बुधवार, 21 जून 2017

खोटा ही सही

कभी आओ कभी बुला लो मुझको।
खोटा ही सही चला लो मुझको।
सोना है जान जेवरों की माना,
टाँके की तरह मिला लो मुझको।।
کبھی آو کبھی بُلا لو مُجھکو۔
کھوٹا ہی سہی چلا لو مُجھکو۔
سونا ہَے جان زیوروں کی مانا۔
ٹاںکے کی ترہ ملا لو مُجھکو۔                       

बुधवार, 24 मई 2017

गजल- कोई तो हमको चाहिए



मुझसे कह इस वक्त अब कहीं और जाने के लिए।
कंधा किसी का मिल गया सिर को टिकाने के लिए।
वो लोग पत्थर हाथ में लेकर मिलेंगे हर जगह,
घर में नहीं है पेट भर कुछ भी पकाने के लिए।।
सब लोग शादी में कहाँ चेहरा दिखाने आएँगे?
कोई तो हमको चाहिए घर भी बचाने के लिए।।
सब देखसुन खा पी के जब ये जिन्दगी हो घाट पर,
तब आंत में बस चाहिए तन मन झुलाने के लिए।।
यूँ तो सभी के हाथ दिखतीं एक जैसी लाइनें।
फिर भी तो अन्तर खोजिये मन को मनाने के लिए।।
नववस्त्र भूषण भूषिता निज मन मुकुर की अप्सरा।
सबको कहाँ मिल पाएगी उर से लगाने के लिए।।
जब पल्लवों ने साथ छोड़ा टहनियाँ नीरस हुईं।
कोई तो ही जाएगा आरा चलाने के लिए।।
व्याकुल नहीं मन में 'विमल' है देखकर जग का चरित।
सारे मशाले चाहिए भोजन बनाने के लिए।।

रविवार, 21 मई 2017

मन्त्रियों की छाँव



अक्टूबर २००५
वार्त्तायन में प्रकाशित


आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से मधुशाला खुली रौनक बढ़ी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन बप्पा को पड़ी थी दाँव की।
वो दरोगा आज फिर कट्टा पकड़कर रह गया।
फैक्ट्री को शह मिली थी मन्त्रियों की छाँव की।
खोदकर गड्ढे सड़क पर काम तो अच्छा किया।
पार जाने के लिये इन्कम बढ़ेगी नाव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
किसलिये परवाह करता उसकी काँव काँव की।

मंगलवार, 16 मई 2017

नया पाठ

16/05/2017
मुहब्बत भरी शायरी लिख रहा हूँ।
स्व जीवन की नव डायरी लिख रहा हूँ।
जो पन्ने पुराने लगे ही रहेंगे,
नया हुस्न कारीगरी लिख रहा हूँ।।1।।
नया पाठ नामे गुलब्बो बढ़ाया।
बुढ़ापे से यौवन में फिर लौट आया।
खुदा की कसम राम के नाम से ली,
मरुथल में सागर से मैं खेल पाया।।2।।
गये जेठ आषाढ़ आया हो जैसे।
प्रकृति ने फिर प्राण पाया हो जैसे।
तड़प दिल में ऐसी कि बिच्छू डसा हो,
कहीं कोबरा काट खाया हो जैसे।।3।।
©विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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