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शनिवार, 13 जनवरी 2018

अभिमन्यु



अर्जुन होना जीवन रण में नहीं बहुत आसान|
कृष्ण सारथी होंगे जिसके जिये वही मैदान|
जीवन के हर चक्रव्यूह का मैं ही द्रोणाचार्य|
निज वध को अभिमन्यु बनूं मैं इतना भी अनिवार्य|
उर में बचकानापन हावी बुद्धि अधूरा ज्ञान|
उतर पड़ा हूँ महासमर में क्या राखे भगवान?
 





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बुधवार, 14 नवंबर 2012

भगवान



बच्चे  भगवान तुम भगवान के पिताजी,
ऊँची   कैंटीन   की  बेकार  पावभाजी।
पानी   बेभाव  सागर  बगल  में दहाड़े,
जिह्वा है  ऐंठती  क्या  खूब जालसाजी।
माना बलवान  हो  है  पूँछ  भी तुम्हारी,
रावण के बन्धुगण देने  को  आग राजी।
सोंचो शैतान आखिर चीख क्यों पड़ा  है?
उसके व्यवसाय पर भगवान है फिदा जी।
पत्ती तू पेड़ का  षडयंत्र  भी समझ  ले,
खाती है  धूप  देती  किन्तु छाँव ताजी।
काँटों में नैन के  उलझा  हुआ  कलेजा,
ले लो जो चाहते हो दिल न फाड़ना जी।

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