सोमवार, 3 जनवरी 2022

इतिहास तो अंततः सभी का एक ही है


1. "ये मेरा नववर्ष नहीं है, मेरा नववर्ष चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। मैं इसकी बधाई न लूँगा न दूँगा।" 
2. "मैं क्रिसमस की बधाई क्यों दूँ। यह मेरा त्यौहार नहीं है।"
3. "मोमबत्ती जलाकर नहीं, केक काटकर नहीं बल्कि दूध पीकर मंत्रोच्चार के साथ जन्मदिन मनाऊँगा।"
4. "मैं फादर डे , मदर डे, टीचर डे, वैलेंटाइन डे कुछ नहीं मनाता, यह हमारी संस्कृति नहीं है।"
ये सब मैं नहीं कहता। वे कहते हैं जो शर्ट, पैंट और टाई पहनते हैं। बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते हैं। बच्चों को चरणस्पर्श और प्रणाम की जगह गुड मॉर्निंग सिखाते हैं और कुत्ते को डॉगी कहलवाते हैं। सिर पर चोटी गायब है लेकिन तिलक लगाते हैं। परिवार में कोई स्वर्गवासी हो तो सिर घुटाने में शर्माते हैं और सिर्फ कटिंग करा के परिवारी होने का कर्तव्य निभाते हैं। पूजापाठ के अवसर पर पंडित से कहते हैं कि जल्दी निपटाओ। यज्ञोपवीत बस विवाह के आसपास चार दिन पहनते हैं। गौसंरक्षण का नारा और रिक्शेवाले की बेइज्जती दोनों साथ साथ चलते हैं। ऑफिस में लंबा सा तिलक लगाकर बैठते हैं पूर्ण धार्मिक होने का लेक्चर देते हैं और रिश्वत खाते हैं तो डकार भी नहीं लेते। कहो तो खींसेंं निकाल देते हैं।
नीम हकीम खतरेजान। स्वयं को सनातनी कहते हैं किन्तु 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना का तिरस्कार कर अन्य समाजों को अपमानित करने का भाव भी हृदय में पाले हुए हैं। हम तो सहिष्णु रहे हैं, हम असफल हो गए संसार को सहिष्णुता सिखाने मेंं। हाँ म्लेच्छों से अमानवीयता सीखकर असहिष्णु होने का अभ्यास करने लग गए हैं। यह अत्यधिक विचित्र है कि हम धीरे धीरे असहिष्णु होते जा रहे हैं और सहिष्णु होने का ठप्पा भी छोड़ने में शर्मा रहे हैं। 
मेरी बात करो तो मैं यह सोच रहा हूँ कि मैं वैष्णव हूँ? शैव हूँ?शाक्त हूँ?  साईं भक्त हूँ? वेदाचारी हूँ? शिश्नपूजक हूँ? कापालिक हूँ? वैरागी हूँ? आनन्दमार्गी हूँ? या फिर नाग, गन्धर्व, यक्ष, रक्ष, किन्नर, सुर, असुर, देव, दानव, आर्य, द्रविड़ आदि से कोई हूँ। अथवा हूण, शक, यवन आदि में से हूँ। या फिर इस सबका घालमेल हूँ। यह प्रश्न आजकल के सभी तथाकथित धर्म व समुदायों से अपेक्षित है चाहे वे हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध, जैन आदि भारतीय पृष्ठभूमि के हों अथवा मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, पारसी आदि विदेशी पृष्ठभूमि के हों। इतिहास तो अंततः सभी का एक है और मूल भी। इस सबमें मनुष्यता को कहाँ खो दिया?



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (05-01-2022) को चर्चा मंच      "नसीहत कचोटती है"   (चर्चा अंक-4300)     पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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  2. सच दोगली सोच रखना कभी भी न स्वयं और नहीं मानवता के लिए अच्छी बात हो सकती है

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