शुक्रवार, 2 अप्रैल 2021

गिल्ली-डंडा

स्कूल अब 11 अप्रैल को खुलेंगे सरकार ने घोषित कर दिया जाहिर है ये अब जुलाई से पहले नहीं खुलेंगे। तो बच्चों आओ कल से मैदान में गिल्ली-डंडा खेलने की प्रैक्टिस करते हैं। क्योंकि इसे सिखाने के लिए न तो बिल्डिंग की जरूरत है और न इन्फ्रास्ट्रक्चर की न अध्यापक की और गिल्ली-डंडा खेलने से न कोरोना ही फैलता है और न ही सरकार की नजर में ये सेक्टर आया है। वैसे भी सालभर से गलियों में तो गिल्ली-डंडा ही खेल रहे थे। जब से कोरोना लगा है तुम ज्यादातर घर पर ही रहे हो। तुम बोर नहीं हुए क्योंकि सरकार ने कहा बेटा मोबाइल है न। माँ बाप के सामने पढ़ाई करो और जब मन ऊबे तो कान में लीड लगाकर ईलू-ईलू गाओ। हाँ जब उससे भी बात न बने तो वो जो तुम्हारी नई क्लास-टीचर हैं न जिनको तुमने उस सो-हॉट सो-सेक्सी कुछ ऐसे ही बोला था न उनसे उनकी निजी जिंदगी के बारे में जानकारी और दोस्तों में चटकारे लेकर बताओ यार! क्या मेम हैं तुम पर अभी से डोरे डाल रही हैं। यदि निगेटिव सोचते हो तो अपने साथियों को बताओ कि कैसे हिन्दी वाले पुराने टीचर रंग को लंद बोलते थे। हाँ तुमने मम्मी पापा को उल्लू बहुत बनाया वे जरूर ऊब गए हैं, एक कमरे के फ्लैट में तुम माँ -बाप के बीच प्राइवेसी के बाधक बन गए हो। शायद इसीलिए वे  तुम्हें अपना शत्रु मानने लगे हैं और तुमने उनका सम्मान करना छोड़ दिया है। 
स्कूल बन्द होने से पहले ही तुम पढ़ाई से जी चुराते थे। अब तो किसी बहाने की भी जरूरत नहीं। स्कूल बन्द है और माँ बाप ने भी कह दिया कि प्राइवेट स्कूलों की फीस मुफ्त में नहीं देंगे जब स्कूल ठीक से खुलेंगे तब नाम लिखायेंगे और तभी कापी किताबें खरीदेंगे। कुछ बच्चे सरकारी स्कूलों का रुख कर गए हैं लेकिन तुम वहाँ भी नहीं गए क्योंकि तुम्हें लगता सरकारी स्कूल में जाने से तुम्हें बेइज्जती महसूस होगी। तो सबसे बड़ी मुसीबत तुम्हारी है क्योंकि तुम धोबी के कुत्ते हो गए न घर के न घाट के। तो तब तक गिल्ली-डंडा ही खेलने का प्रोग्राम बनाते हैं क्योंकि बेटा कोरोना भी जिद पकड़ गया है कि छोटे प्राइवेट स्कूलों की कब्र खोदे बगैर मानेगा नहीं। तो घर से बाहर निकलो और मैदान में मिलो। वैसे टेंशन मत लो गिल्ली-डंडा तुम्हें मुझसे ज्यादा आता है तो तुम्हें डरना नहीं पड़ेगा मुझसे जैसे स्कूल में डरते हो, दरअसल सिखाओगे तुम ही मैं तो सिर्फ सीखूँगा। सीखूँगा इसलिए ताकि कोरोना ने जो भयावह चीजें सिखाईं हैं उसे भूल सकूँ शायद भूल सकूँ कि मेरे पास एक अदद पेट भी है जो सिर्फ रोटी से भरता है और रोटी हाथ पैर हिलाने से ही मिलती है। तो हाथपैर हिलाने हैं। मुझे पता है अब इस उम्र में हाथ पैर हिलाने से कुछ होने वाला नहीं। लेकिन हाथपैर तो हिलाने ही हैं। नहीं हिलाने से लगेगा मर गया हूँ। तो जिन्दा हूँ इस अहसास के लिए गिल्ली-डंडा जरूरी है।
गिल्ली डंडा इसलिए भी जरूरी है ताकि यह सरकार के मस्तिष्क को टकोर सके और उसे अहसास करा सके कि डाल हिलाकर पराक्रम दिखाना बंदरों का काम है रिजल्ट भी आना चाहिए। फिलहाल कोरोना का रिजल्ट यह है कि हम जहाँ से चले थे एक साल बाद भी वहीं हैं।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही लिखा आपने, बहुत सुंदर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-04-2021) को   "गलतफहमी"  (चर्चा अंक-4026)    पर भी होगी। 
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
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    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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  3. यथार्थपूर्ण सृजन ।

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  4. वाह बहुत सार्थक लेख।
    बधाई।

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