गुरुवार, 20 अगस्त 2020

फकीर

बहुत बड़ी झोली लिए, गद्दी डटा फकीर।
क्षण में गंगा तीर है, क्षण में यमुना तीर।
क्षण में यमुना तीर, कर्म हैं घूम-घुमारे।
मन-बातों के वीर, विरोधी सभी पछारे।
बदल रहे हैं नित्य, दवाएं, काढ़ा, जड़ी।
अच्छे दिन हैं दूर, मुसीबत बहुत बड़ी।।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

कोरोना प्रभु का अवतार

बार बार लोग लोग लिख रहे हैं, कि कोरोना से कोई भगवान, गॉड या अल्लाह बचा नहीं पा रहा है। इस देश को मन्दिर और मस्जिद की नहीं स्कूलों और अस्पतालों की जरूरत है। आखिर कहना क्या चाहते हैं? क्या ईश्वर ने आपको दृष्टि और समझ नहीं दी या फिर विलुप्त हो गयी है?
वह मन्दिर और मस्जिद ही हैं जहाँ हर ओर से हारने के बाद व्यक्ति शरण लेने जाता है। तुम ही अपने कर्तव्य पालन से विमुख होकर हर कृत्य-कुकृत्य किये जा रहे हो, भक्ष्य-अभक्ष्य खाये जा रहे हो, बहू-बेटियों का नंगा नाच देख रहे हो, समस्त पृथ्वी पर अपना आधिपत्य जमाकर तमाम जीव जन्तुओं को नष्ट किये दे रहे हो, अपने लालच में जल, जंगल, जमीन सभी कुछ तो नष्ट किये दे रहे हो। फिर कहते हो कोरोना से भगवान नहीं बचा रहा। अरे भाई ये तो ट्रेलर है अगर नहीं सुधरे तो पिक्चर अभी बाकी है। कोरोना के अगली पीढ़ी के वायरस और बैक्टिरिया आयेंगे और अपना तांडव मचाएंगे। आपके स्कूल और अस्पताल धरे रह जाएंगे। जब तक आप टीके या दवा का आविष्कार करेंगे तब तक नई फ़ौज आएगी तबाही मचाने। अरे मूर्खों वह मन्दिर व अन्य धार्मिक स्थल ही हैं जो जीने की राह दिखाते हैं। तुम सीखो तब तो। 
सलीके से जीना तुम्हारी आदत रही नहीं, साफ़ सफाई की आदत तुम्हें छुआछूत लगती है, दूसरों के अधिकार समझना तुम्हें अपनी हेठी लगती है, देवस्थल पर सिर झुकाना पिछड़ापन लगता है, जन भावनाओं को आहत करना तुम्हें आनन्ददायक है, कर्तव्य तुम्हें स्मरण करते लज्जा आती है। बात करते हो भगवान कुछ करता नहीं।
जब जब होइ धरम की हानी।
बाढहिं अधम असुर अभिमानी।
तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा।
हरहिं सृष्टि की सहजहिं पीरा।
यह कोरोना भी प्रभु का अवतार है, तुम जैसे रावणों को हनुमान की तरह चेतावनी देने आया है, आगे जब स्वयं भगवान आयेंगे तो रावणों तुम्हारा क्या होगा? सोंचो।
देश को स्कूल अस्पताल भी चाहिए और देवस्थल भी। अन्यथा चले जाओगे वहीं जहाँ से आये हो। यह  पोस्ट किसी धर्म विशेष के लिए नहीं अपितु प्रकारांतर से राजनीति करने वालों के लिए है।

सोमवार, 10 अगस्त 2020

कोरोना रे अब तो जा रे


कोरोना रे, अब तो जा रे|
जाड़े गये, फिर गर्मी आई,
तूने पाँव पसारे|
लोग-बाग़ घर भीतर घुसि गए,
तूने डेरे डारे|
बारिश जाई रही अपने घर,
अब तो तू भी जा रे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
मन्दिर बनि रहो मोदी कृपा से,
तुमसे रामउ हारे|
बिना दवा जन ठीक हुई रहे,
काहे छ्प्परू फारे|
लूट पाट औ' घटा नफा सब,
देखि लई हइ प्यारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|
घेरो चीनु संभारी फौजें,
अब राफेल रखवारे|
पर-निर्भरता छोड़के भारत,
राग स्वदेशी गा रे|
मजदूरों ने करी वापसी तुमहि,
टिकासनु डारे|
कोरोना रे, अब तो जा रे|


कृपया पोस्ट पर कमेन्ट करके अवश्य प्रोत्साहित करें|

रविवार, 9 अगस्त 2020

विद्यालय

जब आप विद्यालय की चर्चा करते हैं विशेषकर प्राइवेट विद्यालय की तो आपको यह भी लिखना चाहिए कौन से प्राइवेट विद्यालय। एक ओर उंगलियों पर गिनने योग्य शहरी क्षेत्र के कुछ विद्यालय हैं जो ब्लैक मनी से खड़े हुए हैं और निरन्तर ज्यादा इनपुट लेकर कम आउटपुट दे रहे हैं अर्थात भारी भरकम फ़ीस लेते हैं और कुछ हजार बच्चों को पढ़ाकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं। यहाँ अध्यापक पढ़ाता कम है अभिभावक से पैसा ज्यादा ऐंठता है कभी कभी अभिभावक के कान भी उमेठता है। बुआओं और चाचाओं के द्वारा बने मॉडलों से ऑफिस की या अन्य किसी कमरे की दीवार सजी होती है और नीचे नर्सरी के जी के बच्चों के नाम लिखे होते हैं। मेरा अनुभव है पढ़ाई के नाम पर इन विद्यालयों में सिर्फ कॉपियाँ चेक होती हैं और होमवर्क दिया जाता है जिसे या तो अभिभावक कराएं या आपका ट्यूटर कराये। फिर फ़ीस भी अनाप शनाप हर साल रजिस्ट्रेशन फीस, एडमिशन फीस, डेवलपमेंट फीस, पूअर्स फण्ड, लाइब्रेरी फीस, सायकिल स्टैंड चार्ज,  इलेक्ट्रिसिटी फीस, ऑनलाइन सर्विसेज फीस, कंप्यूटर फीस और भी बहुत सारे चार्ज जिनमें से कई सुविधाओं का बालक उपयोग ही नहीं करता। अब ऐसे विद्यालय अगर अपने अध्यापकों का पेमेंट नहीं कर रहे तो बिल्कुल गलत बात है। आपको लगता है ये आपके बच्चे को होशियार बना रहे। वास्तव में ये होशियार बच्चे का ही एडमिशन लेते हैं। हर साल जिले भर के  विद्यालयों के 50 बच्चों को टॉप मिलता है कभी मालूम किया है फिसड्डी बच्चे कितने होते हैं। ऐसे विद्यालयों की वसूली पर लगाम लगनी चाहिये। दूसरी ओर मेरे जैसे विद्यालय संचालक भी हैं। मैं 1998 से विद्यालय चला रहा हूँ कमाई के मामले में अपने तीन अन्यभाइयों से बहुत पीछे हूँ। मैं समझता हूँ कुछ अन्य विद्यालय भी मेरी तरह के ही चल रहे होंगे। हकीकत यह है मुझे अधिकांश अभिभावकों ने नवंबर से मार्च तक की ही फ़ीस नहीं दी है अप्रैल और उसके बाद की छोड़िये। जो वसूल ले उसे 15 प्रतिशत कमीशन दूँगा। अप्रैल व उसके बाद की फ़ीस की वसूली शून्य। फ़ीस वसूली का कार्य अध्यापकों ने खुद किया तब कहीं जाकर अध्यापकों को अप्रैल मई का वेतन दे पाया हूँ। उसके बाद का वेतन देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है। मुझे इतने टिप्पणी कारों में से किसी एक को रोजगार देने में प्रसन्नता होगी कि वह अप्रैल व उसके बाद की फ़ीस वसूल ले और यदि वह 80 प्रतिशत फ़ीस वसूल पाया तो हर 80 में 20 उसके। देहात का सच यह है 20 प्रतिशत छात्र सूचना भेज चुके हैं कि उनका नाम काट दें। वह इस साल पढ़ेंगे नहीं इसका कारण भी किसी ने साफ़ साफ़ नहीं बताया लेकिन बात यही है फ़ीस नहीं देंगे स्कूल बदल लेंगे। अब मैं शिक्षकों को वेतन कहाँ से दूँ। मैं तैयार हूँ शिक्षक को भी रसीद बुक देने के लिए कि अभिभावक दे तो वे जमा कर लें और अपना वेतन काट के जो बचे मुझे दे दें। मुझे तो दुबारा स्कूल खुलने पर स्कूल में जो साँप बिच्छुओं ने डेरा डाल रखा है उनको हटाने के लिए भी उधार ही लेना पड़ेगा। अब सरकार कुछ मदद करे तो बात बने। वरना भगवान ही मालिक है।

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