सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

दोहा-वार्ता

बड़े बड़ेन के संग मा, कबहु न घूमन जाय।
वह तौ खइहैं कोरमा, तुमका सूखी चाय।। (नीतीश नयन , हरदोई)
मिलिहै तुमका कोरमा, रहउ ढंग से संग।
टाँग बड़ेन की खींचि के, सदा राखिये तंग।। (विमल शुक्ल, हरदोई)
टांग बड़े कर खीचिहौ तो अपुनौ होइहौ तंग, 
बहुत दिनन ई ना बचे होइ जाये एक दिन जंग। (श्रद्धानन्द द्विवेदी, अमेठी)
तबलमंजनी ना करैं,ना हम मांगैं भीख ।
दादा हमसे दूर तुम,राखौ अपनी सीख।। (नीतीश नयन, हरदोई)
तबलमंजनी ना करउ, ना तुम मांगउ भीख।
इनका काटउ यहि तरह, जैसे सिर की लीख।। (विमल शुक्ल, हरदोई)
बड़े जो राखैं दाबि के, करैं न लघु की चिन्त।
हुईहै जंग जरूर तब, फल हुइहैं अनमन्त।। (विमल शुक्ल, हरदोई)

शनिवार, 30 जनवरी 2021

कागज का मेढक


इस वीडियो में आप देखेेंगे कि एक बच्चा  जब कागज को हाथ लगाता है तो वह मेढक की तरह उछलता है। बस 10 सेकंड का समय दें 
और बालक को प्रोत्साहित करें।


कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

महात्मा गाँधी और किसान

आज महात्मा गाँधी जी की पुण्यतिथि है। मेरे लिए कोई विशिष्ट महत्व निजी तौर पर तो नहीं है। किन्तु अभी 26 जनवरी को जो लालकिले पर हुआ और जिस तरह से पुलिस ने मामले का सामना किया तो एकबारगी गाँधी जी मेरे लिए महत्वपूर्ण हो गए। 
मैं टीवी पर विभिन्न चैनलों के माध्यम से जो लाइव टेलीकॉस्ट देख रहा था तो लग रहा था कि दो चार तो जरूर लाठी डण्डों की चोट से मरे मराये होंगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि भारतीय पुलिस अभी भी गाँधीवादी हो सकती है।  कोई शातिर पूछ रहा था कि पुलिस क्या कर रही थी, गुण्डे लालकिले तक पहुँच गए। वास्तव में जो यह शातिर चाहता था वह पुलिस ने नहीं किया अस्तु पुलिस को साधुवाद। वरना जो शातिर यह पूछ रहा था कि पुलिस क्या कर रही थी वही शातिर लालकिले के बाहर तिरंगा उतार कर अन्य ध्वज फहराने वाले की लाश पर घड़ियाली आँसू बहाते हुए सरकार व पुलिस से यह सवाल कर रहा होता कि अपना हक माँगने की सजा पिछवाड़े पर गोली। 
कोई ऐंकर भी टीवी पर चिल्लाता देखो देखो यह नमो सरकार का किसान विरोधी चेहरा। एक बेकसूर देश भर के किसानों के हक के लिए शहीद हो गया। 
राकेश टिकैत के जो आँसू टपके वो सैलाब बन गए होते। नहीं हुआ ऐसा। किसे धन्यवाद दूँ, पुलिस को। नहीं पुलिस तो वही करती है जो उसे आदेश होता है। सत्ता पक्ष के इशारे पर आग उगलती है तो चूड़ियाँ भी पहन लेती है। क्या आदेश था राम जाने। काश आज गाँधी जी होते तो लालकिले पर अन्य झण्डे के फहरते और हिंसा फैलते देखते तो कहते जो हुआ उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेता हूँ और असहयोग आंदोलन की तरह यह आंदोलन भी स्थगित करता हूँ।

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

उर में उठती पीर

मिट्टी खाई गिट्टी खाई , खा डाली सीमेंट याद है।
गए पोतने दीवारों को , चेहरे पर की पेंट याद है।।1।।
डाली पर दो बन्दर बैठे, मुझको ढँग से ताक रहे थे,
गड्ढा खोद गिटैली रख के, ढक दी थी वो गेंद याद है।।2।।
बहुत बार शैतानी करके, बच जाते थे कभी कभी हम,
लेकिन फँसे सजा पाई जब, खूब दुखी थी पीठ याद है।।3।।
भरी दोपहर छुक छुक करती, जिसके नीचे रेल चली थी,
बच्चों के मन भाने वाला, वो पीपल का पेड़ याद है।।4।।
विदा हुई जब काली कोयल, पीछे पीछे दौड़ रहा था,
ठोकर खाकर गिरा जहाँ पर, वहाँ पड़ी थी ईंट याद है।।5।।
था जिस दिन स्कूल आखिरी, छूट गया कुछ बहुत कीमती,
अंकपत्र दे ठगा गया था, उर में उठती पीर याद है।।6।।

हमारीवाणी

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