हमारे भतीजे शुभम शुक्ला को माँ विषय पर कविवर सुनील जोगी की कविता बहुत पसंद आयी और होली मिलन समारोह के अवसर पर श्री भूरेश्वर मन्दिर भाटनटोला पिहानी में पढ़ी गयी आप भी सुनें|
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शनिवार, 21 जनवरी 2023
बुधवार, 25 अक्टूबर 2017
स्वयं की झनकार के प्रति
20/10/2017
जन्म लेना
एक वचन था जो किया संसार के प्रति।
माँ, पिता,
गुरु, देवगण द्वारा किये उपकार के प्रति।
और हम विस्मृत
किये निज स्वार्थ में ही जी रहे हैं,
दण्ड क्या
देगा विधाता हो रहे अपकार के प्रति।
त्यागकर
कर्त्तव्य का पथ पग कुपथ में दे दिये,
किन्तु
अति जागृत हुए हैं स्वयं के अधिकार के प्रति।
हम सितारों
में लगे हैं खोजने अपनी जगह को,
किन्तु
अपनी दृष्टि की गति हो गयी जलधार के प्रति।
शीश से
ऊपर उठाकर हाथ दीपक ले खड़े,
गालियाँ
बकने लगे हैं व्यर्थ ही अँधियार के प्रति।
हाट की
हर चिल्लपों पर ध्यान इतना दे रहे,
हम अजाने
हो गये हैं स्वयं की झनकार के प्रति।
जब हमें
निज के लिए कुछ गीत गाने चाहिए,
मुंह उठाये
रागिनी अल्ला रहे दरबार के प्रति।
रविवार, 14 मई 2017
माँ
२७/०३/१९९५
बिन्दु से शब्द का अर्थ है सिन्धु सा वर्णों में ॐ से भी यह बढ़कर।
केवल मानव प्राणि नहीं सुर पूजित देवों में देवों से बढ़कर।
नाम लिये अपनेपन का अहसास पवित्र उठे उर कढ़कर ।
सत्य कहूँ कुछ झूठ नहीं नहीं थोड़ी भी बात करूँ बढ़ चढ़कर।।1।।
माँ जननी सुखदायक पोषक प्राण पिलाकर पालन हारी।
जन्म की पीड़ा से काल डरे निज अंग सहे अबला महतारी।
सूखे बिछौने सुला सुत को खुद भीगे में जाग के रात गुजारी।
कौन है त्याग मयी कहो माँ सम कौन द्वितीय है सृष्टि पुजारी।।2।।
जन्म की पीड़ा से काल डरे निज अंग सहे अबला महतारी।
सूखे बिछौने सुला सुत को खुद भीगे में जाग के रात गुजारी।
कौन है त्याग मयी कहो माँ सम कौन द्वितीय है सृष्टि पुजारी।।2।।
माँ फिर फिर माँ कहिये कहो ऐसी मिठास कहाँ तुम पाओगे।
बार हजार करो त्रुटियाँ पर कण्ठ से फेरि किसे मिल पाओगे।
माँ को कभी ठुकराया अरे तब प्रेम का फिर परिवेश न पाओगे।
आँचल माँ का भले सस्ता पर मोल नहीं चुकता कर पाओगे।।3।।
बार हजार करो त्रुटियाँ पर कण्ठ से फेरि किसे मिल पाओगे।
माँ को कभी ठुकराया अरे तब प्रेम का फिर परिवेश न पाओगे।
आँचल माँ का भले सस्ता पर मोल नहीं चुकता कर पाओगे।।3।।
केवल पालन पोषण ही नहीं ज्ञान के बीज हिये बिखराती।
शिक्षित सभ्य बना सुत को इस जीवन का सन्मार्ग बताती।
लायक पुत्र को शेर बना कुल के यश का विस्तार कराती।
किन्तु है खेद जलाकर दीपक नित्य घने तम में रह जाती।।4।।
शिक्षित सभ्य बना सुत को इस जीवन का सन्मार्ग बताती।
लायक पुत्र को शेर बना कुल के यश का विस्तार कराती।
किन्तु है खेद जलाकर दीपक नित्य घने तम में रह जाती।।4।।
माँ ममता से भरी गगरी छलकी जिस देह वही समझे।
स्वर्ग बसा चरणाम्बुजों में जिसको पद नेह वही समझे।
लोरियों में सत जीवन की धुन है जिस गेह वही समझे।
माँ छवि दर्शन के सुख का जिसको परिवेश वही समझे।।5।।
स्वर्ग बसा चरणाम्बुजों में जिसको पद नेह वही समझे।
लोरियों में सत जीवन की धुन है जिस गेह वही समझे।
माँ छवि दर्शन के सुख का जिसको परिवेश वही समझे।।5।।
व्यष्टि न माँ को कहें तो भली यह एक पवित्र समष्टि का मूल है।
स्वयं रही अबला जननी पर वीर सपूतों की राशि अमूल है।
नाहक नारि प्रताड़ित है जन आज हुआ उसके प्रतिकूल है।
भूलो नहीं अरे माँ के ऋणी तुम सिर्फ़ नहीं यह सृष्टि समूल है।।6।।
स्वयं रही अबला जननी पर वीर सपूतों की राशि अमूल है।
नाहक नारि प्रताड़ित है जन आज हुआ उसके प्रतिकूल है।
भूलो नहीं अरे माँ के ऋणी तुम सिर्फ़ नहीं यह सृष्टि समूल है।।6।।
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