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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

वसंती होलें

मुक्तक

आओ बन्धु वसंती होलें।
उमगें हृदय वचन यों बोलें।
सरसों जैसी सूक्ष्म काय हों,
फिर भी जगत नेह से धोलें।।1।।

शीत गई अब जड़ता छोड़ो।
तन के, मन के बन्धन तोड़ो।
बहुत किया विध्वंस सृजन में,
शक्ति नदी की धारा मोड़ो।।2।।

पग पग प्रकृति प्रफुल्लित पावन।
गाती राग विराग नसावन।
आओ हम भी आलस छोड़ें,
आता पास दिख रहा फागुन।।3।।

हमारीवाणी

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