रविवार, 20 नवंबर 2011

तुम फिर आ गये



तुम फिर आ गये, चेहरा बदल कर।
चिन्ह बदल कर दल बदल कर।
यह तो नहीं चाहा था, कि इतनी जल्दी लौट आओ।
जिस वायदे के साथ भेजे गये थे, निभाना तो दूर याद भी न रख पाओ।
तुम कुछ सैकड़े लोग, पाँच साल भी इकट्ठे रह नहीं पाते।
तो सवा अरब जनता की एकता अखण्डता को कैसे सँभाल पाओगे।
मन्त्रालय कि फाइलें बेच आये हो देश को कैसे नहीं बेच खाओगे।
मेरे प्रश्नों के उत्तर दे दो तो वोट पाओगे अन्यथा लोकतान्त्रिक ढँग से पीटे जाओगे।
तुम फिर आ गये, चेहरा बदल कर।
चिन्ह बदल कर दल बदल कर।

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