शनिवार, 13 मार्च 2021

अपराधबोध

अनैतिकता की मानव-निर्मित परिभाषाओं से उपजा अपराधबोध 

पिछले एक पोस्ट में मैंने जो लिखा उससे दोनों तरह के लोग खीझ गए। एक तो इसलिए कि कैसे मैंने विवाह की पवित्रता और अंतर्निहित प्रेम पर प्रश्न किया और दूसरे इसलिए कि कैसे मैंने दहेज़ को, और ग़ैर-कामकाजी महिलाओं के घर की जिम्मेदारियाँ इत्यादि को सही कह दिया। देखिए फिर से कहूँगा―मुझे विवाह में पवित्रता और प्रेम की बातें निहायती बेईमानी लगती हैं। मुझे इस संसार में कुछ भी ग़लत नहीं लगता सिवाय इस बात के कि अपराधी अपराध भी करता है और निरपराध बने रहने का नाटक भी। मुझे ताल ठोक कर अपराध करने वाले लोग बेहतर लगते हैं बहरूपियों से। 

1. 
सबसे पहले तो इस बात पर आते हैं कि कितना अंतर्निहित प्रेम या पवित्रता है। ताश के पत्ते पर फ्रंट में उसकी वैल्यू लिखी होती है बैक में तरह-तरह की डिजाइन्स बनी होती हैं। गणितीय प्रायिकता (Mathematical Probability) का एक प्रयोग करते हैं। ताश की 52 गड्डियाँ लीजिए जिनके पीछे के भाग में बेहतरीन और अलग-अलग डिजाइन्स बनी हों। उनमें से यादृच्छया (At Random) एक-एक कार्ड निकालकर अलग मेज़ पर रख दीजिए। अब आपके पास मेज़ पर अलग से अलग-अलग गड्डियों के 52 ताश के पत्ते हैं जिनमें पीछे की डिजाइन एकदम अलग है। मैं अब आपसे कहता हूँ कि आप इस नई मिक्स्चर गड्डी से एक ताश चुनिए जिसकी डिजाइन आपको एकदम परफेक्ट लगे। आप अपने अनुसार एक बेहतरीन ताश चुनते हैं अब वो चुना हुआ ताश बादशाह हो, ग़ुलाम हो, या इक्का, या तिक्की आपका भाग्य; और तिक्की को सही चल दिए तो आपका हुनर। ये होती है अरेंज्ड मैरिज। तो लव मैरिज क्या है? लव मैरिज में भी यही मिक्स्चर गड्डी होती है बस आपको सेकंड के भी दसवें हिस्से के लिए मिक्स्चर गड्डी के सारे 52 ताश के पत्ते पलट कर दिखाए जाते हैं और फिर छुपा लिए जाते हैं अब इस छोटे से समय में आपकी नज़रें जो समझती हैं उसके आधार पर आप एक कार्ड चुनते हैं। अरेंज्ड मैरिज से थोड़ा कम Probabilistic. ख़ैर! जोड़ियाँ आसमान में बनती है इस बात से अधिक विश्वास मुझे उर्जागैतिकी (थर्मोडायनामिक्स) की इस बात पर है कि वह रिएक्शन फ़ीज़बल होता है जिसका गिब्स फ्री एनर्जी ऋणात्मक होती है।

विवाह क्यों करते हैं? सामान्य उत्तर होगा सब करते हैं तो करते हैं। समाजशास्त्र का छात्र कहेगा मनुष्य ने अपनी संततियों के जन्म तथा विकास एक लिए एक संतुलित सामाजिक संस्था बनाई―विवाह―जिसने सामाजिक और जैविक स्तर पर मनुष्य प्रजाति का विकास किया। मुझे ओशो वाली बातें न सुनाइएगा। इन सबके इतर विवाह एक व्यापार है यूँ समझिए एक टेबल पर एक डील करने के लिए दो पार्टियाँ बैठी हुई हैं। और दोनों टेबल पर वो सब रखती हैं जो उनके पास ऑफर करने के लिए है। जैसे लड़की के पास अच्छा शरीर, साफ त्वचा का रंग, अच्छे नैन-नक्श, 64 कलाएँ, 36 गुण, और दहेज़। लड़के के पास अच्छा शरीर, लड़की से अधिक लंबाई, अच्छी सैलरी, पुश्तैनी सम्पत्ति, अच्छा चरित्र। और यदि विश्वास नहीं होता तो कभी शादी वाले घरों में कन्वर्सेशन सुनिए। शादी तय होने से लेकर होने तक के कंवर्सेशन। आपने एक ताश का पत्ता चुना और अभी तक जो आपके लिए बस अदर पार्टी थी उससे आपको प्यार करना है। हास्यास्पद है या नहीं? रंग, रूप, मोटाई, लम्बाई, चाल-ढाल, पैसा, दहेज़, प्रॉपर्टी, स्टेटस सब नाप-तौल फिर कह रहे हैं कि पवित्रता है प्रेम है। कितने झूठ मानेंगे। देखिए लगाव एक अलग बात है। जो स्कूल नौवीं से बारहवीं मुझे 4 साल कचोटता रहा उससे मुझे कहीं न कहीं लगाव हो गया था। परिंदे को पिंजरे से लगाव होना स्वाभाविक है। स्टॉकहोम सिंड्रोम सामान्य है। पर पवित्र प्रेम? मेरा एक दोस्त कहता है कि उसके पिता जी घर में कुत्ते को पालने के सख़्त ख़िलाफ़ थे फिर जब कुत्ता आया तो कुछ समय बाद उन्हें सबसे अधिक लगाव हो गया। फिर पति-पत्नी तो एक दूसरे के लिए फिर भी मनुष्य हैं। 

2.
चूंकि यह बात एक्सप्लेन हो ही चुकी है कि विवाह एक बिजनेस डील है और एक परम्परागत रूढ़िवादी संस्था है। इसमें नारीवाद/उदारवाद जैसी चीज़ों के लिए कोई स्थान नहीं। आप इन्वेस्ट करते हैं और बदले में रिटर्न की अपेक्षा करते हैं। आप कुछ ऑफ़र करते हैं और बदले में कुछ ऑफ़र चाहते हैं। आप दोनों हाथों में लड्डू नहीं ले सकते कि आप एक कंज़र्वेटिव इंस्टिट्यूशन का हिस्सा भी रहें और उसमें लिबरल विचार भी रखें। एक डील है। अब डील में यदि अच्छी प्रॉपर्टी, कद-काठी, और सैलरी वाला लड़का ढूँढ़िएगा तो अच्छा-अच्छा दहेज़, घर का कामकाज, और सुंदर-सुंदर चेहरा भी बनाइएगा ना। काहे का लेफ्ट काहे, का लिबरल, काहे का साम्यवाद? बस पूँजीवाद, घोर पूँजीवाद। परंतु व्यापार का अर्थ भाव का अभाव बिल्कुल नहीं है। भाव सहज मानव अभिव्यक्ति हैं। बिजनेस पार्टनर्स भी अच्छे दोस्त बन जाते हैं। पर बिजनेस प्राथमिकता रहती है। एक बात और है जो हमारे आस-पास सामान्यतः दिख जाएगी लड़कियाँ वे लड़के पसन्द करती हैं जो उनसे बेहतर हों। हर मामले में। या कमोबेश आर्थिक और शारीरिक रूप से। जो आपसे बेहतर है वो आपसे दबेगा क्यों? एक दो बार दब भी गया, पर हमेशा? सोचिएगा। 

परन्तु निराश न होइए। सत्य स्वीकारिए। स्वीकार कीजिए कि आप स्वार्थी हैं प्रेमी नहीं। और याद रखिए कि जिस प्रेम की कल्पना आप/प्रेमी/लेखक/फ़िल्मकार/क्रांतिकारी आदि करते हैं उसमें पदार्थवाद या भौतिकवाद नहीं है, वह ईश्वरीय है, निराकार है, समय और स्थान से परे, क्वांटम है, वह है भी और नहीं भी, छलिया है, कृष्ण जैसे, कल्याणकारी है शिव जैसे, सत्य है, सुंदर है। वह परस्पर सम्मान, त्याग और समर्पण के निःस्वार्थ भाव से रचा गया है। पर जो प्रेम आप वास्तविकता में करने में सफल होते हैं उसमें पदार्थवाद है, भौतिकवाद है, पूँजीवाद है, पाखण्ड है, डर है, अपराधबोध है। जिस तरह हम बहुत सुंदर दृश्य की कल्पना कर उसे बना नहीं सकते, जिस तरह हम कर्णप्रिय संगीत सोचकर भी उसे बजा नहीं सकते, जिस तरह हम कोमल या क्रांतिकारी शब्द सोचकर भी कविता नहीं लिख सकते उसी तरह उस काल्पनिक प्रेम को वास्तविकता में ढालने का कार्य सबके वश की बात नहीं है। परन्तु हम प्रयास करते हैं। कविताएँ लिखते हैं, फेंक देते हैं, फिर से लिखते हैं, कितने संगीत धुन बनने से पहले हवाओं में खो जाते हैं, कितने चित्र बनते हैं बिगड़ जाते हैं। दोस्त! कल्पना को वास्तविकता तक लाने का नाम ही जीवन है। कल एक मित्र ने साझा किया कि आलोचना करो दुःख नहीं पहुँचाओ। यह हमारी आपकी आलोचना है, दुःखी मत होइए। कविताएँ लिखिए, फेंकिए, धुन बनाइए, बिसारिए, चित्र खींचिए, बिगाड़िए, प्रेम कीजिए, स्वार्थी बनिए, फिर कीजिए और निःस्वार्थता लाइए। ब्रह्मांड की एंट्रॉपी बढ़ाने की इस दिशा में आपका खुले दिल से स्वागत है। मुस्कुराइए।

―सिद्धार्थ शुक्ल

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