शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

चुनाव चर्चा


उत्तर प्रदेश के सहित ५ राज्यों में विधानसभाओं के चुनावों कि अधिसूचना जारी की जा चुकी है नेता लोग जोड़ तोड़ में जुट गये हैं लिहाजा अब से दो ढाई महीने चुनाव की गहमागहमी रहेगी। नेता लोग वोटरों को लुभाने रिझाने और खरीदने में लग गये हैं ऐसे में जो मुझे सूझ पड़ा तो कुछ एक दोहे हाजिर हैं।
डेट इलेक्शन की हुई, जब से घोषित मित्र।
गाँव गली औ’ शहर के, बदले तब से चित्र॥१॥
कल तक थे उस ओर जो, आज इधर की ओर।
पाले बदले जा रहे,बदल रहे हैं छोर॥२॥
अपनी अपनी ताक में,हर नेता है व्यस्त।
पब्लिक तब भी त्रस्त थी, पब्लिक अब भी त्रस्त॥३॥
अपनी अपनी खूबियाँ,गिना रहे हैं लोग।
हर इक करना चाहता, विधायिका में योग॥४॥
नेता जी की खासियत, पब्लिक समझे खूब।
झूठ दगा मक्कारियाँ, हैं इनकी महबूब॥५॥
चोर लुटेरों के करों, पहुँच गया जन्तन्त्र।
जनता की लाचारियाँ, चबा रहा धनतन्त्र॥६॥
कौन चुने किसको यहाँ, ये चुनाव है खेल।
नेता ही बिकते नहीं, वोटर की भी सेल॥७॥
साड़ी-मोबाइल बँटे, बँटी पायलें पर्स।
दारू उतरी गले से, बदल गये निष्कर्ष॥८॥
लोकतन्त्र रस्साकशी, सँख्याबल की आस।
ऐ! वोटर घबरा नहीं, जिधर मिले चर घास॥९॥



गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

अन्ना हजारे


अन्ना जैसे देश में, सौ दो सौ हो जायें।
सत्य मानिये भ्रष्टजन देश छोडकर जायें॥१॥
बूढ़े की हुँकार पर, जागा सारा देश।
भ्रष्ट व्यवस्था से घृणा, जन जन में आवेश॥२॥
अन्ना गाँधी से अधिक, मेरे लिये महान।
गाँधी गैरों से लड़े, वह अपने इन्सान॥३॥
अन्ना तुम युग युग जियो, रहो हमेशा स्वस्थ।
मार्ग दिखाओ लोक को, कभी न करना प्रस्थ॥४॥
लोकपाल हित आपने, किया हठी सन्घर्ष।
भारत का कण कण हुआ,पूर्ण हर्ष उत्कर्ष॥५॥
जन की ताकत चीज क्या किया आपने सिद्ध।
घबराये काँपे बहुत, राजनीति के गिद्ध॥६॥
बूढ़ी हड्डी आपकी, युवकों सा उत्साह।
भूखे रहकर आपने, दी लड़ने की राह॥७॥
गाँधी के हथियार को दिया आपने मान।
जँग लग रही थी वहाँ, रखी आपने शान॥८॥
पुनः आपकी कृपा से , गाँधी के सिद्धान्त।
प्रासंगिक लगने लगे, अब तक जो थे शान्त॥९॥

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

पिहानी


प्राणों से प्यारी ये पिहानी की पवित्र भूमि,
जन्मभूमि श्याम रँग राँचे रसखान की।
कभी जो दमिश्के अवध नाम से विख्यात रही,
नहीं मोहताज है ये झूठे गुणगान की।
छाते मशहूर किसी काल में पिहानी के थे;
वीरों में प्रसिद्धि थी तेगों की शान की।
आजकल की दोषपूर्ण राजनीति से बची,
एक है पिहानी अभी हिन्दू मुसलमान की।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

Anna Hazare and Indian government


मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

अब गनीमत है


आज विज्ञापन में पढ़ा कि अब टी ई टी अभ्यर्थियों को किसी भी जिले से आवेदन करने की अनुमति है और उन्हें केवल एक जिले से बैंक ड्राफ़्ट लगाना होगा शेष जिलों के लिय़े उन्हें ड्राफ़्ट की फोटोकापी लगानी होगी यह अभ्यर्थियों के लिये बहुत बड़ी राहत है इस राहत के जिम्मेदारों को धन्यवाद। किन्तु अभी कसर है होना यह चाहिये था कि अभ्यर्थियों से आवेदन भी एक ही माँगा जाता प्रदेश स्तर पर और उन्हें डाक खर्च में भी राहत प्राप्त हो जाती। अगर ऐसा हो जाये तो सोने मेम सुहागा हो जायेगा।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

विचार


विचार तो खालीपन में ही आता है। ये बात और है कि खाली दिमाग शैतान का घर कहा जाता है।

किसी जमाने में भारत देश में एक बादशाह हुआ मुहम्मद तुगलक कहते हैं कि बड़ा ही सिरफिरा बादशाह था। वह इतिहास तो लिख लिया गया क्योंकि वह एक था आज का इतिहास कैसे लिखा जायेगा जिधर नजर दौड़ाइये तुगलक ही तुगलक  नजर आते हैं। किसी और क्षेत्र की बात हो तो बात हजम हो जाती है मगर जब बात शिक्षा के क्षेत्र की होती है तो बात हजम नहीं होती।
मैंने अपने लेख टी ई टी की नौटंकी शीर्षक की पोस्ट में लिखा था कि सरकार टी ई टी के अभ्यर्थियों को मूर्ख बना रही है जो प्रति अभ्यर्थी तीन जिलों से आवेदन भरवा रही है किन्तु मैं अब क्या लिखूं जब मैने जाना कि उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रति अभ्यर्थी पांच जिलों से आवेदन के लिये विज्ञापन निकाला है।
केवल इतना ही होता तो भी गनीमत थी अभ्यर्थी हाईकोर्ट पहुंचे अर्जी लेकर कि उन्हें किसी भी जिले से मनमाफिक संख्या मे आवेदन करने दिये जायें मैं पूछना चाहता हूँ कि आखिर कितनी बेइज्जती करवाओगे कोर्ट से डिमाँड तो यह करनी चाहिये थी कि उन्हें आवेदन करने कि प्रक्रिया से ही छूट प्रदान की जाये और यदि आवेदन भरवाना आवश्यक ही हो तो प्रदेश लेवल पर फार्म भरवा कर कौंसिलिंग करानी चाहिये इससे अभ्यर्थियों क काफी समय, श्रम और पैसा बच जाता। अब इस तरह सरकार की आमदनी तो बढ़ जायेगी किन्तु अभ्यर्थियों पर बहुत अधिक बोझ बढ़ जायेगा। इतना ही निवास के संदर्भ में जो शपथ पत्र माँगे गये हैं वह भी अनुचित ही है ऐसे शपथ पत्र अथवा प्रमाण पत्र कौंसिलिंग के समय माँगे जाने चाहिये। फिर अभ्यर्थी जब नौकरी से पूर्व निवास प्रमाण पत्र बनवाकर जमा करेगा तब ऐसे शपथ पत्र का औचित्य समझ में नहीं आता। फिर यह शपथ पत्र तो लेखपाल और कानूनगो को देना चाहिये कि उन्होंने सही रिपोर्टें लगाईं हैं तथा तहसीलदार को देना चाहिये कि उन्होंने सही सर्टीफिकेट जारी किय़ा है।
वैसे भी हिन्दुस्तान में कोई भी सर्टिफिकेट फर्जी बनवाना हो सरकारी कुत्ते आसानी से बना देते हैं लेकिन अगर सही सर्टिफिकेट बनवाना हो तो नाकों चने चबाने पड़ते हैं। आखिर निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिये इतनी जटिल प्रक्रिया की क्या आवश्यक्ता है पहले निवास प्रमाण पत्र के लिये आवेदन के साथ शपथ पत्र लगाओ फिर दो गजेटेड अधिकारियों से प्रमाणित कराओ तब लेखपाल व कानूनगो को क्रमशः पूजो। और हफ्ते भर में हासिल करो प्रमाण पत्र। अब कोई मुझे बताये कि क्या शपथ पत्र झूठा नही दिया जा सकता, आखिर गजेटेड अधिकारी के पास कौन सा रिकार्ड होता है जिससे वह परिचय दे सकता है यदि परिचय देने का आधार व्यक्तिगत जान पहचान है कृपया कोई गजेटेड अधिकारी ही मुझे बता दे की वह अपनी नियुक्ति वाले क्षेत्र में कितने हजार लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता है। शायद कुछ सैकड़ा लोगों को भी नहीं जबकि हजारों की संख्या में लोग आय जाति निवास प्रमाण पत्र रोज बनवाते हैं तो ऐसे में उसके परिचयदान पर कितना भरोसा किया जा सकता है। मैने तो यहाँ तक भोगा है कि इस परिचयदान को पैसे देकर हासिल किया है।
वास्तव में निवास की तस्दीक कर सकता है स्थानीय निकाय जैसे ग्राम पंचायत, नगर पालिका, क्षेत्र पंचायत, टाउन एरिया आदि। अथवा पोस्टमैन सबसे बेहतर है।
मेरा निवेदन है कि सम्बन्धित लोग मुझ अल्पज्ञ की बातों पर ज्यादा नहीं थोड़ा सा ही विचार करें कुछ अनुचित कह हो तो क्षमा करें।

बुधवार, 30 नवंबर 2011

झूठ बोलना


कक्षा के सामने से गुजरते हुए प्रधानाचार्य जी की नजर जब शोर मचाते हुए बच्चों पर पड़ी तो उन्होंने डपट कर पूछा, "किसका पीरियड है? "स...सर! अंग्रेजी का," बच्चों ने सहमकर उत्तर दिया। "कौन पड़ाता है?" "सर! मिश्रा जी सर!" प्रधानाचार्य जी ने मिश्रा जी को बुलवाया और बच्चों को पढ़ाने के लिये कहकर चले गये।
मिश्रा जी ने बच्चों को डाँटा "बड़े गधे हो, अपने अध्यापक के सम्मान में इतना ही कह देते कि पीरियड खाली है। कम से कम मेरी डाँट तो नहीं पडती बड़े हरिश्चन्द्र बने फिरते हो। उन्हीं मे से एक बच्चा अपने घर आया और उसकी माँ ने पूँछा,"बेटे आज स्कूल मे क्या सिखाया गया?" "बच्चे ने मासूमियत से जवाब दिया, "माँ झूठ बोलना।"

शनिवार, 26 नवंबर 2011

टी ई टी की नौटंकी


उत्तर प्रदेश में टी ई टी के रिजल्ट घोषित हो गये हैं और सरकार एक बार फिर बेरोजगारों से मजाक करने के मूड में है खबर है कि एक दो दिन में विज्ञापन जारी किये जायेंगे फिर आवेदन माँगकर अध्यापकों की भर्ती की जायेगी एक आवेदक ३ जिलों से आवेदन कर सकता है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि आखिर छल करने के लिये सरकार को बेरोजगार ही मिले थे।अव्वल तो एक विद्यार्थी जिसने ग्रेजुएट की परीक्षा पास करके बी एड या बी टी सी की एन्ट्रेन्स परीक्षा पास करके उसने बाकायदा ट्रेनिंग ली है फिर अध्यापक होने की योग्यता उसने हासिल की है। उसका टी ई टी के नाम पर एक और इम्तहान ही गलत है। दर असल टी ई टी की परीक्षा भारत की सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था पर एक ऐसा करारा तमाचा है जो हमारे देश के अकल के अन्धे नीति निर्धारकों को महसूस नहीं होता।
सरकार के द्वारा इस परीक्षा का आयोजन यह बताता है कि हमारे देश के नीति नियन्ता एक ऐसी शिक्षा व परीक्षा व्यवस्था देने में नाकामयाब रहे हैं जिसमें से होकर अच्छे स्टूडेन्ट बाहर निकलें ताकि बार बार उनकी परीक्षा की आवश्यकता ही न रहे तथा संस्थानों के द्वारा जारी सर्टीफिकेटों पर विश्वास किया जा सके।

वास्तव में शिक्षा व्यवस्था इस कदर चरमरा गई है कि आज बिना एक भी दिन स्कूल में जाये हुए भारत खासकर यू पी में कोई भी डिग्री हासिल की जा सकती है। ऐसे में क्या गारंटी है कि इस परीक्षा के बाद अच्छे अध्यापक विद्यालयों को हासिल होंगे। वास्तव में सरकार बेरोजगारों से कमाई करने में लगी है आवेदन फार्म भरवाने के नाम पर। जितनी ज्यादा बार आवेदन फार्म भरे जायेंगे उतनी बार आवेदकों से शुल्क वसूला जायेगा।

अच्छा होगा कि एक ऐसी ईमानदार शिक्षा परीक्षा प्रणाली विकसित की जाये जिससे अच्छे विद्यार्थी बाहर निकलें जिनकी अंकतालिकाओं पर विश्वास किया जा सके और उन्हें बार बार परीक्षाओं से न गुजरना पड़े। फिलहाल टी ई टी के बारें में इतना चाहूँगा कि अब जो पास हो गये हैं उनसे कोई आवेदन न भरवाकर मेरिट के आधार कौंसिलिंग करा ली जाये और क्रम से आवेदकों की च्वाइस पूँछ्कर उन्हें जिले व स्कूल आवंटित कर दिये जायें तो सरकार की बड़ी मेहरबानी होगी।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

शरद पवार को थप्पड़


कृषि मन्त्री शरद पवार को थप्पड़ मारना लोकतन्त्र में एक निन्दनीय घटना है तथापि हमारे नेताओं को यह सोंचना पड़ेगा कि आखिर ऐसा करने के लिये  के जिम्मेवार कौन है लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले तब कहाँ होते हैं जब वे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना भूल जाते हैं और पब्लिक देखती है कि एक ओर वह त्रस्त है और नेता लोग मौज उड़ाते हैं। 

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

पिहानी हरदोई मार्ग


आज दिमाग में आया कि कुछ आस पास के बारे में लिखा जाये सामने नजर उठाकर देखा तो सड़क पर एक बोर्ड लगा था पिहानी हरदोई मार्ग। सड़क पर एक निगाह डाली इसलिये कि कुछ खास नजर आ जाये मगर यह सड़क भी जिले की दूसरी सड़कों की तरह ही टूटी फूटी नजर आई। समझना मुश्किल कि सड़क में गड्ढे या गड्ढों में सड़क। ऐसा तब है जब कि इस जिले में ९ विधान सभा क्षेत्र हैं और सभी पर सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के विधायक सत्तासीन हैं।
आपको क्या लगता है कि यहाँ के विधायक सो रहें हैं जी नहीं। जो सत्ता के नशे में चूर होते हैं उन्हें यह पता नहीं होता कि किन वायदों के साथ वे सत्ता में पहुँचे।

रविवार, 20 नवंबर 2011

तुम फिर आ गये



तुम फिर आ गये, चेहरा बदल कर।
चिन्ह बदल कर दल बदल कर।
यह तो नहीं चाहा था, कि इतनी जल्दी लौट आओ।
जिस वायदे के साथ भेजे गये थे, निभाना तो दूर याद भी न रख पाओ।
तुम कुछ सैकड़े लोग, पाँच साल भी इकट्ठे रह नहीं पाते।
तो सवा अरब जनता की एकता अखण्डता को कैसे सँभाल पाओगे।
मन्त्रालय कि फाइलें बेच आये हो देश को कैसे नहीं बेच खाओगे।
मेरे प्रश्नों के उत्तर दे दो तो वोट पाओगे अन्यथा लोकतान्त्रिक ढँग से पीटे जाओगे।
तुम फिर आ गये, चेहरा बदल कर।
चिन्ह बदल कर दल बदल कर।

मन्जिल


रास्ते बन्द हैं वे सब जिन्हें मन्जिल से मेरी वास्ता।
फिर भी यह गनीमत है कहीं तो मेरी मन्जिल है।
साथ कोई हो न हो जाना तो जरूरी है।
पथ में रोशनी हो या अँधेरा फूल या काँटे।
जानता हूँ तुम सदा ही साथ हो,
कैसा भय कैसी तनहाई, काँटे क्या अन्धेरा क्या?

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

पंछी उड़ जा


इस पल दो दानों का लालच, फिर आजीवन पराधीनता।
पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा,
उधर नीड़ में कोई तेरा पन्थ हेरता होगा।
मम्मी पापा कह कह कातर स्वरों टेरता होगा।
तेरे मुहँ में जो भोजन है क्या पर्याप्त न होगा।
यह दाने तो माया मृग हैं, ठीक नहीं है इधर लीनता।
पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा पंछी उड़ जा|
सड़क
दूर क्षितिज पर जहाँ एकाकार है धरा और अम्बर, सड़क निज के समाप्त होने की प्रतीति देती है, किन्तु होती नहीं समाप्त।
ध्येय पर पहुँच कर भी बढ़ लेती है अन्यत्र किसी दूसरे ध्येय की ओर जिस पर चलने को आतुर होते हैं पथिक।
ऐसी ही किसी सड़क पर मैं तुम और सारा संसार गतिमान है।
चलते रहो यही जीवन का साधारण सा अंकगणित है।
जिसने समझा उसी ने विकास के प्रतिमान गढ़े।
बटमारों के प्रति
तुम भी कितने हो दीन मित्र, खाना पड़ता है छीन मित्र, सुनते न काल की बीन मित्र, मति से पैदल यश हीन मित्र।

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

मोबाइल


मोबाइल भी क्या अजब गजब चीज आ गई।
जिन्दगी का चैनो सुकूँ शान्ति खा गई।
दो से छ्त्तीस हो गए बिस्तर पे हम दोनों।
फोन उनके हाथ में था काल आ गई।
काल आ गई तो साली काल आ गई।
तीन दिन से मेरा रोटी दाल खा गई।
छोटी साली घर पे मोबाइल की चिपकू आ गई।
हफ्ते भर की आय के रिचार्ज खा गई।
गुमनाम नम्बर से कोई करता है परेशान।
पूछता है बाबू जी फाईल कहाँ गई।
मिसकाल आधी रात को करता है वेवजह।
पूछ्ता है ट्रेन किस नम्बर पे आ गई।
बात पन्डित से करो मैसेज मिला मुझे।
काल छः मिनट कि छत्तीस चबा गई।
लोग मोबाइल पे क्या क्या बेचते हैं आजकल।
स्वास्थ्य, बीमा, कार, भूमि, यन्त्र जादुई।

आदमी की औकाति
पपुआइनि गुर्रानीं पप्पू मिमियाने,
आदमी की औकाति उनसे हम जाने।
पप्पू जो बोलैं वह जाइ रही थाने,
घरेलू हिंसा दहेज उत्पीड़न सैकड़ों बहाने।

शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

नवीन संस्कृति


आज अपनी संस्कृति का पतन होता जा रहा,
हर तरफ पर संस्कृति का नशा छाता जा रहा।
है यही वह देश प्यारे विश्व का जो था गुरू।
अपनी  गरिमा का इसे अब तो पता तक न रहा।
माँ बाप के सम्मान सूचक शब्द भी अब खो गये।
माता बनी मम्मी पिता जी डैड कैसे हो गये।
आशीष पाते थे बड़ों के पैर छूकर के जहाँ।
टाटा, हैलो और हाय में हम आज कैसे खो गये।
हम आधुनिक बनने की खातिर क्य न करते फिर रहे।
अच्छे भले कपड़ों में भी पैबन्द कैसे जड़ रहे।
सोचा न था फैशन परस्ती ऐसे दिन दिखलायेगी।
रूमाल भर कपड़े में ही औरत पूरी ढक जायेगी।
नारी का आभूषण है लज्जा बात थी प्रचलित यहाँ।
पर फैशनों के दौर में हैं नारियाँ विचलित यहाँ।
सबसे अलग मैं ही दिखूँ ये होड़ इनमें लग रही।
अतएव लज्जा सो गयी निर्लज्ज्ता है जग रही।
                         अनंत राम मिश्र
                    ग्राम-औड़ेरी, तहसील-शाहाबाद
                      जिला-हरदोई (उत्तर प्रदेश)
                              भारत


बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

जीवन में सन्तुलन


एक शिशु बाल्यावस्था,  किशोरावस्थायुवावस्था तथा प्रौढ़ावस्था से गुजरते हुए कब वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाता है प्रायः व्यक्ति इस गतिशीलता से अपरिचित रह जाता है। शैशवावस्था व वाल्यावस्था को छोड़कर प्रायः वह , " जब से मैने होश संभाला अब तक बुद्धि नहीं आई ," "मेरे पास सब कुछ है किन्तु फिर भी कहीं कुछ कमी है," मैंने जीवन में बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया" जैसे जुमले बातचीत में प्रयोग किया करता है किन्तु शब्दों में इनका अर्थ व्यक्त नहीं कर पाता। ऐसा क्यों है कि सम्पूर्ण जीवन भर सीखने वाला अन्त तक अशिक्षित रह जाता है। जीवन भर धन सम्पदा का संचय करने वाला मात्र रिक्त हस्त ही नहीं अपितु आधे अधूरे मन से इस संसार से कूच कर जाता है।



समस्त घटनाओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। आधिदैविकआध्यात्मिकऔर आधिभौतिक। आधिदैविक घटनाओं को हम उपलब्ध ज्ञान - विज्ञान व उपकरणों  की सहायता से समझ नहीं सकते। ऐसी घटनाओं मे कार्य कारण सम्बन्ध की सिद्धि असम्भव होती है। इनका प्रभाव शरीर व मन दोनों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। उदहरणार्थ - अटलांटिक महासागर में बरमूडा त्रिकोण क्षेत्र जहाँ समुद्र में जलयान व वायुयान अचानक गायब हो जाते हैंकुछ वर्षों पूर्व भारत सहित अनेक देशों में शिव परिवार की मूर्तियों द्वारा दुग्धपान , अमरनाथ की गुफा में बर्फ के शिवलिंग के निर्माण व उत्तर प्रदेश में मुँहनोचवा जैसी घटनायें विज्ञान की समझ से परे हैं। वैज्ञानिक मात्र तर्क प्रस्तुत करते हैं किन्तु घटनाओं का एक मत से यथार्थ कारण प्रस्तुत करने में असमर्थ रहते हैं। आध्यात्मिक घटनायें मनुष्य के मन श्रद्धा आस्था विश्वास ध्यान योग धर्म भगवतभक्ति आदि से सम्बन्धित हैं। इनमें कार्यकरण सम्बन्ध स्थापित करना एक सीमा तक सम्भव होता है। इनका प्रभाव पहले मन पर पुनश्च शरीर पर पड़ता है। बुद्ध द्वारा अन्गुलिमाल का हृदय परिवर्तनऋषि उपदेश द्वारा वाल्मीकि का पथ प्रदर्शनसम्मोहनतन्त्र मन्त्रधार्मिक अनुष्ठानयज्ञ इत्यादि आध्यात्मिक घटनायें हैं।
   आधिभौतिक घटनाओं में जीवन की सामान्य दैनिक वृत्तियाँ सम्मिलित हैं जिनमें कार्यकारण सम्बन्ध व्यक्त करना सरल होता है तथा जो प्रथम शरीर को तदनन्तर आत्मा को प्रभावित करती हैं। सामान्य मनुष्य को आधिभौतिक घटनायें ही सत्य प्रतीत होती हैं अन्य काल्पनिक या  मिथ्या। यही मनुष्य के अधूरेपन का कारण है। जो मनुष्य सभी प्रकार की घटनाओं को एक साथ रख कर विश्लेषण कर उनके प्रति सन्तुलन स्थापित कर लेते हैं वे सन्तोष क अनुभव करते हैं और सन्तोषी का पात्र कभी रिक्त नहीं होता।
मनुष्य प्रायः हानि की स्थिति में भाग्य जैसी आधिदैविक शक्ति को दोष देते हैं तथा विधाता को शायद यही मन्जूर थाभगवान गरीबों के साथ न्याय नहीं करता या ईश्वर ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं किन्तु जब लाभ की स्थिति में होते हैं तो कर्म जैसी आधिभौतिक शक्ति का आश्रय लेकर यह तो मेरे ही वश कि बात थीमेरी बराबरी का दम किसमें हैमेरी जगह कोई और होता तो मिट गया होता या भाग गया होता जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं। मनुष्य विस्मृत कर देता है कि उनके लाभ हानि में अनेक मनुष्यों की आकांक्षाओंसदिच्छाओंप्रेरणाओंप्रोत्साहनोंनिन्दाआशीर्वाद इत्यादि अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का भी हाथ है। यदि मनुष्य किसी हानि लाभ के पीछे स्थित तीनों (दैविकभौतिकआध्यात्मिक) शक्तियों के प्रभाव का यथार्थपरक आकलन कर लें तो वे सुखे दुखे समे कृत्वk लाभा लाभौ जया जयौ की स्थिति को प्राप्त कर लें तब कोई सूनापन न रहेगा।

वास्तव में संसार का कोई भी मनुष्य न तो पूर्णतः सफल होता है न पूर्णतः असफल। उदाहरणार्थ महात्मा गाँधी ने सत्यअहिंसा व प्रेम का दर्शन प्रतिपादित ही नहीं किया अपितु उसे अपने जीवन में उतारा भी । इसी दर्शन को हथियार बनाकर उन्होंने स्वतन्त्र्ता संग्राम में अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया किन्तु जीवन के अन्तिम दिनों में राष्ट्र विभाजन की त्रासदी ने उन्हें मर्माहत कर दिया कि उन्हें लगा कि उनका जीवन व्यर्थ गया।
आप बाजार गये मोलभाव किया किन्तु खरीदा कुछ नहीं। एक अर्थ में आप खाली हाथ वापस आये किन्तु आपके साथ बाजार के अनुभवमस्तिष्क में अंकित वस्तुओं के भावआपकी मोलभाव कर सकने की क्षमता में वृद्धि क्या कम हैजो भविष्य में लाभ पहुचायेंगे। कोई खरीददारी करके बाजार से लौटा उससे आपको ज्ञात हुआ कि जो वस्तु वह दस रूपये में खरीद लाया है उसे आप पाँच रूपये में तय करके छोड़ आये हैं। लाभ मे कौन रहा जिसने कुछ खरीदाउसे पाँच रूपये की हानि हुई किन्तु वह लाभ में है कि उसने बाजार में समय नहीं गवाँया। आप लाभ में हैं आपने बाजार को जाना किन्तु आप हानि में हैं आपने कोई वस्तु नहीं खरीदी और समय गँवा दिया। दोनों के लिये यथार्थतः प्रसन्नता या अप्रसन्नता का कोई कारण नहीं है।
   आधुनिक युग में धन साधन न होकर साध्य की भूमिका ग्रहण कर चुका है। जीवन तनावपूर्ण है। कार्य व अवकाश के मध्य कोई सन्तुलन नहीं है। आलस्य शरीर का शत्रु है किन्तु अति सर्वत्र वर्जयेत अति श्रम स्वास्थ्य व मनःशान्ति का नाशक है। स्वास्थ्य लाभ के लिये परिश्रम व विश्राम दोनों का अपना महत्व है।
अधिक धन कुकृत्यों से एकत्र होता है जो स्वयं को तथा संतति को पतन की ओर ले जाता है। फिर अधिक धन संचय की आवश्यकता ही क्या हैपूत सपूत तो क्या धन संचय पूत कपूत तो क्या धन संचयसुपुत्र आवश्यकतानुसार धनार्जन कर लेते हैं जबकि कुपुत्र संचित धन को विनष्ट कर आत्मा को क्लेश पहुँचाते हैं तब अपने कुकृत्यों पर पछ्ताने का अवसर भी नहीं मिलता।संसार में सभी कार्य धन से संपन्न होते हैं सर्वे गुणाः कांचनम आश्रयन्ते किन्तु दैवगति धन से नहीं टाली जा सकती। धनबल से अनैतिक कार्यों पर आवरण डाला जा सकता है किन्तु देर सबेर कर्मफल से नहीं बचा जा सकता है। धनबल चाटुकारों को शरण दे सकता है किन्तु सच्चे मित्रों को आपका सद्व्यवहार ही आकर्षित कर सकता है। धनबल भौतिक सुख सुविधायें एकत्र कर सकता है किन्तु सुख शान्ति आपके सुकर्म ही दे सकते हैं। धन मनुष्य को दास बना लेता है स्वन्त्रता प्रदान नहीं करता। धन मनुष्य को उस हाथी के समान बना देता है जो आत्मिक बल से युक्त सिंह का सामना नहीं कर सकता। अतः धन व इससे सम्बन्धित सभी चीजों में मनुष्य का दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिये। धन आवश्यक है किन्तु उसके लिये पागल होना उचित नहीं।  
     

  
    मनुष्य भी क्या करे इच्छायें अनन्त होती हैं जिनकी पूर्ति के लिये वह निरन्तर शक्तिशाली होने का यत्न करता है तथा भूल जाता है कि दो पैरों का विवेकशील मनुष्य चन्द्रमा पर अपने पैरों के निशान छोड़ आया है किन्तु अविवेकी मकड़ा आठ पैरों से युक्त होकर भी अपना जाला छोड़कर कहीं नहीं जा पाया। तात्पर्यतः शक्तिशाली होने के लिये आठ पैर आवश्यक नहीं अपितु दूरदृष्टि व दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है। मनुष्य को चाहिये कि शक्ति अनुसार ही इच्छाओं को विस्तार दे।
   निष्कर्षतः सुखी, आशापूर्ण व कल्याणमय जीवन की सम्प्राप्ति में जीवन के विभिन्न पक्षों यथा कर्म, भाग्य, आवश्यकता, इच्छा, सामर्थ्य, धन, कार्य, अवकाश, नैतिकता, सद्व्यवहार, लाभ, हानि, इत्यादि के सम्बन्ध में सन्तुलित व सामंजस्यपूर्ण जीवनदृष्टि नितान्त आवश्यक है।


गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

आज सुबह

. आज सुबह
आज सुबह कुछ नई नवेली]
दुल्हन सी सकुचाती आई।
नील गगन पर रौनक छाई]
जन जन को हर्षाती आई।
पक्षी चहके चीं चीं करके]
पेड़ों पर दीवाली छाई।


२. आसान
कम साथ में जितना सामान होगा सफर आपका उतना आसान होगा]
न बोरी न बिस्तर न खाना न कपड़ा तो फिर जिन्दगी में काहे का लफड़ा।

सोमवार, 12 सितंबर 2011

भूत होते हैं?

भूत होते हैं या नहिं होते मैंने कभी दिमाग नहीं खपाया। उनसे मुझे डर लगता है या नहीं मुझे नहीं मालूम। लेकिन जीवन में कुछ घटनायें ऐसी होती हैं जिनका रहस्य खुल जये तो मामूली लगती हैं और रहस्य न खुले तो अलौकिक या भूताचाली लगती हैं| ऐसी ही एक घटना मेरे जीवन में घटित हुई है उसका सच्चा बयान करता हूँ पढ़ें।बात सन १९८२ य ८३ की है मेरी उम्र कोई ९ साल रही होगी मैं कक्षा ४ या ५ का विद्यार्थी था मुझे ठीक से याद नहीं। मैं पिहानी से शाहाबाद जाने वाली बस पर सवार हुआ और कोई ६ बजे शाम को अन्तोरा गाँव में उतरा। वहाँ उस दिन स्थानीय बाजार लगा था। मैंने एक दुकान पर लैया के बने हुए लड्डू खरीदे जिन्हें स्थानीय भाषा में मुरमुरिया कहते हैं। पानी पिया और वहाँ से कैमी गाँव के लिये पैदल ही रवाना हुआ।अन्तोरा से कैमी कि दूरी कोई डेढ़ किमी है। आधे रास्ते में मुझे याद आया कि मैंने जो झाड़ू पिहानी में खरीदी थी वह उस दुकान पर ही भूल आया जहाँ मुरमुरिया खरीदी थी। मैं तुरन्त ही उन्हीं पैरों वापस आया खैर मुझे झाड़ू सही सलामत उसी दुकान पर मिल गयी मैंने झाड़ू उठायी पुनः कैमी के लिये प्रस्थान किया। अँधेरा हो चला था। अब मैं शायद आखिरी व्यक्ति थ
k जो इस शाम को इस रास्ते से गुजर रहा था क्योंकि मुझे इस समय कोई दूसरा इस रास्ते पर दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था।रास्ते में बरसात का पानी जमा हो जाने वाली निचली भूमि थी जिसे स्थानीय भाषा में जोर कहते हैं उस पानी में घुस कर पार करना पड़ता था। मैं भी उसमें घुसा। यह जोर कैमी व अन्तोरा के लगभग बीचोंबीच थी। मैंने जोर को घुसकर पार किया और गाँव की ओर चलने लगा। मुझे ऐसा मह्सूस हुआ कि जैसे कोई मेरा पीछा कर रहा है। मेरे चलने से सट सट सट सट की आवाज आ रही थी जैसे कोई हवाई चप्पल पहन कर मेरे पीछे पीछे चल रहा हो।मेरी उम्र कच्ची थी अँधेरा हो चुका था और उस जोर को पार करने के तुरन्त बाद में एक बाग पड़ता था जिसमें से होकर मैं गुजर रहा था। इस बाग के बारे में स्कूल के बच्चों में यह अफवाह थी कि इसमें तेजा नाम के किसी आदमी का भूत जब तब टहलता देखा जाता है इसलिये अब मुझे डर लगने लगा। बावजूद इसके कि मैं निडर प्रकृति का व्यक्ति हूँ मैंने अपनी चाल तेज कर दी तो मुझे लगा कि पीछा करने वाले ने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी है। सट सट सट सट की आवाज भी स्पीड पकड़ गयी है अब तो मेरी रूह काँप गयी और मुझे अपनी सात पुस्तें याद आ गयीं।मैं दौड़ने लगा लेकिन अपने छोटे छोटे पैरों से कहाँ तक भागता फिर मुझे भागने का अभ्यास भी नहीं था। मै थककर चूर हो गया मगर मेरा पीछा करने वाला रुक नहीं रहा था। वह भी दौड़ रहा था। इस बीच मैंने कई बार पीछे मुड़ मुड़कर देखा लेकिन पीछा करने वाला मुझे कहीं दिखायी नहीं दिया। मेरे हौसले पस्त हो गये और मैं रुक गया। लगभग रात हो गयी थी तारे इक्का दुक्का आसमान पर दिखायी देने लगे थे रात उजाली थी लेकिन रास्ते पर ५० मीटर से अधिक अब नहीं देखा जा सकता था। मैंने अँधेरे में दो चार आवाजें दीं कौन है? कौन है? कौन है? मगर वहाँ कोई नहीं था। मैं परेशान हो गया था समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ?तब मैंने फैसला किया कि अब और नहीं दौड़ूँगा चाहे जो हो जाये अब जो सामने आयेगा उससे टकराऊँगा| यद्यपि सच यह है कि थकान के कारण मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था साँस उखड़ सी रही थी। कुछ देर यथावत खड़ा रहा कोई सामने नहीं आया तब मैं धीरे धीरे पुनः कैमी की ओर चला।सट सट सट सट की आवाज अब भी आ रही थी। अब मैने यह सुनने का निश्चय किया कि आखिर आवाज आ कहाँ से रही है। तब मैंने नीचे की ओर देखा आवाज वहाँ से आ रही थी। मैंने देखा कि मेरे पायजामे के दोनों पाँयचे पानी में भीगकर आपस में चिपक गये हैं और मेरे चलने से आपस में टकरा रहे हैं जिससे सट सट सट सट की आवाज आ रही है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ हँसी भी आयी मगर मारे थकान के मैं हँस भी नहीं पाया हाँ दिल को तसल्ली जरूर मिली।

रविवार, 4 सितंबर 2011

अपने प्लॉट का एरिया क्षेत्रफल जाँचें

अपने प्लॉट का एरिया क्षेत्रफल जाँचें
एक अच्छे एवं खूबसूरत मकान की ख्वाहिश किसे नहीं होती| आप अपनी सुविधा, सामर्थ्य एवं उपलब्धता के अनुसार प्लॉट खरीद कर एक अच्छा सा घर बनवा लेते हैं और उसमें आराम से रहने लगते हैं। लेकिन कभी गौर किया है कि चौकोर वर्गाकार या आयताकार प्लॉट बहुत कम मिल पाते हैं। यदि आप वर्गाकार या आयताकार क्रमशः चित्र 1 व चित्र 2 के अनुसार प्लॉट पर मकान बनवाये हैं तब तो ठीक है अन्यथा बहुत सम्भव है कि आपके प्लॉट का जो एरिया क्षेत्रफल आपको बताया गया है अथवा आपने जो बैनामा करवाया है उससे कम हो। कभी कभी प्लॉट काटने वाले इस बात को जानते हैं और कभी कभी नहीं भी। चूंकि आप अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च कर रहे हैं तो आपके लिये अति आवश्यक है आप जो प्लॉट खरीद रहे हैं उसके सही क्षेत्रफल का ज्ञान आपको हो।
प्लॉट बेचने वाला आपको बता रहा है कि देखिये भाई साहब यहाँ पर सड़क तिरछी निकली है अतः प्लॉट तिरछे कटे हैं लेकिन लोकेशन बहुत बढ़िया है। यह जो तिरछे कटे प्लॉट हैं धीरे से आपकी जेब काट लेते हैं। उदाहरणस्वरूप आप एक प्लॉट खरीद रहे हैं जिसकी लम्बाई 80 फुट और चौड़ाई 50 फुट है तो इसका क्षेत्रफल होगा चित्र 2  की आकृति के अनुसार होने पर 80 * 50 = 4000 वर्ग फुट किन्तु यदि इसकी आकृति चित्र 3  के अनुसार है तब इस प्लॉट का क्षेत्रफल 4000  वर्ग फुट से कम होगा।अब प्रश्न यह है कि क्षेत्रफल कितना कम होगा तो यह निर्भर करेगा कि प्लॉट की किसी एक भुजा से दूसरी भुजा के मध्य लम्बवत दूरी कितनी है। यह लम्बवत दूरी चित्र 4 के अनुसार जैसे जैसे कोण C व कोण A का मान घटेगा और कोण DB का मान बढ़ेगा घटती जायेगी या जैसे जैसे कोण CA का मान बढ़ेगा तथा कोण D व कोण B का मान घटेगा बढ़ती जायेगी।
चित्र 3 व 4 के स्वरूप वाले प्लॉट का क्षेत्रफल सही रूप में इसी लम्बवत दूरी पर निर्भर करता है। ऐसी आकृतियाँ समान्तर चतुर्भुज कही जाती हैं। जिसका क्षेत्रफल निकालने का सूत्र इस प्रकार है।
क्षेत्रफल =आधार रेखा *लम्बवत दूरी
चित्र 4 के उदाहरण में प्लॉट ABC1D1 का क्षेत्रफल =  80*45 = 3600 वर्ग फुट
प्लॉट ABC2D2 का क्षेत्रफल=80*35=2800 वर्ग फुट
प्लॉट ABC3D3 का क्षेत्रफल =80*30=2400 वर्ग फुट
अब आप देखेंगे कि प्लॉट तिरछा होने पर प्लॉट विक्रेता सदैव भुजाओं ABAD को गुणा करके क्षेत्रफल निकालेगा अगर आप स्वीकारते हैं तो चित्र 1 व 2  के अनुसार न होने पर आप को हानि अवश्य होगी कम या अधिक का प्रश्न अलग है।
प्लॉट जितना अधिक तिरछा होता जायेगा आपकी जेब पर डाका उतना अधिक पड़ता जायेगा। अतः भविष्य में जब कभी प्लॉट खरीदें तो आकृति 1 व 2 को प्राथमिकता प्रदान करें।आकृति 3 की स्थिति में क्षेत्रफल का सही आकलन कर सही मूल्य अदा करें।
अब आप कहेंगे कि यह तो बहुत से गणित जानने वाले जानते होंगे तो बन्धु हममे से बहुत से लोग गणित नहीं पढ़ते जो पढ़ते हैं भूल जाते हैं।जो लोग गणित जानते हैं उनमें से बहुत से सिद्ध नहीं कर पाते हैं कि आखिर प्लॉट का क्षेत्रफल कैसे हो जाता है। या लम्ब रेखा और आधार रेखा की गुणा क्यों करें\ साइड की सामने की रेखा की गुणा क्यों नहीं करें\ तो चित्र संख्या 5 का ध्यान से अवलोकन करें।
देखें प्लॉट विक्रेता के अनुसार क्षेत्रफल ADCB का क्षेत्रफल =AB*CB या AB* AD =80*50=4000  वर्ग फुट
अब आकृति के त्रिभुज ECB को उठाकर त्रिभुज GDA पर रखें तब जो आकृति तैयार होती है वह ABEG जिसकी लम्बाई AB = 80 फुट तथा चौड़ाई GA=  DF= EB =45  फुट तथा क्षेत्रफल = 80*45=3600  वर्ग फुट। यही वास्तविक क्षेत्रफल है आकृति ABCD का भी तथा आकृति ABEG का भी। क्योंकि त्रिभुज   ECB = त्रिभुज     GDA







आशा है हमारे इस लेख से पाठकगण लाभान्वित होंगे और भविष्य में ऐसे ही उपयोगी लेख लिखने के लिये प्रेरित करेंगे। आपकी कमेंट का इन्तजार रहेगा।

हमारीवाणी

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