मंगलवार, 2 जनवरी 2018

कालिंजर



यह स्थान उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में है| यहाँ के किले को चन्द्रवर्मन चन्देल ने बनवाया था| महमूद गजनवी ने 1022 में बुन्देलखण्ड के गणशासक से इसे लेने का प्रयास किया किन्तु अंततः उसे संधि करनी पड़ी| 1202- 1203 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चन्देल राजा परमार्दिदेव को पराजित करके इसे अपने अधिकार में कर लिया| किन्तु राजपूतों ने पुनः इस पर अधिकार कर लिया| 1545 में शेरशाह सूरी ने इसे बुंदेलों से जीता, किन्तु बारूद के ढेर में आग लग जाने से सूरी की मृत्यु हो गयी| 1569 में अकबर के सेनापति मजनूं खां ने यह किला रामचन्द्र से बिना किसी युद्ध के ही हस्तगत कर लिया| 





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कायल



यह स्थान केरल के जनपद तेन्नावेली में ताम्रपर्णी नदी के तट पर है| इस स्थान का वर्णन मार्कोपोलो ने अपने यात्रा वृत्तान्त में किया है| उस समय यह एक प्रसिद्ध बन्दरगाह था| मार्कोपोलो यहाँ 1288 व 1299 में दो बार आया| 




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जुन्नार



यह स्थल महाराष्ट्र राज्य के पुणे से ४० मील उत्तर में है| यहा 150 शैल गुहायें जिनमें से 10 चैत्य तथा शेष बौद्ध विहार हैं| इन गुहाओं का समय पहली से दूसरी शताब्दी का है| इन गुहाओं में गणेश लेख व तनुजा लेख महत्त्वपूर्ण हैं, यहाँ मूर्तियाँ नहीं है किन्तु कुछ गुहाओं की दीवार पर लक्ष्मी, कमल, गरुण व सर्प आदि के चित्र उत्कीर्ण हैं जो बौद्धधर्म के हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित है| यहाँ के चैत्य गृह आयताकार हैं जिनकी छतें सपाट और मण्डप स्तम्भ रहित हैं| एक चैत्य गोलाकार भी है| इस आकृति का चैत्य पश्चिम भारत में नहीं मिलता| यहाँ की एक गुफा से 124 ईस्वी का शक नरेश नहपान के मन्त्री अयम का एक अभिलेख मिला है जिसमें नहपान को महाक्षत्रप कहा गया है|




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पंडुआ

 लखनौती से 20 मील दूर यह स्थान अलाउद्दीन अलीशाह के समय में बंगाल की राजधानी था| 1360 में सिकन्दर शाह  के काल में बनी ‘अदीना मस्जिद’ के भग्नावशेष यहाँ अभी मौजूद हैं| इसमें सिकन्दरशाह की कब्र भी है इसमें 400 गुम्बद हैं| इस मस्जिद में हिन्दू वास्तुकला का प्रभाव देखा जा सकता है| पंडुआ में ही जलालुद्दीन मुहम्मदशाह की भी कब्र है, जिसे इखलाखी मकबरा भी कहा जाता है| यह स्थल 14वीं शताब्दी में चिश्ती सूफी सिलसिले की गतिविधियों का भी केंद्र रहा है|




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