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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

नारी जिनके संग नहीं

मौन भली है मौन सी, मौन त्रिया भौकाल।
मार खाइये मौन हो, करिये नहीं बवाल।।
बाबा या कि फकीर हो, सब नारी के फन्द।
नारी जिनके सॅंग नहीं, उनके फाटक बन्द।।
मिले तरक्की रात-दिन, बने लला धनवान।
चहुंदिशि फैले कीर्ति नित, क्षण क्षण हो सम्मान।
गोरू हाॅंकति गुरु बने, चेला बेंचति तेल।
कलियुग मा सम्बन्ध की, लगी चतुर्दिक सेल।। 
जिसको दें सन्देश हम, उसे समझ में आय।
वरना दल कविता मित्रवर, उसके प्रति अन्याय।। 
सालों की पूजा करें, पत्नी होय प्रसन्न। 
सीखें जो सिद्धान्त यह, सदा रहेंगे टन्न।।

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

सीधी सच्ची बात

मन को माता साध दे, सत सुर के अनुरूप|
उर भावों को दे सकूं, निश्छल हो सदरूप||1||
मेरे अनुभव लाभ दें, कर दें जन कल्याण|
माता! उन पर लेखनी, पाए लय गति प्राण||2||
माता विनती एक है मेरी यह कर जोर|
अब तो आकर काट दो अहंकार की ड़ोर||3||
नेह प्रकट हो शैल से सरि धारा की भांति|
जल कण मोती सी अमर हो शब्दों की पांति||4||
बस छूते ही खींच लें उर को ध्वनि की ओर|
अलंकारमय शब्द दे, नाच उठे मन मोर||5||
जो कानों को प्रिय लगे दर्शा दे दो छंद|
माता जिन पर लेखनी पाए गति निर्द्वन्द।।6।।
सद्य प्रफुल्लित हृदय हो रसयुत होवें कर्ण|
अधरों से प्रस्फुटित हों विचरे नभ में वर्ण||7||
संध्या संध्या सी रहे रहे प्रात सम प्रात|
उलझन सुलझाती रहे सीधी सच्ची बात||8||
सरल शब्द मस्तिष्क में पनपें तव आशीष|
सेवा सत साहित्य में झुका रहे मम शीश||9||


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शनिवार, 12 नवंबर 2022

नशा


चीलों के घर ही मिले, बन्धु! अस्थियाँ-माँस।
खरगोशों का कुटुम्बी, कठिन बचानी साँस।।
द्वेष नहीं है रंच भी, अपनी अपनी राह।
मुँह तो केवल एक है, आह करे या वाह।।
मंचों की चिंता नहीं, कवि हूँ भाँड़ न मित्र।
केवल खुद के ही लिए, रचूँ शब्द के चित्र।।
नशा जरूरी है बहुत, करते सुर नर नाग।
बिना नशे पनपे नहीं, कोई रँग या राग।।
चाय और नमकीन भी, सबको नहीं नसीब।
हम बस उससे काम लें, जो भी मिले करीब।।
ठग भी हुए हबीब हैं, रहा नहीं एतबार।
बैलगाड़ियाँ दे गए, ले गए मोटर कार।।

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

सिंगार

मेंहदी कर से छूटती, पर रह जाता रंग।
हरी पत्तियाँ लाल रँग, चित्त हो गया दंग।।1।।
गोरी छत पर बैठ कर, करती रही सिंगार।
हमसे तो बंदर भले, कर लेते दीदार।।2।।
गोरी हुई सलज्ज तो, कर बैठी कर-ओट।
मन मोहित, तन तरंगित, हृदय हर्ष लहालोट।।3।।
भ्रमर फूल के लोभ में, चख बैठा अंगार।
होना था फिर राख ही, हुआ उचित व्यवहार।।4।।
फूल-फूल उड़ता रहा, रस न कहीं था भिन्न।
जब थक कर भँवरा गिरा, कली-कली थी खिन्न।।5।।
अंगूरी काया लिए, सुभगे! अधिक न डोल।
ऋतु वसंत जब जायेगी, कौन करेगा मोल।।6।।
पोर-पोर से शहद हो, टपक रहा है नेह।
आँखें मधुमक्खी हुईं, तड़प उठी है देह।।7।।
बैठ खेत की मेड़ पर, देख न उसकी राह।
पहुँच गई घर पिया के, तज तेरी परवाह।।8।।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

अजब समझ

शेयर मार्केट चढ़ रही, लेकिन मैं बेहाल।
खुले नहीं स्कूल हैं, कोरोना की चाल।।1।।
ले न सके हैं कोर्स या, मोबाइल कुछ बन्धु।
बच्चे उनके भी हुए, बिना पढ़े गुण-सिन्धु।।2।।
अजब समझ सरकार की, करती खूब कमाल।
बसें भरी हैं ठसाठस, ट्रेनें करें सवाल।।3।।
रोगी जब घटने लगे, बिना दवा-वैक्सीन।
क्यों खतरों की लोग हैं, बजा रहे फिर बीन।।4।।
कोरोना ने कम किया, मित्र! देश को तंग।
इसके भय से हो गये, बच्चे-बूढ़े दंग।।5।।
छोड़ तुम्हारे शहर को, बढ़ा न मेरे गाँव।
कोरोना को मारते, पटक-पटककर पाँव।।6।।

बुधवार, 1 जुलाई 2020

पढ़ाई

खुसरो बहुत उदास है, खुले नहीं स्कूल।
जो पाया था ज्ञान वह, सब बैठा है भूल।।
इंटरनेट की गाँव में, हुई न अच्छी पैठ।
भट्ठा विद्या दान का, यहाँ गया है बैठ।।
कोरोना ने रोक दी, बच्चों की बढ़वार।
शिक्षा हो पायी नहीं, बन्धन हुए अपार।।
पिंजरे का तोता बना, खुसरो तके अगास।
कोरोना मर जाए तो, जीवन भरे उजास।।
चित्त हो गए गुरु जी, चेहरा भरे कराह।
रोक पढ़ाई पर लगी, कैसे हो निर्वाह।।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

दस का बीस

दो की पुड़िया आठ में, बण्डल दस का बीस।
वो मिलता मिलता है तभी, किस्मत हो इक्कीस।।
केवल सब्जी मिल रही, ठीकठाक है दाम।
कोरोना के राज्य में, बाकी सब बेदाम।।
बन्द दुकानें हैं सभी, तलब लगी है जोर।
आना जाना है कहीं, सही समय है भोर।।
चाहे जो भी बन्द हो, बन्द नहीं है पेट।
शून्य कमाई हो गयी, खाली हो गयी टेंट।।
जैसे अंध सुरंग में, यात्रा हुई अनन्त। 
इस बन्दी का देखिये, कब होता है अन्त।।

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

केजरीवाल पप्पू और योगी

दिल्ली की पब्लिक प्रिये, फिर से हुई हलाल।
माल मुफ्त का हजमकर, चुना केजरीवाल।।1।।
पप्पू तब भी फेल था, पप्पू अब भी फेल।
जीरो की स्पीड पर, खिसक रही है रेल।।2।।
योगी गैंया बैल को, दिल्ली देते भेज।
और केजरीवाल का चरवा लेते खेत।।3।।

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

दोहे


राजनीति के फंद में, बोला माँ से पूत।
मेरे बप्पा वही हैं, दीजै मुझे सबूत।।1||

कोई चौकीदार है और कोई है चोर।
घुला चुनावी रंग है रहे परस्पर बोर।।2||

चौकीदारी करो या या फिर बेचो चाय।
जब तक वोटर नासमझ, कमी मौज में नाय।।3||

गहरी नदी चुनाव की, बड़ी तेज है धार।
हाथी सायकिल पर चढ़ा, कैसे होगा पार।।4||
 




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सोमवार, 18 मार्च 2019

प्रियंका जी

मोदी सरकार 55 वर्ष तक चिल्लाती रही बेटी बचाओ पढ़ाओ| राहुल जी को बहुत देर से समझ में आया वो भी इतना कि बेटी पढ़ाओ बेटी बढ़ाओ| अब राहुल जी तो ठहरे कुंवारे सो बेटी तो थी नहीं| हाँ बहन थी सो ऐन इलेक्शन के वक्त प्रियंका जी को बढ़ा दिया आगे| बोल जय गंगा मइया की विशेषकर इलाहाबाद से बनारस वाली की| एक बात और इससे पता चलता है कि पप्पू को लग रहा है अब अपने बूते कभी पास नहीं होगा| 
एक बात और लोग एयर स्ट्राइक को लेकर प्रायः सरकार से सबूत माँग रहे हैं| इस पर एक दोहा 
राजनीति के फंद में, माँ से बोला पूत|
मेरे बप्पा कौन हैं, दीजे मुझे सबूत||

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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

पन्द्रह लाख


मन्दिर बन पाया नहीं, मिले न पन्द्रह लाख।
मतदाता ने भी रखा, बीजेपी को ताख।।
नए नोट की चमक सा, फीका हुआ प्रभाव।
मतदाता सहलायेगा, कब तक अपने घाव।।
भूल गए सब वायदे, सबका किया विकास।
सबसे अधिक सवर्ण का, शासन में उपहास।।

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सोमवार, 6 नवंबर 2017

चाय और नमकीन

तन बेचारा लोमड़ी, लेकिन मन लँगूर।
डाल अगर किञ्चित् झुके, खा पाऊँ अँगूर।।1।।

एक साथ में दे गयी, मजे सुन्दरी तीन|
सुबह सलोनी धूप सँग, चाय और नमकीन।।2।।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

नोट बंद

04/12/2016

अपनी अपनी खोपड़ी, अपना भूसा घास।

दुर्दिन जब भी आयेंगे, बेदम च्यवनप्राश।।1।।

नोट बंद अच्छा हुआ, बुधिया को विश्वास।

नमो राज में चोर की, मर जायेगी सास।।2।।

रंग मंच के खेल सब, दुर्बल का उपहास।

धनिकों का आनन्द है, निर्धन के हित फाँस।।3।।

एक रुपैया के लिए, मुर्गा पूरा क्लास।

वाह गुरू जी शिष्य से, अच्छा है परिहास।।4।।



गुरुवार, 24 मार्च 2016

होली का त्यौहार है


अम्मा बड़ी हताश हैं पप्पू बहुत उदास।

सत्ता का घोड़ा छुटा, छुटी हाथ से रास।।

रंग बदरंग हो गये।

खोपड़े तंग हो गये।।

जनाधार को खिसकता देख रहे अखितेश।

अफसर भुगतेंगे अगर हार गये वह रेस।।

नतीजा जो भी आये।

हिले कुर्सी के पाये।।

अनुमानों की रेस में हाथी का है क्रेज।

बीजेपी भी धार से लगती है लबरेज।।

पास आया सन सत्रह।

कांग्रेस करे दुराग्रह।।

पगड़ी वाले छुटे तो मिले केजरीवाल।

गठे चुटकुले इस तरह बन गयी एक मिसाल।।

फंसे हैं ऑड इवेन में।

बसे हर दल के मन में।

लालू और नितीश की खिचड़ी बड़ी कमाल।

धरी रही मैनेजरी उतर गयी सब खाल।।

अमित जी कला खा गये।

विरोधी किला पा गये।।

होली देहरादून में रंगीली इस बार।

रंग चले कुछ इस तरह संकट में सरकार।।

वेवफा कुर्सी भइया।

डुबाये किसकी नैया।।

अन्ना जी खामोश हैं रामदेव वाचाल।

टीवी पर वह बेचते तरह तरह का माल।।

लगा मैगी पर ताला।

योग संग बिके मशाला।।

रँग जेएनयू में बंटे लिए बाल्टी आव।

देशद्रोह से पगे हैं गुझिया पापड़ खाव।।

राहुल जी के मन भाए।

कन्हैया घर हो आये।।

होली का त्यौहार है मेलजोल की रस्म।

उर की कटुता आज से होनी चाहिय भस्म।।

प्रेम की जय जय बोलो।

कर्म में मिश्री घोलो।।

रविवार, 4 मार्च 2012

जंगल की सरकार


जंगल के पशु एक दिन, हुए कहीं एकत्र।
करने को सुविचार यह,हो वन में जनतन्त्र॥१॥
सबको रोटी , वस्त्र, घर, हो हर कर को काम।
शेरों के खरगोश अब, होंगे नहीं गुलाम॥२॥
रोटेशन से चलेगी, जंगल की सरकार।
आरक्षण की बहुत है, चूहों को दरकार॥३॥
शेर न राजा आज से, मन्त्री नहीं सियार।
सिंहासन आसीन हो, चुनी हुई सरकार॥४॥
सेनापति की पोस्ट पर, भईंसा हो आसीन।
नीलगाय, गदहा, सुअर, मन्त्री होंगे तीन॥५॥
बन्दर, चूहा, चिरैयाँ, तकैं अन्नभण्डार।
लोकपाल लागू करौ, मेटौ भ्रष्टाचार॥६॥
उल्लू, गिद्ध, बिलाव अब, किया करेंगे न्याय।
संसद जैसा यहाँ भी, होगा एक निकाय॥७॥
चर्चा में आये नहीं हाथी चीता बाघ।
आयोगों के मुख्य पद, झटकेंगे ये घाघ॥८॥
तभी कहीं से आ गया, निज दल बल संग शेर।
सभा छोड़ भागे सभी, किये बिना कुछ देर॥९॥


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रविवार, 8 जनवरी 2012

हमारे गाँव की सड़कें


आजकल हमारे गाँव की सड़कें बहुत खराब हैं अगर ऐसी ही कुछ दशा आपके यहाँ की सड़कों की भी हो तो कृपया मुझे अवश्य बतायें मेरा दुख कुछ कम हो जायेगा वरना मुझे लगता है कि मेरे यहाँ छोड़कर बाकी सब ठीक है। अपने गाँव की सड़कों की दशा का बखान करते हुये कुछ दोहे हाजिर हैं।
सड़कें मेरे गाँव की, सबसे सुन्दर मित्र।
कदम कदम पर खुदे हैं, गड्ढे बड़े विचित्र॥१॥
गति सीमा के बोर्ड की, यहाँ नहीं दरकार।
दस बारह की चाल में, चलती मोटर कार॥२॥
कन्कड़ पत्थर उखड़कर, बिखर गये हैं खूब।
जल्दी जल्दी नवीकृत, होते टायर ट्यूब॥३॥
वाहन से पत्थर उछल, सिर से जो टकराय।
अस्पताल की आय में, तुरत वृद्धि हुइ जाय॥४॥
मेघों की जब जब कृपा हो जाती है मित्र।
बीच सड़क तालाब के, दिख जाते हैं चित्र॥५॥
छप्पक छप्पक जाइये, ऊपर पैन्ट समेट।
चप्पल जूते का हुआ, बिल्कुल मटियामेट॥।६॥
फिसलन से बचिके अगर, सौंदि बौंदि घर जाउ।
इच्छा होइ न होइ पै, मलि मलि खूब नहाउ॥७॥
नाली सड़कन पर बहैं, लिये निजी मलमूत्र।
जनप्रतिनिधि कर्मठ यहाँ, बतलाते हैं सूत्र॥८॥
अगर तुम्हारी गली भी,यूँ ही खस्ताहाल।
फिर तो सब कुछ ठीक है, करिये नहीं बवाल॥९॥


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