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रविवार, 28 फ़रवरी 2021

सिंगार

मेंहदी कर से छूटती, पर रह जाता रंग।
हरी पत्तियाँ लाल रँग, चित्त हो गया दंग।।1।।
गोरी छत पर बैठ कर, करती रही सिंगार।
हमसे तो बंदर भले, कर लेते दीदार।।2।।
गोरी हुई सलज्ज तो, कर बैठी कर-ओट।
मन मोहित, तन तरंगित, हृदय हर्ष लहालोट।।3।।
भ्रमर फूल के लोभ में, चख बैठा अंगार।
होना था फिर राख ही, हुआ उचित व्यवहार।।4।।
फूल-फूल उड़ता रहा, रस न कहीं था भिन्न।
जब थक कर भँवरा गिरा, कली-कली थी खिन्न।।5।।
अंगूरी काया लिए, सुभगे! अधिक न डोल।
ऋतु वसंत जब जायेगी, कौन करेगा मोल।।6।।
पोर-पोर से शहद हो, टपक रहा है नेह।
आँखें मधुमक्खी हुईं, तड़प उठी है देह।।7।।
बैठ खेत की मेड़ पर, देख न उसकी राह।
पहुँच गई घर पिया के, तज तेरी परवाह।।8।।

हमारीवाणी

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