पता नहीं किस किस के सम्पर्क में खटखटा रहा हूॅं।
पिछले कुछ दिन बीत गये हैं लोगों की इच्छा पर चलते,
अपनी इच्छा पर सवार होना क्या कोई सरल काम है?
कीमत जानी और रख दिया वापस कितनी बार,
जेब ने कहा कि ठहरो अभी नहीं लेना अगली बार।
चाहा तुम यदि पड़ो सामने थोड़े सिक्के तुमको दे दूॅं,
नाम तुम्हारा सुनते ही सबने अपने काम गिनाये।
सोचा कदम उठाकर रख दूॅं चलूॅं कहीं एकान्त।
पैरों ने धकियाया पीछे और किया पथ भ्रान्त।
मैं कविता लिखने को तत्पर कलम हाथ में धरी रही,
ऑंखों के सामने रजिस्टर, कॉपी और किताब नाचते,
अपनी अपनी सुना रहे हैं मेरे शब्द रुके ज्यों के त्यों।
सब कुछ ठीक ठाक होकर भी मैं हूॅं इतना परेशान क्यों?
व
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