रविवार, 21 जून 2026

भरत भूषण तिवारी

बिहार में भरत भूषण तिवारी की पुलिस द्वारा की गयी हत्या को लेकर आहत हूं और उस नौजवान को सादर श्रद्धांजलि देते हुए ईश्वर से परिवार को सांत्वना देने की प्रार्थना करता हूं किन्तु आश्चर्यचकित बिल्कुल नहीं हूं। 
याद करें पुलिस के द्वारा किए गए कुछ एन्काउन्टरों को जिन पर आपने या आपके जानने वाले तमाम लोगों ने तालियां बजायीं थीं। लगभग पूरे देश में मीडिया के द्वारा और जनसामान्य के द्वारा पुलिस को बधाइयां भी दी गयीं। इसके बाद याद करें बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया आदेश के जब किसी अपराधी का घर ढहाने बुलडोजर अपराधी के दरवाजे पहुंचा। हम बड़े प्रसन्न हुए। सरकार की भूरि भूरि प्रशंसा की और भूल गए देश में तानाशाही नहीं चलनी चाहिए संविधान की चलनी चाहिए। यद्यपि यह भी सही है कि हमारा संविधान व न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि यह समय पर पीड़ित को न्याय नहीं दे पाती और अपराधियों का संरक्षण करती है। आवश्यकता इस बात की थी हम सरकार से मांग करते कि इस व्यवस्था को सही किया जाये ताकि लोगों का विश्वास संविधान में जगे। हुआ इसका उल्टा हमने संवैधानिकता व न्यायप्रणाली को दरकिनार कर तानाशाही को अच्छा समझा। हमें लगा कि यह तानाशाही केवल अपराधियों, गुण्डों और माफियाओं के खिलाफ काम करेगी। लेकिन यह भूल गये हमारे समाज में कहावत है कि टोना करने वाली औरत अपनी औलाद को भी नहीं बख्शती। तो पुलिस प्रशासन वैसे भी किसी का सगा नहीं और यदि उसको स्वच्छंदता प्राप्त हो जाये तो सोने में सुहागा। यद्यपि इस व्यवस्था ने अपराधियों पर अंकुश लगाया है किन्तु मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि गाहे-बगाहे इस व्यवस्था ने निर्दोषों को भी मौत के घाट उतारा है उनके घर गिराये हैं।  भरत भूषण तिवारी की पुलिस द्वारा हत्या इसका बहुत बड़ा उदाहरण है। उसकी हत्या एक निरपराध की हत्या है। परन्तु कभी अंधभक्ति के कारण तो कभी जातिवाद और सम्प्रदायवाद के कारण यह जानते हुए भी कि यह गलत है हमने संविधान और कानून का उल्लंघन सरकार के द्वारा होने दिया। 
यहां मैं किसी धर्म, जाति या सम्प्रदाय के प्रति झुकाव नहीं रखता हूं, मेरा झुकाव संविधान और कानून की रक्षा के प्रति है, यदि संविधान और कानून त्रुटिपूर्ण है तो उसकी त्रुटियां दूर करें इसका दबाव सरकार पर बनायें कि अपराधियों को त्वरित दण्ड मिले और पीड़ितों को न्याय मिले। कानून से इतर चलकर किसी का भला नहीं होने वाला न सरकार का न जनसामान्य का। थोड़ी देर तो लगता है कि अच्छा हुआ एनकाउंटर में मारे गए, बुलडोजर ने घर गिरा दिया, पीड़ितों को न्याय मिला, किन्तु लोकतांत्रिक संविधान और विधि के शासन की हत्या उसका क्या? वह ऐसे ही दर्द देगी, आज एक भरत भूषण तिवारी मारा गया है कल आपके लाल का नम्बर लग सकता है।

शुक्रवार, 19 जून 2026

जो राम रचि राखा

दो हजार ग्यारह की जनगणना में हम एक सौ इक्कीस करोड़ थे। इस समय जनगणना चल रही है मेरा अनुमान है कि इस समय हम एक सौ पचास करोड़ होंगे। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि शासन चलाने के लिए हम कुछ सैकड़ा ईमानदार लोग चुन पाने में असमर्थ हैं। पिछले अस्सी वर्षों में हम अपराधियों से मुक्त नहीं हो पाये। दो हजार चौदह में एक उम्मीद बंधी थी कि भ्रष्टाचार मुक्त समाज की स्थापना में भाजपा अपना योगदान देगी। हिन्दू समाज का उत्थान बिना किसी भेदभाव के होगा। तमाम दल जो अल्पसंख्यक समुदाय को वरीयता देने के क्रम में बहुसंख्यक समाज के हितों की अनदेखी कर रहे हैं वह अब नहीं होगा। प्रारंभ में ऐसा लगा भी कि सब काम ठीक से हो रहा है। यद्यपि कुछ शिकायतें मेरी प्रारंभ से रहीं हैं जिसकी वजह से मेरे तमाम मित्र मान ही नहीं पाये कि मैं भाजपा के विरुद्ध नहीं हूं। मेरी बला से।
किन्तु बाद में जिस तरह अन्य दलों के जिताऊ कन्डीडेटों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा ने अपने सिद्धांतों की बलि दी और तमाम अपराधियों को पवित्र घोषित कर दिया उससे यही लगा कि, "राम तेरी गंगा मैली हो गयी पापियों के पाप धोते धोते" गाना शायद भाजपा के लिए ही लिखा गया था। हमारी समस्या यह नहीं है कि कल सत्ता में कौन आयेगा? भाजपा, सपा, बसपा या कांग्रेस कोई भी आये अधिकांश विधायक वही लोग रहेंगे? जीतें किसी पार्टी या गठबंधन से कूद फांद करके सत्ता में शामिल हो ही जायेंगे। कहने का मतलब इस लोकतंत्र में विधायक या सांसद सरकार बदलने पर भी कम ही बदलते हैं, इसलिए चाहे जिस पार्टी की सरकार बने इनका रोल नीति निर्धारण में कम ही रहता है। वर्तमान में तो नीति-निर्धारण कारपोरेट जगत से प्रभावित है कुछ चुने हुए उद्योगपति अपने फायदे के कानून बनवाने में सफल हैं जनता जाये भाड़ में। वह तो मुफ्त गल्ला और सब्सिडी लेकर मस्त है।
समस्या यह है कि चुनें किसे क्योंकि सबको चुना और आखिरी दल था भाजपा वह भी फेल हो गयी। अब "जायें तो जायें कहां?" अभी भी समय है बुलडोजर बाबा अगर राम मन्दिर में हुई दान की चोरी के मामले में कोई प्रभावी कार्रवाई करें अन्यथा किसी का हित नहीं होगा न आपका और न आप पर विश्वास करने वालों का। आप पर अविश्वास करने वालों का भी हित नहीं। फिर होगा क्या? वही जो राम रचि राखा।

नेहरू जी की गलती

मन्दिर नहीं बना था प्यारे कांग्रेस की चलती थी।
क्योंकि कृपा गांधी नेहरू की म्लेच्छ वर्ग को मिलती थी।
जय बीजेपी जय जय मोदी मन्दिर तो बनवा डाला,
किन्तु कोष में चोर घुस गये नेहरू जी की गलती थी।
भ्रष्टाचार मिटाओगे तुम इस वादे पर आये थे,
चाल तुम्हारी भी खलती है जैसे उनकी खलती थी।
तुमने खुद को गंगा समझा सब अपराधी स्वच्छ किये,
कहां गयी वैसी बीजेपी जैसी पहले मिलती थी।
मुद्दों पर मौनी बाबा है आत्मप्रशंसा लीन लबारी,
बना दिया परधान उसे यह सन चौदह की गलती थी।
विमल

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

जातिवाद

फेविकोल का वादा था फिर हाथ हथौड़ा थामा क्यों?
जातिवाद का पहन पजामा बन बैठे हो मामा क्यों?
जिनका दामन पकड़ युगों से सिंहासन के सिंह दहाड़े,
उनके बच्चों की खातिर तुम भूल गये निज जामा क्यों?
तुमने चल दी चाल चाल का प्रतिउत्तर एक चक्रव्यूह है,
तुमको तो दक्षिण चलना था चल बैठे हो वामा क्यों?

बुधवार, 7 जनवरी 2026

रजाई में

तन मन कॉंपा, ठंड बढ़ गयी, सूरज छिपा रजाई में।
कुहरा, बादल, शीत मिल गये,बिक गये अक्षर ढाई में।
गर्म श्वास की, चाह चढ़ गयी, बढ़ गयी प्रीति लोनाई में।
खुल खुल खॉंसें, बुढ़ऊ घर में, मर गयी मौज दवाई में।।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

शीत के शासन

शीत की रीति है प्रीति जमे वहीं आग जले गरमाई मिले यदि।
शून्य भई मति कम्पन अंग में  संग फले मनभाई मिले यदि।
स्वर्ग की चाह न मोक्ष का मोह न नेह उढ़ायी रजाई मिले यदि।
शुक्ल कहें सुख शीत के शासन अंक समायी लुगाई मिले यदि।

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

सृष्टि का विचार

विचार से है सृष्टि या कि सृष्टि का विचार है।
विचार ब्रह्म ने किया कि ब्रह्म ही विचार है।।
अपार प्रश्न हैं व प्रश्न भी कठिन कुठार हैं‌।
जुड़े हजार लोग तो जवाब दस हजार हैं।
फटा जो अणु असंख्य पिंड चल पड़े जहाॅं तहॉं।।
मुझे समझ न आ रहा कि पिंड थे वहॉं कहॉं।।
विशाल पिण्ड कोटि-कोटि मूर्त हो रहे सतत।
अमूर्त कण मनज लगे प्रमाणहीन बिन्दुवत।।
वहॉं पे कौन था कि जिसके कर चले प्रहार को।
प्रकट हुए अरूप से सरूप हो विहार को।।
युगों युगों चलें न सत्य पा सकेंगे छोर का।
न साॅंझ का पता चले न ज्ञान मिले भोर का।।
दबाव था वो कौन सा हटा कि पिण्ड उड़ चले।
उन्हें जहां जगह मिली इस दिशा में मुड़ चले।। 
उड़े अगर विचित्र क्या? विचित्र है रुके नहीं।
हवा करे बिना थके वो खेल से छके नहीं।।
कहाॅं है स्रोत शक्ति का वो कौन है महाबली।
प्रयास कौन कर रहा प्रकृति फिरे चली चली।।
लगा हुआ उसी अचिन्त्य खोज में सदा रहूॅं।
मिले ना हल न खेद कुछ अज्ञात से जुड़ा रहूॅं।।

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

रखना

वो चाहेगा तुम्हें पिआसा रखना।
मत किसी से कोई आशा रखना।
मंच तो उसने सजा रक्खे हैं सब,
अपनी ओर से न तमाशा रखना।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

जल बचाइए

फेसबुक पर एक बन्धु सुझाव दे रहे थे कि जाड़ा बहुत है जल बचाइए और संडे के संडे नहाइये तो मेरे मन में कुछ भाव उठे और फटाफट व्यक्त हो गये। आनंद लें।

संडे को नहाया तो भी खर्च होगा ज्यादा जल,
हो सके तो एक बार माह में नहाइये।
बोतल में पानी भर रख लो कबर्ड में,
हन्नू हन्नू कह कर शीष पे घुमाइये।
दिख जाये कोई अन्य भी जो नहाता हुआ,
खुद ही नहा लिये हैं मन में मनाइये।
जन्म जब हुआ था तो नहला दिया था नर्स ने,
एक इसी स्मृति से काम को चलाइये।

रविवार, 14 दिसंबर 2025

करतार

यों ही नहीं कहते उसे करतार हम।
हर ओर उसकी देखते सरकार हम।।
हमने लगाये पुष्प पादप श्रम किया,
हैं देखते उनपर खिली तलवार हम।।
जब भी लगा हर रास्ता अब बन्द है,
खुद हो गये हैं आप ही से पार हम।।
क्या कर्म था क्या फल मिला किसको पता,
हर हानि का उस पर रखेंगे भार हम।।
ज्यादा कभी तो कम कभी अनुमान से,
मजबूत भी तो फिर कभी लाचार हम।।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

जड़ को भूल गया

या तो मैं ही उधर न गुजरा, जिधर टिका मधुमास रहा।
या फिर मेरे मन आंगन को, मधु बसंत ही भूल गया।।
यह संभव है निज कविता में, झूठा प्रेम उड़ेल दिया।
उर का कोई कोमल पन्ना, अनजाने में ठेल दिया।
सत्य यही है मुख मुस्काता, मैं मुस्काना भूल गया।।
रत्न रहे होंगे तलछट में, लेकिन मैं कंजूस रहा।
दान नहीं कर पाया बिल्कुल, मैं किंचित मायूस रहा।
दूर रह गया लेन देन से, जीवन रस को भूल गया।। 
अपने दुर्गुण आगे करके, जग को केवल दर्द दिया।
सम्बन्धों की गर्माहट को, अवसर पाकर सर्द किया।
शाखें पत्ते गिने फूल फल, लेकिन जड़ को भूल गया।।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

रजगंध पियारी

कैमी का छाॅंड़ि पिहानी बसे हम छॉंड़ि पिहानी बसे हैं अयारी।
पात की भाॅंति उड़ाति फिरे हम धाइ गये जित धाई बयारी।
भावी की बात विधाता को ज्ञात है जाने कहॉं अब होइ तैयारी।
बालपने जेहि भूमि फिरे वही गॉंव-गली-रजगंध पियारी।।
कैमी व अयारी- हरदोई जनपद के गाॅंव
पिहानी - हरदोई जनपद का नगर

भगवानहु ऐहै

काहे को मान गुमान करौं यदि मान गयो अपमानहु जैहै।
आजु भई जो भली या बुरी जेहि गारी दयी जयगानहु गैहै।
शीश पे हाथ धरे करौ सोच न साॅंझि भई तौ विहानहु ह्वैहै।
द्वेष  तजौ   उर  नेह धरौ  उर  नेह   धरे भगवानहु ऐहै।

सोमवार, 22 सितंबर 2025

मीटर और फीते


हमारे मित्र कवि ने लिखा कि मीटर पर ध्यान न दें आजकल फीते से लिख रहे हैं तो उनको मेरी प्रतिक्रिया

हम तो हथेली से नाप लेते हैं,
बित्त दो बित्त।
अधिक हुआ तो हाथ आजमा लेते हैं।
नापना हो कोई बहुत छोटी चीज,
तो बाल, नाखून और उंगलियॉं भी,
नापने का काम करती हैं।
मीटर और फीते बहुत बाद में आये,
हमने ऑंखें बन्द कईं,
घुसे ध्यान में और नाप लीं,
ब्रह्माण्ड में नक्षत्रों की दूरियॉं।
कविता तो भावनाओं से नाप लेते हैं,
आपको पूरे सौ नम्बर देते हैं।
विमल

सोमवार, 9 जून 2025

घरवाली

जो घरवाली का कहा, मान न सकता मित्र।
उसे मिलें ससुराल से, चोटें बड़ी विचित्र।
चोटें बड़ी विचित्र, मिलें जो पूरी माने।
जोरू का है दास, सभी देते हैं ताने।
इसीलिए तू मान, कहे जो कुछ भी साली।
साली वश में होय, रहे वश जो घरवाली।।

मंगलवार, 3 जून 2025

एक बड़ा घर

एक बड़ा सा गॉंव का घर,
उन्नत मस्तक चूमे अम्बर,
जिसमें लग जाते सौ बिस्तर,
पूरे जवार में प्रबल प्रखर।
परिवार बढ़ा फैला लश्कर,
अब घर में हैं दर ही दर,
ऊॅंचाई घटी घट गया असर,
सिसक सिसककर करता बसर।

मंगलवार, 27 मई 2025

भण्डारा

भोजन उसे कराइए, उर से दे आशीष।
भण्डारे में कीजिए, तनिक न पैसा खीस।
तनिक न पैसा खीस, कीजिए फोटू खातिर।
लोग समझने लगे मियां तुम पूरे शातिर।
भण्डारे की आड़ दिख रहा अहं युक्त मन।
जब भूखा मिल जाए करा दो उसको भोजन।।


सोमवार, 26 मई 2025

वे ही दोषी नहीं

किसने व्यभिचारी को चुनकर
प्रतिनिधि अपना बना लिया।
और सुअर ने सत्ता पाकर,
मुॅंह कीचड़ में सना लिया।
वे ही दोषी नहीं द्यूत में,
जो नारी को हार गये हैं।
कन्धे पर गांडीव टॅंगा था,
किन्तु मौन को धार गये हैं।
अरे! हस्तिनापुर के वासी,
तुमने दुर्योधन को झेला।
तुम भी उतने ही दोषी हो,
कुरुक्षेत्र में लगा झमेला।
सत्ता का आस्वाद लगा है,
तुम लोगों की दाढ़ों में भी।
इसीलिए हर ओर जहर है,
कैपसूल में काढ़ों में भी।
तुमको रण में घुसकर ही,
मरना होगा इतना तय है।
माथे पर कलंक गाथा ले,
तिरना होगा इतना तय है।

सोमवार, 12 मई 2025

व्यथा

हम राजा हैं,
जिसमें एक व्यथा भी है।
जो दिखता है,
उसके पीछे एक कथा भी है।
हलवा राजा की हलक में,
काट रहा है।
पूरा देश,
राजा की खोपड़ी चाट रहा है।
भगत सिंह फॉंसी पर,
गॉंधी नोटों पर चढ़े।
वर्तमान के स्तम्भ,
इतिहास पर खड़े।
राजा का छप्पन है,
गॉंधी का छत्तीस रहा होगा।
गॉंधी की क्या लाचारी होगी,
हृदय में कितना खून बहा होगा।
राजा,
इसे सीजफायर के निर्णय के आलोक में देख रहा है।
जन,
इसे सिन्दूर की लाली के शोक में देख रहा है।

सोमवार, 28 अप्रैल 2025

ले गया

कोई बल के घमण्ड, छीन के प्रचण्ड हुआ,
कोई हो विनम्र हाथ जोड़ मॉंग ले गया।
जो भी कहें होशियार, चालबाज, कपटी या,
रहा धंधेबाज झूठ सॉंच धॉंग ले गया।
कोई दीन-हीन बना, द्रवित हृदय छना,
करों को प्रसार दान झोली टॉंग ले गया।
जो भी जिस योग्य रहा उसी भाॅंति ले गया वो,
अपनी ही ले गया न मेरी भॉंग ले गया।।

हमारीवाणी

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