रविवार, 26 अप्रैल 2020

कोरोना

आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से कोरोना चला रौनक घटी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन राहें बन्द थीं हर ठाँव की।
ये पुलिस तो आज फिर से हो गयी आतंकमय,
लोग मुर्गा बन गए ज्यों पाठशाला काँव की।
लॉकडाउन को लगाकर काम तो अच्छा किया।
लोग शहरों से छुटे चौखट खड़े हैं गाँव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
माँगने आया दवा वो मुझसे खूनी आँव की।
तुम भले समझो गजल प्यारे इसे बेकार में,
मैंने बस यात्रा शुरू की है हृदय की नाँव की।

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