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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

नारी जिनके संग नहीं

मौन भली है मौन सी, मौन त्रिया भौकाल।
मार खाइये मौन हो, करिये नहीं बवाल।।
बाबा या कि फकीर हो, सब नारी के फन्द।
नारी जिनके सॅंग नहीं, उनके फाटक बन्द।।
मिले तरक्की रात-दिन, बने लला धनवान।
चहुंदिशि फैले कीर्ति नित, क्षण क्षण हो सम्मान।
गोरू हाॅंकति गुरु बने, चेला बेंचति तेल।
कलियुग मा सम्बन्ध की, लगी चतुर्दिक सेल।। 
जिसको दें सन्देश हम, उसे समझ में आय।
वरना दल कविता मित्रवर, उसके प्रति अन्याय।। 
सालों की पूजा करें, पत्नी होय प्रसन्न। 
सीखें जो सिद्धान्त यह, सदा रहेंगे टन्न।।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

बदल गया स्कूल

बाबा कबीर का एक दोहा याद आता है,
"गुरु कुम्हार घट शिष्य है गढ़ गढ़ काढ़इखोट।
अंतर हाथ सहार दइ बाहर दइ दइ चोट ।।"

वक्त बदल गया तो इस दोहे को छोड़िये जनाब और यह कुंडलिया पढ़िये।

"गुरु विक्रेता शिष्य है, क्रेता अति धनवान।
पैसा खींचत गुरु भला, भला न पकड़े कान।
भला न पकड़े कान, कभी अपने शिष्यों का।
देवे भले न ज्ञान, कभी अपने हिस्सों का।
विद्यालय को छोंड़ क्लास ट्यूशन की लेता।
है पैसे की होड़, ज्ञान  का गुरु विक्रेता।।"

हमारीवाणी

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