मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

इतिहास

मैं किसको सच मानूॅं,
देखने वाले रहे नहीं,
लिखने वाले तटस्थ होते नहीं,
मैंने इतिहास की ओर से मुॅंह मोड़ लिया है,
नाता भविष्य से जोड़ लिया है।
तुम सब गाओ अपनी-अपनी,
मैं भी अपनी गाता हूॅं।
एक नयी सड़क बनाता हूॅं।
उसके लिए सब खाईयाॅं पटेंगी,
सब टीले टूटेंगे।
रोने वाले रोयेंगे, 
मजे लूटने वाले मजे लूटेंगे,
इतिहास के व्याख्याकार, 
मजे करते हैं, 
और भ्रमित करते हैं।

बुधवार, 26 मार्च 2025

विदेशी बनाम देशी शब्दावली

वे साहित्यकार जो अन्य भाषा की शब्दावली को भारतीय भाषा में परिवर्तित करके लिखना चाहते हैं उनके लिए मेरा विचार।मूल भाषा के शब्दों को विदेशी भाषा के शब्दों से स्थानांतरित करना और विदेशी शब्दों को अंगीकार करना दो अलग-अलग चीजें हैं। भारतीय संस्कृति ही आत्मसात करने की प्रवृत्ति पर आधारित है। आज भाषा और संस्कृति का जो स्वरूप हमें दिखाई देता है उसमें देवों,‌दानवों, यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, गन्धर्वों, नागों इत्यादि की संस्कृतियों के साथ साथ हूण, कुषाण, रोमन, यूनानी, अरबी, फारसी, तिब्बती, वर्मी और वर्तमान में अंग्रेजी आदि का विस्तृत प्रभाव है, हम स्थिर नहीं रह सकते। रेल को लौह पथगामिनी लिखने पर, स्टेशन, टिकट, कोट, पैण्ट, शर्ट, साइकिल, पम्प, पेट्रोल, डीजल, टोल प्लाजा, आदि तमाम शब्दों का हिन्दी करण करना होगा। आप साहित्यकार होने के नाते पुस्तकों में इनका हिन्दी कृत रूप प्रयोग कर लेंगे किन्तु जनसामान्य इन्हें अपना नहीं पायेगा। वह अपने ही ढंग से चलता है वैसे भी सिनेमा और मोबाइल के युग में साहित्य की भूमिका बहुत सीमित हो गयी है।

शनिवार, 22 मार्च 2025

कोठे

मेरे एक मित्र ने फेसबुक पर अपनी कविता में कोठा शब्द का प्रयोग किया तो मैं भी लिख गया। कुण्डलिया का आनन्द लें।

घर घर कोठे खुल गये, आजादी के बाद।
फैशन फिल्मों से लिया, अपने सिर पर लाद।
अपने सिर पर लाद, लीद बेशर्मी की ली।
जिसको भी दो टोक, ऑंखें हों नीली पीली।
कोठे की कर बात, करो मत चोट हृदय पर।
बेशर्मी का नृत्य, दिख रहा मित्रों घर घर।।
विमल ९१९८९०७८७१

अंक में

रेशे जुटे कपास के, ऐसे मैं वो एक।
भरे परस्पर अंक में, किये प्रेम मन नेक।।

हमारीवाणी

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