रविवार, 30 दिसंबर 2012

सबके वश की बात नहीं




मेरे नयनों में बस जाना सबके वश की बात नहीं।
मेरी आशाओं पर छाना सबके वश की बात नहीं।
आँसू लाख टपकते उर से जीवन के सूनेपन पर।
पर मेरे सा चुप रह जाना सबके वश की बात नहीं।
कोई मेरे प्रियतम को ले जो जी चाहे कह देता है।
सुनकर मेरे सा सह जाना सबके वश की बात नहीं।
जब जी चाहे घर में आना इतना तो हो सकता है।
मेरे चाहे बिन रुक जाना सबके वश की बात नहीं।
कोई मुझसे जितना चाहे जो चाहे ले सकता है।
पर मेरा अनुभव पा जाना सबके वश की बात नहीं।


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