गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

लोकतन्त्र की अर्थी निकली

घर में जो दरार दिखती है।
उस दरार में घर दिखता है।
झाड़ दुलत्ती बदल रहा दल,
अब नेता बहुत बिदकता है।
ऊँट कहाँ किस करवट बैठे,
बिलकुल पता नहीं चलता है।
आम सवेरे संध्या इमली,
रस बदला तो रस्ता बदली।
नेता लड़े लड़ी जनता पर,
लोकतन्त्र की अर्थी निकली।
दंगे हजम हजम घोटाले,
जनता के दिल में हैं छाले।
कुत्तों से उम्मीद नहीं है,
जनता ही कुछ सूत्र निकाले।

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