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बुधवार, 14 अप्रैल 2021

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गिल्ली-डंडा

स्कूल अब 11 अप्रैल को खुलेंगे सरकार ने घोषित कर दिया जाहिर है ये अब जुलाई से पहले नहीं खुलेंगे। तो बच्चों आओ कल से मैदान में गिल्ली-डंडा खेलने की प्रैक्टिस करते हैं। क्योंकि इसे सिखाने के लिए न तो बिल्डिंग की जरूरत है और न इन्फ्रास्ट्रक्चर की न अध्यापक की और गिल्ली-डंडा खेलने से न कोरोना ही फैलता है और न ही सरकार की नजर में ये सेक्टर आया है। वैसे भी सालभर से गलियों में तो गिल्ली-डंडा ही खेल रहे थे। जब से कोरोना लगा है तुम ज्यादातर घर पर ही रहे हो। तुम बोर नहीं हुए क्योंकि सरकार ने कहा बेटा मोबाइल है न। माँ बाप के सामने पढ़ाई करो और जब मन ऊबे तो कान में लीड लगाकर ईलू-ईलू गाओ। हाँ जब उससे भी बात न बने तो वो जो तुम्हारी नई क्लास-टीचर हैं न जिनको तुमने उस सो-हॉट सो-सेक्सी कुछ ऐसे ही बोला था न उनसे उनकी निजी जिंदगी के बारे में जानकारी और दोस्तों में चटकारे लेकर बताओ यार! क्या मेम हैं तुम पर अभी से डोरे डाल रही हैं। यदि निगेटिव सोचते हो तो अपने साथियों को बताओ कि कैसे हिन्दी वाले पुराने टीचर रंग को लंद बोलते थे। हाँ तुमने मम्मी पापा को उल्लू बहुत बनाया वे जरूर ऊब गए हैं, एक कमरे के फ्लैट में तुम माँ -बाप के बीच प्राइवेसी के बाधक बन गए हो। शायद इसीलिए वे  तुम्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं और तुमने उनका सम्मान करना छोड़ दिया है। 
स्कूल बन्द होने से पहले ही तुम पढ़ाई से जी चुराते थे। अब तो किसी बहाने की भी जरूरत नहीं। स्कूल बन्द है और माँ बाप ने भी कह दिया कि प्राइवेट स्कूलों की फीस मुफ्त में नहीं देंगे जब स्कूल ठीक से खुलेंगे तब नाम लिखायेंगे और तभी कापी किताबें खरीदेंगे। कुछ बच्चे सरकारी स्कूलों का रुख कर गए हैं लेकिन तुम वहाँ भी नहीं गए क्योंकि तुम्हें लगता सरकारी स्कूल में जाने से तुम्हें बेइज्जती महसूस होगी। तो सबसे बड़ी मुसीबत तुम्हारी है क्योंकि तुम धोबी के कुत्ते हो गए न घर के न घाट के। तो तब तक गिल्ली-डंडा ही खेलने का प्रोग्राम बनाते हैं क्योंकि बेटा कोरोना भी जिद पकड़ गया है कि छोटे प्राइवेट स्कूलों की कब्र खोदे बगैर मानेगा नहीं। तो घर से बाहर निकलो और मैदान में मिलो। वैसे टेंशन मत लो गिल्ली-डंडा तुम्हें मुझसे ज्यादा आता है तो तुम्हें डरना नहीं पड़ेगा मुझसे जैसे स्कूल में डरते हो, दरअसल सिखाओगे तुम ही मैं तो सिर्फ सीखूँगा। सीखूँगा इसलिए ताकि कोरोना ने जो भयावह चीजें सिखाईं हैं उसे भूल सकूँ शायद भूल सकूँ कि मेरे पास एक अदद पेट भी है जो सिर्फ रोटी से भरता है और रोटी हाथ पैर हिलाने से ही मिलती है। तो हाथपैर हिलाने हैं। मुझे पता है अब इस उम्र में हाथ पैर हिलाने से कुछ होने वाला नहीं। लेकिन हाथपैर तो हिलाने ही हैं। नहीं हिलाने से लगेगा मर गया हूँ। तो जिन्दा हूँ इस अहसास के लिए गिल्ली-डंडा जरूरी है।
गिल्ली डंडा इसलिए भी जरूरी है ताकि यह सरकार के मस्तिष्क को टकोर सके और उसे अहसास करा सके कि डाल हिलाकर पराक्रम दिखाना बंदरों का काम है रिजल्ट भी आना चाहिए। फिलहाल कोरोना का रिजल्ट यह है कि हम जहाँ से चले थे एक साल बाद भी वहीं हैं।

सोमवार, 25 जनवरी 2021

परिवर्तन

भाई लोग कभी कभी बहुत निराश हो जाते हैं। कभी स्वयं को कभी विधाता को दोष देते हैं। बन्धु धैर्य रखें समय बड़ा बलवान है। वह हर घाव का इलाज रखता है।
सन 91 में दो लाइन लिखी निजी अनुभव से 

सब सोये मैं जागा फिर भी रहा अभागा।
एक सोने का हंस बनाया लोग कह गए कागा।।

फिर 2021 के विकट कोरोना काल में जब आर्थिक रूप से स्वयं की कमर टूट गई तब भी जीवन के प्रति एक नई दृष्टि विकसित हुई और फिर दो लाइन लिखी

मेरी खुली किताब के पन्ने पलट के देख।
चाँदी के भाव बिक गए सिक्के गिलट के देख।।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

कोरोना प्रभु का अवतार

बार बार लोग लोग लिख रहे हैं, कि कोरोना से कोई भगवान, गॉड या अल्लाह बचा नहीं पा रहा है। इस देश को मन्दिर और मस्जिद की नहीं स्कूलों और अस्पतालों की जरूरत है। आखिर कहना क्या चाहते हैं? क्या ईश्वर ने आपको दृष्टि और समझ नहीं दी या फिर विलुप्त हो गयी है?
वह मन्दिर और मस्जिद ही हैं जहाँ हर ओर से हारने के बाद व्यक्ति शरण लेने जाता है। तुम ही अपने कर्तव्य पालन से विमुख होकर हर कृत्य-कुकृत्य किये जा रहे हो, भक्ष्य-अभक्ष्य खाये जा रहे हो, बहू-बेटियों का नंगा नाच देख रहे हो, समस्त पृथ्वी पर अपना आधिपत्य जमाकर तमाम जीव जन्तुओं को नष्ट किये दे रहे हो, अपने लालच में जल, जंगल, जमीन सभी कुछ तो नष्ट किये दे रहे हो। फिर कहते हो कोरोना से भगवान नहीं बचा रहा। अरे भाई ये तो ट्रेलर है अगर नहीं सुधरे तो पिक्चर अभी बाकी है। कोरोना के अगली पीढ़ी के वायरस और बैक्टिरिया आयेंगे और अपना तांडव मचाएंगे। आपके स्कूल और अस्पताल धरे रह जाएंगे। जब तक आप टीके या दवा का आविष्कार करेंगे तब तक नई फ़ौज आएगी तबाही मचाने। अरे मूर्खों वह मन्दिर व अन्य धार्मिक स्थल ही हैं जो जीने की राह दिखाते हैं। तुम सीखो तब तो। 
सलीके से जीना तुम्हारी आदत रही नहीं, साफ़ सफाई की आदत तुम्हें छुआछूत लगती है, दूसरों के अधिकार समझना तुम्हें अपनी हेठी लगती है, देवस्थल पर सिर झुकाना पिछड़ापन लगता है, जन भावनाओं को आहत करना तुम्हें आनन्ददायक है, कर्तव्य तुम्हें स्मरण करते लज्जा आती है। बात करते हो भगवान कुछ करता नहीं।
जब जब होइ धरम की हानी।
बाढहिं अधम असुर अभिमानी।
तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं सृष्टि की सहजहिं पीरा।
यह कोरोना भी प्रभु का अवतार है, तुम जैसे रावणों को हनुमान की तरह चेतावनी देने आया है, आगे जब स्वयं भगवान आयेंगे तो रावणों तुम्हारा क्या होगा? सोंचो।
देश को स्कूल अस्पताल भी चाहिए और देवस्थल भी। अन्यथा चले जाओगे वहीं जहाँ से आये हो। यह  पोस्ट किसी धर्म विशेष के लिए नहीं अपितु प्रकारांतर से राजनीति करने वालों के लिए है।

सोमवार, 10 अगस्त 2020

कोरोना रे अब तो जा रे


कोरोना रे, अब तो जा रे|
जाड़े गये, फिर गर्मी आई,
तूने पाँव पसारे|
लोग-बाग़ घर भीतर घुसि गए,
तूने डेरे डारे|
बारिश जाई रही अपने घर,
अब तो तू भी जा रे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
मन्दिर बनि रहो मोदी कृपा से,
तुमसे रामउ हारे|
बिना दवा जन ठीक हुई रहे,
काहे छ्प्परू फारे|
लूट पाट औ' घटा नफा सब,
देखि लई हइ प्यारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
घेरो चीनु संभारी फौजें,
अब राफेल रखवारे|
पर-निर्भरता छोड़के भारत,
राग स्वदेशी गा रे|
मजदूरों ने करी वापसी तुमहि,
टिकासनु डारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|


कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

सोमवार, 27 जुलाई 2020

गिद्ध

मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टर लोग हर बात की जिम्मेदारी मरीज और उसके तिमारदारों पर डालते हुए बात बात में बताओ ऐसा करें बताओ ऐसा न करें मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। कहने का मतलब यह है कि मैंने महसूस किया है किमरीज का हित अनहित नहीं सोचते अपितु मरीज के साथ आये हुए लोगों की इच्छानुसार इलाज करते हैं वो तीमारदारों के रिस्क पर किन्तु कोरोना के मामले में सरकार से लेकर पब्लिक तक जिस तरह जाँच कर करा कर हर आदमी को जबरदस्ती कोरोना का मरीज साबित करके इलाज कर देने में जुटे हुए हैं इस तत्परता का क्या कारण है? काश ऐसी ही तत्परता अन्य रोगों के इलाज को लेकर भी दिखाई दे तो शायद कोई होरी कोई धनिया मेडिकल कॉलेज में डेरे तम्बू लेकर असहाय न दिखाई दे।
आखिर कोरोना के नाम पर असली फायदा किसे हो रहा है आज इस बात की जांच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये जाने की आवश्यकता है। इतना तो तय है किसी ने कोरोना के नाम पर पूरी दुनिया को हैक कर लिया है।
आखिर बीमार किसे कहते हैं? इसे परिभाषित किये जाने की आवश्यकता है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में टीबी, हैजा, फ्लू,इंफ्लुएंजा आदि के बैक्टीरिया व वायरस पाये जाते हैं क्या हम सबको जांच कर कर के रोगी सिद्ध कर दें। कम से कम कोरोना के मामले में यही हो रहा। मै आपको बताऊँ हममें से बहुत कम लोग इस बात पर गौर करते हैं कि रोगियों का जो आँकड़ा आपके हृदय में डर पैदा करने के लिए टीबी पर दिखाया जा रहा है वह संक्रमितों के हैं न कि रोगियों के। इसी प्रकार मौत का आँकड़ा भी वास्तव में मुझे कोरोना है इस कारण मरने वालों की संख्या ज्यादा होगी बनिस्बत उनके जो वास्तव में कोरोना से मरे। तो बन्धुओं घबराएं नहीं सरकार और मीडिया को हौवा खड़ा करने दें और आप अपना स्वाभाविक जीवन जियें। कोरोना, इम्युनिटी ड्रग्स का व्यापार, लॉकडाउन बहुत हो गया। सामान्य मनुष्य मौत से इतना ज्यादा डरता तो कोई युद्ध नहीं होता, कोई समुन्दर में मछली पकड़ने नहीं जाता, कोई अंतरिक्ष में जाने की नहीं सोंचता, न कोई पहाड़ की तलहटी में घर बनाता जहाँ मौत हर समय मुँह फैलाये रहती है। तो फिर ये कौन से गिद्ध हैं जिन्होंने ने कोरोना के नाम पर मनुष्य को गीदड़ बना दिया है इन गिद्धों का भय छोड़ो और शेर बनो।

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

प्राइवेट स्कूल व संकटकाल

प्राइवेट विद्यालय विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के आजकल घोर आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि प्राइवेट विद्यालयों ने खूब कमाया उन्हें क्या दिक्कत तो बन्धु कब्र का हाल मुर्दा ही जानता है। पैसा आनी जानी चीज है किसी के पास जमा रहती हो तो रहती हो मेरे जैसे लोगों के पास नहीं रहती। आज मुझे मेरे पिता जी याद आते हैं पैसा बचाकर रखने को लेकर उनसे प्रायः मेरी बहस हो जाती थी। वह कहते थे संकट काल के लिए कुछ रकम बचाकर रखनी चाहिए मैं उनकी बात को अभी तक हवा में उड़ाता चला आया था। उनको गुजरे 3 माह भी नहीं बीते थे कि मुझे पता चल गया वह सही थे और मैं गलत। काश मैंने कभी उनकी बात को गम्भीरता से लिया होता। मैं प्रबन्धक हूँ किसी तरह से अध्यापकों को घर घर भेज कर पैसा जुटा रहा हूँ वह भी अप्रैल मई जून की फीस कोई अभिभावक नहीं दे रहा है कोई कोई अभिभावक मार्च व इससे पहले की फीस जमा करने में नाराज हो रहे हैं किसी किसी अशिक्षित अभिभावक ने कुछ अपशब्द भी कहे। खैर जो उपलब्ध हो पाया है उसमें अप्रैल मई का वेतन दे रहा हूँ शेष विद्यालय खुलने पर। ईश्वर मुझे क्षमा करे।

शनिवार, 16 मई 2020

उत्पात

खून पसीना दे शहरों को मजदूरों ने खड़ा किया।
समय पड़ा तो शहरों ने ही मजदूरों को डरा दिया।
यूँ तो छत पर छतें बहुत थीं थे मालों पर माले।
कोई शरण नहीं दे पाया सबने डाले ताले।
जो मशीन बन चला रहे थे कारोबार तुम्हारे।
नर हो उनको टिका न पाये कुत्तों से दुत्कारे।
कल फिर काँधे यही मिलेंगे मृत हो चुके शहर को।
उल्टा समय-चक्र घूमा है आये बुद्धू घर को।
लेकिन उनका क्या बेचारे जो घर पहुँच न पाये।
आँखें माँ बापों की सावन त्रिया अधिक दुःख पाये।
इस युग में जब जन पेशाब को मोटर लेकर जाते।
मील हजारों पैदल चलकर आये रिश्ते नाते।
कोरोना यह मिटे मिटे ना कोई बात नहीं है।
पर शहरों की हृदयहीनता क्या उत्पात नहीं है?
विमल कुमार शुक्ल 'विमल' 9198907871

शुक्रवार, 8 मई 2020

गुलब्बो

मेरी गुलब्बो गेह के बाहर नहीं निकली।
महसूस खुद को कर रही है नाचती तकली।
राहें कोरोना बन्दकर बैठा रहा लेकिन,
आ ही गयी है ख्वाब में स्वच्छन्द ज्यों तितली।
गुल्ब्बो

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

दस का बीस

दो की पुड़िया आठ में, बण्डल दस का बीस।
वो मिलता मिलता है तभी, किस्मत हो इक्कीस।।
केवल सब्जी मिल रही, ठीकठाक है दाम।
कोरोना के राज्य में, बाकी सब बेदाम।।
बन्द दुकानें हैं सभी, तलब लगी है जोर।
आना जाना है कहीं, सही समय है भोर।।
चाहे जो भी बन्द हो, बन्द नहीं है पेट।
शून्य कमाई हो गयी, खाली हो गयी टेंट।।
जैसे अंध सुरंग में, यात्रा हुई अनन्त। 
इस बन्दी का देखिये, कब होता है अन्त।।

रविवार, 26 अप्रैल 2020

कोरोना

आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से कोरोना चला रौनक घटी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन राहें बन्द थीं हर ठाँव की।
ये पुलिस तो आज फिर से हो गयी आतंकमय,
लोग मुर्गा बन गए ज्यों पाठशाला काँव की।
लॉकडाउन को लगाकर काम तो अच्छा किया।
लोग शहरों से छुटे चौखट खड़े हैं गाँव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
माँगने आया दवा वो मुझसे खूनी आँव की।
तुम भले समझो गजल प्यारे इसे बेकार में,
मैंने बस यात्रा शुरू की है हृदय की नाँव की।

हमारीवाणी

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