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बुधवार, 23 दिसंबर 2020

लोटा नहीं न डोर

मेरी खुली किताब के पन्ने पलट के देख।
चाँदी के भाव बिक गये सिक्के गिलट के देख।।1।।
केवल दरोदिवार से पूछो नहीं हालात,
सुननी जो तुझको खनक तो बिस्तर उलट के देख।।2।।
यूँ तो हमारे चित्त का कुछ भी नहीं प्रसार,
ब्रह्माण्ड बस गया यहाँ थोड़ा सिमट के देख।।3।।
रूखा बहुत स्वभाव है सब जानते हैं बन्धु,
स्नेहिल हृदय समूर सा इससे लिपट के देख।।4।।
बारिश नहीं हुई तो क्या फिसलन है हर जगह,
चिकना हूँ मार्बल सा इसपर रपट के देख।।5।।
भइया 'विमल' के पास थी लोटा नहीं न डोर,
कैसे मिटी ये प्यास फिर, बादल झपट के देख।।6।।

रविवार, 21 मई 2017

मन्त्रियों की छाँव



अक्टूबर २००५
वार्त्तायन में प्रकाशित


आज फिर से बिक गयी पायल किसी के पाँव की।
जब से मधुशाला खुली रौनक बढ़ी है गाँव की।
रो-कलपकर शान्त आखिर हो गया बच्चा विकल।
दूध लाता कौन बप्पा को पड़ी थी दाँव की।
वो दरोगा आज फिर कट्टा पकड़कर रह गया।
फैक्ट्री को शह मिली थी मन्त्रियों की छाँव की।
खोदकर गड्ढे सड़क पर काम तो अच्छा किया।
पार जाने के लिये इन्कम बढ़ेगी नाव की।
द्वार से मैंने भिखारी को भगाया आज फिर।
किसलिये परवाह करता उसकी काँव काँव की।

मंगलवार, 16 मई 2017

नया पाठ

16/05/2017
मुहब्बत भरी शायरी लिख रहा हूँ।
स्व जीवन की नव डायरी लिख रहा हूँ।
जो पन्ने पुराने लगे ही रहेंगे,
नया हुस्न कारीगरी लिख रहा हूँ।।1।।
नया पाठ नामे गुलब्बो बढ़ाया।
बुढ़ापे से यौवन में फिर लौट आया।
खुदा की कसम राम के नाम से ली,
मरुथल में सागर से मैं खेल पाया।।2।।
गये जेठ आषाढ़ आया हो जैसे।
प्रकृति ने फिर प्राण पाया हो जैसे।
तड़प दिल में ऐसी कि बिच्छू डसा हो,
कहीं कोबरा काट खाया हो जैसे।।3।।
©विमल कुमार शुक्ल'विमल'

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