सोमवार, 20 दिसंबर 2021

ईश्वर सहायता करे

समय ने कविता के क्षेत्र से राजनीति के क्षेत्र में पटक दिया। एक साधारण अध्यापक हूँ, राजनीति की बारीकियाँ नहीं समझता। न देना जानता हूँ न माँगना। किसी के काम आता हूँ यह भी मुझे नहीं पता। फिलहाल मैं लोगों से काम नहीं ले पाता यह मुझे लगता है। मेरे से किसी का कोई काम हो जाए या किसी को कुछ मिल जाए अथवा मेरा कोई काम किसी से चल जाए यह ईश्वर की अनुकम्पा है। अपना सिद्धांत है अजगर करै न चाकरी
छोटे भाई हैं। आम आदमी पार्टी से 155 विधानसभा शाहाबाद से विधायक पद के प्रत्याशी हैं। व्यवहार कुशल हैं, क्षेत्र में जनप्रिय हैं, विजय प्राप्ति की संभावनाओं और आत्मविश्वास से ओतप्रोत हैं। शिवाजी की भाँति 90 सिपाही लेकर औरंगजेब की 10000 की  सेना से टकराने और पराजित करने का हुनर रखते हैं। दो बार जिला पंचायत सदस्य पद के लिए अपार समर्थन व मत भी प्राप्त कर चुके हैं।
लोगों ने दोनों बार कहा तुम न जीतोगे मगर जीते। इस बार भी लोग अनुमान लगा रहे हैं। इनके आसपास जीतोगे या नहीं जीतोगे का कयास लगाने वालों की बड़ी भीड़ है। जो अपने अपने अनुमान सही होने का दावा करती है। वे लोग तो सबसे आगे बढ़कर भविष्य बताते हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा।  मैं अपने छोटे भाई को वैसे ही जानता हूँ जैसे माँ अपने बालक को। यह भीड़ की नहीं सुनते। इन्हें पता होता है कि यही जीतेंगे। सफलता के लिए यह आवश्यक है। भीड़ भटकाती है और जापान जाने वाले को रंगून पहुँचाती है। अपने सीमित संसाधनों के द्वारा एक बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक अच्छी योजना सदैव फलवती होती है। यह बात इन्हें पता है। इस योजना निर्माण का गुरुतर दायित्व निभाने में मुझे अपना योगदान देना है। ईश्वर मेरा सहायक हो।

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

हिरन


155 शाहाबाद विधानसभा उत्तर प्रदेश के एक गाँव में भ्रमण के दौरान मुझे खेतों में टहलता हुआ हिरन दिखा तो मैं स्वयं को रोक नहीं पाया और वैन में बैठे ही बैठे मोबाइल से कुछ तस्वींरें खींच लीं।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

सनम

अभी तो बहुत कुरकुरा हूँ सनम।
हसीनों पे चलता छुरा हूँ सनम।
न डाई रँगे बाल सिर पर रहे,
जमाना घुटे उस्तुरा हूँ सनम।।

रविवार, 28 नवंबर 2021

प्रयागराज या इलाहाबाद

क्यों भैया किसी ने खोजकर बताया नहीं कि इलाहाबाद का नाम इलाहाबाद इसलिए नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह आबाद है। कहानी यह है कि इला नाम है सरस्वती जी का। अब गंगा और यमुना तो वहाँ प्रत्यक्ष हो गईं किन्तु सरस्वती जी थीं अदृश्य तो हमारे जैसे घोंघों ने सॉरी घाघों ने इला+इह+आ+आबाद नाम से उन्हें इलाहाबाद में प्रत्यक्ष कर दिया। सच तो यह है कि अकबर के समय में इसका नाम इलाहावास था। इला+इह+आवास। मतलब देवी सरस्वती इस लोक में निवास करती हैं। आज भी इलाहाबाद के आसपास के लोग इसे इलाहावास ही बोलते हैं। अकबर के सिक्कों पर इलाहावास और इलाहाबाद दोनों खुदे मिलते हैं। मुझे लगता है अकबर ने पहले स्थानीय नाम को खुदवाया किन्तु फिर अरबी फारसी उच्चारण से साम्यता होने के कारण इसे इलाहावास से इलाहाबाद कर दिया। साथ ही अर्थ का अनर्थ भी। कहा तो यह भी जाता है कि इसका नाम इलाहाबाद जहाँगीर के समय से शुरू हुआ।
लोग कहते हैं कि यहाँ तट पर जो किला है उसे अकबर ने बनवाया। मुझे नहीं लगता। क्योंकि अकबर एक भी दिन इस किले में रुका होता तो इस किले में मस्जिद जरूर होती आगरा, दिल्ली और फतेहपुर सीकरी की तरह। अगर हो तो पाठक अवश्य अवगत करायें। उल्टे इस किले में है पातालपुर मंदिर, अक्षय वट व सरस्वती कूप जो हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं। अकबर से इस दरियादिली की उम्मीद मुझे तो नहीं है। सत्य के अनुसंधान की आवश्यकता है। 
जो भी हो अगर आप वैराग्य चाहते हैं तो हरिद्वार या उसके उत्तर जाइये, भक्ति की कामना है तो अयोध्या या मथुरा जाइये, ज्ञान की खोज में हैं तो काशी है। किन्तु निस्वार्थ भाव से चाहे प्रयागराज कहें, इलाहावास कहें या इलाहाबाद कहें। यहाँ संगम में डुबकी लगाएं और ज्ञान, भक्ति तथा वैराग्य तीनों को एक साथ पाएं।

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