गाँधी जी का चौथा बन्दर,
आसपास दिख जाता है।
कुछ मत बोले मत कुछ सुने,
न ऊपर नजर उठाता है।
मोबाइल या कम्प्यूटर पर,
नजर गड़ाये जारी है।
डिजिटल वर्ड में धँसा हुआ है,
भूला दुनियादारी है।
इस ब्लॉग के अन्य पृष्ठ
दुनिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दुनिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, 26 नवंबर 2017
चौथा बन्दर
शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017
दुनिया
नजर.के सहारे चला जा रहा हूँ।
कोई बता दे कहाँ जा रहा हूँ।
दुनिया अजब सा तिलिस्मी सफर है,
जहाँ जा रहा हूँ वहीं आ रहा हूँ।
कोई बता दे कहाँ जा रहा हूँ।
दुनिया अजब सा तिलिस्मी सफर है,
जहाँ जा रहा हूँ वहीं आ रहा हूँ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)