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शुक्रवार, 22 मार्च 2019

आवाज नहीं आई

22/03/2019
प्रातः 3:30 का समय, मोबाइल की घण्टी बजे जा रही है। अब क्या कहें मई के महीने में इसी समय तो नींद आती है, सो नींद में विघ्न पड़ गया। जब तक होशोहवास में आकर मोबाइल उठाता घण्टी बन्द। अपनी आदत किसी के मिसकाल का जवाब देने की नहीं है अतः फोन किनारे रखा और फिर शुरू हुई सोने की कोशिश। किन्तु फोन फिर बज उठा। कान में लगाया, हलो! हलो! उधर से कोई आवाज नहीं। 15 सेकेंड कॉल चल गई। फोन बन्द करके किनारे रखा। करवट बदली। फोन फिर चालू। फिर वही हलो! हलो! किन्तु उधर से कोई आवाज नहीं। यही क्रम चार-पाँच बार। कहीं मेरा मोबाइल तो खराब नहीं हो गया? जो उधर से आवाज नहीं आती।
मैंने अपना दूसरा फोन उठाया उसी नम्बर पर मिलाया, उधर फोन उठाया गया किन्तु आवाज नहीं आई। इतनी आश्वस्ति हुई कि चलो अपना फोन ठीक है। समस्या उधर से ही है किन्तु क्या? उसके फोन में कोई समस्या है या उसके जीवन में। जो बार बार फोन किये जा रहा है। कोई परिचित नम्बर तो था नहीं। कौन हो सकता था?  उधार किसी से लिया नहीं, वायदा किसी से किया नहीं।  नाते रिश्ते में कोई होता तो दूसरे नम्बरों पर फोन कर लेता।  यह भी हो सकता था फोन करने वाले को पता ही न हो कि उसका फोन खराब है और वह यह सोच रहा हो कि मैं जानबूझकर बहाना कर रहा होऊँ कि आवाज नहीं आ रही।
जो भी हो स्थिति दयनीय थी, अवश्य ही कोई मुसीबत का मारा था जिसकी समस्या सिर्फ मुझसे ही हल हो सकती थी  तभी तो बार बार फोन कर रहा था या कर रही थी। यदि कर रही थी तो और भी दयनीय है उसकी अनिर्वचनीय मधुर ध्वनि कानों तक नहीं आ पा रही है। जो भी हो फोन वाइब्रेशन मोड पर लगाया। फोन करने वाले संभावितों व सम्भावितियों के चित्र हृदय को रोमांचयुक्त पीड़ित कर रहे थे। विचार करते करते झपकी आ गई। 5:30 पर उठा तो मोबाइल में 50 से अधिक मिस्ड कॉल पड़ी हुईं थीं।
अरे!बाप रे बाप! मैंने फिर अपने फोन से इधर से कॉल करने का प्रयास किया, फोन उठा आवाज नहीं आयी। फिर भी मैंने इधर से कहा कि देखिये आप जो कोई भी हैं अगर मेरी आवाज आप तक पहुँच रही है तो आप इतना समझ लें कि आपकी आवाज इधर नहीं आ रही है आप किसी दूसरे नम्बर से कॉल करें। पता नहीं मेरी आवाज उधर नहीं पहुँची या कुछ और। उसी नम्बर से दिन भर कॉल करने के प्रयास होते रहे और मैं परेशान होता रहा। क्या बच्चे हैं जो मोबाइल से खेल रहे हैं किन्तु बैकग्राउंड साउंड आना चाहिए। कोई किसी मुसीबत में तो नहीं मुझे सबसे ज्यादा यही बात परेशान कर रही थी। लेकिन तमाम अटकलों के वाबजूद कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या करना चाहिए उसकी हर अगली कॉल पर हृदय की धड़कनें तीव्र हो जातीं थीं और मन की हलचल बढ़ जाती थी।
शाम को 6 बजे फिर फोन आया , उठाया। अहा हा! क्या मधुर आवाज थी सुबह से जान निकली जा रही थी अब तो बिल्कुल ही निकल गयी।
“सुनो जी आप घर पर कब आ रहे हैं? वाह क्या स्नेहिल निमन्त्रण था?"
किन्तु इतना स्नेहिल भी नहीं कि मैं अपनी परेशानी दबा पाता, बोला, “दिमाग खराब है तुम्हारा सुबह से परेशान कर रखा था इधर आवाज नहीं आ रही थी।”
“हाँ, वो मोबाइल बिगड़ गया था, अभी थोड़ी देर पहले ही तुम्हारे भैया ने मुझे बताया कि इस फोन से न तो आवाज आ रही है और न जा रही है। दूसरे सेट में सिम डाल कर बात कर रही हूँ।”
“कौन भइया”
“अरे राहुल”
"कौन राहुल”
“अरे कहाँ लग गया फोन? कौन बोल रहे हैं आप”
"ये हरदोई है। आपने कहाँ के लिए मिलाया था?"
“सॉरी रॉंग नम्बर”
"ओके!”
पेट की गैस, हृदय का बोझ सब जा चुके थे साथ ही नींद भी आँखों से उड़ गई थी।


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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

मुक्ति

सामने दुकान है, दुकान के पास खड़ा है नीम का पेड़, इस पेड़ के चारों ओर बाँधा गया है चबूतरा। कल तक पेड़ और चबूतरा दोनों प्रफुल्लचित्त रहते थे कल शायद फिर प्रसन्न हों किन्तु आज उदास हैं, शायद सिर्फ यही उदास हैं अगर कोई अन्य उदास है तो वह है लेखक। क्योंकि थोड़ी देर पहले इस चबूतरे से एक लाश उठाकर ले जाई गयी है अंतिम संस्कार के लिए। आज सुबह वह मर गयी थी या आसपास वालों को लगता है कि वह आज सुबह मरी थी। जहाँ तक लेखक का प्रश्न है लेखक को लगता है वह अपने जीवन में बहुत बार मरी होगी या यूँ कहें उसके अपनों ने उसे मारा होगा, आज तो उसे मुक्ति मिल गयी।
कुल तीन प्राणी वह स्वयं उसका पति और उसका आठ वर्ष का लड़का कोई पैंतीस वर्ष पूर्व इस मुहल्ले में रहने के लिए आये थे। किसी चीज की कोई कमी नहीं, हँसी ख़ुशी  से भरा पूरा परिवार। अगर कोई कमी थी तो सिर्फ इतनी कि परिवार में इकलौती सन्तान थी। किन्तु पति पत्नी को कोई मलाल नहीं, कभी इस बारे में उन दोनों की जुबान पर कोई चर्चा नहीं दिखाई दी।
पति ने अपना कपड़े का व्यवसाय शुरू किया। दुकानदारी चल निकली। किन्तु कुसंगति रुपी व्याधि जिसे हो जाए उसे कौन सा अन्य व्यसन नहीं लग जाएगा। युवावस्था का जोश कुछ आगा पीछा सोंचने तो देता नहीं। दुकान प्रायः बन्द रहने लगी और पति का ठिकाना मुहल्ले के किसी कोने में हो रहे जुए का फड़। कभी कभी पीना पिलाना भी हो जाता था। परिणाम घर में चिक चिक और कलह। बेचारी पत्नी जीते जी समझो मर गयी। कई बार दिमाग में आया पति को उसके हाल पर छोड़कर मायके चली जाये, किन्तु वहाँ भी कितने दिन निपटती। माँ-बाप तो रहे न थे और भाइयों भौजाइयों का क्या आसरा? अतः क्या करती विवशता में पति की मार-पीट सहती और रूखी सूखी खाकर किसी तरह जीवन यापन करती। हाँ, एक उम्मीद की किरण थी कि एक दिन उसका लाड़ला बड़ा हो जायेगा तब उसे शायद इस नारकीय यातना से मुक्ति मिल जाये एक सम्भावना यह भी थी कि शायद पतिदेव ही सुधर जायें।
इस संसार में किसी चीज का बिगाड़ तो बड़ा सरल है। कोई भी चीज शीघ्रता से बिगड़ जाती है फिर वह चीज मनुष्य ही क्यों न हो। किन्तु जब बनने या सुधरने का प्रश्न खड़ा होता है तो बड़ी बाधाएँ आतीं हैं। सो पतिदेव तो सुधरने की जगह बिगड़ते ही चले गये। प्रायः घर से गायब भी रहने लगे। हाँ लड़का धीरे धीरे बड़ा हो रहा था। पढ़ाई लिखाई में बहुत तेज तो न था हाँ व्यसन कोई न था उसमें। माँ से प्रेम भी करता था हाँ पिता जी के अवगुणों के कारण उसका अपने पिता जी से प्रायः विवाद हो जाता था। यह स्वाभाविक ही था कि माँ अपने पुत्र का ही पक्ष लेती। उसने स्पष्ट कहा कि वह आजतक पुत्र के लिए ही जीती आई है अन्यथा कब की मर गयी होती। पति ने माँ-पुत्र की इस एकता से आजिज आकर प्रायःकस्बे से भी गायब रहना शुरू  कर दिया। कभी कानपुर कभी आगरा कभी हरिद्वार तो कभी इलाहाबाद। कुछ पता नहीं चलता कब कहाँ आ रहे हैं और कब कहाँ जा रहे हैं। हाँ इस बीच लड़के का विवाह हो गया। चाँद सी बहू घर में आई। अब पत्नी का स्नेह पुत्र के साथ साथ बहू पर भी वितरित होने लगा। पति इस घर में पूरी तरह अनावश्यक हो गया। इसका कारण वह स्वयं था किसी का क्या दोष? काफी समय हो गया पति को इस कस्बे में किसी ने नहीं देखा, इस बीच घर में कन्या रत्न जन्मा, पति एक दिन देखने आया अपनी पोती को जब पोती दो माह की थी। घर में उसने किसी से कोई बात नहीं की। उसकी बहन आई हुई थी बस उसी ने उसे पोती का दर्शन करा दिया। घर में उससे कोई जलपान इत्यादि के लिए कोई कुछ पूछता इससे पूर्व ही वह पोती के हाथों में 50 की नोट थमाकर जैसे आया था वैसे ही चला गया। आज वह पहली बार फूट फूट कर रोई, विधाता ही जाने क्यों? अपने पति के लिए शायद या फिर उसके लिए जो बदलाव उसके बेटे में उसकी बहू के घर आ जाने के बाद हुए थे। जो भी हो कोई बारुद अवश्य उसके हृदय में था जो उसके पति के इस प्रकार आनन-फानन आने-जाने से फट पड़ी। किन्तु उसने किसी से कुछ नहीं कहा। जो कहना था लोगों ने कहा और बातें हवा में तैरीं कि अब बेटा माँ को पहले सा महत्त्व नहीं देता। इसमें गलती माँ-बेटा दोनों की रही होगी? बेटे के सामने चयन की समस्या रही होगी वह माँ और पत्नी में सामंजस्य नहीं बिठा पाया, अथवा माँ भूल गयी कि उसका अपने बेटे पर जितना भी हक हो कुछ न कुछ हक उसकी पत्नी का भी होगा। सुनने में आता था कि सास बहू अपना अपना खाना अलग बनाती हैं। कभी सुनने में आता था कि बहू आज नाराज होकर मायके चली गयी है। यह आना-जाना रूठना  मनाना लगा रहा, घर में एक पोते की किलकारियाँ भी गूंजने लगीं। अब तो इस घर में माँ कहें या सास जैसी चीज और भी अनावश्यक हो गयी। बहू का पूरा ध्यान अपने दोनों बच्चों पर और वृद्धा उपेक्षित हो गयी। तीज त्यौहार तक पर वृद्धा पर इतना ध्यान भी बहू-बेटे न दे पाये, जितना लोग घरों-दीवारों पर देते हैं। अब शायद पहली बार पत्नी को पति की याद सचमुच में आई। शायद इसीलिए वृद्धा ने खबर पाई कि उसका पति पड़ोस के गाँव में अपने किसी मित्रके यहाँ ठहरा हुआ है। वृद्धा ने अपने बहू बेटे से तमाम मिन्नतें कीं कि वे या तो उसके पति को लिवा लायें या फिर उसे ही उसके पति के पास पहुँचा दें, किन्तु उन्हें न सुनना था न उन्होंने सुना। पता नहीं किस भले आदमी ने उसकी मदद की पत्नी को पति से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पत्नी को अपने पति को पहचानने में बड़ा यत्न करना पड़ा। वह बहुत ही दुर्बल व कृशकाय हो गया था बीमार भी बहुत था। अपनी पत्नी की ओर उसकी आँखें उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह जमीन में नजरें गड़ाये रहा और पत्नी उसे निःशब्द घूरती रही। कितना समय ऐसे ही बीत गया बताना अनावश्यकहै। जब दोनों की दृष्टि मिली तो बरसों के बिछड़े ऐसे आलिंगनबद्ध हुए जैसे प्रथम रात्रि में भी न हुए होंगे। दोनों की आँखों से पश्चाताप ,ग्लानि व संताप की अविरल गंगा-यमुना बह चली। दोनों ने अपने अपने दुःख दर्द व गिले शिकवे किये। पत्नी ने किसी तरह पति को अपने साथ रहने को राजी किया, पति को भी अब आश्रय की आवश्यकता थी अतः उसे राजी होना पड़ा। एक बार फिर पत्नी का समर्पण देखने को मिला। दोनों घर आ गये। किसी तरह लड़का पिता जी को घर में रखने के लिए राजी हुआ। पत्नी को कुछ सान्त्वना प्राप्त हुई, किन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन पत्नी पति को घर पर लिवाकर आई उसके छ: सात दिन बाद ही एक रात पति ने पत्नी से पानी माँगा, पत्नी ने बहू को आवाज लगाई, जब बहू नहीं आई तो विवश होकर पत्नी रसोईघर में स्वयं ही पानी लेने चली। खटरपटर सुनकर बहू की नींद क्याखुल गई बहू ने पूरा मुहल्लासिर पर उठा लिया। बेचारी पानी के बिना ही लौट आई। पति के सिरहाने खड़ी होकर सुबकने लगी, पति ने कुछ कहने का प्रयास किया किन्तु कुछ कह न सका उसका मुहँ खुला का खुला रह गया। वह अनन्त यात्रा पर निकल चुका था।
जैसे किसी को आसमान से लाकर जमीन पर पटक दिया गया हो। सारे संसार में अन्धकार का साम्राज्य छा गया।
विधवा का कठिन जीवन फिर परिवार की ओर से उपेक्षा किसी मृत्यु से कम है तो यह स्त्री वास्तव में जीवित थी। हाँ वृद्धा के लिए एक अच्छी बात यह हुई कि पोती स्कूल जाने लायक हो गई थी। बेटे बहू को एक नौकरानी की आवश्यकता थी सो वृद्धा से अच्छी नौकरानी कहाँ मिलती? ड्यूटी लगा दी गई। वृद्धा का इतना लाभ हुआ कि अब तक उसका घर से बाहर निकलना जो पहले कम होता था अब अधिक हो गया तो इससे उसका दिल बहल जाता था दूसरे उसके अन्तर्मन की पीड़ा अब पोती के प्रति ममता में परिवर्तित होती जा रही थी। अब पोती थी जिसके साथ उसका समय ही गुजर जाता हो सिर्फ ऐसा न था बल्कि वह उसके साथ अपने दुख भी भूल जाती थी। दूसरे बच्चे इतने दुनियादार नहीं होते कि बिना किसी कारण किसी से घृणा कर लें। किसी तरह वृद्धा अपना दर्द भूलने का यत्न कर ही रही थी कि उसकी ड्यूटी बढ़ गई। अब पोता भी उसके दोस्तों शामिल हो गया था। वह भी स्कूल जाने लगा था। किन्तु एक नई समस्या खड़ी हो गई। पोती जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थी धीरे धीरे अपने अपने माँ-बाप का मन्तव्य समझकर उनका अनुसरण करती जा रही थी। या यों कहें कि माँ कहीं न कहीं अपनी बेटी को यह समझाने में कामयाब हो रही थी कि बुढ़िया इस घर में फालतू की चीज है। अब बुढ़िया और पोती के बीच दूरी बढ़ रही थी। वह इतनी बढ़ी कि बुढ़िया को जब तब अपने साथियों के मध्य अपमानित कर देती। इस विस्तृत संसार में बुढ़िया बस भगवान से कहती कि उसे उठा ले।
भगवान उसकी क्यों सुनने लगे? बुढ़िया की जरूरत भगवान को भी न थी। किसी तरह दिन गुजरते रहे।
एक सप्ताह पूर्व पोती का विवाह था। बुढ़िया के हृदय में पोती के ब्याह को लेकर बड़ी उमंगें थीं। लेखक जानता था कि किस उत्साह से क्या-क्या यत्न करके उसने पोती के विवाह के लिए लिए उपहार खरीदे। किन्तु द्वार पर बारात आने के ठीक एक दिन पहले पोती व माँ ने बुढ़िया को अपशकुनी व मनहूस करार देकर उसे सख्त हिदायत दी कि विवाह कार्य सम्पन्न होने तक बुढ़िया कमरे से बाहर नहीं निकलेगी। बुढ़िया ने बुझे मन से स्वीकारा भी कि वह कमरे से बाहर न निकलेगी। लेकिन उसका कलेजा तब फट गया जब पोती ने बुढ़िया के दिए उपहारों को हाथ लगाने से भी मना कर दिया। बुढ़िया उस दिन के बाद से कमरे से बाहर न निकली, उसका पोता उसे कमरे में खाना दे आता था। कल सुबह भी वह खाना लेकर गया था द्वार नहीं खुले।  पति पत्नी ने पड़ोसियों को इकट्ठा किया। द्वार तोड़ा गया। चारपाई के ऊपर बुढ़िया का मृत शरीर था और चारपाई के नीचे एक हफ्ते से उसे भेजा हुआ भोजन जिसे उसने हाथ भी न लगाया था।

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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

अंकित, अनीस, अनिकेत



गंगाघाट की सीढियों पर बैठे हुए संजय मानो गंगा माँ में तैरते व हिचकोले खाते हुए दीपों की गिनती कर रहा था| अभी सूरज ठीक से अस्त नहीं हुआ था, किन्तु हर की पैड़ी पर होने वाली गंगा आरती में भाग लेने के लिए आने वाले श्रद्धालुओं का जमघट लगना शुरू हो गया था| संजय भी आरती में भाग लेने के लिए सुविधानुसार सीढ़ियों पर एक स्थान पर आसन जमा चुका था| तभी अचानक एक हाथ उसके सामने फैला| बाबू जी इस भूखे साधु को भी एक चाय पिला दो| संजय जैसे नींद से जागा उसे यह स्वर जाना पहचाना सा लगा| उसने सिर ऊपर उठाया तो ऐसा लगा जैसे इसे कहीं देखा हो| दुबारा फिर वही स्वर गूँजा| बाबू जी इस भूखे को एक चाय पिला दो| सामने एक गेरुआ भेषधारी साधू दिखाई पड़ा| यद्यपि उसने जटायें व दाढ़ी-मूँछे इत्यादि बढ़ा रखीं थीं किन्तु संजय अपने मित्र को तुरन्त ही पहचान गया, “अंकित! तुम यहाँ|” “कौन अंकित, मैं अंकित नहीं हूँ| मैं स्वामी अनिकेत हूँ|” और इसी के साथ बड़ी तत्परता से वह साधुवेशधारी वहाँ से खिसक लिया|
अंकित! अंकित! की आवाज देता हुआ संजय भी अपने स्थान से उठकर उसके पीछे चला| किन्तु संजय अधिक दूर तक उस साधुवेशधारी का अधिक दूरी तक पीछा न कर सका और वह साधु भी उसी भीड़ में न जाने कहाँ गुम हो गया|
संजय जब रूका तो ठठाकर हँसा, “हा! हा! हा! अंकित, अनीस, अनिकेत! अब जब मिलेगा तो कोई और नया नाम चस्पा होगा|” संजय जब लौटकर अपने स्थान पर आया तो सीढ़ियों पर जगह न थी| गंगा आरती प्रारम्भ हो चुकी थी, किन्तु उसका मन अब आरती में नहीं लग रहा था| अतः उसने सीधे होटल के कमरे में हो जाना उचित समझा|
कमरे में पहुँचकर उसने बेयरे को कमरे में खाना पहुँचाने का आर्डर दिया और अपनी जेब से पर्स निकालकर अपने जिगरी दोस्त अंकित के साथ खिंचाई हुई फोटो देखने लगा| उसे वह दिन याद आ रहा था जब संजय व अंकित सहपाठी हुआ करते थे| ग्रेजुएशन की उस क्लास में अंकित बड़ा ही होनहार छात्र था| कक्षा 10 व 12 की परीक्षायें उसने प्रथम श्रेणी में ससम्मान उत्तीर्ण कीं थीं और डिग्री कॉलेज में भी वह प्रशंसा का अधिकारी था| किन्तु जब किसी पर इश्क का भूत सवार होता है तो उसे पूरी तरह से मटियामेट कर देता है|
शकीला, हाँ यही नाम था उसका जिससे उसे प्यार हो गया| शकीला भी उसे चाहती थी| छुपते छुपाते होने वाले मेलजोल के चर्चे कॉलेज के लडके लडकियों के मुँह-कान से होते हुए उनके घर परिवारों तक भी पहुँच गये| जिस दिन उन दोनों को यह पता चला कि उनका कथानक जग जाहिर हो गया है दोनों ने फैसला कर लिया कि वे आपस में शादी कर लेंगे, किन्तु क्या यह इतना सरल था? सबसे बड़ी बाधा धर्म-मजहब तो बीच में पहाड़ की तरह खड़े ही थे वह भी बहुत दुर्गम व जानलेवा|
दोनों के घर परिवार वाले समझा रहे थे कि यह बेमेल विवाह है धर्म व मजहब से बाहर जाकर किया गया यह सम्बन्ध किसी को स्वीकार्य नहीं होगा| किन्तु कौन मानता है? अंततः अंकित के घर-परिवारवालों ने कलेजे पर पत्थर रखा और जीते जी अंकित को मरा मानकर उसे अपने परिवार से बहिष्कृत कर दिया| उस दिन से कॉलेज का हॉस्टल ही अंकित का घर संसार हो गया|
उधर जब शकीला किसी भी तरह से अंकित को छोड़कर विवाह के लिए राजी न हुई तो मुल्ला और मौलवियों ने फरमाया अगर अंकित इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले तो उसका निकाह शकीला से पढ़वाया जा सकता है| शकीला के अब्बू ने मुशीर को अंकित के पास भेजा और सारी बात कहलवायी| अंकित ने कुछ भी आगा पीछा विचारा नहीं और इस्लाम कुबूल करने को अपनी रजामंदी दे दी| अगले ही दिन अंकित को मस्जिद ले जाया जाया गया, उसका इस्लामिक संस्कार कराया गया और उसका नाम अंकित से बदलकर अनीस हो गया| कुछ ही दिन बाद बड़ी धूमधाम से अंकित उर्फ़ अनीस का निकाह शकीला के साथ पढ़ दिया गया| ख़ास बात यह थी की विजय प्रेम की नहीं हुई अपितु अहंकार की हुई| इस विवाह को कुछ मुस्लिम युवाओं ने नगर भर में हिन्दुओं पर मुस्लिमों की विजय के रूप में प्रचारित किया|
बहरहाल निकाह के बाद जब वे दोनों कॉलेज पहुँचे तो कॉलेज के छात्र-छात्राओं व सहपाठियों की नजरें उन दोनों को ऐसे घूर रहीं थीं जैसे कोई जानवर कॉलेज में घुस आया हो| कॉलेज के लड़के-लड़कियों का व्यवहार अब उनके साथ पहले सा नहीं था| वे दूरियाँ बनाने लगे थे| पहले के पुराने दोस्तों के साथ उनका मेलजोल कम हो गया था| अनीस और शकीला शायद ही कभी समझ पाए होंगे कि जो लोग उनके प्रेम को सहन कर लेते थे वे अब उन दोनों का विवाह क्यों नहीं स्वीकार पा रहे थे?
धीरे- धीरे कॉलेज उन दोनों को अरुचिकर प्रतीत होने लगा था और एक दिन उन दोनों ने अपना ग्रेजुएशन पूरा किये बिना ही कॉलेज छोड़ दिया| उन्होंने महसूस कर लिया था कि कॉलेज के लड़के लड़कियाँ उन दोनों से यद्यपि कुछ न कहते फिर भी नजरों के व्यंग्य वाण उन पर सदैव चलाया करते, घृणा से देखते और उन दोनों को असहज कर देने वाली कानाफूसियाँ करते|
जब दोनों घर पर रहे तो अनीस ने पाया कि उसके हिन्दू मित्रों व रिश्तेदारों ने तो उससे दूरियाँ बना ही लीं थीं मुस्लिम जन भी उसे अपने मध्य सम्माननीय स्थान देने को तैयार प्रतीत न होते थे| उधर शकीला व उसके परिवार के लोगों को मुस्लिम समाज का एक वर्ग उपेक्षा से देखता था और एक हिन्दू से अपनी लड़की का निकाह पढ़वा देने पर जब तब आलोचनायें कर देता था| मुहल्ले व रिश्तेदारी की हमउम्र लड़कियों को उनके माँ बाप प्रायः उन्हें शकीला से दूरी बनाये रखने की हिदायत देते रहते थे| ऐसे में दोनों दीन-दुनिया से जैसे अलग-थलग पड़ गये थे| तमाम लानतों-मलानतों के बीच अंकित उर्फ़ अनीस ने चार साल किसी तरह गुजारे| शकीला को उससे दो संतानें हुईं दोनों लड़कियाँ| जिस रात को छोटी लड़की का जन्म हुआ उस सुबह के बाद फिर अंकित उर्फ़ अनीस को किसी ने उस शहर में नहीं देखा न ही किसी को उसके बारे में कोई खबर ही मिली|
शकीला के अब्बू व मुशीर भाई दोनों ने उसके बारे में पता करने का बहुत यत्न किया किन्तु कोई खोज खबर न मिली| अंकित के परिवार वालों ने चूंकि उसे छोड़ ही रखा था अतः उसके बारे में कुछ भी पता करने की कोशिश न की| शकीला के अब्बू व मुशीर भाई ने बहुत प्रयास किया कि शकीला व उसके बच्चों को अंकित के परिवारवाले अपना लें किन्तु अंकित के पिताजी ने साफ साफ कह दिया कि विधर्मियों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता| यद्यपि शकीला के परिवारवालों ने इस्लामिक रीति के अनुसार शकीला के दूसरे विवाह का प्रयास किया किन्तु शकीला इसके लिए राजी न हुई|
तबसे अब तक अंकित उर्फ़ अनीस उर्फ़ अनिकेत की खोज जारी है|
रूम की घंटी बजी बेयरा खाना लाया था| संजय खाना खाने में व्यस्त हो गया|


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रविवार, 4 दिसंबर 2016

साँप छछूंदर

17/09/2016

अभी एक घंटे पहले वह मेरे पास आया था अपने पड़ोसी विजयगोपाल जी को लेकर। विजयगोपाल जी गाँव के सम्मानित व्यक्ति हैं। पर्याप्त खेती पाती है और स्थानीय राजनीति में भी थोड़ा बहुत दखल रखते हैं। आज सुबह सुबह घर में कुछ विवाद हो गया और लडकों ने विजयगोपाल जी पर हाथ छोड़ दिया। क्या जमाना आ गया है? बच्चे जिनसे मान सम्मान में वृद्धि की अपेक्षा की जाती है वही प्रायः इज्जत तार-तार कर देते हैं। खैर वह मुझसे मशवरा करने आये थे कि क्या होना चाहिए। मेरे मन में किञ्चित आश्चर्य मिश्रित मुस्कुराहट छूटी किन्तु चेहरे पर प्रकट नहीं हुई। कारण यह है कि जो अपने कर्मों से स्वयं एक मजाक बन गया हो उसका और अधिक मजाक उड़ाना मानवीयता के विरुद्ध है। बात यह थी कि विजयगोपाल जी कल तक स्वयं ही दूसरों के मामले सुलझाया करते थे आज अपने आप उलझे हुए हैं। मुझे लग रहा था जैसे कोई MBBS नीमहकीम से इलाज कराना चाहता है।

ऐसा नहीं है कि उनके घर में पहले बाप-बेटों में वाद विवाद न हुआ हो किन्तुहाथापाई की नौबत मेरी जानकारी में पहली बार आई थी। विजयगोपाल जी के छः लड़के हैं और बिना किसी फैमिली प्लानिंग के चार लडकियाँ भी हैं। सब ईश्वर की दें है बस एक चीज का अभाव है वह है संतोष। विजयगोपाल जी व इनका परिवार संतोषी कभी नहीं रहा। जैसे उन्हें सन्तान से अघाव नहीं रहा बस छापते गये वैसे ही लोभ लालच में भी अघाव न था। विभिन्न प्रकार की सम्पत्ति किसी न किसी प्रकार से हथिया लेना उनके बाएं हाथ का खेल था। उनका पूरा परिवार इसमें उनका मददगार था। स्वयं यदि किसी से हजार दो हजार ले लिए तो देने का नाम नहीं। संख्याबल के कारण कोई जल्दी उलझता भी न था। स्वयं किसी को सौ दो सौ रूपये दे दिए और तय वक्त पर न मिले तो कर्जी का साइकिल, मोटरसाइकिल और लढ़ी-बैल इनके दरवाजे की तब तक शोभा बढ़ाता जब तक एक एक पाई वापस न मिल जाए। जो पेड़ जितना अधिक मोटा-ताजा व हरा-भरा दिखाई देता है प्रायः उसकी डालें व तने उतने ही खोखले होते हैं। ऐसा ही कुछ विजयगोपाल जी के साथ भी था।

अरे मैं तो भटक गया। बेकार में विजयगोपाल जी की विशेषताएं बघारने लगा। मेरा मकसद तो विजयगोपाल जी ने जो कहानी मुझे सुनाई बस वह कहानी आपने के सामने परोसने भर का था। तो अब मैं मूल बिंदु पर लौटता हूँ।

जब वह और विजयगोपाल जी आये उस समय मैं पूजा-पाठ में व्यस्त था। मैंने इशारे से उन दोनों को बैठने और प्रतीक्षा करने के लिए कहा। जब तक मैंने पूजा-पाठ किया तबतक घर के नौकर ने उनके चाय पानी की व्यवस्था की। जब मैं उनके सामने पहुंचा तो देखा कि विजयगोपाल जी चेहरा लटकाए हुए बैठे हैं। जब मैंने नमस्कार किया तो उसी तरह चेहरा लटकाए हुए धीरे से मेरी नमस्कार का जवाब दिया। जब मैंने बहुत आग्रह किया तो डबडबाई आँखों और बुझे हुए चेहरे से उन्होंने बताना शुरू  किया।

"अब आपसे क्या छिपाना आप तो सब जानते ही हैं। अपने दसों बच्चों को पालने के लिए कौन कौन से कर्म नहीं किये। आज वही कर्म मेरे सिर चढ़ कर नाच रहे हैं। कई साल पहले की बात है मेरा बड़ा लड़का कोई दस बरस का रहा होगा। मुझे सूचना मिली कि मेरी चाची जो कि विधवा और निःसन्तान थीं और अपने मायके में रह रहीं थीं। काफी धनाढ्य महिला थीं। उन्हें कोई 50 बीघा जमीन अपने मायके में मिली थी। उनका कोई भाई न होने, विधवा व निःसन्तान होने तथा ससुरालियों द्वारा प्रेम न किये जाने के कारण प्रायः हमेशा वहीं रहीं थीं अपनी समस्त भूमि का बैनामा अपने चचेरे भाइयों व भतीजों को करने जा रहीं थीं। ससुराल में उनका जो हक था उस पर हम लोग पहले ही कब्जा जमा चुके थे। अब यह सहन नहीं होता था कि करोड़ों की जायदाद वह किसी और के नाम कर दें जो उनके मरने के बाद मेरी होने वाली थी। अतः एक शाम मैं उनके मायके पहुंचा। मेरी चाची एक अलग घर में रहती थीं। घरेलू कार्य प्रायः नौकर चाकर देखा करते थे। मैं वहाँ ऐसे समय पर पहुँचा जब नौकर लोग घर जा चुके थे और लोग सोने की तैयारी में थे। अतः मुझे चाची के घर आते जाते किसी ने नहीं देखा। मैंने पहले तो चाची को समझाने का प्रयासकिया किन्तु जब वह नहीं मानी तो मैंने जो किया उसका राजदार सिर्फ मेरा बड़ा लड़का है। यह  मेरी गलती रही कि मैंने अपने बड़े लड़के को उसके जिद पकड़ लेने के कारण साथ ले लिया। चाची के मायके वाले काफी दिनों तक यह सोंचते रहे  कि चाची गाँव किनारे बह रही नदी में रात बिरात पानी लेने गईं होंगी और बुढ़ापे के कारण फिसल गयीं। उनकी लाश पांचवे दिन गाँव से कोई 6 किलोमीटर दूर नदी के किनारे काफी सड़ी गली अवस्था में प्राप्त हुई।

बाद में चाची की जमीन मेरे नाम हो गयी। अब मेरे पास उस जमीन को मिलाकर 90 बीघा जमीन है। जिस पर छहों भाइयों का हक है। लेकिन बड़ा लड़का मेरी मजबूरी का नाजायज फायदा उठाना चाहता है। वह कहता है कुछ भी हो उसे उस 50 बीघा में आधी जमीन चाहिए और शेष में छठवाँ हिस्सा। नहीं तो वह पुलिस में कम्प्लेंट करेगा और चाची की हत्या के जुर्म में मुझे जेल पहुंचा देगा। मैं अब इस बुढ़ापे में जेल नहीं जाना चाहता। मेरी गति तो साँप छछूंदर की हो गयी है। अगर लड़के की बात मानूँगा तो घर में खून खराबा हो जायेगा और नहीं मानूँगा तो भी भगवान ही जाने क्या होगा। मुझे आपसे बड़ी उम्मीद है। वह लड़का आपके पास आता जाता है। आपका सम्मान करता है। बहुत मुमकिन है कि वह आपकी बात मान ले और मेरा कल्याण हो जाये। वरना मेरा बुढ़ापा तो नर्क हो ही गया।"

मैंने उनकी हाँ में हाँ मिलाई और उनसे कहा कि ठीक है मैं आपके लड़के को समझाने का प्रयास करूंगा।  उनके जाने के बाद मैंने घड़ी पर निगाह डाली और नोट किया कि जब चक्र पूरा होता है तो घड़ी की सुइयाँ घूम कर फिर वहीं पर आ जाती हैं यद्यपि तमाम चीजें बदल चुकी होती हैं।

सोमवार, 6 जून 2016

तुक्का



बात उन दिनों की है जब मैं अपने पिता जी की डॉक्टरी में उनका हाथ बँटाया करता था| उनके साथ मुझे भी कभी कभी मरीजों को देखने व उनका इलाज करने का मौका मिल जाया करता था| इन दिनों मैं इलाज करना सीख ही रहा था और बमुश्किल अभी रोगों व दवाओं का क ख ग आता था| मेरे पिता जी ने गाँव के कुछ घर-परिवारों को इंगित कर रखा था ककि इनमें दवा सोंच समझ कर देना है क्योंकि वे लोग दवा तो बढ़िया मांगेंगे किन्तु पैसों के नाम पर इनकी नानी मर जाएगी ज्यादा कहने पर दबंगई दिखायेंगे|
खैर एक दिन मुझे ऐसे ही एक घर में इलाज के लिए जाने का मौका मिला| यूं तो मेरे पिता जी ही जाते किन्तु वह उस दिन घर पर नहीं थे| अब किसके यहाँ गया? तो उसका नाम कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी रख लीजिये कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा| मैं अपनी सुविधा के लिए उसका नाम अमित रख लेता हूँ| तो हाँ अमित जी के यहाँ मुझे जाना पड़ा| अर्जेंट बुलाया गया था, अमित जी की तबियत बहुत ज्यादा खराब थी| न करने का सवाल नहीं था| जब मैं अमित जी के घर पर गया तो मैंने देखा अमित जी अपना पेट पकड़ कर दुहरे हुए जा रहे थे और बैलों की तरह हाय हाय चिल्ला रहे थे| अब उनकी हालत देख के मेरी अपनी तबियत खराब हुई जा रही थी| क्या रोग है? क्या दवा दूँ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था| अगर मैं कह दूँ कि मरीज मेरे बस का नहीं है?  यह बात कहना भी मैं उन दिनों सीख नहीं पाया था| मैंने मरीज की नब्ज देखी, जीभ देखी, पेट को छूकर और दबाकर देखा और जिस किसी भी रह से वहाँ मौजूद लोगों यह विश्वास हो कि मैं एक कुशल डॉक्टर हूँ वह सब किया| अंत में चार-पांच तरह की रंग-बिरंगी खड़िया वाली गोलियां निकालीं|(जी हाँ मेडिकल व्यवसाय से जुड़े लोग बताते हैं जितनी दवाएं बाजार में काम की बिकतीं हैं उससे ज्यादा बे काम की बिकतीं हैं| नकली दवाओं का कारोबार तब भी टॉप पर था और अब भी है) और उनकी तीन पुड़ियाँ बनाईं और कहा मेरी जानकारी में इन्हें जो भी समस्या है उसके लिए मेरे पास इससे बेहतर कुछ नहीं है| पुड़ियाँ अमित जी की माँ को देते हुए मैंने कहा 10-10 मिनट के अन्तर से गुनगुने पानी से यह दवा लगातार खिला दीजिये अगर ठीक हो जाएँ तो ठीक वरना किसी दुसरे डॉक्टर को बुला लीजिये| खैर मेरे सामने ही मरीज के लिए पानी गर्म होने लगा था| पैसों के बारे में मुझे पता था कोई पूंछेगा नहीं कितने पैसे हुए और मैं मांगूंगा तब भी मिलेंगे नहीं टरका दिया जायेगा| अतः मैंने भी अपनी जुबान खराब करना ठीक नहीं समझा| वैसे भी मैंने दवा के नाम पर कौन सी संजीवनी बूटी दी थी या तो मैं जानता था या भगवान| पैसे मिलते न मिलते कोई फर्क नहीं पड़ता था| अतः मैं वहाँ से चला आया पैसों की कोई बात नहीं हुई|
अगली सुबह मैं अपने दुकान के बाहर खड़ा था| मैंने देखा अमित जी के हाथ में एक मोटा डंडा है जिससे लिए हुए वे मेरी दुकान की तरफ ही चले आ रहे हैं| मेरी तो जान ही सूख गयी| मैं समझ चुका था मुझे मेरी दवा का मूल्य पीठ पर डंडों के रूप में मिलेगा| लेकिन उस समय पिता जी मेरे साथ ही थे अतः ज्यादा भय नहीं था अन्यथा की स्थिति में मैं वहाँ से निकल लेता| खैर अमित जी आये और उन्होंने मेरे पिता जी के पैर छुए और कहा, “पंडित जी आप तो उस्ताद थे ही आपका लड़का उससे भी बड़ा ही उस्ताद है| इसकी दवा से मुझे तुरंत ही आराम हो गया|”
अमित जी ने मेरी ओर 100 रूपये का नोट बढ़ाया और कहा कि कल वाली 3 खुराकें मैं और दे दूँ तथा कल के और आज के ऐसे काट लूं|
अब अमित जी जब भी बीमार होते इलाज कराने के लिए मुझे ढूंढते और एक लम्बे समय तक (जब तक कि मैं अपने को ट्रेंड नहीं समझने लगा) मैं उनका इलाज करने से बचने की कोशिश करता रहा| क्योंकि तुक्का हर बार नहीं चलता|

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

शास्त्री जी


पहली बार उसे मैंने अपने घर के पास के एक मन्दिर के चबूतरे की फर्श पर बैठकर गुनगुनी धूप का आनन्द लेते हुए देखा था। उम्र कोई 30-35 वर्ष रही होगी। सिर के बाल अभी काले थे। चेहरे पर काली-घनी दाढ़ी मूँछ साधारण ढंग से व्यवस्थित की गयी थी। सफेद कुर्ता पायजामा पहने हुए मस्तक पर श्वेत चन्दन लगाये किसी भद्र पुरूष  की सी आकृति थी। उस दिन मैंने उस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। हाँ इतना जरूर  ध्यानदिया कि वह मेरे लिए बिल्कुल अपरिचित और इस मन्दिर प्रांगण में बिल्कुल नया था।
मन्दिर घर से पास में था। मैं प्रायः मन्दिर पहुंच जाया करता था। पूजा पाठ करने कम उछल कूद करने ज्यादा।मन्दिर का आँगन पर्याप्त विस्तृत था। मुहल्ले के सभी बच्चे प्रायः बिना किसी भेदभाव व शंकारहित होकर अपने खेल-कूद के लिए इसे ही प्रयोग करते थे। मैंने उस दिन के पश्चात उस आदमी को जब-तब अपने पोथी-पत्रे व कागज कलम के साथ उलझा हुआ पाया। वह किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था। बच्चों से तो बिल्कुल नहीं। हाँ बच्चों की धमाचौकड़ी में उसे कोई अरुचि रही हो ऐसा कोई वाकया पेश नहीं आया।
धीरे-धीरे मुझे ज्ञात हुआ कि उसे शास्त्री जी कहते हैं। मन्दिर के प्रबन्धक की अनुमति से यह कुछ दिन यहाँ रहेगा। बहुत पहुंचा हुआ ज्योतिषी और तांत्रिक है। उसका नाम किसी ने नहीं पूँछा। कुल खानदान किसी ने नहीं पूँछा। जाति में किसी की दिलचस्पी नहीं। विशेषकर मुझे तो यह वृत्तान्त लिखते समय तक कुछ नहीं पता। क्योंकि अधिक कोई कुछ बता नहीं सका। हाँ इतना जरुर है कि उस आदमी को देखने और समझने के पश्चात मेरे बाल-मस्तिष्क में पंडितों और तांत्रिकों के प्रति जो परम्परागत धारणा थी वह खंडित हो गयी। पण्डित मोटा जनेऊ पहनते हैं, तिलक लगाते हैं, पूजापाठ में व्यस्त रहते हैं, हाथ देखते हैं, भविष्य बाँचते हैं या तांत्रिक काले कपड़े पहनते हैं, हाथ में  मोरपंख की झाडू रखते हैं, लोबान की धूनी देते हैं अस्थियों की माला पहनते हैं, भूत-प्रेतों पर नियन्त्रण रखते हैं, टोना टोटका करते हैं। ऐसा कुछ भी उस आदमी में नहीं था। इसके विपरीत वह कुर्त्ता-पायजामा और शर्ट -पैंट पहनता था। गले में रुद्राक्ष के साथ सोने की मोटी चैन और हाथ में कंगन पहनता था। पूजा पाठ उस मन्दिर में करते उसे कभी देखा नहीं था। हाँ वह साफ़-सुथरा बहुत रहता था। लोबान व अगरबत्ती की जगह विल्स की सिगरेट सुलगाता था और औसत से अधिक कश खींचता था। अलबत्ता शराब और गांजे के सेवन के बारे में नहीं देखा सुना। आँखों का साइज बहुत बड़ा या छोटा न था पर उनमें लाल डोरे अवश्य दिखाई देते थे। मन्दिर में महिलाओं का आना-जाना अधिक संख्या में होता था फिर भी किसी महिला से उसने कोई वार्त्तालापया इशारेबाजी की हो सुनने में नहीं आता।
वह अविवाहित था अतः बच्चों का कोई प्रश्न नहीं। उसका कोई निकट सम्बन्धी आज तक सामने नहीं आया।
यद्यपि यह ज्ञात हुआ था कि वह ज्योतिषी और तांत्रिक है किन्तु उसके किसी ग्राहक को मैंने उसके आसपास नहीं देखा था। हाँ उसके पास एक लम्बा काशी का पञ्चांग रहता था। कुछ कर्मकाण्ड की पुस्तकेंरहतीं थीं। डायरी और पेन के अलावा उसके झोले में क्या रहता था? इसकी जिज्ञासा आज भी मन में है। मेरा बाल मन बार बार यह सोचता था कि यह कहीं कोई जासूस या अपराधी वृत्ति तो नहीं, किन्तु ऐसा कुछ नहीं था। बच्चों में यह अफवाह थी कि यह व्यक्ति अपने चारों ओर ऐसा अदृश्य कवच रखता था कि कोई साधारण मनुष्य उसके पास नहीं जाता था। हम बच्चों की बिसात ही क्या?
वर्षों बाद पता चला कि वह बहुत बड़ा शिकारी था। छोटी मछलियाँ पकड़ना उसकी आदत में शुमार नहीं था। वह बड़ी बड़ी मछलियों का शिकार करता था। कहा जाता है कि जनपद के कम से कम पाँच विधायकों की जीत में उस आदमी के पूजापाठ का हाथ था। एक मंत्री जी को पुत्र की प्राप्ति में भी उस आदमी का हाथ समझा जाता है। इस सबके बदले में उसने दसियों लाख की फ़ीस वसूली थी।
उसके ग्राहक उसे अपनी गोपनीय बैठकों में बुलाते थे। वहीं डील करते थे। उसके द्वारा प्रदत्त सर्विस में कुण्डली बनाने से कुण्डली मिटाने तक का पूजापाठ शामिल था। कहते हैं वह ऐसे अचूक मन्त्र व उनका व्यवहार जानता था कि वह एक छोटी सी कोठरी में साधनारत रहकर संसार के किसी भी हिस्से में उलट-पुलट कर सकता था। उसके मन्त्र बैलेट बॉक्स में बैलेट्स की गिनती बदल सकते थे, मुकदमा जिता सकते थे, शादी-विवाह, नौकरी, व्यवसाय,शिक्षा व जमीन-जायदाद किसी भी प्रकार की समस्या से निजात दिला सकते थे। किन्तु मुझे इन दावों की सच्चाई प्रमाणित करने वाला आज तक नहीं मिला। क्योंकि आम आदमी उसकी फ़ीस नहीं दे सकता था। धनाढ्यों से कभी पुष्टि नहीं हुई। वैसे भी संगमरमर की दीवारों से छनकर सच्चाई नहीं सिर्फ अफवाहें आती हैं।
सत्य क्या है? कोई नहीं जानता? उस आदमी को कोई 4-5 वर्ष तक उस मन्दिर में रहते हुए देखा। फिर वह भी कहीं चला गया और मुझे भी विधिवश अपना कस्बाछोड़कर गाँव में रहना पड़ा। तब से कोई 17-18 साल बीत गये। कुछ महीने पहले वह मुझे गाँव में ही एक परिचित की दूकान पर दिखाई पड़ा। कुछ नहीं बदला था। अब भी भक सफेद कपड़े पहने हुए वह दिव्यता की मूर्ति प्रतीत होता था, किन्तु बातचीत करने पर पता चला अब बीमार रहने लगा है। डॉक्टर कहते हैं कि उसे फेफड़ों का कैंसर है। पहले वाला तन्त्र मन्त्र का कम उसने छोड़ दिया है। उसके कुछ पुराने ग्राहकहैं जो उस पर श्रद्धा रखते हैं और उसे कभी कभार कुछ दान दक्षिणा कर देते हैं किन्तु पहले वाली बात नहीं। उसे खाँसी बनी रहती है दम भी फूलता है। मगर सिगरेट अब भी उसके होठों की शोभा है। मुझे उस पर तरस आ रहा था मैंने कहा शास्त्री जी जीवन की अंतिम बेला है भगवान का नाम लो। आराम करो। उसने कहा,"अभी समय नहीं आया है। मेरे मन्त्रों में वह शक्ति है कि मैं यमराज को चैलेन्ज क्र सकता हूँ। और अपना जीवनकाल आगे बढ़ा सकता हूँ।" मुझे पहली बार उस व्यक्ति के सन्दर्भ में किये जा रहे दावों पर कुछ कुछ विश्वास होने लगा था। आखिर बात ही उसने ऐसे विश्वासपूर्ण ढंग से कही थी। यद्यपि मुझे लग रहा था कि युवाओं जैसे उसके कथन का साथ उसका शरीर अधिक समय टीक नहीं दे सकता।
कुछ सप्ताह पूर्व ही मैं गाँव के मन्दिर में देवी जी के दर्शन के लिए गया तो पता चला शास्त्री जी यहीं मन्दिर के पीछे एक कोठरी में रहते हैं। मैंने सोचा चलो देख लेते हैं कैसी तबियत है। मैंने उस कोठरी में जाकर देखा कि अर्द्ध-बेहोशी की हालत में शास्त्री जी जमीन पर पड़े हैं। शरीर की त्वचा चटकने लगी है। दरारों से रक्त बहना ही चाहता है किन्तु बहकर बाहर आ नहीं रहा है। शरीर पर चींटे रेंग रहे हैं। शास्त्री जी की सामर्थ्य नहीं है उन्हें हटा सकें। किसी तरह शास्त्री जी को हिलाडुलाकर जगाया। हाल चाल पूछा और एकबार फिर कहा,"शास्त्री जी अब तो भगवान का नाम लो और अपना कल्याण सोचो।" शास्त्री जी ने फिर वही जवाब दिया कि अभी समय नहीं आया है। वह मृत्यु को परास्त कर सकते हैं। मुझे एक कहानी याद आ रही थी जिसमें लेखक ने लिखा था कि लम्बे कारावास का अपराधी जब जेल से उसकी मुक्ति का समय आता है तो वह जेल से बाहर नहीं जाना चाहता। मुझे लगा यह वही कैदी है।
कैसी जीने की ललक है? एक सप्ताह पूर्व सूचना मिली कि शास्त्री जी नहीं रहे। न कोई पीछे रोने वाला न आगे बढ़कर कोई उनकी मदद करने वाला। ज्ञात हुआ कि मृत्यु को जितने का। मन्त्र उन्हें भी नहीं आता था। किन्तु भगवान का नाम लेना तो आना चाहिए शायद इसी से कुकर्मों की बेड़ियाँ कट जायें। आज तो मुझे इस पर भी कठिनाई है कि मैं उन्हें जी कहकर सम्बोधित करूं । किन्तु मैंने सीखा है कि मरने वाले की निन्दा नहीं करते। अगर कुछ ऐसा हुआ है। तो ईश्वर मुझे क्षमा करे।

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