रविवार, 4 मार्च 2012

जंगल की सरकार


जंगल के पशु एक दिन, हुए कहीं एकत्र।
करने को सुविचार यह,हो वन में जनतन्त्र॥१॥
सबको रोटी , वस्त्र, घर, हो हर कर को काम।
शेरों के खरगोश अब, होंगे नहीं गुलाम॥२॥
रोटेशन से चलेगी, जंगल की सरकार।
आरक्षण की बहुत है, चूहों को दरकार॥३॥
शेर न राजा आज से, मन्त्री नहीं सियार।
सिंहासन आसीन हो, चुनी हुई सरकार॥४॥
सेनापति की पोस्ट पर, भईंसा हो आसीन।
नीलगाय, गदहा, सुअर, मन्त्री होंगे तीन॥५॥
बन्दर, चूहा, चिरैयाँ, तकैं अन्नभण्डार।
लोकपाल लागू करौ, मेटौ भ्रष्टाचार॥६॥
उल्लू, गिद्ध, बिलाव अब, किया करेंगे न्याय।
संसद जैसा यहाँ भी, होगा एक निकाय॥७॥
चर्चा में आये नहीं हाथी चीता बाघ।
आयोगों के मुख्य पद, झटकेंगे ये घाघ॥८॥
तभी कहीं से आ गया, निज दल बल संग शेर।
सभा छोड़ भागे सभी, किये बिना कुछ देर॥९॥


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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

चोर महाराज


मेरी यह पोस्ट चोरों को समर्पित है। मैं यह जानता हूँ मेरी यह पोस्ट पढ़ने के बाद चोर चोरी करना नहीं छोड़ेगा। छोड़े भी क्यों कुतिया की पूँछ छह साल नली में रखो फिर भी टेढ़ी की टेढ़ी फिर मैं लेखक हूँ लिखना क्यों छोड़ूँ। तो चोर महाराज जी मैं लिख रहा हूँ।
आपने बहुत बार चोरी की और बहुत सी चीजें चुराईं जरा सोच समझकर और हिसाब लगाकर बताइये उनमें से कितनी चीजें सही-सलामत आपके पास हैं। क्या कहा? चोरी किये गये माल का आधा भी नहीं। छिः छिः कितनी बुरी बात है आपने अपने बुढ़ापे के लिये कुछ तो अधिक बचाया होता। खैर यह बताइये कि आप अपने सम्माननीय पेशे पर कितना गर्व सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर सकते हैं। क्या पब्लिक्ली आप कह ही नहीं पा रहे हैं कि आप चोर हैं? यहाँ भी बेइमानी देखिये आप चोर हैं लेकिन आप कह ही नहीं पा रहे हैं कि आप चोर हैं यानी आपमें सच का सामना करने का साहस भी नहीं है।कोई बात नहीं आपके परिवारवालों व पास-पड़ोसियों को अवश्य इस बात पर गर्व होगा कि आप चोर हैं उन्हें इस बात के प्रचार के लिये लगा दीजिये कि आप चोर हैं। क्या आपसे इतना भी नहीं हो सकता कि आप अपने मुफ्त के प्रचार को सहन कर सकें। अरे भाई आपका काम ही काबिले तारीफ़ है आप इतनी मेहनत से चोरी की योजना बनाते हैं और उस पर अमल करते हैं इस बात की परवाह किये बगैर कि अगर पब्लिक ने पकड़ लिया तो क्या होगा कभी कभी इतनी धुनाई होती है कि पूछो मत। जिसने कभी किसी कुत्ते को धत्त नहीं किया होता वह भी दो चार धौल जमा देता है। कभी कभी तो पिटते पिटते तुम्हारे कोई कोई भाई बन्धु जान से भी मारे जाते हैं। वैसे पुलिस पकड़ ले तो फिर क्या कहना पिटाई का झंझट नहीं सुरक्षा और चाय पानी अलग। हाँ इसके लिये चोरी का माल उनके साथ बाँटना पड़ता है। आपको क्या कौन सा आपके बाप का माल था जो आपको बाँटने में कठिनाई हो। किन्तु क्या कभी आपने सोचा है कि चोरी का माल आप किसी से भी बाँट लें तो दानी तो न कहे जायेंगे।


खैर अपने को क्या मुझे बड़ी खुशी होती है जब मुझे पता चलता है कि किसी पुलिस-कर्मी के घर चोरों ने हाथ साफ़ कर दिया। चोर महराज जानते हैं क्यों? आखिर कौन सा तन्ख्वाह के पैसे लूट लिये आपने। शायद ही कोई पुलिसवाला अपनी तन्ख्वाह को जीवन में हाथ लगाता होगा क्योंकि अधिकाँश पुलिसकर्मियों के ऊपर ऊपर की कमाई इतनी बरसती है कि पूछो मत।अगर किसी लेखपाल के घर का ताला टूटे तो पूछो ही मत इस प्राणी ने तो ऊपर की कमाई के मामले में पुलिस को भी पीछे छोड़  दिया है। वैसे कुछ पुलिसवाले  और लेखपाल बेचारे बड़े भले और ईमानदार होते हैं उनसे मैं क्षमा चाहूँगा कि उनके  बन्धुओं के बारे में इतना कुछ पढ़ते समय उन्हें कुछ तकलीफ़ हो रही हो। लेकिन चोर महाराज जब आप गलती से इनके घर में घुस जाते होंगे तो आपको बड़ी तकलीफ होती होगी क्योंकि उनके घर में चोरी करने लायक कुछ मिलता होगा तो वे चीजें होंगी बेरोजगार बच्चों की डिग्रियाँ और अविवाहित कन्याओं के आँसू। क्या कभी चुराई हैं ये चीजें आपने। नहीं, तो अवश्य चुराइयेगा ये चीजें किसी के भी घर में मिलें अवश्य हर ले जाइयेगा।


बूढ़े बीमार माँ-बाप के गम, विधवा स्त्रियों की पीड़ा, बेरोजगार हृदयों की कसक, भूखे बच्चे की सिसक, निर्धन मन की जर्जरता कभी चुराई है आपने। सच आप चुरा नहीं पायेंगे और अगर चुरा पायें तो चुराकर देखियेगा। आप अपने पेशे पर शर्मायेंगे नहीं गर्व का अनुभव कर पायेंगे, बिना किसी प्रयास के आदर योग्य प्रचार पायेंगे। जो कुछ चुरायेंगे उसका कई गुना ज्यादा अपने जीवन में पायेंगे।यूँ जब आप किसी के घर से चुराते हैं रुपया पैसा कपड़े जेवर घरेलू सामान तो सिर्फ़ इतना ही नहीं मिलता आपको। आपको मिलती है घृणा, गालियाँ अभिशाप और मानसिक अशान्ति। आप सोचते होंगे होगा कोई बात नहीं लोगों को जो कहना है कहें आखिर लोगों को क्या पता आप ही चोर हैं। तो ऐसा नहीं है श्रीमान जी जब आप चोरी करते पकड़े जाते हैं या आपके पास से चोरी का माल बरामद होता है तो लोग जान जाते हैं कि आप चोर हैं। आप दिन भर रजाई में खर्राटे भरते हैं कोई धन्धा किये बगैर लोगों की नजर में मेहनत से अधिक की दौलत जोड़ लेते हैं तो लोग जान जाते हैं आप चोर हैं।
कोई जाने या न जाने आप खुद जानते हैं कि आप चोर हैं और इस बिना पर कि आप चोर हैं कभी खुद का सामना कर के देखिये जनाब। शीशे के सामने खड़े होकर अपना चेहरा देखिये और कहिये यह एक चोर का चेहरा है। मैं जानता हूँ आप नहीं कर पायेंगे ऐसा इसलिये है क्योंकि दिल के किसी कोने में अभी शर्म बाकी है भलाई बाकी है, ईश्वर से भय बाकी है, इन्सानियत बाकी है और अगर आप कर पाते हैं तो वाकई तुम्हारी आत्मा मर चुकी है।जिनके शरीर मर जाते हैं उन्हें मृत कहा जाता है जिनकी आत्मा मर गई हो उन्हें क्या कहा जायेगा। चोर महाराज मुझे एक शब्द सुझा दीजियेगा। आपका बड़ा अहसान होगा। वैसे आप अकेले नहीं होंगे इस फेहरिश्त में। हिन्दुस्तान के ९९.९९% लोग जुड़ जायेंगे उस फेहरिश्त में जिनकी आत्मा मर चुकी है। आखिर क्या कारण है कि सवा अरब आबादी में ५०० सांसद ईमानदार नहीं मिल पाते जिन्हें सत्ता सौंपी जा सके। हम सब चोर हो गये हैं। चाहते नहीं एक ईमानदार आदमी हमारा प्रतिनिधित्व करे। कहा जाता है कि लोकतन्त्र जनता के द्वारा, जनता का शासन, जनता के लिये है। तो जैसी जनता वैसा शासन, वैसी ही जनता के द्वारा।


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रविवार, 8 जनवरी 2012

हमारे गाँव की सड़कें


आजकल हमारे गाँव की सड़कें बहुत खराब हैं अगर ऐसी ही कुछ दशा आपके यहाँ की सड़कों की भी हो तो कृपया मुझे अवश्य बतायें मेरा दुख कुछ कम हो जायेगा वरना मुझे लगता है कि मेरे यहाँ छोड़कर बाकी सब ठीक है। अपने गाँव की सड़कों की दशा का बखान करते हुये कुछ दोहे हाजिर हैं।
सड़कें मेरे गाँव की, सबसे सुन्दर मित्र।
कदम कदम पर खुदे हैं, गड्ढे बड़े विचित्र॥१॥
गति सीमा के बोर्ड की, यहाँ नहीं दरकार।
दस बारह की चाल में, चलती मोटर कार॥२॥
कन्कड़ पत्थर उखड़कर, बिखर गये हैं खूब।
जल्दी जल्दी नवीकृत, होते टायर ट्यूब॥३॥
वाहन से पत्थर उछल, सिर से जो टकराय।
अस्पताल की आय में, तुरत वृद्धि हुइ जाय॥४॥
मेघों की जब जब कृपा हो जाती है मित्र।
बीच सड़क तालाब के, दिख जाते हैं चित्र॥५॥
छप्पक छप्पक जाइये, ऊपर पैन्ट समेट।
चप्पल जूते का हुआ, बिल्कुल मटियामेट॥।६॥
फिसलन से बचिके अगर, सौंदि बौंदि घर जाउ।
इच्छा होइ न होइ पै, मलि मलि खूब नहाउ॥७॥
नाली सड़कन पर बहैं, लिये निजी मलमूत्र।
जनप्रतिनिधि कर्मठ यहाँ, बतलाते हैं सूत्र॥८॥
अगर तुम्हारी गली भी,यूँ ही खस्ताहाल।
फिर तो सब कुछ ठीक है, करिये नहीं बवाल॥९॥


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मँहगाई


लोग अक्सर मँहगाई का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि उनके जमाने में एक रुपये में जितनी चीजें मिल जाती थीं उतनी चीज खरीदने के लिये अब सैकड़ों रुपये चाहिये मगर वे यह भी बताते हैं कि पहले आदमी के पास इतनी सुख सुविधाओं के साधन नहीं थे। तो क्या कुछ सम्बन्ध है मँहगाई और अमीरी गरीबी में अपने दोहों के माध्यम से मैंने देख पाने व दिखा पाने का प्रयत्न किया है कितना सफल हूँ यह आप जानें।
मँहगाई की कृपा से, बनियाइनि है कोट।
रूपया पहले कठिन अब, सरल हजारी नोट॥१॥
पुरखे नंगे पैर ही,पहुँच गये निजधाम।
मँहगाई का वक्त है, लरिका पहिने चाम॥२॥
मन्दी में सिर पर रही, कबहुँ न साबुत फूस।
आज भवन कन्क्रीट का,छ्तों टँगे फानूस॥३॥
मंदी में एक साइकिल चली चवालिस साल।
मँहगाई में बदलती फटफटिया हर साल॥४॥
मिट्टी का दीपक कहाँ घर घर रहा नसीब।
मँहगी विद्युत लैम्प की सब जानें तरकीब॥५॥
बप्पा को सरकार का मिला नहीं स्कूल।
कान्वेन्ट में पढ़ रहे मेरे घर के फूल॥६॥
प्रेमचन्द की कफन के घीसू माधव नित्य।
जन्क फूड भरपेट खा, व्हिस्की पी करें नृत्य॥७॥
मँहगाई ने भर दिये बहुतों के भण्डार।
मन्दी में सूने रहे सब, आँगन घर द्वार॥८॥
तेजी मन्दी पर बहस, बिल्कुल है बेकार।
बहती गंगा द्रव्य की, जो उतरे सो पार॥९॥


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