मत किसी से कोई आशा रखना।
मंच तो उसने सजा रक्खे हैं सब,
अपनी ओर से न तमाशा रखना।
मेरे पास उसके लिए एक ही उपहार था,
साँसों की खुशबू थी बाहों का हार था।
चाँदी की दीवार मैं लाँघ नहीं पाया,
ऊँची थी बिल्डिंग और बन्द हर द्वार था।।2।।
कल सभी को मुफ्त में पर्स बाँटे जायेंगे।
हाथ फैलाना सम्भलकर हाथ काटे जायेंगे।
क्या हुआ नाराज हो तो बन्धु ये बतलाइये,
पर्स बनवाने के हित चमड़ा कहाँ से लायेंगे।