मंगलवार, 5 नवंबर 2019

सारी उमर जाती

शमा जलने  से डर जाती,
पतिंगे की सँवर जाती।
पता है इश्क का खतरा,
मगर वो इश्क कर जाती।।1/11/2019 FB

बहुत बेचैन थी साकी,
न कोई मयकदे आया,
न मेरे पास आती तो,
सुराही ले किधर जाती।|1/11/2019 FB

सजे थे शूल करतल में,
बचाने थे सुमन कोमल।
जो करता पीर की चिंता,
तो फिर माला बिखर जाती।।2/11/2019 FB

खुली खिड़की नहीं होती,
तो होती बात क्या उससे,
जो रुकता द्वार खुलने तक,
चली सारी उमर जाती।।2/11/2019 FB

बसे जिस आँगने जाकर,
लगायी आग नफरत की।
करें दावा मुहब्बत का,
बुरी आदत अखर जाती।।3/11/2019 FB

जहर बो कर हवाओं में,
पवन चाहूँ बसन्ती सी,
ये सपना देखता हूँ जब,
तो हर सूरत है मर जाती।।4/11/2019 FB

फँसी थी मन में जो मछली,
कँटीली और जहरीली,
उगलता या निगल जाता,
'विमल' को हो जहर जाती।|4/11/2019 FB

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल गुरुवार (07-11-2019) को      "राह बहुत विकराल"   (चर्चा अंक- 3512)    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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