या कि स्वयं तन एक नष्ट करें आज काल बन।
खड्ग हस्त धर शत्रु शीश रज कर विलीन हे अवनि आत्मज!
गौरि माँगती आज रक्त रिपु सद्य समर्प दे ध्यान धान्य वपु।
@विमल कुमार शुक्ल'विमल'

सोमवार, 24 मार्च 2014

लकब

सच पूछिए तो आज भी किसी को उचित रूप से सम्बोधित करने के मामले में मैं आज भी उतना ही मूर्ख हूँ जितना मैं आज से बहुत पहले था। फरवरी 2000 में मैंने एक मुक्तक लिखा मुझे आज भी ताजा लगता है। आप भी मुलाहिजा फरमायें---
किसी ने कह दिया होगा,'चाँद' उछल पड़े।
मैंने पुकारा सही नाम तो उबल पड़े।
नालायक, बेहया, बदतमीज जाने कितने,
लकब मेरी तारीफ में निकल पड़े।
लकब-उपाधि

गुरुवार, 20 मार्च 2014

बहुत

हर कोई है दे रहा लेक्चर बहुत।
बढ़ गये हैं आजकल मच्छर बहुत।
भनभनाना खटमलों ने कर दिया शुरू।
हो गया चुनाव बाअसर बहुत।

सोमवार, 17 मार्च 2014

होली में

बड़ी सुन्दर सजी चौपाल है इस साल होली में।
केसरिया रंगे मोदी से सजी है थाल होली में।
बने सरकार जिसकी भी न कोई फर्क है प्यारे।
मुझे अच्छा लगा हुड़दंगे केजरीवाल होली में ।
बहुत मायूस है बेटा बुझी सी दिख रही है माँ।
तिबारा है नहीं दिखती गलेगी दाल होली में।
जो नेता तीसरे मोर्चे की बातों में भ्रमाये हैं।
उसी घर जायेंगे जिस ओर हो तर माल होली में।
बुढ़ापे में लगाया रंग अन्ना ने वो दीदी को।
अंगूठा देखकर ममता हुई हैं लाल होली में।
लिए लालटेन को लालू टटोलति रास्ता आवें।
कहाँ फेकैं समझ आवै न अपना जाल होली में।
नहीं मैं बात माया की करूंगा इस समय कुछ भी।
बहाली तन से हाथी की है बदली चाल होली में।
मुलायम ने समझ रक्खा है पब्लिक को गधा उल्लू।
लगाई लाल को है डांट ढाई साल होली में।
बहुत ज्यादा नहीं कहना अरे वोटर सम्भल जाओ।
तुम्हारा वोट है तलवार कर दो काल होली में।
ये ई वी एम् है पिचकारी बहुत रंग के बटन इसमें।
जो रुचता हो करो रंगीन उसके गाल होली में।

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

लोकतन्त्र की अर्थी निकली

घर में जो दरार दिखती है।
उस दरार में घर दिखता है।
झाड़ दुलत्ती बदल रहा दल,
अब नेता बहुत बिदकता है।
ऊँट कहाँ किस करवट बैठे,
बिलकुल पता नहीं चलता है।
आम सवेरे संध्या इमली,
रस बदला तो रस्ता बदली।
नेता लड़े लड़ी जनता पर,
लोकतन्त्र की अर्थी निकली।
दंगे हजम हजम घोटाले,
जनता के दिल में हैं छाले।
कुत्तों से उम्मीद नहीं है,
जनता ही कुछ सूत्र निकाले।

रविवार, 19 जनवरी 2014

बिको जाति है

गाँव से शहर गओ गोरी के प्रेम पगो,

बीबी का बताई गओ बिजनेस का जाति है।

रोज रोज फोन करि घर मा बताई देइ,

जल्दी लौटि अइबो कुछु सौदा रहो जाति है।

भारत सरकार थी जो शीश कटे चुप्प रही,

औरतन से ज्यादा जेहिकी साख गिरी जाति है।

बीबी रही समझदार एक दिन बोली मियाँ,

जो तुम खरीदति हुआं हियाँ बिको जाति है।

शीत

उठा क्षितिज से कुहरे का दल,

लील गया सूरज का संबल।

लील गया घर खेत बाग वन,

लील गया आंगन का गुंजन।

लहरा बीच रजाई पाला,

मन को कँपा नचा तन डाला।

हड्डी अकड़ लकड़ बन बैठी,

आँतें शीत पकड़ कर ऐंठीं।

कूँ कूँ करते पिल्ली पिल्ला,

बुढ़ऊ कहते जाड़ा चिल्ला।

हमारीवाणी

www.hamarivani.com