रविवार, 26 नवंबर 2017

चौथा बन्दर

गाँधी जी का चौथा बन्दर,
आसपास दिख जाता है।
कुछ मत बोले मत कुछ सुने,
न ऊपर नजर उठाता है।
मोबाइल या कम्प्यूटर पर,
नजर गड़ाये जारी है।
डिजिटल वर्ड में धँसा हुआ है,
भूला दुनियादारी है।

शनिवार, 25 नवंबर 2017

खुशफहमी

चलो खुशफहमी का ढोल बजाते हैं।
पहली दिसम्बर अभी दूर है,
मेरे सपनों में वोट गिने जाते हैं,
हम बिना लड़े ही चेयर पर हैं
और चेयरमैन हुये जाते हैं।

यहाँ पहली दिसम्बर से मतलब कोई भी तिथि जिस पर मतगणना होनी है और लोग जिसकी प्रतीक्षा में हैं|

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

सियासत



बात जब करो शराफ़त से करो।
जब न सुने तो लियाकत से करो।
बात सब सुन लेंगे तुम्हारी मित्रों,
घुमा फिरा के करो, सियासत से करो।।

शनिवार, 11 नवंबर 2017

क्या ऐसा हो सकता है?



मन की कितनी परतें खोलूँ|
बोलूँ तो मैं क्या क्या बोलूँ?
और बोल कर निर्भय डोलूँ|
क्या ऐसा हो सकता है?
मन संशय खो सकता है?
वादे बड़े बड़ी आशायें|
उर पर उगी कठोर शिलायें|
जन जन को कैसे समझायें?
क्या ऐसा हो सकता है?
जन का भय खो सकता है?
गंगा भी मैं यमुना भी मैं,
सरस्वती की संरचना मैं|
लेकिन कितना सूक्ष्म मना मैं?
क्या ऐसा हो सकता है?
मेरा मैं खो सकता है?

हमारीवाणी

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