रविवार, 21 फ़रवरी 2021

बस अड्डा

बस अड्डा (BUS STATION)

इस चित्र में जो खेतों में बस खड़ी दिख रही है, अपनी राह भूलकर इधर नहीं आयी है। बन्धु यह बस अड्डा है। कौन सा? मत पूछो। यह बस अड्डा हमारे देश के असन्तुलित विकास की संतान है। वैसे तो यह बस कैमी और अंतोरा गाँव की सीमा पर खड़ी है लेकिन इस तरह के बस अड्डे उत्तर प्रदेश में बहुत जगह मिल जायेंगे।
मैंने बस अड्डा कहा लेकिन यह क्या, यहाँ कोई चहलपहल तो दिख नहीं रही? बन्धु ऐसा इसलिए है अभी इसके जाने का समय नहीं है। जब किसी के जाने का समय होता है तो उसके घर पर भीड़ इकट्ठी करने की हमारी संस्कृति है चलो जाने से पहले एक बार देख लें वरना किसी का हालचाल जानने की फुर्सत भी कहाँ मिलती है। उसी तरह इस बस की भी रवानगी के समय ही यहाँ यात्री व उन्हें छोडऩे आने वाले दिखाई देते हैं। वरना यह बस दिन भर अपने एकाकीपन का शोक मनाती होगी। सवारी-सकारी छोड़िए कोई दूसरी बस भी यहाँ नहीं खड़ी होती जिससे बोल-बतलाकर अपना जी हल्का कर ले।
इस प्रकार के बस अड्डों का जो एक ही गन्तव्य मुझे अब तक पता चल पाया है, वह है दिल्ली। आज मुझे समझ में आ रहा है क्यों नेता जी ने "दिल्ली चलो" का नारा दिया था। उन्होंने "मुम्बई चलो" या "कलकत्ता चलो" का नारा नहीं दिया। वरना वर्मा से कलकत्ता बहुत पास था। ये बसें रात की मुसाफिर हैं। शाम को भर जाती हैं सुबह दिल्ली में खाली हो जाती हैं और शाम को पुनः उधर से भर जाती हैं और सुबह फिर गाँव में आकर खाली।
मैं गाँव के एक परिवार से मिला। घर में बस बुड्ढा और बुड्ढी। एक अदद लड़के के चक्कर में पाँच लड़कियाँ पैदा कर लीं और फिर कहीं एक लड़का साथ न दे तो दूसरा देगा इस चक्कर में चार लड़के पैदा कर लिए। आज बुड्ढा बुड्ढी अपनी किस्मत को कोसते हुए अकेले। बेटे दामाद सब रोजगार के लिए बाहर हैं दिल्ली या हरियाणा में। अच्छा कह सकते हैं कमाते हैं माँ-बाप को रुपया भेज देते हैं। रुपये से तन की साध तो सध जाती है पर मन की? वही जाने जिस पर बीते। आप कह सकते हैं कि ईश्वर की लीला न्यारी है। किन्तु यह क्या सिर्फ ईश्वर की लीला है। इसमें सरकार और योजनाकारों का कुछ भी दायित्व नहीं क्या? रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर दौड़ कब खत्म होगी? कब इन बुड्ढे-बुड्ढियों को अपनों के मध्य रहना नसीब होगा? या ये यूँ ही इस संसार से यह सोचते विदा हो जायेंगे कि अरे अभी फलाँ बेटा-बेटी नहीं आयी। काश उसे भी देख लेते।

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