सोमवार, 22 मार्च 2021

जाती हैं बाजार

जबसे आयीं मायके, कर नित नव श्रृंगार।
छोट-भैया ले साथ में, जाती हैं बाजार।
जाती हैं बाजार, जहाँ पर राम-पियारे।
लिए रेंट पर रूम, रहें निज गेह बिगारे।
तोड़ रहें सम्बन्ध, एक की खातिर सबसे।
दिखें प्रफुल्लित बन्धु, मायके आयीं जबसे।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-03-2021) को   "रंगभरी एकादशी की हार्दिक शुफकामनाएँ"   (चर्चा अंक 4015)   पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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  2. किस भावना से लिखी है ये कुंडली ? मन की भड़ास है क्या ? या स्त्रियों के लिए आप कुछ भी लिख दें तो वो हास्य हो जायेगा ?
    क्षमा चाहूंगी ... पसंद नहीं कर सकती ...

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    1. बहन पसंद नापसंद निजी है, आपका धन्यवाद। हास्य मैं लिखता नहीं। जो देखा सो लिखा भड़ास का प्रश्न नहीं। कुंडली में सिर्फ स्त्री नहीं पुरूष भी है जो शायद अधिक निन्दित है जो किराए का मकान लेकर रह रहा है और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी से हटा हुआ है। आपको पसंद नहीं इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ किसी को कष्ट देना मेरा ध्येय नहीं।

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  3. ये कविता किसे इंगित कर किन भावों से लिखी गयी हैं? --ब्रजेंद्रनाथ

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    1. कुछ विशिष्ट नहीं जो देखा सो लिख दिया। एक घटना सम्पूर्ण समाज पर लागू हो यह आवश्यक नहीं। ब्लॉग पर आकर टिप्पणी के लिए धन्यवाद। ब्लॉग पर बहुत कुछ उपयोगी भी होगा।

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  4. उत्तर
    1. हार्दिक आभार बन्धु, होलिकोत्सव की शुभकामनाएं।

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