बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

जीवन में सन्तुलन


एक शिशु बाल्यावस्था,  किशोरावस्थायुवावस्था तथा प्रौढ़ावस्था से गुजरते हुए कब वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाता है प्रायः व्यक्ति इस गतिशीलता से अपरिचित रह जाता है। शैशवावस्था व वाल्यावस्था को छोड़कर प्रायः वह , " जब से मैने होश संभाला अब तक बुद्धि नहीं आई ," "मेरे पास सब कुछ है किन्तु फिर भी कहीं कुछ कमी है," मैंने जीवन में बहुत कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया" जैसे जुमले बातचीत में प्रयोग किया करता है किन्तु शब्दों में इनका अर्थ व्यक्त नहीं कर पाता। ऐसा क्यों है कि सम्पूर्ण जीवन भर सीखने वाला अन्त तक अशिक्षित रह जाता है। जीवन भर धन सम्पदा का संचय करने वाला मात्र रिक्त हस्त ही नहीं अपितु आधे अधूरे मन से इस संसार से कूच कर जाता है।



समस्त घटनाओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। आधिदैविकआध्यात्मिकऔर आधिभौतिक। आधिदैविक घटनाओं को हम उपलब्ध ज्ञान - विज्ञान व उपकरणों  की सहायता से समझ नहीं सकते। ऐसी घटनाओं मे कार्य कारण सम्बन्ध की सिद्धि असम्भव होती है। इनका प्रभाव शरीर व मन दोनों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है। उदहरणार्थ - अटलांटिक महासागर में बरमूडा त्रिकोण क्षेत्र जहाँ समुद्र में जलयान व वायुयान अचानक गायब हो जाते हैंकुछ वर्षों पूर्व भारत सहित अनेक देशों में शिव परिवार की मूर्तियों द्वारा दुग्धपान , अमरनाथ की गुफा में बर्फ के शिवलिंग के निर्माण व उत्तर प्रदेश में मुँहनोचवा जैसी घटनायें विज्ञान की समझ से परे हैं। वैज्ञानिक मात्र तर्क प्रस्तुत करते हैं किन्तु घटनाओं का एक मत से यथार्थ कारण प्रस्तुत करने में असमर्थ रहते हैं। आध्यात्मिक घटनायें मनुष्य के मन श्रद्धा आस्था विश्वास ध्यान योग धर्म भगवतभक्ति आदि से सम्बन्धित हैं। इनमें कार्यकरण सम्बन्ध स्थापित करना एक सीमा तक सम्भव होता है। इनका प्रभाव पहले मन पर पुनश्च शरीर पर पड़ता है। बुद्ध द्वारा अन्गुलिमाल का हृदय परिवर्तनऋषि उपदेश द्वारा वाल्मीकि का पथ प्रदर्शनसम्मोहनतन्त्र मन्त्रधार्मिक अनुष्ठानयज्ञ इत्यादि आध्यात्मिक घटनायें हैं।
   आधिभौतिक घटनाओं में जीवन की सामान्य दैनिक वृत्तियाँ सम्मिलित हैं जिनमें कार्यकारण सम्बन्ध व्यक्त करना सरल होता है तथा जो प्रथम शरीर को तदनन्तर आत्मा को प्रभावित करती हैं। सामान्य मनुष्य को आधिभौतिक घटनायें ही सत्य प्रतीत होती हैं अन्य काल्पनिक या  मिथ्या। यही मनुष्य के अधूरेपन का कारण है। जो मनुष्य सभी प्रकार की घटनाओं को एक साथ रख कर विश्लेषण कर उनके प्रति सन्तुलन स्थापित कर लेते हैं वे सन्तोष क अनुभव करते हैं और सन्तोषी का पात्र कभी रिक्त नहीं होता।
मनुष्य प्रायः हानि की स्थिति में भाग्य जैसी आधिदैविक शक्ति को दोष देते हैं तथा विधाता को शायद यही मन्जूर थाभगवान गरीबों के साथ न्याय नहीं करता या ईश्वर ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं किन्तु जब लाभ की स्थिति में होते हैं तो कर्म जैसी आधिभौतिक शक्ति का आश्रय लेकर यह तो मेरे ही वश कि बात थीमेरी बराबरी का दम किसमें हैमेरी जगह कोई और होता तो मिट गया होता या भाग गया होता जैसी शब्दावली का प्रयोग करते हैं। मनुष्य विस्मृत कर देता है कि उनके लाभ हानि में अनेक मनुष्यों की आकांक्षाओंसदिच्छाओंप्रेरणाओंप्रोत्साहनोंनिन्दाआशीर्वाद इत्यादि अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का भी हाथ है। यदि मनुष्य किसी हानि लाभ के पीछे स्थित तीनों (दैविकभौतिकआध्यात्मिक) शक्तियों के प्रभाव का यथार्थपरक आकलन कर लें तो वे सुखे दुखे समे कृत्वk लाभा लाभौ जया जयौ की स्थिति को प्राप्त कर लें तब कोई सूनापन न रहेगा।

वास्तव में संसार का कोई भी मनुष्य न तो पूर्णतः सफल होता है न पूर्णतः असफल। उदाहरणार्थ महात्मा गाँधी ने सत्यअहिंसा व प्रेम का दर्शन प्रतिपादित ही नहीं किया अपितु उसे अपने जीवन में उतारा भी । इसी दर्शन को हथियार बनाकर उन्होंने स्वतन्त्र्ता संग्राम में अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वहन भी किया किन्तु जीवन के अन्तिम दिनों में राष्ट्र विभाजन की त्रासदी ने उन्हें मर्माहत कर दिया कि उन्हें लगा कि उनका जीवन व्यर्थ गया।
आप बाजार गये मोलभाव किया किन्तु खरीदा कुछ नहीं। एक अर्थ में आप खाली हाथ वापस आये किन्तु आपके साथ बाजार के अनुभवमस्तिष्क में अंकित वस्तुओं के भावआपकी मोलभाव कर सकने की क्षमता में वृद्धि क्या कम हैजो भविष्य में लाभ पहुचायेंगे। कोई खरीददारी करके बाजार से लौटा उससे आपको ज्ञात हुआ कि जो वस्तु वह दस रूपये में खरीद लाया है उसे आप पाँच रूपये में तय करके छोड़ आये हैं। लाभ मे कौन रहा जिसने कुछ खरीदाउसे पाँच रूपये की हानि हुई किन्तु वह लाभ में है कि उसने बाजार में समय नहीं गवाँया। आप लाभ में हैं आपने बाजार को जाना किन्तु आप हानि में हैं आपने कोई वस्तु नहीं खरीदी और समय गँवा दिया। दोनों के लिये यथार्थतः प्रसन्नता या अप्रसन्नता का कोई कारण नहीं है।
   आधुनिक युग में धन साधन न होकर साध्य की भूमिका ग्रहण कर चुका है। जीवन तनावपूर्ण है। कार्य व अवकाश के मध्य कोई सन्तुलन नहीं है। आलस्य शरीर का शत्रु है किन्तु अति सर्वत्र वर्जयेत अति श्रम स्वास्थ्य व मनःशान्ति का नाशक है। स्वास्थ्य लाभ के लिये परिश्रम व विश्राम दोनों का अपना महत्व है।
अधिक धन कुकृत्यों से एकत्र होता है जो स्वयं को तथा संतति को पतन की ओर ले जाता है। फिर अधिक धन संचय की आवश्यकता ही क्या हैपूत सपूत तो क्या धन संचय पूत कपूत तो क्या धन संचयसुपुत्र आवश्यकतानुसार धनार्जन कर लेते हैं जबकि कुपुत्र संचित धन को विनष्ट कर आत्मा को क्लेश पहुँचाते हैं तब अपने कुकृत्यों पर पछ्ताने का अवसर भी नहीं मिलता।संसार में सभी कार्य धन से संपन्न होते हैं सर्वे गुणाः कांचनम आश्रयन्ते किन्तु दैवगति धन से नहीं टाली जा सकती। धनबल से अनैतिक कार्यों पर आवरण डाला जा सकता है किन्तु देर सबेर कर्मफल से नहीं बचा जा सकता है। धनबल चाटुकारों को शरण दे सकता है किन्तु सच्चे मित्रों को आपका सद्व्यवहार ही आकर्षित कर सकता है। धनबल भौतिक सुख सुविधायें एकत्र कर सकता है किन्तु सुख शान्ति आपके सुकर्म ही दे सकते हैं। धन मनुष्य को दास बना लेता है स्वन्त्रता प्रदान नहीं करता। धन मनुष्य को उस हाथी के समान बना देता है जो आत्मिक बल से युक्त सिंह का सामना नहीं कर सकता। अतः धन व इससे सम्बन्धित सभी चीजों में मनुष्य का दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिये। धन आवश्यक है किन्तु उसके लिये पागल होना उचित नहीं।  
     

  
    मनुष्य भी क्या करे इच्छायें अनन्त होती हैं जिनकी पूर्ति के लिये वह निरन्तर शक्तिशाली होने का यत्न करता है तथा भूल जाता है कि दो पैरों का विवेकशील मनुष्य चन्द्रमा पर अपने पैरों के निशान छोड़ आया है किन्तु अविवेकी मकड़ा आठ पैरों से युक्त होकर भी अपना जाला छोड़कर कहीं नहीं जा पाया। तात्पर्यतः शक्तिशाली होने के लिये आठ पैर आवश्यक नहीं अपितु दूरदृष्टि व दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है। मनुष्य को चाहिये कि शक्ति अनुसार ही इच्छाओं को विस्तार दे।
   निष्कर्षतः सुखी, आशापूर्ण व कल्याणमय जीवन की सम्प्राप्ति में जीवन के विभिन्न पक्षों यथा कर्म, भाग्य, आवश्यकता, इच्छा, सामर्थ्य, धन, कार्य, अवकाश, नैतिकता, सद्व्यवहार, लाभ, हानि, इत्यादि के सम्बन्ध में सन्तुलित व सामंजस्यपूर्ण जीवनदृष्टि नितान्त आवश्यक है।


गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

आज सुबह

आज सुबह
आज सुबह कुछ नई नवेली]
दुल्हन सी सकुचाती आई।
नील गगन पर रौनक छाई]
जन जन को हर्षाती आई।
पक्षी चहके चीं चीं करके]
पेड़ों पर दीवाली छाई।


सोमवार, 12 सितंबर 2011

भूत होते हैं?

भूत होते हैं या नहिं होते मैंने कभी दिमाग नहीं खपाया। उनसे मुझे डर लगता है या नहीं मुझे नहीं मालूम। लेकिन जीवन में कुछ घटनायें ऐसी होती हैं जिनका रहस्य खुल जये तो मामूली लगती हैं और रहस्य न खुले तो अलौकिक या भूताचाली लगती हैं| ऐसी ही एक घटना मेरे जीवन में घटित हुई है उसका सच्चा बयान करता हूँ पढ़ें।बात सन १९८२ य ८३ की है मेरी उम्र कोई ९ साल रही होगी मैं कक्षा ४ या ५ का विद्यार्थी था मुझे ठीक से याद नहीं। मैं पिहानी से शाहाबाद जाने वाली बस पर सवार हुआ और कोई ६ बजे शाम को अन्तोरा गाँव में उतरा। वहाँ उस दिन स्थानीय बाजार लगा था। मैंने एक दुकान पर लैया के बने हुए लड्डू खरीदे जिन्हें स्थानीय भाषा में मुरमुरिया कहते हैं। पानी पिया और वहाँ से कैमी गाँव के लिये पैदल ही रवाना हुआ।अन्तोरा से कैमी कि दूरी कोई डेढ़ किमी है। आधे रास्ते में मुझे याद आया कि मैंने जो झाड़ू पिहानी में खरीदी थी वह उस दुकान पर ही भूल आया जहाँ मुरमुरिया खरीदी थी। मैं तुरन्त ही उन्हीं पैरों वापस आया खैर मुझे झाड़ू सही सलामत उसी दुकान पर मिल गयी मैंने झाड़ू उठायी पुनः कैमी के लिये प्रस्थान किया। अँधेरा हो चला था। अब मैं शायद आखिरी व्यक्ति थ
k जो इस शाम को इस रास्ते से गुजर रहा था क्योंकि मुझे इस समय कोई दूसरा इस रास्ते पर दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था।रास्ते में बरसात का पानी जमा हो जाने वाली निचली भूमि थी जिसे स्थानीय भाषा में जोर कहते हैं उस पानी में घुस कर पार करना पड़ता था। मैं भी उसमें घुसा। यह जोर कैमी व अन्तोरा के लगभग बीचोंबीच थी। मैंने जोर को घुसकर पार किया और गाँव की ओर चलने लगा। मुझे ऐसा मह्सूस हुआ कि जैसे कोई मेरा पीछा कर रहा है। मेरे चलने से सट सट सट सट की आवाज आ रही थी जैसे कोई हवाई चप्पल पहन कर मेरे पीछे पीछे चल रहा हो।मेरी उम्र कच्ची थी अँधेरा हो चुका था और उस जोर को पार करने के तुरन्त बाद में एक बाग पड़ता था जिसमें से होकर मैं गुजर रहा था। इस बाग के बारे में स्कूल के बच्चों में यह अफवाह थी कि इसमें तेजा नाम के किसी आदमी का भूत जब तब टहलता देखा जाता है इसलिये अब मुझे डर लगने लगा। बावजूद इसके कि मैं निडर प्रकृति का व्यक्ति हूँ मैंने अपनी चाल तेज कर दी तो मुझे लगा कि पीछा करने वाले ने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी है। सट सट सट सट की आवाज भी स्पीड पकड़ गयी है अब तो मेरी रूह काँप गयी और मुझे अपनी सात पुस्तें याद आ गयीं।मैं दौड़ने लगा लेकिन अपने छोटे छोटे पैरों से कहाँ तक भागता फिर मुझे भागने का अभ्यास भी नहीं था। मै थककर चूर हो गया मगर मेरा पीछा करने वाला रुक नहीं रहा था। वह भी दौड़ रहा था। इस बीच मैंने कई बार पीछे मुड़ मुड़कर देखा लेकिन पीछा करने वाला मुझे कहीं दिखायी नहीं दिया। मेरे हौसले पस्त हो गये और मैं रुक गया। लगभग रात हो गयी थी तारे इक्का दुक्का आसमान पर दिखायी देने लगे थे रात उजाली थी लेकिन रास्ते पर ५० मीटर से अधिक अब नहीं देखा जा सकता था। मैंने अँधेरे में दो चार आवाजें दीं कौन है? कौन है? कौन है? मगर वहाँ कोई नहीं था। मैं परेशान हो गया था समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ?तब मैंने फैसला किया कि अब और नहीं दौड़ूँगा चाहे जो हो जाये अब जो सामने आयेगा उससे टकराऊँगा| यद्यपि सच यह है कि थकान के कारण मैं ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था साँस उखड़ सी रही थी। कुछ देर यथावत खड़ा रहा कोई सामने नहीं आया तब मैं धीरे धीरे पुनः कैमी की ओर चला।सट सट सट सट की आवाज अब भी आ रही थी। अब मैने यह सुनने का निश्चय किया कि आखिर आवाज आ कहाँ से रही है। तब मैंने नीचे की ओर देखा आवाज वहाँ से आ रही थी। मैंने देखा कि मेरे पायजामे के दोनों पाँयचे पानी में भीगकर आपस में चिपक गये हैं और मेरे चलने से आपस में टकरा रहे हैं जिससे सट सट सट सट की आवाज आ रही है। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ हँसी भी आयी मगर मारे थकान के मैं हँस भी नहीं पाया हाँ दिल को तसल्ली जरूर मिली।

रविवार, 4 सितंबर 2011

अपने प्लॉट का एरिया क्षेत्रफल जाँचें

अपने प्लॉट का एरिया क्षेत्रफल जाँचें
एक अच्छे एवं खूबसूरत मकान की ख्वाहिश किसे नहीं होती| आप अपनी सुविधा, सामर्थ्य एवं उपलब्धता के अनुसार प्लॉट खरीद कर एक अच्छा सा घर बनवा लेते हैं और उसमें आराम से रहने लगते हैं। लेकिन कभी गौर किया है कि चौकोर वर्गाकार या आयताकार प्लॉट बहुत कम मिल पाते हैं। यदि आप वर्गाकार या आयताकार क्रमशः चित्र 1 व चित्र 2 के अनुसार प्लॉट पर मकान बनवाये हैं तब तो ठीक है अन्यथा बहुत सम्भव है कि आपके प्लॉट का जो एरिया क्षेत्रफल आपको बताया गया है अथवा आपने जो बैनामा करवाया है उससे कम हो। कभी कभी प्लॉट काटने वाले इस बात को जानते हैं और कभी कभी नहीं भी। चूंकि आप अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा खर्च कर रहे हैं तो आपके लिये अति आवश्यक है आप जो प्लॉट खरीद रहे हैं उसके सही क्षेत्रफल का ज्ञान आपको हो।
प्लॉट बेचने वाला आपको बता रहा है कि देखिये भाई साहब यहाँ पर सड़क तिरछी निकली है अतः प्लॉट तिरछे कटे हैं लेकिन लोकेशन बहुत बढ़िया है। यह जो तिरछे कटे प्लॉट हैं धीरे से आपकी जेब काट लेते हैं। उदाहरणस्वरूप आप एक प्लॉट खरीद रहे हैं जिसकी लम्बाई 80 फुट और चौड़ाई 50 फुट है तो इसका क्षेत्रफल होगा चित्र 2  की आकृति के अनुसार होने पर 80 * 50 = 4000 वर्ग फुट किन्तु यदि इसकी आकृति चित्र 3  के अनुसार है तब इस प्लॉट का क्षेत्रफल 4000  वर्ग फुट से कम होगा।अब प्रश्न यह है कि क्षेत्रफल कितना कम होगा तो यह निर्भर करेगा कि प्लॉट की किसी एक भुजा से दूसरी भुजा के मध्य लम्बवत दूरी कितनी है। यह लम्बवत दूरी चित्र 4 के अनुसार जैसे जैसे कोण C व कोण A का मान घटेगा और कोण DB का मान बढ़ेगा घटती जायेगी या जैसे जैसे कोण CA का मान बढ़ेगा तथा कोण D व कोण B का मान घटेगा बढ़ती जायेगी।
चित्र 3 व 4 के स्वरूप वाले प्लॉट का क्षेत्रफल सही रूप में इसी लम्बवत दूरी पर निर्भर करता है। ऐसी आकृतियाँ समान्तर चतुर्भुज कही जाती हैं। जिसका क्षेत्रफल निकालने का सूत्र इस प्रकार है।
क्षेत्रफल =आधार रेखा *लम्बवत दूरी
चित्र 4 के उदाहरण में प्लॉट ABC1D1 का क्षेत्रफल =  80*45 = 3600 वर्ग फुट
प्लॉट ABC2D2 का क्षेत्रफल=80*35=2800 वर्ग फुट
प्लॉट ABC3D3 का क्षेत्रफल =80*30=2400 वर्ग फुट
अब आप देखेंगे कि प्लॉट तिरछा होने पर प्लॉट विक्रेता सदैव भुजाओं ABAD को गुणा करके क्षेत्रफल निकालेगा अगर आप स्वीकारते हैं तो चित्र 1 व 2  के अनुसार न होने पर आप को हानि अवश्य होगी कम या अधिक का प्रश्न अलग है।
प्लॉट जितना अधिक तिरछा होता जायेगा आपकी जेब पर डाका उतना अधिक पड़ता जायेगा। अतः भविष्य में जब कभी प्लॉट खरीदें तो आकृति 1 व 2 को प्राथमिकता प्रदान करें।आकृति 3 की स्थिति में क्षेत्रफल का सही आकलन कर सही मूल्य अदा करें।
अब आप कहेंगे कि यह तो बहुत से गणित जानने वाले जानते होंगे तो बन्धु हममे से बहुत से लोग गणित नहीं पढ़ते जो पढ़ते हैं भूल जाते हैं।जो लोग गणित जानते हैं उनमें से बहुत से सिद्ध नहीं कर पाते हैं कि आखिर प्लॉट का क्षेत्रफल कैसे हो जाता है। या लम्ब रेखा और आधार रेखा की गुणा क्यों करें\ साइड की सामने की रेखा की गुणा क्यों नहीं करें\ तो चित्र संख्या 5 का ध्यान से अवलोकन करें।
देखें प्लॉट विक्रेता के अनुसार क्षेत्रफल ADCB का क्षेत्रफल =AB*CB या AB* AD =80*50=4000  वर्ग फुट
अब आकृति के त्रिभुज ECB को उठाकर त्रिभुज GDA पर रखें तब जो आकृति तैयार होती है वह ABEG जिसकी लम्बाई AB = 80 फुट तथा चौड़ाई GA=  DF= EB =45  फुट तथा क्षेत्रफल = 80*45=3600  वर्ग फुट। यही वास्तविक क्षेत्रफल है आकृति ABCD का भी तथा आकृति ABEG का भी। क्योंकि त्रिभुज   ECB = त्रिभुज     GDA







आशा है हमारे इस लेख से पाठकगण लाभान्वित होंगे और भविष्य में ऐसे ही उपयोगी लेख लिखने के लिये प्रेरित करेंगे। आपकी कमेंट का इन्तजार रहेगा।

हमारीवाणी

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