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मंगलवार, 14 नवंबर 2023

यूडाइस+ पर फीडिंग की समस्या

पिछले वर्ष से कक्षा 1 से 12 के छात्र छात्राओं का रिकॉर्ड यूडाइस+ पर फीड किया जा रहा है। चूंकि पिछले वर्ष सभी बच्चों को नये सिरे से फीड करना था अतः कोई समस्या नहीं हुई। परन्तु इस वर्ष आप बच्चों की फीडिंग दो तरह से कर सकते हैं। प्रथम जिन बच्चों को सत्र 2022-23 में फीड किया था उन्हें अपग्रेड करके। दूसरे जो छात्र बाहर से आये हैं उनका पेन pen यानी परमानेंट एजूकेशन नम्बर सर्च करके उन्हें अन्य विद्यालय से इम्पोर्ट करके। पेन को आधार व जन्मतिथि की सहायता से सर्च करने की व्यवस्था साइट पर है।
सिद्धान्ततः कोई त्रुटि नहीं है किन्तु व्यवहार में बड़ी कठिनाई है।   
जो बच्चे कहीं नहीं पढ़े हों कक्षा 1 में उन्हें सीधे फीड कर सकते हैं अन्य कक्षाओं में इम्पोर्ट करना ही पड़ेगा।
मेरी और मेरे जैसे कई लोगों की समस्या यह है कि जो बच्चे 2021-22 या उससे पूर्व के वर्षो में कक्षा 5 उत्तीर्ण हुए या उनकी उम्र अधिक हो जाने पर भी उन्होंने निचली कक्षा में कहीं प्रवेश नहीं लिया उनको साइट पर कैसे फीड किया जाए। कोरोना के चलते तमाम बच्चे प्रवेश से वंचित रहे या स्वयं को विद्यालय में प्रवेश के लिए तैयार नहीं कर पाए। कुछ ऐसे भी विद्यालय हैं जिन्होंने फीडिंग की नहीं या लापरवाही से की ऐसे बच्चों की फीडिंग कैसे होगी। 
तमाम लोग यहां शिक्षा विभाग से जुड़े हुए हैं कृपया अपनी सम्मति प्रदान करने का कष्ट करें।

गुरुवार, 7 सितंबर 2023

इण्डिया बनाम भारत

हमारे गाॅंव-देहात में एक कहावत है कि "गुह मा ईंटइ डरिहौ तो छिट्टइ पैहौ"। जब से विपक्षी दलों ने इकट्ठे होकर अपने गठबंधन का नाम "इण्डिया" रख लिया तब से भाजपा को देश का नाम बदलकर भारत रखने की खुजली शुरू हो गई। यह वही भाजपा है जिसने अपने कार्यकाल में अपने अनेक कार्यक्रम इण्डिया के नाम पर शुरू किये हैं। उदाहरण के लिए, "मेक इन इंडिया, खेलों इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, फिट इण्डिया आदि।" यह वही भाजपा है जिसने मुलायम सिंह यादव के द्वारा सन 2004 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में लाये गये इण्डिया के स्थान पर देश का नाम भारत करने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए सदन से बहिर्गमन किया था। यह इस देश की राजनीति की बड़ी सुन्दर विशेषता है कि पक्ष से विपक्षी और विपक्ष से पक्ष में जाने पर नेताओं के चश्मे का नम्बर बदल जाता है।
विपक्ष भी यह भूल गया कि एक समय कहा गया था, "इन्दिरा इज इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा"। कहना अलग बात थी और होना अलग। इन्दिरा चुनाव हार गईं और चापलूसों का दिया नारा फ्लॉप हो गया।" कुछ ऐसा ही पुनः होने जा रहा है। अन्तर मात्र इतना है कि आज एक समूह अपने को इण्डिया घोषित कर रहा है। 
कोई भी व्यक्ति या समूह अपना नाम इण्डिया रख ले तो उसका उद्धार तो होने से रहा। हॉं अपने कर्म बदल लें तो बात दूसरी है। जिसकी हाल साल में कोई सम्भावना नजर नहीं आती।
मैंने एक सोसायटी का रजिस्ट्रेशन 1998 में कराया था। आज भी कार्यरत है। नाम है, "भारतीय चेतना समिति" आजकल भारतीय, राष्ट्रीय आदि नामों से संस्थाओं के पंजीकरण नहीं होते। मैं सोचता हूॅं अगर मैंने समिति का नाम कुछ और रखा होता तो क्या अन्तर आता। शायद कुछ भी नहीं। 
अब चाहे विपक्ष अपना नाम इण्डिया रख ले या पक्ष इण्डिया के स्थान पर भारत शब्द का प्रयोग करे। आम आदमी पर इसका क्या प्रभाव होगा? संविधान में भले ही लिखा है, "इण्डिया दैट इज भारत" और राजनीतिक लिखा पढ़ी में देश विदेश में भले ही इण्डिया शब्द का प्रयोग किया जाता है, आम भारतीय जनमानस इस देश को भारत के नाम से ही जानता है। जब जब कोई सनातनधर्मी संकल्प के मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह यही करता है,
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2080, तमेऽब्दे नल नाम संवत्सरे दक्षिणायने ……. ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे ……. मासे …… पक्षे …….. तिथौ ……. वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री ……….. (जिस देवी.देवता की पूजा कर रहे हैं उनका नाम ले)पूजनं च अहं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये।
इस मन्त्र में कहीं इण्डिया शब्द का प्रयोग नहीं है। इस मन्त्र में स्पष्टतः भारतवर्ष शब्द का प्रयोग किया गया है।
पक्ष और विपक्ष जनहित के मुद्दों की उपेक्षा कर कृपया इस पर राजनीति न करें। इण्डिया को इण्डिया और भारत को भारत रहने दें। विपक्ष को चाहिए कि जनभावनाओं को समझकर ही किसी मुद्दे को हवा दे। आखिर विपक्ष को इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए कि इण्डिया के स्थान पर शब्द का प्रयोग किया जाये। जब हम राष्ट्रगान का वाचन करते हैं तब भारत भाग्यविधाता शब्द का प्रयोग करते हैं न कि  इण्डिया भाग्यविधाता। विपक्ष को समझना चाहिए कि इण्डिया भारत  -भारत इण्डिया करके वह भाजपा को ही लाभ पहुंचायेगा। हाॅं यदि वह शान्त रहे तो शायद इण्डिया भारत -भारत इण्डिया के मुद्दे पर आम आदमी ध्यान ही न दे।
भाजपा को भी चाहिए यदि वह वाकई गम्भीर है तो संविधान में संशोधन कर "इण्डिया दैट इज भारत" शब्द समूह को हटाये और व्यर्थ का वितण्डा बन्द करे।

रविवार, 29 जनवरी 2023

नवोदितों को सुझाव

एक तो बिना पूछे व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़ लेते हो, बिना यह विचार किये हुए कि मेरे पास समय भी है कि नहीं। चलो माना मेरे पास ग्रुप छोड़ने का विकल्प है तो छोड़ दिया। मसला खत्म। 
नहीं मसला खत्म नहीं है, आप विचार करें आपने ग्रुप बनाया क्यों? अपने ग्रुप का उद्देश्य अवश्य स्पष्ट करें। अगर वाकई साहित्य और भाषा का उत्थान आपका उद्देश्य है तो प्रथम तो भाषा और साहित्य का अध्ययन और अनुशीलन स्वयं करें। नीम हकीम अस्पताल खोलें तो ठीक मेडिकल कॉलेज भी खोलकर बैठे हैं यह हजम नहीं होता। दूसरे जिन सदस्यों को जोडें उन्हें बता दें कि परिष्कृत और परिमार्जित रचनाएं प्रस्तुत करें। यदि कुछ रचनाएं अपरिष्कृत और अपरिमार्जित हैं तो एडमिन को अधिकार होना चाहिए कि वह उस रचना के सन्दर्भ में उचित सुझाव अपने सदस्य को दे। सदस्य को चाहिए कि उन सुझावों को सहृदयता से अवलोकन करे और उचित होने पर स्वीकारे। 
किसी भी लेखन को सही ठहराने से भाषा व साहित्य का उत्थान तो होने से रहा ग्रुप की गरिमा भी समाप्त होती है। 
अगर एडमिन के अलावा अन्य सदस्य कोई सुझाव दे रहा है तो अवश्य विचार करें। यह क्या बात हुई कि वाह वाह ग्रुप में कर दूँ तो लेंड़ फूल गए और जरा सी आलोचना हुई तो गाल फूल गए।प्रसंशा पटल पर चाहते और डाँट पर्सनल रूम में। यह द्वैध आचरण है इससे अन्य लोगों के सीखने का अवसर समाप्त होता है। ग्रुप में बैठकर हगोगे तो डंडे खाने का साहस भी रखो। टाइपिंग मिस्टेक, शब्दों की वर्तनी सम्बन्धी त्रुटियाँ जाने अनजाने सबसे होती हैं किन्तु बुद्धिमान लोग ऐसी पोस्ट को डिलीट कर सुधरी पोस्ट दुबारा लगा देते हैं। त्रुटि को जानकर और मानकर पोस्ट को डिलीट न करना निर्लज्जता है और अर्थ का अनर्थ होने से आपकी रचनाधर्मिता का महत्व समाप्त होता है।
नवोदितों को चाहिए वे स्वीकारें कि अभी सीख रहे हैं इससे उनकी सम्मान घटता नहीं है अपितु बढ़ता है। शिक्षार्थी कभी अपमानित नहीं होता गुरुता के दावेदार पग पग पर अपमानित होते हैं।
कुछ सामान्य त्रुटियाँ निम्नलिखित हैं नवोदित इन पर अवश्य ध्यान दें।
1- छन्द सम्बन्धी त्रुटियाँ, आजकल इन पर ध्यान नहीं दिया जाता और इनको लेकर कोई चिन्ता की बात नहीं क्योंकि छन्दमुक्त कविता का युग है।
2- विरोधाभासी विचार सम्बन्धी त्रुटियाँ, इन पर अवश्य ध्यान दें विशेषकर लम्बी कविताओं और गजलों में प्रायः नवोदित शुरुआत में जो कहते हैं अन्त में उसी बात की काट भी कर जाते हैं। इससे कवि व लेखक दिग्भ्रमित प्रतीत होता है। स्रोता अथवा पाठक को आप क्या कहना चाहते हैं। यह स्पष्ट रखें।
3- संस्कृति की अज्ञानता सम्बन्धी त्रुटियाँ, सरस्वती को शक्ति की देवी, दुर्गा को ज्ञान की देवी, शंकर को सर्जनहार, विधाता को प्रलयंकर कहना आदि। 
4- जल्दी जल्दी बहुत अधिक लिखकर तत्काल पोस्ट करना, यह बहुत बड़ी त्रुटि है एक साहित्यकार अपने समय का अमिट हस्ताक्षर होता है। आज वह जो लिखेगा वर्षों बाद वह प्रमाण रूप में स्वीकारा जाएगा अतः जो लिखें उसे कम से कम पाँच बार पढ़ने का नियम अवश्य बनायें तब पोस्ट करें। 
5- स्वयं को स्वयंभू मानने की त्रुटि, जो लिखें उसे अपने से निकटतम वरिष्ठ साहित्यकार को अवश्य सुनायें और सुझाव प्राप्त करें।
आप मुझसे सहमत हों आवश्यक नहीं किन्तु विचार अवश्य करें। इस पोस्ट में बहुत कुछ छूट गया है। थोड़ा लिखा अधिक समझना। हमारे यहाँ पत्र में लिख दिया जाता रहा है, तथावत लें।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

उत्पाद और फार्मूला

हिन्दी और उर्दू दो प्रमुख भारतीय भाषाएं हैं, जो वर्तमान में अधिकांश जन के द्वारा प्रयोग की जाती हैं। कवि और लेखक प्रायः इन्हें बहनों की संज्ञा प्रदान करते हैं। मैं स्वयं अपनी बोलचाल में प्रायः उर्दू शब्दों का प्रयोग करता हूँ। मेरा यह भी विश्वास है कि हिन्दी साहित्य में अन्य भाषाओं के वे शब्द जो जनमानस में प्रचलित हो गए हैं उन्हें स्वीकारने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह मनचाही भाषा का प्रयोग करे और मैं उसके इस अधिकार का सम्मान करता हूँ। भाषाई भिन्नता किसी को निम्नतर या उच्चतर नहीं बनाती। किन्तु यहाँ मेरी खिन्नता उन कवियों व लेखकों से है जो नाम के साथ तो कवि या लेखक चेंप लेते हैं और लिखते हैं उर्दू गजलें और शेर। बिल्कुल उस प्रोडक्ट की तरह जो अपने रैपर पर छपे फार्मूलेशन से बिल्कुल मेल नहीं खाता। कठिनाई तो तब होती है जब विद्वता प्रदर्शन के लिए हठात उर्दू (मूलतः अरबी व फारसी) के ऐसे अप्रचलित शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनके अत्यधिक सरल व प्रचलित स्थानापन्न उपलब्ध हैं। कुछ रचनाकार तो उर्दू् और हिन्दी शब्दों का ऐसा अनुपात रखते हैं कि हिन्दी लंका के रावणराज में रामभक्त विभीषण दृष्टिगोचर होती है। अरे भाई! किस लिए लिख रहे? रद्दी कहाँ से उत्पन्न हो रही है? या तो जन का मनोरंजन करो या फिर कुछ उपयोगी लिखो। यह भी कि नाम के आगे देहलवी, बरेलवी, लखनवी, संडीलवी जैसे टाइटिल लगाओ और मियां शायर हो जाओ। अल्लाह आपको तौफीक अता फरमाए और आपको उर्दू शायरी में नामवर कर दे। क्या कठिनाई है? आपको रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी जी याद तो होंगे। 
भाषा एक ऐसा संवेदनशील उपकरण है जिसकी गम्भीरता को न समझने से ही केशवदास के जैसा उच्चकोटि का रचनाकार पर हासिये पर चला गया और तुलसीदास जी जैसे साधारण रचनाकार उस प्रतिष्ठा को प्राप्त कर गये जिसके आगे मेरे सहित समस्त विश्व नतमस्तक है और प्रेरणा प्राप्त करता है।
मेरे एक मित्र हैं, विद्वान हैं हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत पर अच्छा अधिकार रखते हैं। लिखते हैं कविता विद्वता से लबरेज। नई वाली जो न तो पूर्णतया गद्य है और न पद्य। यहाँ तक तो ठीक था किन्तु जब वे संस्कृत के शब्दों को ठूँस ठूँस कर भरते हैं तो समझना कठिन हो जाता है कि खीर खाएं या शब्दकोश को लेकर चाँदीवर्क हटाएं। अर्थात देखने में सुन्दर किन्तु खाने में कठिन, पचाने की चर्चा तो सुधी जन छोड़ ही दें।
यदि हिन्दी के संयोजकों व कारक शब्दों को पृथक करके विभक्तियों का ही प्रयोग करते तो कम से कम संस्कृत साहित्य की ही श्रीवृद्धि हो जाती और गीर्वाणभारती पर बड़ा उपकार होता साथ ही हिन्दी का भी उपकार होता। हिन्दी कम से कम उनकी रचनाओं में अपना अस्तित्व तो खोज पाती।
तो अगली बार जब लेखनी चले तो कवि बनें कवि के चोले में शायर अथवा शंकराचार्य नहीं। यह भी ध्यान दें कि रचना में कितनी हिन्दी खिलखिला रही है और कितनी दूसरी भाषा। यदि हिन्दी सिसक रही है तो स्वयं को हिन्दी का सपूत कहने से परहेज करें और कालनेमि के परिणाम का ध्यान करें। हिन्दी साहित्य के मंच पर महावीरों की न्यूनता नहीं है ऐसी पटकनी लगेगी कि अपना अस्तित्व ढूँढ़ते रह जाओगे।

शनिवार, 18 जून 2022

उल्लूपने का काम

उपद्रवियों से विनम्र निवेदन है कि राष्ट्रहित में राष्ट्रीय सम्पत्ति को हानि पहुँचाना बंद करें। आपकी पीड़ा शायद मेरी भी हो। किन्तु लोकतंत्र में विरोध का यह तरीका बिल्कुल भी जायज नहीं है। सरकार की नीतियों से असहमति अपनी जगह और उसके लिए तोड़फोड़ अपनी जगह। 
सरकार ने तो बिना विचारे काम करने की हठ पकड़ ली है। पहले नोटबंदी, फिर सी ए ए, फिर किसानों के लिए कानून और अब अग्निवीर योजना। किस-किस बात के लिए तोड़ फोड़ करोगे। आप किसी योजना से असहमत हैं तो आपके पास शान्तिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है या चुनाव में आपके पास मौका होता है कि आप सरकार को उसकी औकात बता सकें। 
समस्या यह भी है कि शान्तिपूर्ण प्रदर्शन की भाषा वो सरकार कैसे समझे जिसकी आईटी सेल लगातार प्रचारित कर रही है कि गाँधी की शान्ति और अहिंसा छलावा थी। अंग्रेज देश छोड़ कर इसलिए गए क्योंकि हिंसक आन्दोलन उस काल में हुए। अंग्रेजों की दृष्टि में जो उग्रवादी थे वे इस सरकार के समर्थकों की दृष्टि में सबसे बड़े देशभक्त थे और गाँधी दोगले। तो भैया जैसा बोओगे वैसा काटोगे यह जग की रीति है। एक ओर सरकार व उसके समर्थक उग्रवाद को महिमामंडित करें और दूसरी ओर तोड़ फोड़ करने वालों की निन्दा ये दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं।
तो भैया चुनाव तक इन्तजार करो और तोड़ फोड़ बन्द करो।
सरकार के लिए भी यह आत्मावलोकन का अवसर है कि लम्बे समय तक आप जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते। जनता में लोकप्रियता हासिल कर लेना और जनहित के फैसले लेना दो अलग अलग बातें हैं। जनता प्रायः छल को समझ नहीं पाती और जब तक समझती है तब तक देर हो चुकी होती है। इस सरकार और वर्तमान जन के मध्य भी यही है। 
सरकार कुछ भी कहे कि वह कानूनी प्रक्रिया का पालन करेगी किन्तु करते समय वह पक्षपात अवश्य करेगी। हर जगह वह बुलडोजर का प्रयोग नहीं कर सकती। हर जगह बुलडोजर सफल भी नहीं हो सकता यह बात मेरे जैसे दो चार गाँधी समर्थक ही जानते हैं। 
लोकतंत्र में बहुमत की चलती है और यही लोकतंत्र का गुण भी है और अवगुण भी। गुण और अवगुण के मध्य बहुत बारीक विभाजक रेखा है। उसे देखने के लिए बहुत बारीक बुद्धि भी चाहिए। बुद्धि के सन्दर्भ में जार्ज बर्नाड शॉ के पात्र ब्लंटशली ने रैना से कहा, "नाइन सोल्जर्स आउट ऑफ टेन आर बॉर्न फूल्स।"
दुर्भाग्य से इस समय विवाद भी सोल्जर्स के सन्दर्भ में ही है। लेकिन मैं इस कथन को सम्पूर्ण समाज पर लागू कर जब लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में देखता हूँ तो यही लोकतंत्र का सबसे बड़ा अवगुण है। बहुत बार नौ लोगों ने उल्लूपने का काम किया है और आगे भी करते रहेंगे।

शुक्रवार, 10 जून 2022

चित्रमाला

ये जो हँसते-मुस्कुराते हुए एकदूसरे के कँधे पर हाथ रखकर, गोद में उठाकर या आलिंगनबद्ध होकर बीसियों तरह की मुद्राओं से युक्त चित्रमाला सोशल मीडिया पर लगाई है सच बताना इस प्रेम में कितनी सच्चाई है। प्रश्न ये भी है कि विवशताओं के मध्य यह फिल्मी अदाकारी कहाँ से आई है। तुम्हारे अधरों की भंगिमा लिखे गए शब्दों का साथ नहीं देती, नयन तो किसी स्वर्णमृग या स्वर्णमृगी के पीछे गए हुए लगते हैं। कभी कभी ऐसा भी प्रतीत होता है कि चिपका दिए गए हो काटकर पास-पास। 
ये जो पग पग पर साथ देनेवाली बात लिख देते हो इसमें कितनी सच्चाई है। सच बताना किसके दबाव में ये बयान चिपका देते हो। मिसेज के साथ फोटो मजबूरी है। प्रेस्टीज का सवाल है बाबा। न कहीं काशी न कहीं काबा। मगर विशेषण बाबू, बेबी, सोना और बाबा। कभी किच किच नहीं होती? कितने नीरस हो? या सच कह नहीं सकते बेबस हो। 

सोमवार, 6 जून 2022

छप्पन इंची गुब्बारा

2014 में गुब्बारे का साइज 56 इंच था। जनभावनाओं के सहारे उड़ा तो उड़ता गया। भूल गया कि हर उड़ान की सीमा है। जमीन और आसमान के तापमान और दशाओं में फर्क होता है। उड़ने की स्वतंत्रता में संविधान का बंधन है। अब संविधान के अनुच्छेदों में छेद ढूँढ़ कर बढ़ना सरल रहा तो बढ़ लिये। लेकिन धर्म व जाति ऐसा भावनात्मक बिन्दु है जिस पर भारत जैसे बहुलतावादी देश में खड़े होकर कला करना बहुत मुश्किल है। 
किसानों का विरोध करते करते इस गुब्बारे में हवा भरनेवालों ने सोये हुए खालिस्तानियों को भी तमाशा देखने के लिए बुला लिया। मैं इसे आन्तरिक कूटनीतिक असफलता मानता हूँ। 
पुनश्च मुस्लिमों व कश्मीर का मसला ऐसा है जो एक दूसरे से अलग होते हुए भी एक दूसरे में गुंथे हैं। इस मसले से ऐसा समूह जुड़ा है जिसकी आँखों पर आसमानी किताब का वो नूर है जिसमें तर्क की रोशनाई नहीं होती। जिसके लिए छठवीं शताब्दी और बाइसवीं शताब्दी के समाज में कोई अन्तर नहीं है। इसने इतनी सामान्य बात नहीं समझी संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है। इसने यह नहीं सीखा कि जो परिवर्तित न होंगे तो नष्ट हो जाएंगे। 
इस वर्ग के अन्दर ही कुछ लोग जिन्होंने परिवर्तनों को स्वीकारा भी उनका भी व्यवहार दोगला है। बस एक उदाहरण पर्याप्त है कि संगीत इस्लाम विरोधी है लेकिन किसी की शादी में जाकर बाजा बजाना बिल्कुल भी इस्लाम विरोधी नहीं है।
जो भी हो मेरा इस्लाम और इस्लामिकों से कोई लेना देना नहीं है। उन्हें अपना आचार विचार मुबारक। 
मैं तो गुब्बारे की चर्चा कर रहा था। गुब्बारे में हवा भरनेवालों ने  अयोध्या की हरित भूमि से अपने गुब्बारे को पार कराया तो गुब्बारे में पंख लग गए। एक तो छप्पन इंच दूसरे पंख चढ़ा। मथुरा व काशी की सैर पर भी निकल पड़ा। कुछ तमाशाई जोश में आकर गुब्बारे को पूरे देश की सैर कराने पर आवाज लगाने लगे। बड़ी विवशता में या सदाशयता भी हो सकती है कि आर एस एस के मुखिया को कहना पड़ा कि काशी की तरह का अभियान प्रत्येक बिल्डिंग के लिए नहीं चलाया जाएगा। अच्छा है। 
कश्मीर में या विश्व में अन्यत्र जब कोई आतंकी घटना होती है तो जैसे यह वर्ग देश में या विश्व में रहता नहीं या अन्धा बहरा है लेकिन जैसे ही किसी आतंकी की गर्दन पर लात रखी जाती है तो पेट वाले भी पत्थर टटोलने लगते हैं। जब तक यह वर्ग अपनी भेदभाव वाली मानसिकता से बाहर नहीं आएगा यह संघर्ष अनवरत जारी रहेगा। 
अब फिर गुब्बारे पर आते हैं। गुब्बारा जब बहुत ऊँचाई पर पर पहुँचा तो जोशीले दर्शकों से उसकी दूरी बढ़ गई। शायद एक दूसरे का तालमेल भी टूटा। दर्शकों तक गुब्बारे की प्रतिक्रिया शायद नहीं पहुँच रही या दर्शक गुब्बारे की गति से कोई सबक नहीं लेना चाहते। दर्शक यह भी नहीं समझ पा रहे कि समय के साथ गुब्बारे की दीवारों से वायु विसरित हो जाती है और गुब्बारा नम्र हो जाता है। गुब्बारे का साइज भी कम हो जाता है। 
दर्शकों की समस्या यह है कि उनकी बुद्धि तेज हो गई है कि वे पीछे रह गए और बुद्धि आगे निकल गई। वे भूल जाते हैं कि वे उस शत्रु को कभी समाप्त नहीं कर सकते जिसकी मनोवृत्ति नहीं परिवर्तित कर सकते। शत्रु को समाप्त करना है तो मनोवृत्ति को परिवर्तित करें। लेकिन हवाभरने वाले स्वयं स्वीकारते हैं कि जल को रंगीन बना सकते हैं कीचड़ को नहीं।तो भैया कीचड़ में लोट लगाना बंद करें। गुब्बारे को सही दिशा में उड़ने के लिए प्रेरित करें। गुब्बारे को भी सोचना पड़ेगा जहाँ दस इंच की जगह हो वहाँ से छप्पन इंच नहीं गुजर सकता। हवा भरनेवाले गुब्बारे का साइज कम होते नहीं देखना चाहते यद्यपि साइज कम होना नियति है। 

शुक्रवार, 3 जून 2022

खुद से शादी

स्वयं से प्रेम तो बहुत से मनुष्य करते हैं, मैं भी करता हूँ। किन्तु विवाह तो किसी अन्य से ही किया है। विवाह का उद्देश्य प्रेम होता है पहली बार पता चला। हमारी सनातन परंपरा में तो दो अनजाने लोग विवाह करते रहे हैं बच्चे पैदा करते रहे हैं परिवार का विस्तार करते रहे हैं। उनमें कभी प्रेम हुआ तो ठीक नहीं हुआ तो ठीक। मेरे अपने विवाह को 26 वर्ष हो गए। मैं अपनी पत्नी से प्रेम करता हूँ निश्चय करके नहीं कह सकता। पत्नी को छोड़िये मेरे जानने वालों को कोई यह बता दे कि विमल कुमार शुक्ल को किसी से प्रेम भी है तो विश्वास नहीं करेंगे। 
विवाह का कारण प्रेम है तो यह भी आवश्यक नहीं। हमारे समाज में तमाम लोग हैं परस्पर प्रेम करके जीवन बिता देंगे पर विवाह नहीं करेंगे। विवाह किसी और से प्रेम किसी और से यह भी चलता है। 
फिल्म वालों ने लैला मजनूँ और शीरी फरहाद से टपोरियों को दिमाग में इस तरह भर दिया है कि अब प्रेम पहले फिर शादी और कभी कभी शादी से पहले ही ब्रेकअप। 
मैं कुछ लोगों को जानता हूँ जो विवाह करके अपना घर तो बसा  नहीं पाये हाँ प्रेम के चक्कर में दूसरे का तोड़ जरूर दिया। ऐसे लोग भी समाज में हैं विवाह नहीं करेंगे लेकिन हर फूल का आस्वाद ग्रहण करने के चक्कर में रहेंगे। एक उम्र पर जब स्थायित्व चाहेंगे तो फूलों के द्वारा स्वतः फेंक दिए जायेंगे। 
खैर आप विवाह करें न करें। आपकी इच्छा। संविधान अनुमति देता है। किन्तु बायोलॉजी का क्या? बायोलॉजी सभी सजीवों में (पेड़ पौधों सहित) अपनी सृष्टि विस्तार के लिए लैंगिक व अलैंगिक दो प्रकार के साधनों को इंगित करती है। लैंगिक व अलैंगिक जनन करनेवाले प्राणियों की पृथक पृथक विशेषताएं होती हैं। स्पष्टतः मनुष्य लैंगिक प्राणी है। जैसे ही बालक बालिकाएं किशोरावस्था में पहुँचते हैं विपरीत लिंगियों में आकर्षण बढ़ जाता है। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। हाँ हमारी सामाजिक परम्पराओं व मान्यताओं के कारण हम लड़के लड़कियों के स्वतंत्र मेलजोल को अनैतिक मानते रहे हैं। 
इस अनैतिकता को नैतिकता का स्वरूप प्रदान करने के लिए ही विवाह को स्वीकारा गया है। दूसरे आयुर्वेद के जानने वाले जानते है कि शरीर के चौदह वेग भूख, प्यास, खाँसी, श्वास, जम्भाई आदि में एक वेग यौनेच्छा का भी है। इन सारे वेगों को रोकने से शरीर विकारग्रस्त हो जाता है। विवाह मनुष्य की यौन इच्छाओं की तृप्ति का साधन भी है। भौतिकी में भी न तो धनावेश-धनावेश आकर्षित होते हैं और न ऋणावेश-ऋणावेश। ये सदैव प्रतिकर्षित ही करते हैं। कार्यफलन के लिए धनावेश व ऋणावेश का संगम आवश्यक है। इसी प्रकार चुम्बक में ध्रुवों का व्यवहार भी होता है। उत्तर-उत्तर व दक्षिण-दक्षिण ध्रुव कभी नहीं मिलते। एकल ध्रुवीय चुम्बक का तो अस्तित्व ही नहीं होता। 
ठीक इसी प्रकार आप सनकी या महामानव हो सकते हैं किन्तु परिवार नहीं हो सकते। परिवार के लिए धनावेश-ऋणावेश, उत्तर ध्रुव-दक्षिण ध्रुव जैसे ही स्त्री-पुरूष तथा प्रेम और घृणा दोनों की ही आवश्यकता होती है। 
यह सम्भव है कि आपको अपने मनोनुकूल साथी मिलने में समय लगे इसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करें किन्तु मिलेगा अवश्य। न मिले फिर दूसरे को अपने मनोनुकूल बना लें। सबसे सरल है स्वयं दूसरे के मनोनुकूल बन जाएं। प्रेमी का यह भी एक स्वरूप होता है और सर्वोत्तम स्वरूप है कि हम वह बनें जो हमारा प्रेमी/प्रेमिका चाहता है/चाहती है। मार्ग अनन्त हैं हठ छोड़ कर देखें।
संक्षेपतः विवाह एक आवश्यक व नैतिक शर्त है, आप करें न करें आपकी मर्जी, किन्तु उपयुक्त अवस्था प्राप्त कर, पूर्ण स्वस्थ होकर भी विवाह नहीं करते तो आप मनोविकारी हैं हाँ सन्यासी हो जाएं अलग बात है। तो मेरा सुझाव है यदि आपकी उम्र हो गई है नैसर्गिकता का आनन्द लें विवाह करें और वैवाहिक धर्म का पालन करें। जिस प्रकार मार्ग सदैव समतल नहीं होता उसी प्रकार जीवन भी समतल नहीं होता। पर्वतारोहण से घबरायें नहीं।

मंगलवार, 24 मई 2022

जुआ वैध या अवैध

मैं अपने सुधी पाठकों से यह जानना चाहता हूँ कि क्या देश में जुआ खेलना वैध है अथवा अवैध। या फिर वैध और अवैध जुए के मध्य कोई विभाजक रेखा है? 
हमारे समाज में जुए का इतिहास बड़ा पुराना है।  महाभारत काल से भी पुराना। राजा नल अपना सबकुछ जुए में हार गए थे यह युधिष्ठिर से बहुत पहले की कहानी है। मेरा जिस जुए से प्रथम बार परिचय हुआ वह शायद गाँव में गोली-कंचों का अथवा पैसों का रहा। लोगों को खेलते देखा बस कभी कभार खुद भी खेला होगा कुछ याद नहीं। इस संदर्भ में मेरे पिता जी अति कठोर थे। फिर लोगों को ताश खेलते देखा किन्तु खेला कभी नहीं इतना स्पष्ट है। उन दिनों कभी कभी पुलिस जुआरियों के विरुद्ध कार्यवाही कर देती थी। फिर दौर आया लॉटरी का। सबसे अधिक परिष्कृत और सरकार के द्वारा संचालित। लाखों परिवार विनष्ट हो गए लॉटरी के चक्कर में।अन्ततः सरकार ने बन्द करा दिया। यद्यपि लॉटरी दो चार बार लेखक ने भी खरीदी।
लॉटरी बन्द हुई तो सट्टा शुरू हो गया। अभी चल रहा है। जब तब कार्यवाही भी होती है किन्तु परिणाम शून्य। अब तो सट्टा अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।
कुछ समय से जुए का नया स्वरूप आया है। इन्टरनेट पर ऐप डाउनलोड करो। खेलो जीतो और खाते में ट्रांसफर करो। विज्ञापन भी इसका जबरदस्त। "हैलो दोस्तों यह कार मैंने लूडो खेलकर जीती है। तुम भी जीत सकते हो। ऐप डाउनलोड करो। साइट का पता है कखग.com।"
फिर एक्सप्रेस की स्पीड से चेतावनी, "कृपया 18 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए। वित्तीय जोखिम की संभावना शामिल। अपनी जिम्मेदारी और जोखिम पर खेलें। इसकी लत लग सकती है।" बहुत बार क्या कहा जा रहा है समझ नहीं आता।
मेरा प्रश्न यही है कि इस प्रकार का जुआ यदि ऑनलाइन सही है तो ऑफलाइन गलत किस प्रकार से है। यदि दोनों सही हैं तो एक पीछे पुलिस दौड़ती है और दूसरे कमरों में बैठ कर जुआ खेलते रहे हैं यह बिल्कुल उचित नहीं। यदि दोनों गलत हैं तो सरकार को चाहिए कि अविलम्ब ऐसे जुए और साइटों को बंद करें जो युवा शक्ति को अनुत्पादक व हानिकारक व्यवसायों के लिए प्रेरित कर रही हैं।
मैं समझता हूँ कि वकील लोग जो अनाप शनाप मामले ले जाकर कोर्ट में बदनामी झेलते हैं वे इस मुद्दे पर कुछ सार्थक करके सम्मान अर्जित कर सकते हैं। सरकार में बैठे लोगों का भी यह दायित्व है कि युवा पीढ़ी को अंधकार के गर्त में जाने से रोके।











सोमवार, 16 मई 2022

बुद्ध ने क्या दिया

फेसबुक पर एक भाई ने पूछा कि गौतम बुद्ध ने देश को दिया क्या है? तो मैं अल्पबुद्धि व्यक्ति कुछ लिखने का साहस कर रहा हूँ। कुछ अनुचित लिखा हो तो क्षमा करें।
बन्धु वर्तमान में ऐसे विवादों की आवश्यकता नहीं है। गौतम बुद्ध भारतीय वाङमय में ऐसे विचारक हैं जिन्होंने समाज को एक नवीन मानवतावादी दर्शन प्रदान किया जो सत्य, प्रेम और अहिंसा पर आधारित था। वह महात्मा अगस्त्य(शैव मत के प्रचारक) के पश्चात ऐसे दूसरे विद्वान थे जिन्होंने भारतीय मनीषा को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित कर पाने में और बड़े बड़े राजा महाराजाओं को अपने सिद्धांतों से अभिभूत करने में सफलता पाई थी।  गौतम बुद्ध ने जिस मध्यम मार्ग को अपनाने की बात कही है वह ऐसा मार्ग है जिसकी उपेक्षा करने के कारण हम असंख्य सुविधाओं से युक्त होने पर भी विषादग्रस्त हैं।
रही बात सनातन धर्म व बौद्धों के बीच मतभिन्नता और तोड़फोड़ की तो विगत की बात है जिस की चर्चा न हो तो बेहतर।
गौतम बुद्ध ने अपने किसी शिष्य को सनातन धर्म पर आक्रमण के लिए नहीं उकसाया, न ही उन्होंने अन्य धर्मों के विनाश की बात कही। यदि कालांतर में लोग उनके पदचिन्हों पर नहीं चले तो दोष हमारा है। 
आज आवश्यकता उनका विरोध करने की है जो यह कहते हैं कि उनका मत ही सर्वश्रेष्ठ है और अन्य मतों के अनुयायियों को जीवन का अधिकार नहीं है।
हम अत्यधिक सौभाग्यशाली राष्ट्र हैं कि भारतीय मूल का कोई भी मत शैव, शाक्त, वैष्णव, बौद्ध, जैन, सिख आदि अन्य धर्म व मतों के उच्छेद की चर्चा नहीं करता। अपितु सभी लोगों को शान्ति से अपने अपने आचार विचार को मानने की स्वतंत्रता देता है। हम तो हम तो चार्वाक जैसे नास्तिक का दर्शन भी स्वीकार कर भारतीय वाङ्मय में स्थान प्रदान करते हैं।
बौद्धों और सनातनियों के मध्य जो झगड़े के आरोप लगते हैं मुझे निजी स्तर पर समझ नहीं आते। जो समाज मुक्त हृदय से महाभारत काल में यवनों, शकों, हूणों से सम्बन्ध स्थापित करता है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में यूनानियों से व्यापारिक व बौद्धिक सम्बन्ध स्थापित करता है। प्रथम शताब्दी में ईसा मसीह को भारत आकर ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देता है। दूसरी तीसरी शताब्दी में अरबों से व्यापार करता है वह बौद्ध धर्म के लोगों को लेकर इतना असहिष्णु रहा हो समझ नहीं आता। हाँ यह हो सकता है कि राजे महाराजों ने धर्म का नाम लेकर अपना उल्लू सीधा किया हो और निरीह जनता को बौद्ध व सनातन धर्म के नाम पर लड़ाया हो।
तो हाथ जोड़कर समस्त पाठकों से निवेदन है कि बुद्ध को बुद्ध ही रहने दें और बुद्ध बनें। गौतम बुद्ध न सही बुद्धिमान सही।

स्पीड और सुरक्षा

कितना अच्छा था कि अयारी से गुजरने वाला शाहाबाद पिहानी मार्ग ऊबड़ खाबड़ था। आप हिचकोले खाते हुए चलते थे और कहीं देर से पहुँचने पर हाथ मलते थे। धन्यवाद विधायिका जी का जिनके प्रयासों से फर्राटा भरने वाली सड़क बनी। साथ ही समस्या खड़ी हो गई स्पीड की और सुरक्षा की।
पिछले दो दिनों में सड़क पर लगातार अलग अलग स्थानों पर तीन एक्सीडेंट दो मौतें और कम से कम चार घायल। 
हमारी बहुत बड़ी त्रुटि है कि विकसित होती तकनीक के साथ हम विकसित नहीं हुए। हमें यह तो पता है कि हमारी गाड़ी का एवरेज और अधिकतम स्पीड क्या है लेकिन हमें यह पता नहीं कि कितनी स्पीड पर हमारे लिए खतरा कितना ज्यादा है और वाहन रुकने में कितना समय और शक्ति लेता है। बन्धु सामान्य भौतिक विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि 40 किमी प्रति घंटा की चाल का तात्पर्य 11 मीटर प्रति सेकंड होता है और 60 किमी प्रति घंटे की चाल का तात्पर्य लगभग 17 मीटर प्रति सेकंड होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ऑब्जेक्ट आपको सड़क पर दिखे और आप एक सेकेंड के अन्दर त्वरित क्रिया करें तब भी आप ऑब्जेक्ट को हिट कर ही जाएंगे यदि ऑब्जेक्ट आपसे लगभग 15 से 20 मीटर दूर है। स्पष्ट रूप से आप खतरे में हैं। इस स्पीड पर भी।
दूसरा गति दुगुना बढ़ने से खतरा दुगुना नहीं होता बल्कि चौगुना होता है। E=mv^2 आइंस्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण के अनुसार ऊर्जा द्रव्यमान के अनुक्रमानुपाती और वेग के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होती है। उस हिसाब सवारी डबल तो खतरा डबल लेकिन स्पीड डबल तो खतरा चार गुना ज्यादा। 
इस खतरे को कम कर सकते हैं हेलमेट लगा के सरकार लगातार कह रही है हेलमेट लगाओ किन्तु आप आजाद हैं। तो नहीं लगाते। आप लगा भी लें तो पैदल वाला क्या करे। वह तो निकल लिया आपकी ठोकर से।
तो भैया स्पीड कम करें साथ में सवारियों को संख्या भी सीमित करें बीमित तो करा ही लिया होगा।
सिर्फ इसी सडक़ का प्रश्न नहीं है एक्सप्रेस हाइवे प्रतिदिन दुर्घटनाएं होती हैं किसी भी लेन में चलें वाहन और.रेलिंग के मध्य दूरी लगभग शून्य होती है। झपकी का समय आधा सेकंड और कई लोगों का गन्तव्य वहीं स्थिर। 
अरे भाई समय पर पहुँचने का मतलब गन्तव्य तक पहुँचना रखिए न कि भगवान के घर। मृतकों को श्रद्धांजलि और जो लोग इस लेख को पढ़कर सचेत न हों उन्हें श्रद्धांजलि की डीबीडी।(डबल बेनिफिट डिपाजिट) 

गुरुवार, 12 मई 2022

वृद्धों की उचित देखभाल व उनके दायित्व

प्रायः फेसबुक पर चर्चा होती है कि फेसबुक पर तो माँ बाप की फोटो चेंप देते हैं और फादर्स डे-मदर्स डे मनाते हैं। माँ बाप वृद्धाश्रम में पड़े होते हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि सभी वृद्ध जिनकी संतानें वृद्धों की उचित देखभाल नहीं करतीं वे वृद्धाश्रम में हैं। सच यह है कि बहुत कम ही वृद्ध सौभाग्यशाली हैं जो वृद्धाश्रम में रहते हैं। अधिकांश तो बेटे बहुओं की गाली गलौज सुनते हैं या फिर तंग आकर घरबार  छोड़े हुए सड़कों पर टहलते हैं। 
ये वे माँ बाप हैं जिनमें से कुछ ने अपने बच्चों की बहुत बेहतर ढंग से परवरिश की है। थोड़े बहुत ऐसे भी हैं जो शायद इसी योग्य हैं कि वे बहू बेटों की गालियाँ सुनें। लेखक बहुत दुखी है यह देखकर कि लोग संतानों का तो रोना रोते हैं लेकिन संतान के प्रति उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं। लेखक बड़ा प्रसन्न होता है किसी वृद्ध को तंग देखकर क्योंकि लेखक का अपना अनुभव है। बहुत से मामलों में लेखक ने तंग वृद्धों को देखकर उनका इतिहास खंगाला तो अधिकांश मामलों में यही पता चला कि वृद्धों ने जो बोया वही काट रहे हैं। उन अभिभावकों का क्या जो जुए और पार्टियों में अपना समय गुजार देते हैं। न तो स्कूल की फीस समय पर जमा होती है, न कापी किताबों की उचित व्यवस्था, बालक बालिकाओं के भविष्य को लेकर अध्यापकों से परामर्श, न शुभचिंतकों के द्वारा बालक बालिकाओं की शिकायत किये जाने पर उचित कार्यवाही, बीमार होने पर सही इलाज की उपेक्षा। उन माँओं का क्या? बच्चों को दूध नहीं पिलातीं, पास नहीं सुलातीं, देखभाल आया करती है, कुछ बड़े होने पर बच्चे हास्टल में, भावनात्मक लगाव शून्य। हाँ, बच्चे इतना समझते हैं कि माँ बाप एटीएम हैं जहाँ से पैसा निकलता है। जॉब लग गई तो उसकी भी जरूरत खत्म। पहले तो हम अच्छे माँ बाप बनें तब बनेगी बात। हम न तो अपनी पीढ़ी को मिल बाँटकर खाना सिखा पा रहे हैं, न परिवार में सहयोग सिखा पा रहे हैं, न उनके बन पा रहे हैं और उन्हें अपना बना पा रहे हैं। कुछ लोगों को यह अभिमान कि वे पैसा खर्च कर रहे हैं और कुछ लोग सारी जिम्मेदारी बच्चों पर ही डाल देते हैं।
मुझे यह तो नहीं पता कि बड़े होने पर किसके बच्चे अपने माँ बाप के साथ कैसा बर्ताव करेंगे लेकिन अपने आसपास इतना दिखाई देता है कि बहुत से माँ बाप अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वहन नहीं कर रहे हैं। वे भी कल कहेंगे बच्चों को हमने पालपोस कर बड़ा कर दिया और आज बच्चे हमारी उपेक्षा कर रहे हैं। अरे भाई अभी धरती में एक बीज डालो। हरि इच्छा।खाद पानी मिल गया तो वह पौधा पेड़ बन ही जाएगा। लेकिन एक पौधा जिसकी उचित देखभाल हो तो क्या कहने। पौधा जड़ होता है लेकिन हमारे बच्चे जड़ नहीं हैं। वह हर उस क्रियाकलाप को अपने अवचेतन में बैठा लेते हैं जो हमारे द्वारा नित्यप्रति किया जाता है।
बच्चे अपने प्रति हुए व्यवहार को ही अवचेतन में नहीं रखते अपितु आपके अपने परिवार में अन्य लोगों से कैसे व्यवहार हैं इसे भी अपने अवचेतन में रखते हैं। जो माँ बाप रोज घर में किचकिच करते हों उनके बच्चे बड़े होकर अपने माँ बाप का सम्मान करेंगे इसकी सम्भावना कम ही है। आप अपने भाई बहनों से कटु सम्बन्ध रखें और निज सन्तानों से परस्पर प्रेम व सहयोग चाहें तो कठिन कार्य है।
प्रायः लोग कहानी सुना देते हैं कि एक लड़का था और किसी शहर में डीएम हो गया। उसका बाप उसके ऑफिस पहुँच गया। लोगों ने पूछा तो उसने कह दिया कि नौकर है। तो बाप का पारा गर्म। लोग प्रायः बाप के पक्ष में खड़े होते हैं लेकिन मैं लड़के के पक्ष में हूँ कि लड़के की भी कुछ समस्या रही होगी। मुझे याद है कि मैंने अपने पिता जी को एक दिन चाय बनाकर दी। वह चाय लेकर जमीन पर बिना किसी आसनी के पालथी लगाकर बैठ गए ऐसी उनकी आदत थी और उनके लिए बिल्कुल सामान्य। मैंने उनसे कई बार कहा कि कुर्सी पर बैठेंं या तख्त पर बैठ जाएं। लेकिन मेरा कहना बेअसर। अब मैं जमीन पर उस तरह बैठने का अभ्यस्त नहीं। बहुत क्रोध आया और अंततः मैंने चाय खड़े खड़े टहल कर पी क्योंकि अगर मैं कुर्सी पर बैठ जाता और आप वहाँ पहुँच जाते तो या तो मुझे मूर्ख समझते या अशिष्ट।
मुझे एक अन्य व्यक्ति का किस्सा याद है एक दिन मेरे पास आये और बोले भैया मुझे बहू रोटी सेंककर नहीं देती। यद्यपि मुझे पता था कि बहू ऐसी है नहीं लेकिन फिर भी मैंने अपनी पत्नी से उनकी बहू का पक्ष मालूम करवाया तो पता चला कि घर से लेकर खेत न तो उसका पति कोई सहयोग करता है और न बुड्ढे महाशय। मैंने बुड्ढे को बुलाकर पूछा तो बोले लड़के की नालायकी का हम क्या करें? हमारी अवस्था तो कुछ काम धंधे की रही नहीं कि जानवर चरा लाएं या खेत की रखवाली करें। मुझे कुछ समझ नहीं आया बात आयी गयी हो गई। 
एक दिन बुड्ढे मेरे पास एक समस्या लेकर आए। एक बाग वाले ने उनसे बाग की रखवाली कराई और अब उनकी मजदूरी नहीं दे रहा था। अब मुझे बहुत क्रोध आया लेकिन मैंने उनसे कुछ नहीं कहा सिर्फ इतना पूछा कि मुझे यह बताओ अपना चार बीघे खेत की रखवाली के लिए आपके शरीर में ताकत नहीं है और दूसरे का बारह बीघे का बाग बचाने की ताकत कहाँ से आ गई? बुड्ढे ने न तो मेरी बात का कोई जवाब दिया और न ही वे कोई जवाब देने की स्थिति में थे। 
ऐसा नहीं है कि सारी गलती बड़ों की ही हो बच्चे भी बहुत बार गलत लोगों की संगत में परिस्थितियों वश गलत निकल जाते हैं। हम हर जगह न उनका पीछा कर सकते हैं और न उन्हें बन्धन में रख सकते हैं। 
अन्त में, परिवार सबके सहयोग से चलता है चाहें वे बड़े हों या छोटे। सबको अपने अपने हिस्से के कार्य करते समय दूरगामी परिणाम पर भी सोचना चाहिए।

बुधवार, 11 मई 2022

मुहब्बत का जुनून

नाम कुछ भी रख लें। पाठकों की इच्छा। शीलू, नीलू, सावित्री, सुकन्या कोई फर्क नहीं पड़ता। आज किसी ने बताया कि वह चली गई। चली गई? मतलब। अपने पति और चार बच्चों को छोड़कर चली गई। आश्चर्य है? अभी कुछ दिन पहले रात में जब कुछ लोगों ने उसके घर के बाहर पड़ोस के एक लड़के को देखा था तो मुहल्लेवालों का अंदाजा था कि शायद उसकी बेटी के लिए आया था। शायद उसका उसके साथ कुछ चक्कर था। लेकिन लेखक को लगता है ऐसा कुछ था नहीं?  ऐसा कुछ होता तो अब तक स्पष्ट हो जाता है। गाहे बगाहे लोग उसके बारे में जब तब कहते रहते थे कि अगली चालू है लेकिन लेखक को कभी समझ नहीं आया। लेखक को जब भी मिली भद्रता से मिली। नैन नीचे किये प्रायः पूछती हुई कि गुरू जी बच्चों की फीस बता दो या जमा कर लो। इसके अलावा भी कुछ बातचीत लेकिन ऐसी नहीं कि लेखक चरित्र का आकलन कर सके। 
उसके चार बच्चों में सबसे बड़ी लड़की की उम्र 17 वर्ष, दूसरी लड़की की उम्र 15 वर्ष, तीसरा लड़का उम्र 12 वर्ष और चौथे लड़के की उम्र 10 वर्ष। जिस उम्र में उसके बच्चे प्रेम का पाठ पढ़ना शुरू करने वाले थे उसने पढ़ लिया। अनायास ही अपने बच्चों को जिम्मेदार बना दिया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। पुरुष ने कितनी भी वैज्ञानिक प्रगति क्यों न की हो  लेकिन नारी से सामंजस्य बनाकर रखने का स्थायी फार्मूला वह अब तक नहीं खोज पाया।
अपने पति से इतनी ही असन्तुष्ट थी तो शादी के बाद के बीस वर्ष कैसे निपट गये? यदि सन्तुष्ट थी तो जाने की क्या आवश्यकता? लेकिन वह निकल गई ऋषि विश्वामित्र के आश्रम की मेनका की तरह। मेनका तो आयी थी एक लक्ष्य लेकर इसका तो बस जाने का कुछ लक्ष्य रहा होगा। 
जिस पति से चार बच्चे मिले हों और हमउम्र हो तो यौन सम्बन्ध तो कारण प्रतीत नहीं होते। आर्थिक समस्या तो प्रत्येक परिवार में होती है। संयुक्त परिवार में थी नहीं जो कलह के कारण वह जाती? फिर...
कोई समस्या रही भी हो तो परिवार के प्रति दायित्व का क्या पति के प्रति न सही बच्चों के प्रति तो सोचना चाहिए था। फिर वे बच्चे जिनकी उम्र धीरे धीरे विवाह की हो रही थी और जिन्हें पथ प्रदर्शक की आवश्यकता थी। अच्छा ही हुआ ऐसी माँ यदि बच्चों की पथ प्रदर्शक होगी तो उनका उद्धार ही कर देगी। प्रेम के जाल में फँस जानेवाले भी न जाने किस तरह पत्थर दिल हो जाते हैं कि बस पूछो मत। कुछ भी छोड़ सकते हैं एक मुहब्बत के जुनून के सिवा। माँ, बाप, भाई, बहन, बेटा, बेटी, रिश्तेदार और मित्र की क्या कहें ये अपने व अपने प्रेमी के जीवन की भी परवाह नहीं करते। कहाँ से आती है यह हिम्मत या ढीठता?
लेखक ने अदालत कक्ष के बाहर एक माँ को अपनी बेटी के पैर छूकर मानमनौवल करते हुए और बेटी को निर्लज्जता से प्रेमी के साथ ही जाने की जिद करते हुए देखा है। लेकिन यहाँ तो माँ ही निकल ली। बेटी के बारे में कह सकते हैं कि बीस पचीस की उम्र आगा पीछा कम ही सोचती है लेकिन चालीस पैंतालीस की उम्र तो परिपक्वता की कसौटी है। ऐसे में उसका चले जाना ईश्वर ही समझे या वह स्वयं।
हम सबसे मिलते रहे, जोड़ जोड़ कर हाथ।
किन्तु एक ऐसा मिला, साथ ले गया हाथ।।

रविवार, 20 मार्च 2022

चौराहे

चौराहों से डर लगता है। कई प्रश्न प्रताड़ित करते हैं। किधर जाएं? कौन सा मार्ग अपनाएं? किस साधन से जाएं? किसको साथ ले जाएं? 
यह सब पुराने प्रश्न हैं और तब खड़े होते हैं जब हम सकुशल चौराहे तक पहुँचें। आजकल तो समस्या यह है कि चौराहे तक पहुँचने से पहले ही कदम जाम हो जाते हैं। हम ऐसी भीड़ का हिस्सा हो जाते हैं कि गिंजाइयों (एक गेरुए रंग का आधा से एक इंच लम्बाई का कीड़ा) का खानदान भी शरमा जाए। यदि अनन्तता का अनुभव करना हो तो उत्तर भारत के किसी भी महानगर की सड़कों पर अनुभव कर सकते हो। चलो चौराहा पार हो लें फिर पता चले गलत मार्ग पर आ गए हैं तो बहुत बार सही मार्ग पर आने में इतना समय लगता है और इतनी दूरी तय करनी पड़ती है कि गन्तव्य तक पहुँचने का कोई लाभ नहीं रहता।
हमारा जीवन तो सतत चौराहों की श्रृंखला है। सावधानी बरतें। मैंने एक बार अपने छोटे बेटे के साथ पिहानी से सीतापुर, सीतापुर से लखीमपुर खीरी और लखीमपुर खीरी से शाहजहांपुर तथा शाहजहांपुर से फिर पिहानी की यात्रा की तो एक आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आया कि हर रास्ता लखनऊ की ओर जाता है और वही रास्ता दिल्ली भी जाता है। यकीन मानो इस यात्रा में यह तथ्य जीवन की फिलासफी बन गया। सारे मार्ग भगवान की तरफ और सारे मार्ग शैतान की तरफ। बस हमें यह तय करना है कि हमारा मुँह किधर है और पीठ किधर।
साधन कोई भी हो हर साधन अपने आप में विशिष्ट। बैलगाड़ी और रेलगाड़ी दोनों में कोई तुलना नहीं। दोनों की अपनी उपयोगिता और अपना आनंद। हमें तो बस अपनी रुचि और आवश्यकता पर ध्यान देना है साधन अपने आप में समझ आ जाएगा। जहाँ काम आवे सुई काह करै तरवारि।
जाना अकेले ही है साथ केवल वहीं तक जहाँ से लक्ष्य बिछुड़ जाते हैं सोच बदल जाती है। 

सोमवार, 3 जनवरी 2022

इतिहास तो अंततः सभी का एक ही है


1. "ये मेरा नववर्ष नहीं है, मेरा नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। मैं इसकी बधाई न लूँगा न दूँगा।" 
2. "मैं क्रिसमस की बधाई क्यों दूँ। यह मेरा त्यौहार नहीं है।"
3. "मोमबत्ती जलाकर नहीं, केक काटकर नहीं बल्कि दूध पीकर मंत्रोच्चार के साथ जन्मदिन मनाऊँगा।"
4. "मैं फादर डे , मदर डे, टीचर डे, वैलेंटाइन डे कुछ नहीं मनाता, यह हमारी संस्कृति नहीं है।"
ये सब मैं नहीं कहता। वे कहते हैं जो शर्ट, पैंट और टाई पहनते हैं। बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते हैं। बच्चों को चरणस्पर्श और प्रणाम की जगह गुड मॉर्निंग सिखाते हैं और कुत्ते को डॉगी कहलवाते हैं। सिर पर चोटी गायब है लेकिन तिलक लगाते हैं। परिवार में कोई स्वर्गवासी हो तो सिर घुटाने में शर्माते हैं और सिर्फ कटिंग करा के परिवारी होने का कर्तव्य निभाते हैं। पूजापाठ के अवसर पर पंडित से कहते हैं कि जल्दी निपटाओ। यज्ञोपवीत बस विवाह के आसपास चार दिन पहनते हैं। गौसंरक्षण का नारा और रिक्शेवाले की बेइज्जती दोनों साथ साथ चलते हैं। ऑफिस में लंबा सा तिलक लगाकर बैठते हैं पूर्ण धार्मिक होने का लेक्चर देते हैं और रिश्वत खाते हैं तो डकार भी नहीं लेते। कहो तो खींसेंं निकाल देते हैं।
नीम हकीम खतरेजान। स्वयं को सनातनी कहते हैं किन्तु 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का तिरस्कार कर अन्य समाजों को अपमानित करने का भाव भी हृदय में पाले हुए हैं। हम तो सहिष्णु रहे हैं, हम असफल हो गए संसार को सहिष्णुता सिखाने मेंं। हाँ म्लेच्छों से अमानवीयता सीखकर असहिष्णु होने का अभ्यास करने लग गए हैं। यह अत्यधिक विचित्र है कि हम धीरे धीरे असहिष्णु होते जा रहे हैं और सहिष्णु होने का ठप्पा भी छोड़ने में शर्मा रहे हैं। 
मेरी बात करो तो मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं वैष्णव हूँ? शैव हूँ?शाक्त हूँ?  साईं भक्त हूँ? वेदाचारी हूँ? शिश्नपूजक हूँ? कापालिक हूँ? वैरागी हूँ? आनन्दमार्गी हूँ? या फिर नाग, गन्धर्व, यक्ष, रक्ष, किन्नर, सुर, असुर, देव, दानव, आर्य, द्रविड़ आदि से कोई हूँ। अथवा हूण, शक, यवन आदि में से हूँ। या फिर इस सबका घालमेल हूँ। यह प्रश्न आजकल के सभी तथाकथित धर्म व समुदायों से अपेक्षित है चाहे वे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि भारतीय पृष्ठभूमि के हों अथवा मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि विदेशी पृष्ठभूमि के हों। इतिहास तो अंततः सभी का एक है और मूल भी। इस सबमें मनुष्यता को कहाँ खो दिया?



सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ईश्वर सहायता करे

समय ने कविता के क्षेत्र से राजनीति के क्षेत्र में पटक दिया। एक साधारण अध्यापक हूँ, राजनीति की बारीकियाँ नहीं समझता। न देना जानता हूँ न माँगना। किसी के काम आता हूँ यह भी मुझे नहीं पता। फिलहाल मैं लोगों से काम नहीं ले पाता यह मुझे लगता है। मेरे से किसी का कोई काम हो जाए या किसी को कुछ मिल जाए अथवा मेरा कोई काम किसी से चल जाए यह ईश्वर की अनुकम्पा है। अपना सिद्धांत है अजगर करै न चाकरी
छोटे भाई हैं। आम आदमी पार्टी से 155 विधानसभा शाहाबाद से विधायक पद के प्रत्याशी हैं। व्यवहार कुशल हैं, क्षेत्र में जनप्रिय हैं, विजय प्राप्ति की संभावनाओं और आत्मविश्वास से ओतप्रोत हैं। शिवाजी की भाँति 90 सिपाही लेकर औरंगजेब की 10000 की  सेना से टकराने और पराजित करने का हुनर रखते हैं। दो बार जिला पंचायत सदस्य पद के लिए अपार समर्थन व मत भी प्राप्त कर चुके हैं।
लोगों ने दोनों बार कहा तुम न जीतोगे मगर जीते। इस बार भी लोग अनुमान लगा रहे हैं। इनके आसपास जीतोगे या नहीं जीतोगे का कयास लगाने वालों की बड़ी भीड़ है। जो अपने अपने अनुमान सही होने का दावा करती है। वे लोग तो सबसे आगे बढ़कर भविष्य बताते हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा।  मैं अपने छोटे भाई को वैसे ही जानता हूँ जैसे माँ अपने बालक को। यह भीड़ की नहीं सुनते। इन्हें पता होता है कि यही जीतेंगे। सफलता के लिए यह आवश्यक है। भीड़ भटकाती है और जापान जाने वाले को रंगून पहुँचाती है। अपने सीमित संसाधनों के द्वारा एक बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक अच्छी योजना सदैव फलवती होती है। यह बात इन्हें पता है। इस योजना निर्माण का गुरुतर दायित्व निभाने में मुझे अपना योगदान देना है। ईश्वर मेरा सहायक हो।

रविवार, 28 नवंबर 2021

प्रयागराज या इलाहाबाद

क्यों भैया किसी ने खोजकर बताया नहीं कि इलाहाबाद का नाम इलाहाबाद इसलिए नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह आबाद है। कहानी यह है कि इला नाम है सरस्वती जी का। अब गंगा और यमुना तो वहाँ प्रत्यक्ष हो गईं किन्तु सरस्वती जी थीं अदृश्य तो हमारे जैसे घोंघों ने सॉरी घाघों ने इला+इह+आ+आबाद नाम से उन्हें इलाहाबाद में प्रत्यक्ष कर दिया। सच तो यह है कि अकबर के समय में इसका नाम इलाहावास था। इला+इह+आवास। मतलब देवी सरस्वती इस लोक में निवास करती हैं। आज भी इलाहाबाद के आसपास के लोग इसे इलाहावास ही बोलते हैं। अकबर के सिक्कों पर इलाहावास और इलाहाबाद दोनों खुदे मिलते हैं। मुझे लगता है अकबर ने पहले स्थानीय नाम को खुदवाया किन्तु फिर अरबी फारसी उच्चारण से साम्यता होने के कारण इसे इलाहावास से इलाहाबाद कर दिया। साथ ही अर्थ का अनर्थ भी। कहा तो यह भी जाता है कि इसका नाम इलाहाबाद जहाँगीर के समय से शुरू हुआ।
लोग कहते हैं कि यहाँ तट पर जो किला है उसे अकबर ने बनवाया। मुझे नहीं लगता। क्योंकि अकबर एक भी दिन इस किले में रुका होता तो इस किले में मस्जिद जरूर होती आगरा, दिल्ली और फतेहपुर सीकरी की तरह। अगर हो तो पाठक अवश्य अवगत करायें। उल्टे इस किले में है पातालपुर मंदिर, अक्षय वट व सरस्वती कूप जो हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। अकबर से इस दरियादिली की उम्मीद मुझे तो नहीं है। सत्य के अनुसंधान की आवश्यकता है। 
जो भी हो अगर आप वैराग्य चाहते हैं तो हरिद्वार या उसके उत्तर जाइये, भक्ति की कामना है तो अयोध्या या मथुरा जाइये, ज्ञान की खोज में हैं तो काशी है। किन्तु निस्वार्थ भाव से चाहे प्रयागराज कहें, इलाहावास कहें या इलाहाबाद कहें। यहाँ संगम में डुबकी लगाएं और ज्ञान, भक्ति तथा वैराग्य तीनों को एक साथ पाएं।

सोमवार, 28 जून 2021

कृपया, इसे बच्चों की पहुँच से दूर रखें

प्रायः बहुत सी वस्तुओं के पैक पर लिखा होता है, "कृपया, इसे बच्चों की पहुँच से दूर रखें।" जब से इन्टरनेट आया है तब से प्रायः वीडियो इत्यादि पर लिखा होता है, "बच्चे नहीं देखें।" एक शब्द परिचय में आया, "पैरेन्टल कन्ट्रोल।" तात्पर्य कि मोबाइल या कम्प्यूटर में ऐसी सेटिंग्स कि बच्चों को कुछ सामग्री देखने से रोका जाए। 
एक दिन मेरी संवेदना जाग पड़ी कि इस संदर्भ में भी कुछ लिखा जाए तो कलमघसीटी चालू हो गई। अगर पैक या वीडियो पर चेतावनी न भी दी हो तब भी हमारी प्रवृत्ति है कि हम आदिकाल से बच्चों से बहुत सी चीजें छिपाते चले आए हैं। यह अलग बात है कि हम बच्चों से जो छिपा रहे होते हैं बहुत बार वह उन्हें पहले से पता होता है या वे चीजें उनकी पहुँच में होती हैं।
मुझे एक घटना तब की याद है जब मैं जनरल स्टोर का व्यवसाय करता था। एक दिन एक बच्चा जिसकी उम्र कोई दस वर्ष के अन्दर ही रही होगी मेरे पास कन्डोम का पैकेट लेन आया। तो मैंने उससे दो रूपये लिए और पैकेट दे दिया। बच्चे ने मुझसे पूछा कि इस पैकेट में क्या है? तो मैंने उससे कहा कि वह इस चक्कर में न पड़े और जिसने मँगाया हो उसे जाकर दे दे। किन्तु बच्चा तो बच्चा। उसने कहा कि वह पैकेट खोलकर जरूर देखेगा। मैं क्या कर सकता था? बच्चे ने पैकेट खोलकर देखा और जबरदस्त टिप्पणी की, "अच्छा, अब हम समझे काहे भाभी ने कही हती चुप्पइ हमइ दिअउ आइ कोइक बतइउ ना।" मुझे नहीं मालूम वह बच्चा क्या समझा क्या नहीं किन्तु मुझे उसकी समझ पर शंका भी नहीं।
एक साहब का किस्सा मुझे याद आता है कि उनके पास ऐसा ही एक पैकेट था, बच्चों की पहुँच से दूर रखने के लिए। उन्होंने नौ फुट ऊँची टाँड़ पर डिब्बे को सबसे पीछे हर सामान के पीछे रखा। मगर बच्चे खेलने लगे गेंदबाजी का खेल कमरे के अन्दर और गेंद भी कम्बख्त क्या उछली सीधे टाँड़ पर और डिब्बे के पीछे। बच्चों ने तख्त पर मेज और मेज पर कुर्सी और कुर्सी पर पाटा रखा और लगा दी स्वर्ग में सीढ़ी। मुझे रावण याद आ गया सुना है उसने सोने की सीढ़ी बनवाकर स्वर्ग तक लगाई थी। बच्चों ने हाथ बहुत आगे तक बढ़ाया किन्तु गेंद तो हाथ नहीं आयी नालायक डिब्बा हाथ आ गया।
अगली बार ऐसे ही किसी डिब्बे को बक्स के अन्दर ताला लगाकर रखा यह फार्मूला तो बिल्कुल ही बेकार निकला बच्चा शैतानों का सरदार निकला। छोटा बता रहा था कि बड़का ताले को हाथ लगाये बगैर ही बक्से का माल पार कर सकता है बस एक पेंचकस चाहिए। वह बक्से को आगे से नहीं पीछे से खोलेगा।
अगली बार साहब ने उस डिब्बे को कबाड़ यानी बेकार का सामान जो चलन से बाहर व निष्प्रयोज्य हो उसमें डाल दिया और सोचा बच्चे यहाँ न पहुँचेंगे। एक दिन साहब घर से बाहर और कबाड़ी घर के अन्दर। बच्चे सामान की छँटनी में जुटे तो डिब्बा उनकी नजर से कैसे बचता? 
भइया घर घर है और बच्चे भगवान। भगवान यानी अन्तर्यामी। घर में मेरी पहुँच दो एक कमरों में और बच्चों की घर के कोने कोने में। तो बच्चों की पहुँच से दूर रखना बहुत बड़ा दायित्व है। 
कुछ चर्चा मोबाइल और कम्प्यूटर में पैरेन्टल कन्ट्रोल की। कैसे करें? 
आजकल एक वाक्य कहा जाता है कि शाम को मोबाइल की मेमोरी डिलीट करके सोयें वरना मरने के बाद लोग जान जायेंगे कितना भला आदमी था। अब इसका भी बड़ा विचित्र किस्सा है। एक साहब गोवा पहुँचे, मौजमस्ती की। अपने कैमरे से फोटो खींची। वापसी में उन्हें लगा कि कैमरे में कुछ फोटो सेहत के लिए हानिकारक हैं अतः एक एक कर बहुत सारी फोटो उन्होंने डिलीट कर दीं। थोड़े दिनों के बाद एक कार्यक्रम की फोटोज उसी कैमरे से खींची गईं और असावधानीवश कैमरे की मेमोरी फार्मेट हो गई। तमाम लोगों से राय मशवरे के बाद भी फोटोज वापस आने का कोई रास्ता न सूझा तो एक दिन एक बच्चे ने अपना दिमाग लगाया और कम्प्यूटर में एक सॉफ्टवेयर लोड करके फोटोज रिकवर कीं तो वे फोटोज भी रिकवर हो गईं जो साहब की सेहत के लिए हानिकारक थीं। तो मेमोरी डिलीट करने का फार्मूला फेल है।
फोल्डर या कम्प्यूटर को पासवर्ड भले ही बड़े लोग न तोड़ पायें किन्तु बच्चे खेल लेते हैं पासवर्ड से। मैं क्या तमाम अधेड़ उम्र के लोग बड़े पैमाने पर अपनी कम्प्यूटर और मोबाइल की छोटी छोटी समस्याओं के लिए बच्चों पर ही निर्भर हैं। ऐसे में पैरेन्टल कन्ट्रोल सबसे वाहियात विचार है। प्रायः बड़े ऑनलाइन शॉपिंग की उतनी समझ नहीं रखते जितनी बच्चे। सेटिंग सम्बन्धी मामलों में भी बच्चे बहुत आगे निकल गए। मुझे तो विलियम शेक्सपियर की बात बिल्कुल जमती है, "चाइल्ड इज फादर ऑफ द मैन।" तो भइया एक ही विकल्प है बच्चा हो जाओ और घर में, मोबाइल में या कम्प्यूटर में कोई ऐसी चीज मत लाओ जो बच्चों की पहुँच से दूर रखनी पड़े। एक बात और 
मोबाइल ने बच्चों को बच्चा नहीं रखा।
यहाँ ऐसा कुछ नहीं बच्चों ने नहीं चखा।



बुधवार, 23 जून 2021

कवि की मौलिकता

मेरे एक मित्र का  प्रश्न था , "बंधु क्या कोई भी कवि मौलिक रहा, है या होगा?" मैंने जो उत्तर लिखा शायद वह आपके मतलब का हो।

मौलिक तो केवल ईश्वर है। कविता के सन्दर्भ में मौलिक होना अलग बात है। कविता के दो पक्ष हैं भाव पक्ष और कला पक्ष। कोई कवि अपने अनुभवजन्य हृदयोदगारों को अपने ढंग से प्रस्तुत करता है तो वह मौलिक ही माना जाता है। नये बिम्ब व नवीन उदाहरण का प्रयोग भी मौलिकता की श्रेणी में आता है। होता क्या है जब से फेसबुक आया है और उससे पहले भी लोग दूसरों की कविता अपनी बताकर ज्यों की त्यों सुना देते थे और छोटे समाचार पत्रों इत्यादि में छपवा तक देते थे। जब तब बेइज्जत भी होते थे।
आजकल भी फेसबुक पर कोई अच्छी सी कविता को मिनटों में तमाम कवि अपनी बता  देते हैं। कुछ होशियार किस्म के चोट्टे आजकल शब्दों में थोड़ी बहुत छेड़छाड़ कर कुछ नये शब्द जोड़कर दूसरों की कविता को अपनी बना लेते हैं। छन्द को स्वच्छंद कर कीचड़ से कलाकन्द हो जाने का भ्रम पाल लेते हैं। ऐसी कविता फेसबुक पर लाइक और कमेन्ट की संख्या बढ़ा सकती है किन्तु उसे कितने समय तक लोग याद रखेंगे भगवान ही जानता है। समय की कसौटी पर ऐसे कवि कवि मौलिक अमौलिक किसी भी श्रेणी में नहीं आते। स्वयं ऐसे कवि अपने हृदय पर हाथ रखकर देखें और याद करें कि आज कितनी रचनाएं उन्होंने मनोयोग से पढ़ने के बाद लाइक कीं या उनपर कमेंट कीं। तब यह सोचें कि उनके लाइक और कमेंट में कितने लाइक व कमेन्ट उनकी रचना को पढ़कर हुए होंगे यकीन मानिए बहुतों को अपने कवि होने पर ग्लानि हो जाएगी।
आप मौलिकता-अमौलिकता के चक्कर में न पड़ें। आपके अनुभव में जो आपके हृदय से छनकर आये वह व्यक्त करें तो कोई उंगली नहीं उठायेगा। वैसे भी मैं अनुभव कर रहा हूँ पिछले कुछ समय से आपका पुनर्जन्म हो गया है। एक अच्छा प्रश्न करके मुझे गद्य लिखने को प्रेरित करने के लिए धन्यवाद।

गुरुवार, 10 जून 2021

अगले किसी मोड़ पर

ऐ! गुलब्बो,
ये तय है कि अगले किसी मोड़ पर मेरी तेरी राहें अलग हो जाएंगी। कुछ दूर तक एक दूसरे को शायद देखते भी रहें, किन्तु कहाँ तक? उसके बाद रहेंगी स्मृतियाँँ या वे भी नहीं। सौ वाट का बल्ब जलते ही पाँच वाट के बल्ब पर ध्यान कहाँ जाता है। फिर क्या प्रेम क्या घृणा दोनों को हृदय में रख पाना कठिन हो जाएगा। तो क्यों नहीं वर्तमान को मिठास से भर दें और घृणा का परिहास कर दें। अपने हृदय में झाँककर देखो और प्रेम तथा घृणा को पृथक पृथक पहचानने का यत्न करो। असफल हो गए न। जब प्रेम दिखता है तो घृणा नहीं और जब घृणा दिखाई दी तो प्रेम नहीं दिखाई दिया। क्यों? वास्तव में प्रेम और घृणा का पृथक पृथक अस्तित्व ही नहीं है। वे दोनों तो एक ही हैं। प्रेम और घृणा का एक एक कर दिखाई देना तो हमारी आँखों पर चढ़ी ऐनकों के कारण है। लाल गुलाब हरी ऐनक से बैंगनी दिखता है और पीली ऐनक से नारंगी। किन्तु गुलाब तो गुलाब ही है।
मैंने छोड़ दिया है तुममें भविष्य को देखना तुम भी छोड़ दो मुझमें अपने भविष्य को देखना। रेल की दो पटरियों की तरह साथ साथ होने का भ्रम मत पालो। दूर दूर रहकर भी जब तक साथ दिखाई पड़ रहे हैं तब तक स्लीपरों के सहारे टिके रहने का आनंद उठा लो। जैसे ही जंक्शन आयेगा दोनों का साहचर्य परिवर्तित हो जायेगा। फिर एक दूसरे के मार्ग की स्टेशनें पृथक हो जायेंगी।
तुम्हारा वर्तमान

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