रविवार, 2 जुलाई 2017

पूछते हो?

मेरे दर्दे दिल की दवा पूछते हो।
बड़े नासमझ हो ये क्या पूछते हो?
जवानी बदन से विदा माँग बैठी,
मिटी चाहतों की रज़ा पूछते हो?
गुलाबी कपोलों पे छाई निलाई।
चमन में बहारों से फिर क्या मिलाई?
नमक मिर्च घावों पे छिड़को न साजन,
समुन्दर से उसकी तृषा पूछते हो?
अभी तुम जवां हो तुम्हें सब छजे है,
तुम्हारी वजह से ही महफ़िल सजे है,
जहाँ रुक गए तुम है जन्नत वहीं पर,
क्यों  बहती हवा का पता पूछते हो।
कभी इस डगर में भी खनकी थी पायल,
अभी तक हरे जख़्म औ' दिल है घायल,
दवा कर रहा हूँ तो बढ़ती मरज है,
जली लाश की भी शिफ़ा पूछते हो।

बुधवार, 21 जून 2017

खोटा ही सही

कभी आओ कभी बुला लो मुझको।
खोटा ही सही चला लो मुझको।
सोना है जान जेवरों की माना,
टाँके की तरह मिला लो मुझको।।
کبھی آو کبھی بُلا لو مُجھکو۔
کھوٹا ہی سہی چلا لو مُجھکو۔
سونا ہَے جان زیوروں کی مانا۔
ٹاںکے کی ترہ ملا لو مُجھکو۔                       

बुधवार, 24 मई 2017

गजल- कोई तो हमको चाहिए



मुझसे कह इस वक्त अब कहीं और जाने के लिए।
कंधा किसी का मिल गया सिर को टिकाने के लिए।
वो लोग पत्थर हाथ में लेकर मिलेंगे हर जगह,
घर में नहीं है पेट भर कुछ भी पकाने के लिए।।
सब लोग शादी में कहाँ चेहरा दिखाने आएँगे?
कोई तो हमको चाहिए घर भी बचाने के लिए।।
सब देखसुन खा पी के जब ये जिन्दगी हो घाट पर,
तब आंत में बस चाहिए तन मन झुलाने के लिए।।
यूँ तो सभी के हाथ दिखतीं एक जैसी लाइनें।
फिर भी तो अन्तर खोजिये मन को मनाने के लिए।।
नववस्त्र भूषण भूषिता निज मन मुकुर की अप्सरा।
सबको कहाँ मिल पाएगी उर से लगाने के लिए।।
जब पल्लवों ने साथ छोड़ा टहनियाँ नीरस हुईं।
कोई तो ही जाएगा आरा चलाने के लिए।।
व्याकुल नहीं मन में 'विमल' है देखकर जग का चरित।
सारे मशाले चाहिए भोजन बनाने के लिए।।

रविवार, 21 मई 2017

मन्त्रियों की छाँव



अक्टूबर २००५
वार्त्तायन में प्रकाशित


आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से मधुशाला खुली रौनक बढ़ी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन बप्पा को पड़ी थी दाँव की।
वो दरोगा आज फिर कट्टा पकड़कर रह गया।
फैक्ट्री को शह मिली थी मन्त्रियों की छाँव की।
खोदकर गड्ढे सड़क पर काम तो अच्छा किया।
पार जाने के लिये इन्कम बढ़ेगी नाव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
किसलिये परवाह करता उसकी काँव काँव की।

हमारीवाणी

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