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गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

रजगंध पियारी

कैमी का छाॅंड़ि पिहानी बसे हम छॉंड़ि पिहानी बसे हैं अयारी।
पात की भाॅंति उड़ाति फिरे हम धाइ गये जित धाई बयारी।
भावी की बात विधाता को ज्ञात है जाने कहॉं अब होइ तैयारी।
बालपने जेहि भूमि फिरे वही गॉंव-गली-रजगंध पियारी।।
कैमी व अयारी- हरदोई जनपद के गाॅंव
पिहानी - हरदोई जनपद का नगर

भगवानहु ऐहै

काहे को मान गुमान करौं यदि मान गयो अपमानहु जैहै।
आजु भई जो भली या बुरी जेहि गारी दयी जयगानहु गैहै।
शीश पे हाथ धरे करौ सोच न साॅंझि भई तौ विहानहु ह्वैहै।
द्वेष  तजौ   उर  नेह धरौ  उर  नेह   धरे भगवानहु ऐहै।

मंगलवार, 4 जुलाई 2023

अबला-सबला

पलकों पर लाज का भार धरे धरती धँसे नैन कथा रचते।
हिय में जब नेह की ज्योति जले तब संशय रंच नहीं बचते।
अभिमान श्रृंगार का व्यर्थ प्रिये! उपमा-उपमान कहाँ जँचते?
जब प्रेम-प्रसून प्रसारें सुगन्ध सदा तब मन्मथ आ मचते।।1।।

अलकावलि अबला की सबला बलवान हुई उर आहत है।
गजरे के सुकोमल पुष्प छिपा अनुभूत करे कुछ राहत है।
यह नैन शरों क्षतविक्षत है पर सोंच यही कि अनाहत है।
लगे नागिन-वृन्द ये केश समूह न चिंत यहीं रहे चाहत है।।2।।

शनिवार, 27 मई 2023

चाहते जो फायदा

वैद्य का बतावै परी, भीर जौन आय परी,
तबै जी मा चैन परी, हेकड़ी तो न चली।
साँची जो बतैहौ नाइ, दवा ठीक पैहौ नाइ, 
ईश न करी सहाइ, जान जाइ न चली।
चाहते जो फायदा तउ सीखि लेउ कायदा,
तुमसे जो ज्ञानी होय हेरफेर न चली।
बात यहै एक भली बनौ नहीं बाहुबली, 
जैसे कहै उठौ बैठो मनमौज न चली ।।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

चन्द्र

एक चन्द्र नभ राजे, दूजो चन्द्र मुख चन्द्र,
तीजो चन्द्र माँगबेंदी माथ पे दिखानो है।
चौथो चन्द्र पतिदेव सामने जो दीख गए,
करवा में चार चन्द्र मन अनुमानो है।
कौन वालो चन्द्र तुम्हें पूजनो है चन्द्रमुखे!
बार बार यही प्रश्न चित्त उमड़ानो है।
सरल सुभाय किन्तु वाणी में वणिक सी,
बोल पड़ी भानुमती, राज ही छिपानो है।।

साथ ही जिन क्षेत्रों में चन्द्रमा आज दिखाई नहीं पड़ रहा है, उस क्षेत्र की बहनों के लिए अतिरिक्त पंक्ति

रूप लखि चन्द्रमुखिन चन्द्रमा लजाइ के,
सामने न आवे मेघ मध्य जा लुकानो है।।

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

सूर्य महिमा

रस 
रवि के हयों की पदचाप सुने रजनी डग डाल गई मग मेंं।
निंदिया निशि के सँग भाग चली तम छोड़ रहा उजले जग में।
नवजीवन सिक्त हुई धरणी रस फैल गया पशु में खग में।
अब भी मन फूर्त नहीं जिसके गिन लो उस मानव को नग मेंं।।
सूर्य महिमा
नभ मस्तक सूर्य सुशोभित हो निज पन्थ प्रकाश प्रसार करा।
क्षण एक कहीं ठहराव नहीं अविराम निकाम प्रचार करा।
समदृष्टि रखे सबमें सबको निज रश्मि-समूह प्रवार* करा।
नित दान करे बस दान करे कुछ माँग नहीं न प्रहार करा।।
* आच्छादन, ढकना 

शनिवार, 3 सितंबर 2022

गुलाब जल

पापा मम्मी का दुलार भरा हाथ शीश रहे,
आसमां में छेद करो छेद हो ही जाता है।
बीबी और बच्चों की रेड पड़ जाती है जब,
कालाधन सिर पर सफेद हो ही जाता है।
प्रेमिका प्रपंच में जो पड़ गए आप बन्धु,
तन का गुलाब जल स्वेद हो ही जाता है।
कली जो बसंत छोड़ दिन निपटाय रहीं,
बाबा कह जाती हैं तो खेद हो ही जाता है।

मंगलवार, 23 मार्च 2021

फटी हुई जीन्स

फटी हुई जीन्स की आलोचना न करें बन्धु,
हो सके तो सही वेशभूषा को सम्मान दें।
कुतियों के भौंकने पर कान बन्धु देते क्यों,
कोयलों के गुणगान वाला आसमान दें।
कोयले के नाम से काली छवि बने मन,
मन को तो क्षीरसिन्धु का ही ज्ञान-ध्यान दें।
भृष्ट-जन-चिंतन से भृष्टता ही आती तन,
मन में न राम यदि रमा को स्थान दें।।


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रविवार, 7 मार्च 2021

होरी ढिंगै लगी

ऐसिउ का रिस लागि सखे तुम फागुन आयो भुलाइ न पायेउ।
काहे सताइ रहे उनका जिनसे कबहूँ अपनापन पायेउ।
हेरि हिये गलती सब मानिबि द्वारे भले मोरे आयेउ न आयेउ।
होरी ढिंगै लगि द्वेष न केहू से चित्त फटै वह होरी न गायेउ।।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

बिजली का करेंट


ड्रेस एक सुन्दर सी बाल हों सजीले बन्धु,
गमछे पर डालने को सेंट होना चाहिये|
पैरों में भूरे रंग की स्लीपरें हो हल्की सी,
खद्दर के कुर्ते पर पैंट होना चाहिये|
आँखों पे ऐनक हो नाक पर खिसके जो,
पान रंगे होंठ परमानेंट होना चाहिये|
डायस पे डायरी या हाँथ में हो पुर्जी एक,
कविता में बिजली का करेंट होना चाहिए|
 



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रविवार, 14 मई 2017

माँ


२७/०३/१९९५
बिन्दु से शब्द का अर्थ है सिन्धु सा वर्णों में ॐ से भी यह बढ़कर।
केवल मानव प्राणि नहीं सुर पूजित देवों में देवों से बढ़कर।
नाम लिये अपनेपन का अहसास पवित्र उठे उर कढ़कर ।
सत्य कहूँ कुछ झूठ नहीं नहीं थोड़ी भी बात करूँ बढ़ चढ़कर।।1।।
माँ जननी सुखदायक पोषक प्राण पिलाकर पालन हारी।
जन्म की पीड़ा से काल डरे निज अंग सहे अबला महतारी।
सूखे बिछौने सुला सुत को खुद भीगे में जाग के रात गुजारी।
कौन है त्याग मयी कहो माँ सम कौन द्वितीय है सृष्टि पुजारी।।2।।
माँ फिर फिर माँ कहिये कहो ऐसी मिठास कहाँ तुम पाओगे।
बार हजार करो त्रुटियाँ पर कण्ठ से फेरि किसे मिल पाओगे।
माँ को कभी ठुकराया अरे तब प्रेम का फिर परिवेश न पाओगे।
आँचल माँ का भले सस्ता पर मोल नहीं चुकता कर पाओगे।।3।।
केवल पालन पोषण ही नहीं ज्ञान के बीज हिये बिखराती।
शिक्षित सभ्य बना सुत को इस जीवन का सन्मार्ग बताती।
लायक पुत्र को शेर बना कुल के यश का विस्तार कराती।
किन्तु है खेद जलाकर दीपक नित्य घने तम में रह जाती।।4।।
माँ ममता से भरी गगरी छलकी जिस देह वही समझे।
स्वर्ग बसा चरणाम्बुजों में जिसको पद नेह वही समझे।
लोरियों में सत जीवन की धुन है जिस गेह वही समझे।
माँ छवि दर्शन के सुख का जिसको परिवेश वही समझे।।5।।
व्यष्टि न माँ को कहें तो भली यह एक पवित्र समष्टि का मूल है।
स्वयं रही अबला जननी पर वीर सपूतों की राशि अमूल है।
नाहक नारि प्रताड़ित है जन आज हुआ उसके प्रतिकूल है।
भूलो नहीं अरे माँ के ऋणी तुम सिर्फ़ नहीं यह सृष्टि समूल है।।6।।

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

पतिंगा और हम

बारि बारि दिया हम, राखे थे मुंडेर पर,

करिहैं जो उजाला तौ, जीव हित होई।

किन्तु जो पतिंगा रहे, धाइ धाइ ज्वाला धंसे,

देखि पंख मूड़ जरे, गयो चित रोई।

पग पग पुंगा लोग, कौशल का ठेका लिए,

विद्वता के बीज रहे, पुलकित बोई।

हमहूँ प्रतिज्ञा करी, तन जान रहे धरी,

छोड़िबो न धर्म निज, करै कित कोई।।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

ढंग के कपड़े



साज सिंगार प्रभाव विचित्र कभी मन में अनुमान किया करो।
ओ! सजनी! तन वस्त्र धरे पर श्री छवि का धरि ध्यान लिया करो।
रूपसि रूप की पारखी हौ तुम तो पटुता के प्रमाण दिया करो।
सृष्टिज अंग मिला सुभगे निज शक्ति अमूल्य का मान किया करो॥१॥
तन ढाँप रहे ढंग के कपड़े बहू बेटी के बीच का भेद बतावैं।
रमणी दल बेढँग वस्त्र धरे गणिका-गण का अहसास करावैं।
पहिनावा लखे जन वाद करें जननी और सास के चिन्ह गिनावैं।
ननदी और भावज भेद कहाँ पहिराव में बुद्धि सुजान सुनावैं ॥२॥
देखा अभी था तो हूक उठी कसके इसको निज अंग लगाऊँ।
देख रहा अब तो हिय में चरणाम्बुज धो चरणामृत पाऊँ।
था मन में कि कपोल छुऊँ अब है मन में निज शीश चढ़ाऊँ।
है पहिनावे में ये क्षमता कुलदीपिका से कुलहीना कराऊँ॥३॥

हमारीवाणी

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