बुधवार, 23 जून 2021

कवि की मौलिकता

मेरे एक मित्र का  प्रश्न था , "बंधु क्या कोई भी कवि मौलिक रहा, है या होगा?" मैंने जो उत्तर लिखा शायद वह आपके मतलब का हो।

मौलिक तो केवल ईश्वर है। कविता के सन्दर्भ में मौलिक होना अलग बात है। कविता के दो पक्ष हैं भाव पक्ष और कला पक्ष। कोई कवि अपने अनुभवजन्य हृदयोदगारों को अपने ढंग से प्रस्तुत करता है तो वह मौलिक ही माना जाता है। नये बिम्ब व नवीन उदाहरण का प्रयोग भी मौलिकता की श्रेणी में आता है। होता क्या है जब से फेसबुक आया है और उससे पहले भी लोग दूसरों की कविता अपनी बताकर ज्यों की त्यों सुना देते थे और छोटे समाचार पत्रों इत्यादि में छपवा तक देते थे। जब तब बेइज्जत भी होते थे।
आजकल भी फेसबुक पर कोई अच्छी सी कविता को मिनटों में तमाम कवि अपनी बता  देते हैं। कुछ होशियार किस्म के चोट्टे आजकल शब्दों में थोड़ी बहुत छेड़छाड़ कर कुछ नये शब्द जोड़कर दूसरों की कविता को अपनी बना लेते हैं। छन्द को स्वच्छंद कर कीचड़ से कलाकन्द हो जाने का भ्रम पाल लेते हैं। ऐसी कविता फेसबुक पर लाइक और कमेन्ट की संख्या बढ़ा सकती है किन्तु उसे कितने समय तक लोग याद रखेंगे भगवान ही जानता है। समय की कसौटी पर ऐसे कवि कवि मौलिक अमौलिक किसी भी श्रेणी में नहीं आते। स्वयं ऐसे कवि अपने हृदय पर हाथ रखकर देखें और याद करें कि आज कितनी रचनाएं उन्होंने मनोयोग से पढ़ने के बाद लाइक कीं या उनपर कमेंट कीं। तब यह सोचें कि उनके लाइक और कमेंट में कितने लाइक व कमेन्ट उनकी रचना को पढ़कर हुए होंगे यकीन मानिए बहुतों को अपने कवि होने पर ग्लानि हो जाएगी।
आप मौलिकता-अमौलिकता के चक्कर में न पड़ें। आपके अनुभव में जो आपके हृदय से छनकर आये वह व्यक्त करें तो कोई उंगली नहीं उठायेगा। वैसे भी मैं अनुभव कर रहा हूँ पिछले कुछ समय से आपका पुनर्जन्म हो गया है। एक अच्छा प्रश्न करके मुझे गद्य लिखने को प्रेरित करने के लिए धन्यवाद।

सोमवार, 21 जून 2021

महबूब

अब न हाथ में किताबें, कन्धों पर बस्ते होंगे,
सड़क पर मिल जायें तो भी एक न रस्ते होंगे।
जो बिक चुके हैं दूसरे की दहलीज पर प्यारे,
क्या करें महबूब का महबूब जो सस्ते होंगे।।
अन्तर्जाल से साभार

शुक्रवार, 18 जून 2021

विषधर

तुम भी तने रहे, हम भी तने रहे।
गड्ढे भरी घृणा, उसमें सने रहे।
ताबूत बन गए, खुद के लिए हमीं,
अमरित भरा रहा, विषधर बने रहे।।

गुरुवार, 10 जून 2021

अगले किसी मोड़ पर

ऐ! गुलब्बो,
ये तय है कि अगले किसी मोड़ पर मेरी तेरी राहें अलग हो जाएंगी। कुछ दूर तक एक दूसरे को शायद देखते भी रहें, किन्तु कहाँ तक? उसके बाद रहेंगी स्मृतियाँँ या वे भी नहीं। सौ वाट का बल्ब जलते ही पाँच वाट के बल्ब पर ध्यान कहाँ जाता है। फिर क्या प्रेम क्या घृणा दोनों को हृदय में रख पाना कठिन हो जाएगा। तो क्यों नहीं वर्तमान को मिठास से भर दें और घृणा का परिहास कर दें। अपने हृदय में झाँककर देखो और प्रेम तथा घृणा को पृथक पृथक पहचानने का यत्न करो। असफल हो गए न। जब प्रेम दिखता है तो घृणा नहीं और जब घृणा दिखाई दी तो प्रेम नहीं दिखाई दिया। क्यों? वास्तव में प्रेम और घृणा का पृथक पृथक अस्तित्व ही नहीं है। वे दोनों तो एक ही हैं। प्रेम और घृणा का एक एक कर दिखाई देना तो हमारी आँखों पर चढ़ी ऐनकों के कारण है। लाल गुलाब हरी ऐनक से बैंगनी दिखता है और पीली ऐनक से नारंगी। किन्तु गुलाब तो गुलाब ही है।
मैंने छोड़ दिया है तुममें भविष्य को देखना तुम भी छोड़ दो मुझमें अपने भविष्य को देखना। रेल की दो पटरियों की तरह साथ साथ होने का भ्रम मत पालो। दूर दूर रहकर भी जब तक साथ दिखाई पड़ रहे हैं तब तक स्लीपरों के सहारे टिके रहने का आनंद उठा लो। जैसे ही जंक्शन आयेगा दोनों का साहचर्य परिवर्तित हो जायेगा। फिर एक दूसरे के मार्ग की स्टेशनें पृथक हो जायेंगी।
तुम्हारा वर्तमान

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